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19 फरवरी 2024 · FEB 19 , 2024

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पाठको की चिट्ठियां
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

आनंद लेना ही बेहतर

आउटलुक की 5 फरवरी की आवरण कथा, ‘आस्था बनाम सियासत’ राम मंदिर प्रतिष्ठा को सिलसिलेवार ढंग से बताती है। देखने से लग रहा है कि यह मुद्दा भाजपा को फायदा पहुंचाएगा लेकिन भारत में कई लोग हैं, जिन्हें राम मंदिर में दिलचस्पी नहीं है। कुछ लोगों को राम में आस्था होगी, लेकिन जरूरी नहीं कि वे भारतीय जनता पार्टी को ही वोट करें। क्योंकि कई हैं, जिन्होंने राम के आने पर खुशी नहीं मनाई। देखा जाए, तो उन्हें राम से नहीं बल्कि उस व्यक्ति से बैर है, जो भाग्य से इस आयोजन का कर्ता-धर्ता बन गया। लेकिन एक व्यक्ति के लिए आखिर राम मंदिर को निशाना क्यों बनाना। इसे भी अन्य मंदिर की तरह मान कर बात खत्म कर देना चाहिए। जितनी बात इस मंदिर को लेकर होगी, उतनी ज्यादा भाजपा मजबूत होती जाएगी। फिर एक बात तो सभी को माननी होगी, कि यह कठिन काम था और हर कोई मान कर चलता था कि यह मुद्दा प्रलय तक चलेगा। अगर यह मुद्दा सुलझ कर मंदिर बन सका है, तो कहीं न कहीं विधाता भी चाहते ही होंगे कि फलां व्यक्ति ही इस काम को पूर्ण करेगा। रामायण के बाल कांड में भी लिखा है, होइहैं सोइ जो राम रचि राखा, का करि तरक बढ़ावहुं साखा।  इसलिए अच्छा हो कि खुशी के इन क्षणों का गहरी आस्था के साथ आनंद लिया जाए।

सुमेर सिंह सोलंकी | बड़वाह, मध्य प्रदेश

 

अनिर्णय की स्थिति

5 फरवरी की आवरण कथा, ‘आस्था बनाम सियासत’ पढ़ी। पक्ष-विपक्ष की कई बातें इसमें कही गई हैं। एक बात अखरने वाली लगी। इस लेख में राजनीतिक विश्लेषक अपूर्वानंद के हवाले से कहा गया है कि भाजपा इसका इस्तेमाल करेगी। करेगी भी, तो इसमें गलत क्या है। यह विवाद इतने दिनों तक पलता ही इसलिए रहा कि किसी ने इसके समाधान के बारे में सोचा ही नहीं। भारत में अब तक अनिर्णय की स्थिति को ही निर्णय की स्थिति मान कर चला जाता था। कोई व्यक्ति देश में लंबित समस्याओं को सुलझा रहा है, तो गलत क्या है। पहले जो लोग देश पर राज कर रहे थे, वे इन समस्याओं की ओर देख लेते और इसका फायदा ले लेते। उन्हें किसने रोका था। लेकिन काम कर रहे व्यक्ति पर प्रश्नचिन्ह लगाना, उसे राजनीति से जोड़ देना भारत का प्रिय शगल है। जिसे मंदिर न जाना हो न जाए, लेकिन इसे सिर्फ राजनीतिक मुद्दे में न समेटा जाए। करोड़ों लोगों की राम पर आस्था है और रहेगी।

श्रीवत्सला नेगी | नैनीताल, उत्तराखंड

 

सब सौहार्द से रहें

5 फरवरी की आवरण कथा, ‘आस्था बनाम सियासत’ बहुत ही विस्तृत तरीके से लिखी गई है। यह सिलसिलेवार ढंग से पूरे घटनाक्रम की जानकारी देती है। इस लेख को पूरा पढ़ कर यही समझ आया कि भारत में कभी भी किसी विवाद को खत्म करने की कोशिश नहीं की जाती है। हर बार जब कोई बड़ी घटना होती है और उसके इतिहास को खंगाला जाता है, तब पता चलता है कि विवाद की जड़ इतनी पुरानी होती है कि व्यक्ति उसका इतिहास पढ़ कर ही ऊब जाए। राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद भी अगर वक्त रहते सुलझा लिया गया होता तो शायद यह नौबत नहीं आती। सरकार चाहे, तो सब कर सकती हैं। लेकिन वोट के चक्कर में सरकार वैसा निर्णय लेती है, जो बाद में जी का जंजाल बन जाता है। मंदिर बनने पर कुछ खुशी से पागल हैं, तो कुछ दुख में। दोनों ही प्रकार का अतिरेक गलत है। राम मंदिर की खुशी भले ही न हो लेकिन कम से कम इस बात की खुशी तो मनाई ही जा सकती है कि इतना लंबा विवाद सुलझ गया। सब सौहार्द से रहें यही कामना की जा सकती है।

श्रीकांत कुलकर्णी | मुंबई, महाराष्ट्र

 

बाकी सब अतीत

आउटलुक के 5 फरवरी अंक में, संपादकीय ‘आस्था का प्रतीक’ अच्छा लगा। वाकई, अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा नए अध्याय की शुरुआत है। और इसे ऐसे ही देखा भी जाना चाहिए। अब तक जो भी विवाद थे, उनके बारे में अब न बात होनी चाहिए, न आरोप-प्रत्यारोप। इस फैसले से यह भी आशा बंधी कि लंबे समय से चली आ रही कानूनी लड़ाई का भी अंत हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसमें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कोर्ट के निर्णय के बाद अयोध्या में अब मंदिर के अलावा सब अतीत है। मंदिर वर्तमान है और वर्तमान का सभी लोगों को स्वागत करना चाहिए। जैसा कि लेख में है, ‘इस मंदिर के बनने के बाद तमाम राजनैतिक लड़ाइयां अब इतिहास का हिस्सा हो जाएंगी’ ऐसा होगा नहीं, क्‍योंकि भारत राजनीतिक बहस के मुद्दे को कभी खत्म नहीं करता। साल दर साल इसी पर बहस होती रहेगी। आने वाले आम चुनाव में भाजपा जोरदार ढंग से फिर सत्ता में आ जाती है, तो बहस होगी। नहीं आ पाती है, तो ज्यादा बहस होगी। यानी इस मंदिर को चुनाव विश्लेषक, विरोधी कभी मंदिर का दर्जा दे ही नहीं पाएंगे। यह उनके लिए हमेशा राजनैतिक मुद्दा रहेगा और आस्था गौण हो जाएगी।

प्रेम प्रकाश आनंद | मोगा, पंजाब

 

बाकी पछता रहे होंगे

5 फरवरी के अंक में, ‘आस्था का प्रतीक’ पढ़ा। वाकई अयोध्या में मंदिर निर्माण बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है। भारतीय जनता पार्टी इसी लहर पर सवाह होकर यहां तक पहुंची है। लेकिन देखने वाली बात यह भी रही कि भाजपा ने इस आग में हाथ डालने का खतरा मोल लिया। अगर यह दांव न चलता, तो भाजपा हमेशा के लिए खत्म हो सकती थी या किसी एकाध हिंदी राज्य में क्षेत्रीय दल जैसी स्थिति में आ सकती थी। इस बात से शायद ही किसी की असहमति हो कि भाजपा ने भले ही इसकी सियासी जमीन तैयार की लेकिन इसे लक्ष्य तक नरेंद्र मोदी ने ही पहुंचाया। यह उनके ही सामर्थ्य की बात थी। जो दल इस मुद्दे से दूरी बरत रहे थे, अब वे पछता रहे होंगे। उन्होंने भारतीय जनमानस को समझने में भूल कर दी। अब क्या हो सकता है, जब चिड़िया चुग गई खेत।

श्रेष्ठ कनौजिया | दिल्ली

 

हिंदुत्व का उदय

5 फरवरी के अंक में ‘आस्था का प्रतीक’ हर पहलू को ठीक ढंग से समझाता है। दरअसल भारत की जनता शुरू से ही आस्थावान रही है। लेकिन पहले स्थितियां ऐसी नहीं थी कि इतनी बड़ी संख्या में लोग अपने आराध्य के प्रति ऐसा प्रदर्शन कर पाते। जो भी दल अपने सियासी कारणों से इस मुद्दे से दूरी बना कर चल रहे थे, वे इस स्थिति को भांप नहीं पाए। दरअसल हर पार्टी को यही लगता रहा कि आस्था बहुत व्यक्तिगत विषय है। इस व्यक्तिगत में समुदाय खास को नाराज न करने मंशा भी छुपी हुई थी। भाजपा में ही यदि कोई दूसरा नेता सत्ता संभाल रहा होता, तो भी ऐसा माहौल नहीं बनता। दरअसल इस मुद्दे पर बार-बार बात कर इसे बहुत ही ज्यादा संवेदनशील बना दिया गया था। फिर सभी को लगने लगा कि इसे न छेड़ा जाए, तो ही बेहतर होगा। भाजपा ने भी कहां सोचा होगा कि एक दिन वाकई यह हो सकेगा। नरेन्द्र मोदी की सूची में जो काम एक बार आ जाता है, वे उसे पूरा करके ही छोड़ते हैं। अब विरोधियों को यह बात समझ आ गई होगी। कांग्रेस चाहती, तो इस मुद्दे को बरसों पहले खत्म कर भाजापा से मुद्दा ही छीन सकती थी। लेकिन वह भाजपा पर बहुसंख्यकवाद और हिंदुत्व की राजनीति करने का आरोप ही लगाती रह गई और भाजपा इस मुद्दे पर जनमानस को आंदोलित करने में कामयाब रही। रही बात, भाजपा के लिए राजनैतिक रूप से फायदे तो इसमें शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है, भाजपा ने इसका पहले भी फायदा उठाया और अब भी उठाएगी ही।

राजाराम त्रिपाठी | बांदा, उत्तर प्रदेश

 

दिमाग पर नियंत्रण!

22 जनवरी अंक में आवरण कथा ‘लाइक्स की लत’ शीर्षक पढ़कर लगा था कि यह सिर्फ सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वालों के दिमागी खलल पर आधारित होगी। लेकिन, जब इसे पढ़ना शुरू किया तो मंत्रमुग्ध होकर पढ़ता चला गया। क्या कमाल की जानकारी और कमाल की भाषा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआइ, सूचना-प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया के इतने सारे पहलू एक साथ पहले किसी लेख में नहीं पढ़े थे। नए दौर की इस देन के मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक, सामाजिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक और कूटनीतिक प्रभावों को इस लेख में बहुत ही खूबसूरती के साथ पिरोया गया है। यह अद्भुत है और अत्यंत विचारोत्तेजक भी। खासकर, गुलामी के उपकरणों को अपनी स्वतंत्रता का जरिया मान लेने की जो गलती हम लगातार करते रहे हैं, वह हिस्सा तो झकझोर देने वाला है। क्रिएटर और मैट्रिक्स सरीखी फिल्में अब सिर्फ कल्पना नहीं लगतीं, बल्कि एक ऐसे भविष्य का चेतावनी-पत्र लगती हैं, जो हमसे बहुत दूर नहीं है। क्या हम ऐसी व्यवस्था के जाल में नहीं फंसते जा रहे, जिस पर सिर्फ मस्क, एल्‍टमैन, सर्जेइ ब्रिन और जेफ बेजोस जैसे मुट्ठी भर लोगों का नियंत्रण होगा? दुनिया अब वाकई खतरनाक बदलाव की ओर है। सबसे भयावह है लोगों के दिमाग पर नियंत्रण की कोशिश। नई टेक्नोलॉजी के इस खतरे के प्रति हमें सावधान होना होगा।

संदीप अग्रवाल | नागपुर, महाराष्ट्र

 

पुरस्कृत पत्र: आस्‍था की राजनीति

राम घर आए, इससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता। ईश्वर में आस्था रखने वाले तो खुश है लेकिन साथ में वे लोग भी खुश हैं, जो ईश्वर को नहीं मानते। आउटलुक की 5 फरवरी की आवरण कथा, ‘आस्था बनाम सियासत’ ने मन प्रसन्न कर दिया। यह ईश्वर से ज्यादा भारत के लिए गौरव का क्षण है। इसलिए नहीं कि वहां मंदिर बना, बल्कि इसलिए कि गलत को सही किया गया। हमें आक्रांताओं से भी शिकायत नहीं होनी चाहिए, उनका काम ही नष्ट करना है। लेकिन हर संस्कृति को अंततः इतना मजबूत होना चाहिए कि वह अपना गौरवशाली अतीत फिर स्थापित कर ले। राम का बिराजना इसी स्थापना की एक कड़ी है। हर भारतीय को इस पर गर्व होना चाहिए क्योंकि यह राजनीतिक मुद्दा नहीं, आस्था है।

सत्यव्रत जमदग्नि | ऋषिकेश, उत्तराखंड