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नशे की गुत्थी और उलझी

पंजाब में नशे से मौतों का सिलसिला बढ़ा तो पड़ाेसी हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल, जम्मू में भी बेरोजगार पीढ़ी लत में लस्त-पस्त
सख्ती और जब्तीः अमृतसर में सीमा पार से करीब 35 करोड़ रुपये की हेरोइन के साथ गिरफ्तार तस्कर

विश्व पर्यावरण दिवस पांच जून से मिशन 'तंदरुस्त पंजाब' चला रही कैप्टन सरकार 26 जून को जालंधर में अंतरराष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस मना रही थी जबकि वहां से 80 किलोमीटर दूर अमृतसर, तरनतारन में चार दिन पहले से ही चिट्टे (ड्रग्स के नशे) की ओवरडोज से मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी। 22 जून को अमृतसर में चिट्टे की ओवरडोज से मौत की नींद सोए, आप नेता मोतीलाल पासी के बेटे कर्ण पासी (26 वर्ष) और उसके दोस्त हरप्रीत (28 वर्ष) की चिता की आग अभी ठंडी नहीं हुई थी कि 23 जून को वायरल हुए वीडियो में नशे का इंजेक्शन हाथ में गड़ाए कोटकपुरा के 22 वर्षीय बलविंदर की मां कश्मीर कौर की, बेटे को मौत के आगोश से जगाने की जद्दोजहद देख देश विचलित हो उठा। तरनतारन के गांव धोतियां का गुरभेज सिंह, भेल का नवनीत, भिखीविंड का गुरजीत, गोइंदवाल का गुरुलाल, झब्बल गांव का सुरजीत सिंह नशे की ओवरडोज से सदा के लिए सो गए। इन चार दिनों (22 से 25 जून) में ही आठ जानें चिट्टे ने लील ली।

पीजीआइ चंडीगढ़ ने दो साल तक नशाग्रस्त पंजाब में किए अध्ययन में पाया कि 14.7 फीसदी (31 लाख) आबादी किसी न किसी नशे की चपेट में है। सभी 22 जिलों में किए सर्वे के मुताबिक, सबसे ज्यादा मानसा जिले की 39 फीसदी आबादी नशे की गिरफ्त में है। 78 फीसदी लोग ड्रग्स डीलरों से नशा खरीदते हैं और 22 फीसदी मेडिकल स्टोरों से।

यह पंजाब तक ही सीमित नहीं है। दिल्ली के इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च सेंटर (‌क्रिड) के एक सर्वे के अनुसार, हरियाणा के सिरसा और अंबाला, राजस्थान के श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़, जम्मू-कश्मीर के जम्मू और कठुआ में नशे की लत फैल चुकी है। सर्वे संकेत देता है कि अमीर वर्ग अफीम और हेरोइन जैसे महंगे नशे के दलदल में फंसा है जबकि गरीब वर्ग सिंथेटिक केमिकल नशे की गिरफ्त में है। इसलिए पानी सिर से ऊपर बहने लगा है।

सियासी मुद्दा

2017 के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा सियासी मुद्दा बना नशा सत्ता हासिल होते ही हुक्मरानों के सिर से उतर गया। 16 महीने पहले आई कांग्रेस की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार का चार हफ्ते में नशे के खात्मे का दावा कहीं नहीं टिका। इन 16 महीनों में नशा रोकने की कोशिशें तेज तो हुईं मगर मौतों का सिलसिला भी तेज हो उठा।

बढ़ते मामले देख पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट ने भी सरकार को फटकार लगाई। हालांकि, मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने आउटलुक से बातचीत में तर्क दिया कि उनकी “सरकार ने ड्रग्स  तस्करों और सप्लायरों की कमर तोड़ दी है। हांगकांग में एक बड़ा तस्कर बचा है जिसे इंटरपोल की मदद से दबोचने की कोशिश जारी है। ड्रग्स सप्लाई घटने और रेट बढ़ने से इलाज के दौरान नशे के विकल्प के रूप में दी जाने वाली दवाओं के इंजेक्शन पीड़ितों ने अपनी नसों में लगाने शुरू किए तभी एकाएक इतनी मौतें हुईं।” कैप्टन के सुर में सुर मिलाते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने भी कहा कि नशे से नहीं, अब नशा न मिलने की वजह से मौतें बढ़ रही हैं। नशे के खात्मे के लिए बनाई गई स्पेशल टॉस्क फोर्स (एसटीएफ) के प्रमुख, एडीजीपी हरप्रीत सिद्धू का कहना है कि राज्य के पास ओवरडोज से मरने वालों के कोई आंकड़े नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हम ऐसे आंकड़े जुटाएंगे, ताकि समस्या पर जल्द काबू पाया जा सके।

आंकड़े सरकारी बयानों पर भारी

हालांकि, स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक, 15 मई से 15 जुलाई के दौरान 60 दिनों में पंजाब के माझा-दोआबा क्षेत्र के अमृतसर, तरनतारन, होशियारपुर, जालंधर, गुरदासपुर के अलावा मालवा के फिरोजपुर, बठिंडा, फरीदकोट और लुधियाना के करीब 63 मृतकों के पोस्टमार्टम में केमिकल के सबूत पाए गए। नशे की भेंट चढ़े इन 63 लोगों की सरकारी अस्पतालों में हुई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पाया गया कि सभी 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के थे, जिसमें पांच 21 वर्ष से कम और एक 18 साल का ही था। जबकि पुलिस के आंकड़े मरने वालों की संख्या सिर्फ दो ही बता रहे हैं।

इतना ही नहीं, नशे की गिरफ्त में फंसी दो महिलाओं ने अपने हालात के लिए फिरोजपुर के डीएसपी दलजीत सिंह ढिल्लों और जालंधर के हेड कांस्टेबल इंद्रजीत सिंह को जिम्मेदार ठहराया। उसके बाद डीएसपी और हेड कांस्टेबल बर्खास्त किए गए, एक इंस्पेक्टर को जबरन रिटायर कर दिया गया और सात पुलिस मुलाजिम सस्पेंड कर दिए गए।

पुलिस की मिलीभगत

दरअसल, ऐसे आरोप भी हैं कि जिस पुलिस पर नशे की सप्लाई-खपत चेन तोड़ने की जिम्मेदारी है, वह खुद ही उस चेन की अहम कड़ी बनी हुई है। 100 से अधिक पुलिस मुलाजिमों के नशे के खेल में शामिल होने का शक है जिनमें  से 30 पिछले 15 महीनों में गिरफ्तार किए गए हैं। 7 से 11 जुलाई के बीच 14 एसएसपी, 130 डीएसपी बदले गए, पर नशे की चपेट में आए सीमावर्ती जिलों में एक दशक से भी ज्यादा समय से कई एसएचओ एक ही पोस्टिंग पर काबिज हैं। फिलहाल, मुख्यमंत्री ने राज्य पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) से हर तीन साल में मुंशी से लेकर एसएचओ तक के तबादले की एक पुख्ता पुलिस तबादला नीति बनाने को कहा है।

सरकार बनने के चार हफ्ते में राज्य को नशे के जंजाल से बाहर निकाल लाने के लिए गुटखा साहिब की सौगंध खाने वाले मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के 16 महीने बीत गए। लेकिन राज्य नशे की गर्त में धंसता ही जा रहा है। यह सही है कि जनवरी 2017 से 24 जून 2018 तक 18,800 गिरफ्तारियां हुई हैं, 16,315 मामले दर्ज हुए हैं और 660 किलो हेरोइन, 117 किलो चरस, 14 किलो स्मैक जब्त की गई है। सरकार इस पर अपनी पीठ भी थपथपा रही है। लेकिन नशा तो नहीं टूटा, उसके बदले लोगों की जान टूट रही है, परिवार बिखर रहे हैं। दरअसल, जनवरी 2014 से जून 2018 तक 56,136 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं और नार्कोटिक ड्रग्स ऐंड साइकोट्रोपिक सब्सटांसेज (एनडीपीएस) एक्ट के तहत 48,425 मामले दर्ज हुए हैं। लेकिन सरकार और पुलिस के पास यह बताने के आंकड़े नहीं हैं कि इनमें कितने ड्रग्स सप्लायर हैं और कितने नशे की खपत करने वाले। हालांकि, मुख्यमंत्री यह कहते हैं कि इकलौता तस्कर या सप्लायर हांगकांग में बच गया है तो इसका क्या अर्थ निकलता है, सरकारी तंत्र से इसका ठोस जवाब नहीं मिलता।

 सरकार की कोशिशें नाकाफी

सरकार ने नशे के खात्मे के लिए पहले स्पेशल टॉस्क फोर्स (एसटीएफ) बनाया और अब डोप अभियान शुरू किया है। सवा तीन लाख सरकारी मुलाजिमों, नई भर्तियों और प्रमोशन के लिए डोप टेस्ट को जरूरी बनाया गया तो इस पर सियासत भी तेज हो गई। खुद मुख्यमंत्री ने अपना डोप टेस्ट कराए जाने का ऐलान किया तो पार्षदों, विधायकों, मंत्रियों से लेकर सांसदों तक में डोप टेस्ट कराने की होड़ लग गई। कांग्रेसियों ने शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर बादल और आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भगवंत मान का भी डोप टेस्ट कराए जाने की मांग की तो केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने राहुल गांधी की भी डोप टेस्ट कराने की मांग कर डाली। कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने भी डोप टेस्ट पर सवाल उठाया और कहा कि नशा रोकने में इससे कोई मदद मिलने वाली नहीं। नशे के खिलाफ सुखबीर बादल ने सरकार का साथ देने की पेशकश की तो मुख्यमंत्री ने उसे यह कहकर ठुकरा दी कि नशा अकाली दल की देन है।

 डोप का फंडा

1,500 रुपये प्रति डोप टेस्ट से सरकारी खजाने पर सालाना करीब 12-15 करोड़ रुपये का बोझ पड़ना तय है। जब खाली खजाने का रोना रोने वाली सरकार तय वक्त पर मुलाजिमों को पगार भी नहीं दे पा रही, 3 से 13 जुलाई के बीच 10 दिन में ही 25,000 से अधिक लोगों के डोप टेस्ट कराए गए। अकेले अमृतसर में ही 2,100 टेस्ट हुए, जिसमें 105 पॉजिटीव पाए गए। डोप की जद में आए प्रदेश के करीब 20 लाख लोगों ने सीधे-सीधे करोड़ों के कारोबार का रास्ता साफ कर दिया है। 3.25 लाख सरकारी और 75 हजार ठेके के मुलाजिम, नौ लाख हथियार लाइसेंसधारक और 30 सितंबर को होने वाले पंचायत चुनावों के लिए करीब सात लाख उम्मीदवारों को 13,028 ग्राम पंचायतों, 148 पंचायत समितियों और 22 जिला परिषदों के चुनाव लड़ने से पहले डोप परीक्षा से गुजरना होगा। मुलाजिमों में डोप टेस्ट को लेकर भारी रोष है कि नशे की गिरफ्त में अधिक बेरोजगार हैं तो सरकार अपने अच्छे-भले मुलाजिमों को शक के आधार पर नशेड़ी ठहराने पर तुली है।

एनडीपीएस एक्ट की धारा 27 के तहत ड्रग्स का खपतकार साबित होने पर अापराधिक माना जाना तय है। हालांकि, मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि जिन मुलाजिमों का डोप टेस्ट पॉजिटिव पाया जाएगा, उन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, सरकार उनका इलाज मुफ्त कराएगी।

लेकिन एक्ट के पुलिसिया दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि जस्टिस मेहताब सिंह गिल कमीशन ने अकाली-भाजपा सरकार के कार्यकाल में राजनीतिक बदले की भावना से पुलिस द्वारा एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज 328 फर्जी एफआइआर रद्द करने की सिफारिश की थी। 2016 में 7,200 सिपाहियों की भर्ती के दौरान अकाली-भाजपा सरकार ने डोप टेस्ट की पहल की थी।

डोप बना सियासी ड्रामा

पंजाब में नशे के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे जोशी फाउंडेशन के अध्यक्ष विनीत जोशी का कहना है कि नशे की ओर बढ़ते युवाओं को रोकने के लिए साल में एक बार स्कूलों में आठवीं कक्षा से और कॉलेजों में भी ब्लड टेस्ट की शुरुआत की जानी चाहिए। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्वेत मलिक का कहना है कि किरकिरी से बचने के लिए कांग्रेस सरकार डोप टेस्ट का ड्रॉमा और केंद्र से एनडीपीएस एक्ट में बदलाव की मांग कर लोगों का ध्यान बंटा रही है। विपक्ष के नेता सुखपाल सिंह खैरा ने कहा कि फांसी की सजा और डोप टेस्ट कैप्टन सरकार का सियासी शगूफा है। डोप टेस्ट पहले ऐलान करके नहीं किया जाता, अचानक किया जाता है। क्योंकि डोप टेस्ट में कुछ घंटों पहले तक किया हुआ नशा ही जांच में आता है। इसलिए सरकारी दफ्तरों में बैठे क्लर्कों के बजाय पुलिस मुलाजिमों और अफसरों का डोप टेस्ट होना चाहिए।

नशे से बेकाबू होते हालात से 16 महीने में सख्ती से निपटने में विफल रही राज्य सरकार ने मामला केंद्र के पाले में डाल दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र में मुख्यमंत्री ने एनडीपीएस एक्ट में संशोधन की मांग करते हुए लिखा है कि पहली बार नशे के साथ पकड़े जाने वाले को भी फांसी की सजा का प्रावधान किया जाए। एक्ट में अभी पहली बार पकड़े जाने पर 10 साल की कैद और दूसरी बार पकड़े जाने पर फांसी की सजा का प्रावधान है पर 29 वर्षों में देश भर में अभी तक एक भी फांसी नहीं हुई है। 2013 से 2015 के दौरान पंजाब में नशे के 14,000 से अधिक मामलों का अध्ययन करने वाले दिल्ली के विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की नेहा सिंघल का कहना है कि एनडीपीएस एक्ट-1985 में 1989 से ही मौत की सजा का प्रावधान है। 29 साल से मौत की सजा के प्रावधान के बावजूद नशा तस्करी और इसके खपतकारों में कोई कमी नहीं आई है। तस्कर से बरामद नशा सामग्री बेचने के लिए है यह साबित कर पाना आसान नहीं है। मौत की सजा से समस्या का हल होने वाला नहीं। एनडीपीएस एक्ट के तहत सलाखों के पीछे पड़े छोटे सप्लायर्स और खपतकार हार्ड कोर क्रिमनल बन सकते हैं। जेलों में 41 फीसदी कैदी एनडीपीएस एक्ट के अधीन बंद हैं।

इलाज पाने वालों की संख्या बढ़ी

चंडीगढ़ के पीजीआइ के ड्रग्स डीएडिक्शन सेंटर के प्रमुख डॉ. देबाशीष बासू का कहना है कि इलाज के लिए आने वाले मरीजों की संख्या इस साल पिछले साल की तुलना में 2,000 बढ़ी है। समस्या तब तक खत्म नहीं होगी जब तक सप्लाई चेन नहीं तोड़ी जाती। स्वास्थ्य मंत्री ब्रह्म महिंद्रा ने बताया कि पंजाब की सभी जेलों समेत तमाम जिला मुख्यालयों और सबडिविजन  में 8,000 ओओएटी (आउट पेशेंट ओपियाड असिस्टेड ट्रीटमेंट) सेंटर में अक्टूबर 2017 से जून 2018 के बीच 2,74,938 नशा रोगी जांच के लिए आए। इस साल जून में प्रतिदिन औसतन 2,346 मरीजों की तुलना में जुलाई में प्रतिदिन 4,408 मरीज ओओटी में आ रहे हैं। उनके मुताबिक सभी जिलों के सरकारी अस्पतालों में डोप टेस्ट के सैंपल लिए जाने की व्यवस्था की गई है, दुरुपयोग रोकने के लिए प्राइवेट अस्पतालों को इससे दूर रखा गया है।

सप्लाई चेन तोड़ना जरूरी

जब तक सप्लाई चेन नहीं टूटेगी तब तक नशे का खात्मा मुश्किल है, भले एनडीपीएस एक्ट को कितना ही कड़ा क्यों न कर दिया जाए। डोप टेस्ट के अभियान पर करोड़ाें रुपये खर्च करने के बजाय सरकार ड्रग्स डी-एडिक्शन सेंटर और री-हे‌ब‌िलिटेशन सेंटर पर खर्च करे। प्राइवेट सेंटरों में इलाज पर प्रतिदिन 1,500 से 3,500 रुपये का खर्च गरीब के बूते से बाहर है। जबकि सरकारी सेंटरों में मुफ्त इलाज का फायदा बढ़ते मरीजों के कारण सभी को नहीं मिल पा रहा है। इलाज के लिए न पूरा इन्‍फ्रास्ट्रक्चर है और न ही डॉक्टर। अमृतसर में राज्य के सबसे बड़े ड्रग्स डी-एडिक्शन ऐंड री-हेबिलिटेशन सेंटर की ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या एक महीने में ही बढ़कर दोगुनी हो गई है। बढ़ रहे मरीजों की तुलना में डॉक्टर और दवाओं की कमी है। 30 लाख से अधिक लोग किसी न किसी नशे की चपेट में हैं, सभी के इलाज के लिए पर्याप्त इन्‍फ्रास्ट्रक्चर नहीं है। नशे की चपेट में 16 से 40 की आयु वर्ग के लोग अधिक हैं। नशे के कारण बढ़ी नपुंसकता और एचआइवी की वजह से शादियां-परिवार टूट रहे हैं। युवाओं पर गीत-संगीत का भी असर है। पारंपरिक पंजाबी गीत-संगीत के बजाय स्थानीय टीवी चैनल और एफएम रेडियो पर बजते रैप में खुले आम दारू और नशे को बढ़ावा देते बोल युवाओं के दिलो-दिमाग में भी नशे का जहर घोल रहे हैं। नशे के खिलाफ लड़ाई तेज करने को मदद के लिए सरकार ने गायकों को तलब किया, पर उसके हाथ इनके गीतों को सेंसर करने का अधिकार नहीं है। राज्य सरकार द्वारा ऐसी नीति बनाए जाने की जरूरत है कि नशा परोसने वाले गीत-संगीत को प्रतिबंधित किया जा सके।

 

पिता समेत परिवार के पांच सदस्य गंवाए

नशे की वजह से पिछले दो दशक में पिता समेत परिवार के पांच सदस्य खोने वाले मुक्तसर के गुज्जर रोड के राजिंदर सिंह बिंदा के मुताबिक, 1998 में 38 वर्ष की उम्र में नशे में जान खोने वाले उनके पिता परिवार के पहले सदस्य थे। एक साल बाद उनके मामा की भी नशे की चपेट में आने से मौत हुई। 2010 में पहले चाचा और 2014 में दूसरे चाचा की भी नशे की गिरफ्त में आने से मौत हो गई। 2013 में 32 साल का चचेरा भाई भी नशे की भेंट चढ़ गया। इस तरह एक के बाद एक परिवार के पांच सदस्य नशे की भेंट चढ़ गए। बिंदा ने कहा कि नशे में जान गंवाने वाले परिवार के सदस्यों की गलती का खामियाजा अभी तक भुगतना पड़ रहा है। भुक्की और अफीम के नशे की लत में पिता ने सारी जमीन बेच डाली। नौबत यहां तक आ गई कि आज राजिंदर सिंह बिंदा ट्रक ड्राइवरी करके अपने परिवार का गुजर-बसर कर रहा है। इसका असर यह जरूर हुआ कि बिंदा परिवार का अब कोई सदस्य किसी तरह के नशे को हाथ भी नहीं लगाता।

नशे से जिंदगी हारा कबड्डी खिलाड़ी

मोगा के बुर्ज हमीरा गांव का 24 वर्षीय चरण सिंह कबड्डी खेलते-खेलते नशे में जिंदगी हार गया। चरण के पिता पूर्व सैनिक दर्शन सिंह ने बताया कि कबड्डी खेलने के दौरान वह कुछ ड्रग्स पेडलर्स की संगत में पड़ गया और लत लगा बैठा। छह महीने पहले राजस्थान के गंगानगर के एक ड्रग्स डी-एडिक्शन सेंटर में इलाज के लिए भर्ती कराया गया। जून के आखिरी हफ्ते में सेंटर से छुट्टी होने पर घर आया। पुराने दोस्त उसे फिर बाहर घुमाने के लिए ले गए। वह नशा न लेने की कौल लेकर गया था। घर वापस आया तो उल्टियां कर रहा था। बठिंडा के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां से उसे डीएमसी लुधियाना में, और फिर पीजीआइ चंडीगढ़ में भेजा गया, जहां सात जुलाई को उसकी मौत हो गई।

बेटा गुरुद्वारे गया, नहीं लौटा

हिमांशु की मां मोनिका अमृतसर के जंडियाली टांगरी गांव में एक छोटी-सी किराने की दुकान चलाती है। छह माह पहले जब मोनिका को अपने बेटे हिमांशु के बारे में पता चला कि वह नशे की गोलियां खाता है तो वह उसे अमृतसर स्थित स्वामी विवेकानंद नशा छुड़ाओ केंद्र ले गई। 27 जून को हिमांशु घर वापस आ गया और उसने अपनी मां को भरोसा दिलाया कि वह नशा नहीं करेगा। 12 जुलाई को वह घर से मल्लियां स्थित गुरुद्वारा साहिब मेला देखने के लिए गया मगर सही-सलामत घर नहीं लौटा। उसका शव गुरुद्वारे के शौचालय से बरामद किया गया। शव के पास सिरिंज और ड्रग्स बरामद हुए।

तीन गांव नशामुक्त घोषित

खेमकरण का एक नशामुक्त गांव

नशे से बढ़ती मौतों से चितिंत कई नशाग्रस्त इलाकों में स्थानीय लोगों ने नशे के खिलाफ मुहिम छेड़ दी है। पहल नशे के लिए बदनाम जिले तरनतारन के खेमकरण से हुई। खेमकरण के तीन गांवों की मुहिम को परखने पर जिला प्रशासन ने इन तीन गांवों का सर्वे कर उन्हें नशामुक्त गांव घोषित किया। तरनतारन के डिप्टी कमिश्नर प्रदीप सभरवाल के मुताबिक 10 और गांव नशामुक्त घोषित होने की ओर अग्रसर हैं। ड्रग्स पेडलर्स की 39 प्रापर्टीज जब्त कर नीलामी की प्रक्रिया चल रही है। विधायक सुखपाल भुल्लर के मुताबिक, तरनतारन पंजाब का ऐसा पहला जिला बन गया है जिसके तीन गांव मस्तगढ़, मनावा और कलंजर पूरी तरह से नशा मुक्त हो गए हैं। ये गांव पूरे राज्य के लिए रोल मॉडल साबित होंगे। कलंजर गांव के सरपंच अवतार सिंह के मुताबिक, 1,200 की आबादी वाले उनके गांव में एक व्यक्ति को छोड़कर बाकी कोई भी नशे की चपेट में नहीं है। आठ वर्ष से हेरोइन का नशा कर रहा वह 33 वर्षीय व्यक्ति भी कहता है कि ड्रग्स डीएडिक्शन सेंटर की काउंसलिंग की मदद से उसकी पहले की रोजाना हेरोइन की चार गोलियों की खपत घटकर एक रह गई है। मनावा के सरपंच रणजीत सिंह का दावा है कि 1,050 की आबादी वाले उनके गांव में कोई भी नशे की चपेट में नहीं है। युवाओं को खेलों से जोड़ने के लिए पंचायत ने क्रिकेट, फुटबाल और वॉलीबॉल किट उपलब्ध कराई हैं। मस्तगढ़ गांव के सरपंच बेअंत सिंह ने पुष्टि की कि 3,000 की आबादी वाला उनका गांव पूरी तरह से नशामुक्त है।

पंजाब के बाहर फैला नशा

नेहरू सेल-सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल ऐंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट (क्रिड) के प्रमुख्‍ा प्रो. रणजीत सिंह घुम्मण के मुता‌ब‌िक, ‘पंजाब 13 साल आतंक के साये में रहा और अब केमिकल टेररिज्म से जूझ रहा है। बेरोजगारी में नशे की लत में पड़े 16 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के लोग ही सिंथेटिक नशे के पेडलर भी बन गए। इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च सेंटर, दिल्ली ने नशे के सामाजिक-आर्थिक कारण जानने के लिए पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और राजस्थान का सर्वे शुरू कराया है। हरियाणा के सिरसा और अंबाला, राजस्थान के श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़, जम्मू-कश्मीर के जम्मू और कठुआ में पूरे हुए सर्वे संकेत देते हैं कि अमीर वर्ग अफीम और हेरोइन जैसे महंगे नशे के दलदल में फंसा है जबकि गरीब वर्ग सिंथेटिक केमिकल नशे की गिरफ्त में है। नशे की लत पूरी करने के लिए गरीब वर्ग के लोग ही सिंथेटिक केमिकल नशे के कारोबार में लिप्त हैं। ड्रग्स डी-एडिक्शन सेंटर्स में जाकर पता लगाया जाए कि नशे की लत कैसे शुरू हुई और आज हालात क्या हैं? नशे की लत में पड़ने वालों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि क्या रही है? इसके सामाजिक-आर्थिक असर क्या हैं? ड्रग्स री-हे‌बिलिटेशन सेंटरों में स्किल डेवलपमेंट जैसी पहल नहीं हुई, जिससे उनके लिए रोजगार का रास्ता खुले।’

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