Advertisement

सूरमा या सूत्रधार बनने की पेशकदमी

राहुल गांधी के नए तेवरों और सियासी परिपक्वता के प्रदर्शन से कांग्रेस नए जोशोखरोश के साथ बड़ी लड़ाई में जुटी मगर चुनौतियां भी कई
नया जोशः राहुल की अध्यक्षता में कांग्रेस कार्यकारिणी की पहली बैठक

नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव वाले दिन मैं घर से संसद जा रही थी। युवा टैक्सी वाला वाचाल प्रवृत्ति का निकला और अपनी ‌सियासी राय जाहिर करने लगा। उसने कहा कि मोदी को और समय देना चाहिए, क्योंकि अभी तो उन्होंने देश की समस्याओं की गांठ ही खोली है और उन्हें हल करने के लिए एक बार फिर मौका देने की जरूरत है। और राहुल? उसने उन्हें खारिज कर दिया। मैंने कहा कि आज राहुल भी बोलेंगे। जब वह मुझे वापस घर ले जा रहा था तो कहने लगा कि उसने मोबाइल पर राहुल का भाषण सुना, “तीन-चार अच्छे मुद्दे उठाए। 15 लाख रुपये का वादा था, लेकिन लोगों के खातों में नहीं पहुंचा,  हवाई जहाज सौदे (राफेल डील) में कुछ तो गड़बड़ है। यह भी सच है कि इनकम टैक्स इंस्पेक्टर छोटे लोगों को तंग कर रहे हैं।” उसने कहा, “अच्छा बोला, पर अभी टाइम लगेगा।”

उस टैक्सी ड्राइवर और अधिकतर निम्न मध्यवर्ग के बाकी नौजवानों को राहुल गांधी के भाषण में जो अच्छा लगा, उसे एक ने कुछ ऐसे कहा, “दे मारा।”

राहुल गांधी ने उस दिन अपने तेवर कम नहीं किए और इन युवाओं को यही पसंद आया। उन्होंने मोदी पर सीधे निशाना साधा, जिसे देखकर वे दंग रह गए। उन्हें मोदी भी इन्हीं चीजों की वजह से पसंद आते हैं। मोदी विरोधियों को सीधी टक्कर देते हैं और सख्त रुख अख्तियार करते हैं। दरअसल, ये नौजवान ताकत की पूजा करते हैं। इससे उनमें उम्मीद जगती है कि यही ताकत उनके जीवन में कुछ बदलाव ला सकती है। इसलिए “नए” राहुल गांधी में उनकी दिलचस्पी जगी है। लेकिन युवाओं का भरोसा जीतने के लिए राहुल को अभी और मेहनत करनी पड़ेगी।

संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी के भाषण ने उनकी पार्टी के नेताओं में भी जोश भर दिया। बेशक, उनका मनोबल राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने जा रहे मुकाबले के लिहाज से काफी मायने रखता है। इन चुनावों के नतीजे ही 2019 के महाभारत का रुख तय करेंगे।

कांग्रेसियों का उत्साह राहुल गांधी द्वारा बुलाई गई विस्तारित कार्यसमिति की पहली बैठक में भी साफ झलक रहा था। कई लोगों को लगा कि अगर ऐसी ही एकजुटता रही तो अगले साल विपक्ष भारी पड़ सकता है। इससे कम से कम भाजपा का बहुमत तो छिन ही जाएगा और मोदी के बजाय किसी दूसरे के लिए मौका बन सकता है। अगर ऐसा भी नहीं हुआ और मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं, तब भी उन पर कुछ अंकुश रखने में कामयाबी मिल सकती है।

बहरहाल, राहुल की “झप्पी पॉलिटिक्स” ने प्रधानमंत्री को भौचक्का कर दिया और सुर्खियां बटोर ले गई। उस दिन की महफिल उन्होंने लूट ली। नतीजतन, मोदी ने अपने भाषण का पूरा जोर राहुल, सोनिया गांधी और कांग्रेस पर हमला करने में लगा दिया। जिस आंध्र प्रदेश के मुद्दे पर तेलुगु देशम पार्टी ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था, उसका जिक्र मोदी के भाषण में पचास मिनट बाद जाकर आया। अगले दिन उत्तर प्रदेश में किसानों की रैली में भी उन्होंने काफी वक्त इस बात पर लगाया कि कैसे राहुल प्रधानमंत्री की ‘गद्दी’ उनसे छीनना चाहते थे!

उधर, राहुल गांधी ने मोदी के खिलाफ अब तक का सबसे कर्रा भाषण बिना पढ़े दिया। साथ ही एक काम और किया। यह जताने के लिए कि उनके मन में प्रधानमंत्री को लेकर कोई व्यक्तिगत दुर्भावना और द्वेष नहीं है, वे उनके पास गए और गले लग गए।

राहुल के भाषण को विपक्ष के कई नेताओं ने संसद में ध्यान से सुना। सबसे बड़े विपक्षी दल के तौर पर कांग्रेस में भरोसा पैदा करने की राहुल गांधी की कोशिशों के लिहाज से यह काफी मायने रखता है।

राहुल की ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर आंख मारने की स्कूली बच्चों जैसी हरकत ने इसकी गंभीरता कुछ कम कर दी। इससे प्रधानमंत्री को राहुल गांधी पर “बचकानेपन” जैसा हमला करने का मौका मिल गया, जबकि राहुल की राजनीतिक “परिपक्वता” से कई लोग वाकई हैरान थे। सबसे दिलचस्‍प था, हिंदू भावनाओं को छूने का एक नए कथानक और रणनीति का आगाज। राहुल का यह अंदाज लाजवाब था कि उन्होंने “भाजपा से सीखा” कि असली हिंदू होने का क्या मतलब है, जाहिर है यह तंज था। कहा कि हिंदू होने का मतलब सबसे “प्रेम” करना है न कि “घृणा” करना। “धर्मनिरपेक्षता” या शशि थरूर की “हिंदू पाकिस्तान” वाली बात के बजाय यह समावेशी सोच भाजपा के दिग्गजों को परेशानी में डाल सकता है।

यह सही है कि मोदी से मुकाबले के लिए राहुल को लंबा सफर तय करना है। मोदी न सिर्फ राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं, बल्कि लोकप्रिय भी हैं। उनके पीछे एक दुर्जेय तंत्र मजबूती से खड़ा है। ऐसा तंत्र खड़ा करने में राहुल गांधी को पूरी सदिच्छाओं के बावजूद काफी वक्त लगेगा। फिर भी कांग्रेस अध्यक्ष पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से भरे हैं और कई लोगों का उनके प्रति नजरिया बदलने लगा है।

कई मौकों पर राहुल गांधी कह चुके हैं पार्टी को ‌नए सिरे से खड़ा करने के लिए वे अनुभवी और युवा नेताओं को साथ लेकर चलना चाहते हैं। स्‍थाई और विशेष आमंत्रित सदस्यों को छोड़ दें तो उन्होंने जिस 23 “सदस्यीय” कार्यकारिणी का गठन किया है वह सोनिया गांधी की पुरानी टीम जैसी ही है। इसमें मनमोहन सिंह, ए.के. एंटनी, अंबिका सोनी, मोतीलाल वोरा, कुमारी शैलजा, अहमद पटेल, आनंद शर्मा, तरुण गोगोई, गुलामी नबी आजाद हैं।

कुछ युवा नेताओं-ज्योतिरादित्य सिंधिया, आर.पी.एन सिंह, जितिन प्रसाद, गौरव गोगोई, सुष्मिता देव, दीपेंद्र हुड्डा को स्‍थाई आमंत्रित या विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर टीम में शामिल कर राहुल गांधी ने यकीनन युवा और अनुभव के बीच संतुलन बनाया है।

समझदारी सावधानी से आगे बढ़ने में ही है, क्योंकि आज पार्टी केवल तीन राज्यों-पंजाब, कर्नाटक और मिजोरम में सत्ता में है और चार साल पहले लोकसभा चुनावों में 44 सीटों पर सिमट गई थी।

मजबूरियों के बावजूद कैप्टन अमरिंदर सिंह और भूपेंद्र सिंह हुड्डा जैसे जनाधार वाले नेताओं को राहुल ने अपनी टीम से क्यों बाहर रखा, यह समझ से परे है। राजस्‍थान और मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट और कमलनाथ को भी जगह नहीं दी गई। इन लोगों को करीब 250 लोगों की विस्तारित कार्यकारिणी में शामिल किया गया है।

पूर्वी राज्यों ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार का सीडब्‍ल्यूसी में प्रतिनिधित्व न होना भी समझ से परे है। भाजपा हिंदी पट्टी में होने वाले नुकसान की भरपाई पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत से करने की कोशिश करेगी। लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ रहे आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के भी किसी नेता को राहुल ने नहीं चुना है।

फौरी तौर पर राहुल गांधी को कर्नाटक सरकार की स्थिरता भी तय करनी होगी, जहां जेडीएस के नेतृत्व वाली सरकार में बड़ी पार्टी होकर भी कांग्रेस सहयोगी की भूमिका में है। इस सरकार की सफलता 2019 के चुनाव में कर्नाटक के बाहर भी मतदाताओं को प्रभावित और विपक्षी गठबंधन में भरोसा बहाल कर सकती है। लोकसभा चुनाव से पहले इस सरकार के गिरने पर भाजपा “खिचड़ी” सरकार के डर को हवा देगी और उन लोगों की सोच भी बदल सकती है जो दोबारा मोदी को नहीं देखना चाहते।

राहुल गांधी के नए तेवर ने कई लोगों को प्रभावित किया है जो मुश्किल दिख रहे विपक्षी महागठबंधन को आकार देने का काम कर सकता है। हालांकि, इसने कई क्षत्रपों के मन में संदेह भी पैदा किया। ममता बनर्जी ने अगले साल 19 जनवरी को “फेडरल फ्रंट” (महागठबंधन नहीं) की मेगा रैली की घोषणा कर दी। उन्हें और अन्य क्षत्रपों को यह रास आएगा कि नेतृत्व की भूमिका कांग्रेस उनमें से किसी एक को दे। जाहिर है, कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरती है तो राहुल प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे। यानी भाजपा से कांग्रेस के आगे होने की स्थिति में बेहद अलग समीकरण देखने को मिलेंगे।

मौजूदा वक्त में राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी दलों को एकजुट करना और कांग्रेस को मुख्य भूमिका में लाने की है। आखिरकार 2019 की बड़ी लड़ाई इस बात पर निर्भर करेगी कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्षी दल कोई साझा मंच तैयार कर पाएंगे कि नहीं। पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी को दूर कर कड़ी मेहनत और ग्राउंड वर्क की बिसराई संस्कृति को फिर से जिंदा करने के लिए राहुल गांधी को नई ऊर्जा की आवश्यकता होगी।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

Advertisement
Advertisement
Advertisement