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हिंदी फिल्मों के मांझी गीत

बंगाल की पृष्ठभूमि पर बनी हिंदी फिल्मों में कई बार कथ्य या संवेदना के धरातल पर मांझी गीतों का दृश्यों को प्रभावी और तीव्र बनाने में इस्तेमाल किया गया। बंगाल और उत्तर-पूर्व भारत का भटियाली लोक संगीत एक तरह मांझी गीतों से ही निकला है।
बंदिनी में अशोक कुमार और नूतन

सलिल चौधरी ने कभी कहा था, 'पूरे विश्व में नाविकों के संगीत में कई समानताएं पाई जाती हैं। चाहे वह वोल्गा के नाविकों का संगीत हो या बंगाल के मांझियों का।  शरतचंद्र के उपन्यास पर आधारित फिल्म विराज बहू में बंगाल के प्रसिद्ध लोकगायक निर्मलेंदु चौधरी से सलिल ने भटियाली शैली में 'मांझी रे, ले चल नइया, राम करेगा पार’ जैसा खूबसूरत गीत गवाया था, जमाना (1953) में रफी और साथियों के स्वर में मांझी गीतों का प्रयोगात्मक कोरस प्रभाव 'नैया का मेरी तू ही खेवैया’ गीत में डाला था पर भटियाली आधारित मांझी गीतों की कंपोजीशन और गायकी में सबसे बड़ा नाम सचिन देव बर्मन का रहेगा। सुजाता (1959) के 'सुन मेरे बंधु रे सुन मेरे मितवा’  की मांझी शैली की विरह भरी पुकार आज भी सचिन दा की श्रेष्ठïतम रचनाओं में शामिल है। बंदिनी (1963) के खास भटियाली 'ओ रे मांझी मेरे साजन हैं उस पार’ की आकुलता को भूल सकते हैं? बंदिनी में ही मुकेश के गाए 'ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना’ में भी मांझी शैली का स्पर्श धुन और ऑर्केस्ट्रेशन स्पष्ट नजर आता है।

बंगाल की पृष्ठभूमि पर ही निर्मित, टैगोर की रचना पर आधारित विमल रॉय की काबुलीवाला (1961) में सलिल द्वारा स्वरबद्ध, हेमंत कुमार के 'गंगा आए कहां से, गंगा जाए कहां रे’ में हिलकोरे युक्त ऑर्केस्ट्रेशन के साथ यह मांझी गीत ग्रामीण दार्शनिकता के ऊंचे आयम छू लेता है। शरतचंद्र की कहानी पर आधारित मंझली दीदी (1967) में हेमंत द्वारा संगीतबद्ध और गाए 'उमरिया बिन खेवट की नैया’ में जैसे मांझियों की पूरी जिंदगी का संघर्ष और दर्द साकार हो उठता है। मंझली दीदी के ही हेमंत के गाए 'नदियों की हरी भरी गोद जहां, पीपल की ठंडी ठंडी छांव जहां, वो मेरा गांव है’  के उठान भरे हिस्से के नोट्स मांझी गीत से ही प्रभावित लगते हैं। शरतचंद्र के उपन्यास पंडित मोशाय पर आधारित गुलजार की खुशबू (1975) का बंगाली ग्राम परिवेश फिर हमें किशोर के गाए मांझी गीत 'ओ मांझी रे, अपना किनारा, नदिया की धारा है’ में अभिभूत करता है। वहीं रवींद्रनाथ टैगोर की रचना 'समाप्ति’ पर आधारित उपहार (1971) में मुकेश के स्वर और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल द्वारा संगीतबद्ध 'मांझी नैया ढूंढे किनारा, किसी न किसी की खोज में है ये जग सारा’ हमें मांझी गीतों में जीवन दर्शन के पुट की याद दिलाता है। याद कीजिए सफर (1970) का कल्याणजी आनंद जी द्वारा संगीतबद्ध और मन्ना डे के स्वर में वह लाजवाब मांझी गीत 'नदिया चले चले रे धारा, चंदा चले चले रे तारा, तुझको चलना होगा’। आवारा (1951) में राजकपूर रफी के स्वर में 'नैया तेरी मंझधार, होशियार’ जैसा मांझी गीत लेकर आए तो अमानुष (1975) में श्यामल मित्रा फिर उसी बंगाली ग्राम परिवेश का दर्शन 'नदिया में लहरे नाचे, लहरों में नाचे नैया किसके इशारे ये दुनिया नाचे, कोई न जाने भैया’  के रूप में लाने में सफल रहे। संगीतकार सपन चक्रवर्ती भी फिल्म 36 घंटे (1974) में मुकेश के स्वर में साहिर की रचना 'यहां बंधु आते को है जाना’ में पारंपरिक मांझी गीतों की शैली में आरोह के साथ जीवन के फलसफे को उद्भासित करने में अद्वितीय रूप से सफल रहे।

भटियाली की लाजवाब अनसुनी रचना का उल्लेख अनिवार्य है। फिल्म वास्ता (1984) में संगीतकार अजीत वर्मन ने 'मां बोलो कब तलक यूं चलना है और कितने दिन माटी बन मुझे छिन छिन गलना है’ (आशा-अमित कुमार) को खूबसूरती से कंपोज किया है। आश्चर्य यह गीत चर्चित क्यों न हुआ। संगीतकार रवींद्र जैन ने दो जासूस (1975) में कोली मांझी गीत का प्रभाव 'पुरवैया ले के चली मेरी नैया (शैलेंद्र सिंह, लता साथी) और हम नहीं सुधरेंगे (1985) के 'मांझी ओ मांझी ओ मछुआ में बड़े दिलकश तरीके से डाला था। यह बंगाल के मांझी गीतों से भिन्न था। वेनिस के नाविकों के गीत का इस्तेमाल पहले राज कपूर के लिए शंकर जयकिशन ने संगम (1964) के विवियन लोबो के गाए गीत 'इश लिबेदिश, आई लव यू में और वर्षों बाद आर.डी. बर्मन ने द ग्रेट गैंबलर (1978) के 'दो लफ्जो की है दिल की कहानी (आशा) में बड़ी खूबसूरती से किया था। हिंदी फिल्मों में कई बार मांझी गीतों को पारंपरिक स्वर-रचना से अलग हट कर दूसरे अंदाज में भी पेश किया गया है। बाज (1953) के 'मांझी अलबेले चलो रे हौले हौले में गीता दत्त और ओ.पी. नैयर की शोखी, तुलसीदास (1954) के 'नैया जल्दी ले चलो मुझे सैयां के अंगना में चित्रगुप्त का भोजपुरी लोकरंग, सम्राट पृथ्वीराज चौहान (1959) के 'मांझी रे हिम्मत न हार में वसंत देसाई का देशभक्तिपूर्ण उत्प्रेरक अंदाज जैसे उदाहरण दिए जा सकते हैं। फिल्म चार पैसे (1955) में सरताज के लिखे और बी.डी. बर्मन के संगीतबद्ध 'मांझी मेरी नैया को जी चाहे जहां ले चल के नोट्स छठे दशक के मेलोडी प्रधान गीतों के समान है, लगभग उसी मुखड़े को लेकर हम हिंदुस्तानी (1960) के उत्कृष्ट गीत 'मांझी मेरी किस्मत को जी चाहे जहां ले चल (लता) में बीट्स के लुभावने प्रयोग, कोमल आलाप का प्रभावशाली इस्तेमाल, कोरस का एकीकरण और बांसुरी के साथ अद्भुत अंत संभवत: काफी थाट की इस रचना को संगीतकार उषा खन्ना की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक बनाती है। फिल्म बंधे हाथ (1973) का मांझी गीत 'ओ मांझी ओ, जाए कहां (आशा, साथी) आर.डी. बर्मन की प्रयोगधर्मिता का विशिष्ट उदाहरण है जहां मांझी गीत के पारंपरिक शब्दों को पंचम ने प्रचलित लोकधुन में न डालकर नए बीट्स के साथ पुनरावृत्त और आरोपित बोलों के साथ अद्भुत उठान दी थी।

(लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एवं संगीत विशेषज्ञ हैं।)

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