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तब इंदिरा ने किया था बांग्लादेश में सर्जिकल स्ट्राइक

रक्षा खरीद में देरी के आरोपों पर यह समझने की जरूरत है कि हम पड़ोस की दुकान से भाजी नहीं खरीद रहे हैं। हथियारों का आर्डर देने के बाद आपूर्ति में,-8 साल तक का समय लग जाता है
जनरल शंकर राय चौधुरी

करीब 40 वर्षों तक विभिन्न पदों पर रहकर भारतीय सेना की सेवा करने वाले पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल (रिटा.) शंकर रायचौधुरी ने आजाद भारत की तीनों लड़ाइयों, 1962 में चीन युद्ध और 65 और,1 के पाकिस्तान युद्धों में सक्रिय हिस्सा लिया। नवंबर,1994 से सितंबर 1997 तक भारतीय थल सेना की कमान संभालने वाले जनरल रायचौधुरी सेना की ताकत और चुनौतियों को बेहतर तरीके से जानते हैं। आज अपनी उम्र के 80वें वर्ष में भी पूरी तरह फिट दिखने वाले जनरल रायचौधुरी मानते हैं कि भारतीय सेना अपनी तात्कालिक चुनौतियों से निबटने के लिए पूरी तरह तैयार है और महज हथियारों की खरीद में देरी की वजह से उसकी ताकत को कम नहीं आंका जा सकता।  यही नहीं देश में अभी पाकिस्तान के खिलाफ हुए सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर भी उन्होंने अपनी राय खुलकर रखी और यह भी कहा कि सही मायने में पहला सर्जिकल स्ट्राइक इंदिरा गांधी के शासनकाल में वर्ष 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति-युद्ध के दौरान हुआ था। कोलकाता के सॉल्टलेक स्थित अपने आवास पर उन्होंने हिंदी आउटलुक के समन्वय संपादक सुमन कुमार से देश की सुरक्षा-स्थिति पर लंबी बात की। पेश हैं मुख्‍य अंश:

 

सीधा सवाल, देश के समक्ष मौजूद खतरों से निबटने के लिए भारतीय सेनाएं कितनी तैयार हैं?

पहले यह समझें कि हमारे सामने मुख्‍य खतरा कौन है। चीन के साथ दुश्मनी के सवाल पर मैं यही कहना चाहूंगा कि वह कम से कम हमारा दोस्त तो नहीं ही है। मगर हमें उससे तत्काल कोई खतरा नहीं है क्‍योंकि हम उससे विभिन्न स्तरों पर बातचीत में जुटे हैं। ऐसे में सीधा खतरा हमारे लिए पाकिस्तान ही है। आपके सवाल के जवाब में मैं कहना चाहूंगा कि भारतीय सेना पाकिस्तान की ओर से आने वाले किसी भी खतरे के लिए पूरी तरह तैयार है। चीन के मामले में कई तरह के सर्वेक्षण, आंतरिक जांचों से यह स्थापित हो चुका है कि हमारे सामने 1962 के दोहराव की कोई संभावना नहीं है।

लेकिन कई रक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि हथियारों, उपकरणों की खरीद में हम काफी पीछे हैं?

आपको यह समझना चाहिए कि हम पड़ोस की दुकान से भाजी नहीं खरीद रहे हैं। आज हम कोई आर्डर देते हैं तो उसकी आपूर्ति सात या आठ साल बाद होती है क्‍योंकि हम हथियार और उपकरणों में अपनी जरूरत के अनुसार सहूलियतें चाहते हैं। उसके अनुरूप हथियारों का निर्माण होता है। हम जिस पैमाने पर आर्डर देते हैं उतने बड़े पैमाने पर निर्माण में भी देर होती है। ऐसे में कई वर्षों का समय लग जाना स्वाभाविक है। देरी के लिए इसके अलावा भी कई वजहें होती हैं। केंद्र में कोई भी सरकार हो, उसका स्पष्ट निर्देश होता है कि सेना अपनी तैयारी उपलब्‍ध पैसे के अनुसार नहीं बल्कि देश के सामने मौजूद खतरों के अनुरूप करे। मगर सेना के सामने सबसे बड़ी समस्या है 31 मार्च की डेडलाइन की। अगर किसी वित्त वर्ष में हमने 31 मार्च से पहले बजटीय आवंटन को खर्च नहीं किया तो सारा पैसा वापस करना होता है। ऐसे में खरीद टल जाती है। इस व्यवस्था को बदलना जरूरी है। खरीद के समय एक अन्य समस्या बेनामी चिट्ठी की आती है। जैसे ही हम किसी आर्डर को फाइनल करते हैं तो कहीं से कोई बेनामी चिट्ठी आ जाती है कि इस डील में जनरल साहब ने पैसे खा लिए। भले ही चिट्ठी में तथ्य न हो मगर जांच शुरू हो जाती है और प्रक्रिया थम जाती है। इसके बावजूद सेना खरीद कर ही रही है और पूरी तरह तैयार भी है।

आपने कहा कि आज आर्डर देने पर सात-आठ साल बाद आपूर्ति होती है। क्‍या तब तक जरूरतों में बदलाव नहीं हो जाता?

सेना के अधिकारियों को बेवकूफ न समझें। सेना अपनी तैयारी हमेशा कई साल आगे का सोच कर करती है। मैं जब सेनाध्यक्ष था तो हमेशा पांच साल आगे की योजनाओं पर काम करता था। मैं जानता हूं कि बाकी जनरल भी ऐसा ही करते हैं।

एक आरोप है कि पिछले रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी और वर्तमान रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की स्वच्छ छवि को बरकरार रखने के लिए भी रक्षा सौदों को होल्ड पर रख दिया गया।

देखिए, मंत्रियों की छवि बचाने के लिए सेना को नुकसान तो होता है। मैं किसी का नाम नहीं लूंगा। वैसे पर्रिकर साहब के समय तो हमने फ्रांस से वायुसेना के लिए राफेल सौदा किया है और मैं इस सौदे को अच्छा मानता हूं क्‍योंकि यह देश की तात्कालिक जरूरत को पूरा करने के लिए किया गया है। इस सौदे के बारे में यह भी समझें कि वायुसेना ने कई साल पहले दुनिया के अलग-अलग देशों के लड़ाकू विमानों की जांच कर राफेल को सर्वश्रेष्ठ माना था और मोदी सरकार ने उसी रिपोर्ट के आधार पर यह खरीदी की है। सरकार चाहती तो अपनी छवि बचाने के लिए नई कमेटी गठित कर नए सिरे से जांच कराती मगर ऐसा नहीं किया गया। ये अच्छा कदम है।

हाल में आपने कहा कि पाकिस्तान से भेजे गए आत्मघाती दस्तों की तरह हमें भी अपना आत्मघाती दस्ता बनाना चाहिए?

मैं इस बयान पर कायम हूं। हालांकि यह कैसे होगा यह मुझे नहीं पता। पाकिस्तान धर्म के नाम पर लोगों को मोटिवेट कर फिदायीन बनाता है। हम तो धर्मनिरपेक्ष देश हैं, हम धर्म के नाम पर लोगों को कुर्बान होने के लिए नहीं कह सकते। ऐसे में हमें कोई और प्रेरक बल ढूंढऩा होगा जिसके जरिए हम ऐसे आत्मघाती दस्ते तैयार कर सकें।

भारतीय सेना ने अभी पाकिस्तान की सीमा में घुसकर जो सर्जिकल स्ट्राइक किया उसे लेकर विवाद है। आप क्‍या कहना चाहेंगे।

मैं यही कहना चाहूंगा कि जो हिंदुस्तानी इस सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठा रहे हैं वे देश के गद्दार हैं। दूसरी बात इस सर्जिकल स्ट्राइक का के्रडिट भी सरकार को मिलेगा क्‍योंकि स्ट्राइक किया भले सेना ने हो मगर इसका फैसला पूरी तरह से राजनीतिक होता है। एक उदाहरण से बात समझाता हूं। वर्ष 1971 के बांग्लादेश मुक्ति-युद्ध के दौरान 14 दिसंबर को भारतीय सेना को जानकारी मिली कि ढाका में गर्वनर हाउस में एक लिबरल शख्‍स को गवर्नर जनरल के पद की शपथ दिलाई जा रही है। यह शपथ ग्रहण कहां और कितने बजे होने वाला है यह सटीक जानकारी भारतीय वायुसेना को मिली थी। तब विंग कमांडर बी के विश्नोई के नेतृत्व में चार मिग 21 ने अगरतला से ढाका की उड़ान भरी और गवर्नर हाउस के ठीक उस गुंबद के ऊपर रॉकेटों से हमला किया जिसके नीचे यह कार्यक्रम शुरू हुआ था। चंद मिनट में सब खत्म। यह था सर्जिकल स्ट्राइक और इसका श्रेय इंदिरा गांधी को जाता है

क्‍योंकि हमले का राजनीतिक फैसला उनका था। आखिर 1971 की लड़ाई का पूरा श्रेय इंदिरा गांधी को मिला था या नहीं। तब देवकांत बरुआ जैसों ने तो 'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’ का नारा ही चला दिया था। ऐसे में आज सर्जिकल स्ट्राइक का श्रेय अगर वर्तमान सरकार ले रही है तो उसे कैसे गलत ठहरा सकते हैं।

हमारे अन्य पड़ोसियों से संबंध पर क्‍या कहेंगे।

हमें बांग्लादेश के साथ संबंधों को लेकर ज्यादा उदार होने की जरूरत है। आज पानी को लेकर उनके साथ हमारा टकराव बढ़ रहा है। इसमें हमारी पश्चिम बंगाल सरकार भी पार्टी है। हमें बांग्लादेश को थोड़ा अधिक पानी भी देकर अपने साथ रखने की कोशिश करनी चाहिए क्‍योंकि पश्चिम और पूर्व दोनों मोर्चों पर हम दुश्मन नहीं खड़े कर सकते। बांग्लादेश में जबतक शेख हसीना की सरकार है तबतक तो ठीक है मगर सरकार बदलने से हमारे लिए मुश्किल हो सकती है। वैसे बांग्लादेश के मसले पर यह जानना भी जरूरी है कि बंटवारे के समय भी कुछ त्रुटियां रह गई थीं। उस समय कई हिन्दू बहुल क्षेत्र बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में चले गए थे जबकि कई मुस्लिम बहुल इलाके भारत में रह गए। इसके कारण आज बेहद समस्याएं आ रही हैं।

चीन की सेना अकसर हमारी सीमा में घुस आती है, इसपर सेना का क्‍या रुख होता है?

यह इसलिए होता है क्‍योंकि अधिकांश जगहों पर दोनों देशों की सीमाएं निर्धारित नहीं हैं। चीन सीमा के जिस हिस्से तक अपना दावा करता है चीनी सैनिक वहां तक बढ़ आते हैं जबकि भारतीय सैनिक अपने दावे वाले क्षेत्र तक चले जाते हैं। इसे आप बच्चों के खेल जैसा मान सकते हैं जिसमें एक कहता है कि ये मेरा इलाका है तो दूसरा उसे अपना बताता है। हालांकि बच्चों के खेल से अलग इस खेल में बंदूकें असली होती हैं। इसलिए इस मुद्दे पर लगातार बातचीत भी चल रही है। जैसा कि मैंने पहले कहा, चीन हमारा दोस्त नहीं है मगर 1962 दोहराने की आशंका भी नहीं है।

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