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'मुकुट’ बिना पर्वत विजय की इच्छा

कांग्रेस से सीधे मुकाबले वाले उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी यदि बिना सेनापति के चुनाव में उतरी तो मतदाता उसपर कितना भरोसा करेंगे
पीएम नरेंद्र मोदी के साथ रमेश पोखरियाल निशंक

भारतीय जनता पार्टी उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में निर्णायक चुनावी लड़ाई लडऩे जा रही है। इस चुनाव का 2019 के लोक सभा चुनाव ही नहीं अगले पांच वर्ष के लिए चुने जाने वाले राष्टï्रपति के चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी की ताकत का फैसला होगा। फिर भी लड़ाई के सेनापति का नाम तय नहीं किया गया है। दस-मुंह से दस दिशाओं में मनमाने ढंग से राजनीतिक संघर्षकैसे सफल हो सकता है? उ.प्र. में तो जरूरत पडऩे पर अन्य दलों से गठबंधन या सहयोग की संभावना बन सकती है, लेकिन उत्तराखंड में तो कांग्रेस से सीधा मुकाबला है। दलबदल, बार-बार सत्ता परिवर्तन और अस्थिरता की पृष्ठभूमि में पर्वतराज हिमालय की गोद में पले बसे भले, साहसी, ईमानदार और अपनी जमीन से प्यार करने वाले मतदाता उत्तराखंड को स्थायी सरकार देकर विकास के शिखर पर पहुंचाने की आकांक्षा रखते हैं। दिल्ली दरबार में अपना बखान और नेतृत्व की मात्र जयकार करने वाले कुछ नेता या उनके साथी अथवा 'पेड सर्वे’ भले ही अभी से भाजपा की जीत को पक्‍का बता रहे हों, असलियत यह है कि वर्तमान मुख्‍यमंत्री हरीश रावत ने विभिन्न इलाकों में अपने साथ ही कांगे्रस को मजबूत किया है। उत्तर प्रदेश की तुलना में उत्तराखंड में कांगे्रस अधिक प्रभावशाली है और बसपा जैसे छोटे दल के इक्‍का-दुक्‍का प्रतिनिधि ही किसी क्षेत्र विशेष में प्रभाव रखते हैं।

मजेदार बात यह है कि भाजपा अपने एक कर्मठ, अनुभवी, जमीनी और संपूर्ण उत्तराखंड में कार्यकर्ता से जुड़े नेता के सिर पर 'मुकुट’ पहनाकर पर्वतराज पर झंडा फहराने का दायित्व नहीं दे पा रही है। पूर्व मुख्‍यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी और भगत सिंह कोशियारी को 'बुजुर्ग’ अडिय़ल और चालबाज के आरोपों से घिरे होने के कारण किनारे बैठाया जा सकता है। इसी तरह केवल राष्ट्रीय नेतृत्व की इच्छा से प्रदेशाध्यक्ष बने अजय भटï्ट या पहली बार केंद्रीय मंत्री बने अजय टम्‍टा, राष्ट्रीय युवा प्रवक्‍ता अनिल बलूनी जैसे नेताओं को कुछ वर्षों तक दूसरी पंक्ति में प्रतीक्षा के लिए कह सकते हैं। लेकिन भाजपा का सबसे बड़ा संकट कांगे्रस से दलबदल कर आए मुख्‍यमंत्री पद के दावेदार विजय बहुगुणा, सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत के कारण है। भाजपा या संघ के कार्यकर्ता ऐसे बाहरी विवादास्पद नेताओं के लिए किस मुंह से जनता के बीच जा सकेंगे।

उत्तराखंड के प्रभारी केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय आलाकमान के निर्देशानुसार इतना ही कह पा रहे हैं कि मुख्‍यमंत्री का फैसला चुनाव के बाद भी हो सकता है और चुनाव तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं अध्यक्ष अमित शाह के नाम पर लड़ा जा रहा है। संभवत: वे यह भूल जाते हैं कि उत्तराखंड के गठन की लड़ाई में भाजपा-संघ के कार्यकर्ताओं ने अहम भूमिका निभाते हुए बड़ी जन आकांक्षाएं जगाई थी। यही कारण है कि 1978 से उत्तराखंड के गठन के संघर्ष में आगे रहने वाले रमेश पोखरियाल निशंक के समर्थक राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने समय रहते उन्हें मुख्‍यमंत्री पद के उम्‍मीदवार के रूप में पेश करने की गुहार लगा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के सामने ऐसे समर्थकों ने कई अकाट्य तर्क पेश कर दिए हैं। उत्तराखंड के साथ कुछ अन्य प्रदेशों के भाजपा नेताओं और संघ के कुछ वरिष्ठजनों ने भी इस बात का समर्थन किया है। निशंक समर्थकों को इस बात से भी नाराजगी रही है कि भाजपा के ही कुछ प्रतिद्वंद्वी नेताओं ने पिछले वर्षों के दौरान निशंक पर अनर्गल आरोप लगाकर उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश की। निशंक के मुख्‍यमंत्री काल में लगे आरोपों की सारी जांच पड़ताल में भी एक आरोप साबित नहीं हुआ। दूसरी तरफ उनका यह भी तर्क है कि 57 वर्षीय निशंक के सर्वाधिक राजनीतिक प्रशासनिक अनुभव है। वह 1991, 1993, 1996 में कर्णप्रयाग से लगातार उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। 1997 में कैबिनेट मंत्री बने। सन् 2000 में उत्तराखंड में वित्त, ग्रामीण विकास सहित 12 विभागों के कैबिनेट मंत्री रहे। 2007 से विभिन्न विभागों में मंत्री रहने के बाद 2009 से 2011 तक सफल मंत्री एवं बाद में पार्टी के उपाध्यक्ष एवं 2014 में अच्छे बहुमत से लोक सभा में भी चुने गए। लेकिन जोड़-तोड़ की राजनीति में अनुशासित विनम्र नेता मानकर पीछे रखा जाता।  समर्थकों ने केंद्रीय नेतृत्व के सामने कुछ ऐसे आंकड़े भी रखे, जिससे उत्तराखंड के भाजपा सहित पूर्व मुंख्‍यमंत्रियों के कार्यकाल की विफलताएं उजागर होती हैं। उन्होंने भारत सरकार द्वारा ही जारी आंकड़ों का दस्तावेज राष्ट्रीय नताओं को सौंपा है। आंकड़े साबित करते हैं कि डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के मुख्‍यमंत्री के कार्यकाल में सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जी एस डी पी) 26.25 प्रतिशत हो गई थी। जबकि उनसे पहले भाजपा के मुख्‍यमंत्री रहते यह दर 22.18 प्रतिशत और बाद के मुख्‍यमंत्रियों के दौरान तो 18, 16.54 और 10.23 प्रतिशत तक रह गई। इसी तरह उनके कार्यकाल में कृषि क्षेत्र में विकास दर 13.40 प्रतिशत रही, जबकि उनसे पहले 1 प्रतिशत से भी कम और बाद में 3.71 से 2.30 प्रतिशत तक रह गई। सकल घरेलू औद्योगिक उत्पादन को उन्होंने 12 से बढ़ाकर 19.67 प्रतिशत पहुंचा दिया, जबकि उनके बाद के नेताओं ने गिराकर 9.29 प्रतिशत ला दिया। मैन्यूफैख्‍र विकास दर उन्होंने 24.43 प्रतिशत पहुंचा दी, जो बाद में गिरकर 3.10 प्रतिशत रह गई। सरकार के अलावा एसोचैम जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट में भी निशंक के 2009 से 2011 के कार्यकाल में हुई प्रगति को श्रेष्ठ निरूपित किया गया। समर्थक यह भी ध्यान दिला रहे हैं कि संगठन के पदाधिकारी रहते हुए 20 वर्ष पहले स्वयं नरेन्द्र मोदी ने उत्तराखंड में निशंक के काम को देखा एवं सराहना की। इस सबके बावजूद फिलहाल भाजपा अजीबोगरीब पशोपेश में है। बिहार विधान सभा चुनाव में कोई बड़ा नामी उम्‍मीदवार सामने नहीं रखने का नतीजा पार्टी भुगत चुकी है। उम्‍मीद यही जा सकती है कि जमीनी सूचनाएं मिलने के बाद नेतृत्व उत्तराखंड के शिखर पर पहुंचाने झंडा सही नेता के हाथ में थमा दे।

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