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सपने नौकरी के: कितना खतरनाक होगा उनका मर जाना

ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेञ्चिनकल एजुकेशन के अनुसार हर साल देश के तकनीकी संस्थानों से पढ़ कर 8 लाख इंजीनियर निकल रहे हैं। लेकिन उनमें से 60 प्रतिशत को रोजगार नहीं मिल पा रहा
बेरोजगार युवाओं की यह भीड़ इलाहाबाद के रोजगार कार्यालय की है

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछले करीब तीन सालों के कार्यकाल में युवाओं के लिए रोजगार के सपनों की फैक्टरियां खूब खुली हैं लेकिन धरातल पर नौकरियों का टोटा जस का तस बना हुआ है। मोदी के लिए बड़ी राहत की बात यह है कि अपने में हर साल एक ऑस्ट्रेलिया शुमार कर लेने वाली देश के बेरोजगारों की फौज का उनपर भरोसा भी जस का तस बना हुआ है। आंखों में सपनेलिए युवाओं से बात करने पर अभी यह बात जरूर सामने आती है कि उन्हें मोदी की नीयत सच्ची लग रही है। इसीलिए अभी तक कुछ ठोस नहीं हो पाने के बावजूद वे मोदी से निराश और खफा नहीं हैं। वे शायद यह भी समझ रहे हों कि पीएम मोदी के हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं है। उन्होंने जो सपने दिखाए हैं उन्हें पूरा करने में समय तो लगेगा। वे मोदी को समय देने के मूड में भी दिख रहे हैं। शायद यही कारण है कि आपको ऐसे युवा बहुत कम मिलेंगे जिन्हें आप यह आसानी से समझा पाएं कि मोदी सिर्फ नौकरियां सृजित करने के दावे भर कर रहे हैं। युवा ही नहीं, उद्योग जगत के लोगों व नीति विशेषज्ञों को भी भरोसा है कि समय भले लगे पीएम मोदी के मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे ड्रीम प्रोजेक्ट अंतत: पर्याप्त रोजगार मुहैया करने के प्रभावी जरिया बनेंगे।
आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से और जाहिर है बेरोजगार युवाओं के लिहाज से भी देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भारी जीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक न्यू इंडिया का जो नया नारा दिया वह एक तरह से उनकी स्वीकारोक्ति ही है कि वे भी अपने शासन के तीन साल बीत जाने के बाद अभी सपने देखने और दिखाने के फेज से ही गुजर रहे हैं और वे 2022 तक ही पूरे हो पाएंगे। वे जगह-जगह न्यू इंडिया को समझाते हुए कह रहे हैं कि यह सपनों से हकीकत की तरफ बढ़ता हुआ भारत होगा, सबों के लिए अवसरों का भारत होगा।
पूरी दुनिया में युवाओं को रोजगार देने का सवाल राजनीति में उथल-पुथल का एक बड़ा कारण बन कर सामने आ रहा है। पीएम मोदी के नारे इंडिया फस्र्ट की तर्ज पर अमेरिका फस्र्ट के नारे के बूते ही सभी भविष्यवाणियों को धता बताते हुए डोनाल्ड ट्रंप भी अमेरिका के राष्ट्रपति इसलिए बन पाए क्योंकि उन्होंने वहां के मूल युवाओं को रोजगार पैदा करने एवं विदेशियों द्वारा उन्हें छीने जाने पर रोक लगाने के सपने दिखाए। युवाओं ने उन पर भरोसा भी किया।
हैरत की बात यह है कि पीएम मोदी पर भरोसे की यह स्थिति तब है जब पिछले कुछ महीनों में नौकरियां जाने की खबरें लगातार पढऩे को मिल रही हैं। रोजगार के मोर्चे पर एक घुप्प अंधेरे सुरंग वाली स्थिति बनी हुई है। एक बानगी भर से यह पता चलता है। ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेञ्चिनकल एजुकेशन के अनुसार हर साल देश के तकनीकी संस्थानों से पढ़ कर 8 लाख इंजीनियर निकल रहे हैं। लेकिन उनमें से 60 प्रतिशत को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। स्टार्ट अप इंडिया के तहत तामझाम के साथ अस्तित्व में आई कंपनियां कर्मचारियों को लगातार बाहर का दरवाजा दिखा रही हैं। मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे मेगा प्रोजक्ट के हलकों से भी कोई उत्साहवर्धक संकेत नहीं मिल रहे। उत्तर प्रदेश और राजस्थान में ऐसे नजारे अक्सर देखने में आ जाते हैं कि चंद सरकारी नौकरियों के लिए आवेदकों की बाढ़ आ जाती है। 2015 में ही यूपी में एक अदद चपरासी की नौकरी के लिए पीएचडी, पीजी एवं स्नातक किए हुए युवाओं ने आवेदन किया। इसके लिए कुल 23 लाख आवेदन आए जिनमें भाजपा शासित राज्यों गुजरात और हरियाणा में युवाओं का नौकरी में आरक्षण की मांग को लेकर सडक़ों पर उतरना इस बात को रेखांकित कर रहा है कि वे बिना काम के हैं। 2014-15 में महज 5 लाख रोजगार का सृजन उनकी सरकार कर पाई है। 2015-16 में तो इससे भी कम, केवल 91 हजार नौकरियां। इस दौरान श्रम प्रधान उद्योगों मसलन, ऑटोंमोबाइल, करघा एवं जेवरात उत्पादन में 43 हजार नौकरियां कम ही हो गईं। नतीजतन कई लाख युवा छोटी-मोटी नौकरी कर गुजर बसर करने को मजबूर हुए।
बजट सत्र में अभी-अभी केंद्र सरकार ने संसद में एक सवाल के जवाब में नौकरी के टोटे को स्वीकार किया। केंद्रीय योजना राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने कहा कि देश में बेरोजगारी बढ़ रही है। खास कर पिछड़े तबकों में यह ज्यादा है। मंत्री ने कहा कि बेरोजगारी की कुल दर 5 प्रतिशत लेकिन अन्य पिछड़े वर्गों में यह दर 5.2 प्रतिशत है। मजे की बात है कि 2013 में यह दर 4.9, 2012 में 4.7 प्रतिशत ऑर 2011 में 3.8 प्रतिशत थी। लेकिन इस सब नकारात्मक संकेतों के बावजूद पीएम मोदी अंधेरे सुरंग के अंत में अभी तक एक प्रकाशपुंज की तरह प्रदीप्त हो रहे हैं। युवाओं के मोदी पर यकीन का बाल भी बांका नहीं हुआ है। शायद नोटबंदी सहित चुनाव के बीच में ही गैस सिलिंडर की कीमत में भारी वृद्धि करने जैसे गुस्ताख फैसलों ने युवाओं को मोदी का मुरीद बना दिया हो। लगता है उन्हें यह पूरा यकीन है कि उनके लिए नौकरियों का पिटारा देर सवेर खुलेगा तो मोदी के हाथों ही खुलेगा। इस भरोसे का हश्र क्या होगा यह तो समय बताएगा लेकिन इतना तय है कि यह बात मोदी को अंदर से जरूर मथ रही होगी और शायद उनके तनाव का सबब भी बन रहा होगा। आजादी के बाद शायद ही युवाओं ने किसी नेता में भरोसे का इतना भारी निवेश किया होगा। उनके इसी के भरोसे के बूते मोदी 2019 और 2024 में भी सत्ता के सपने भी देख रहे हैं लेकिन मोदी की जीत चिरस्थायी तभी हो सकेगी जब वे युवाओं से किए गए इन वादों को पूरा करें।
नरेन्द्र मोदी केंद्र की राजनीति में युवाओं की अपेक्षाओं, जो मुख्य रूप से अच्छी नौकरी पाना है, को पूरा करने का सपना उछालते हुए ही अवतरित हुए हैं। मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, डिजिटल इंडिया और उत्तर प्रदेश में भारी विजय के बाद अब न्यू इंडिया मोदी के उन सपनों के नाम है जिन्होंने खास कर युवाओं में अभूतपूर्व अपेक्षाएं जगाई हैं। उन्होंने अपने इन्हीं विभिन्न नारों के मोहपाश में युवाओं को बांध रखा है। आशा की जानी चाहिए कि वे अब अपने वादों पर खरे उतरेंगे। लेकिन अगर असफल हुए तो देश का क्या हश्र होगा। कहने की जरूरत नहीं कि युवाओं के सपनों का मर जाना देश के लिए भी और इन सपनों को दिखाने वाली सरकार के लिए बेहद खतरनाक भी साबित हो सकता है। कहना चाहिए-अतीत तो इतिहास है, आने वाला कल रहस्यमय।
उत्तर प्रदेश के पूरे चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी इस बात को उछालते रहे कि पीएम मोदी हर साल 2 करोड़ रोजगार देने का अपना वादा पूरा नहीं कर पाए। भले ही उन्होंने खुद युवाओं को रोजगार मुहैया कराने के मामले में कुछ भी न किया हो लेकिन वे पीएम मोदी के बारे में यह सच ही कह रहे थे। फिर भी युवा मोदी के साथ जुड़े रहे हैं तो यह पीएम मोदी के लिए बेहद गर्व की बात हो सकती है लेकिन यही उनके बड़े डर का कारण भी होना चाहिए।
उद्योग संगठनों को यह भरोसा है कि पीएम मोदी अंतत: युवाओं को रोजगार देने के अपने वादे को पूरा करने में सफल साबित होंगे। भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) के महासचिव डॉ. ए. दीदार सिंह यह जरूर मानते हैं कि रोजगार सृजन भारतीय अर्थव्यवस्था की कुछ सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं। लेकिन उन्होंने आउटलुक हिंदी से इस सवाल पर कहा है कि ताजा बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने श्रम कानूनों में सुधारों की घोषणा की है। जैसे ही ये सुधार लागू होंगे, रोजगार सृजित करने की कोशिशों पर व्यापक प्रभाव पडऩे वाला है। दरअसल, कारोबार बढ़ाने एवं नौकरियां पैदा करने के लक्ष्य को ध्यान में रख कर ही श्रम सुधार शुरूकिए गए हैं। वे आगे कहते हैं- सरकार ने रोजगार पैदा करने वाले क्षेत्रों, जैसे इन्फ्रास्ट्रख्र
(आधारभूत), हाउसिंग, चमड़ा उद्योग और फुटवियर पर खासा जोर दिया है, यह भी एक सकारात्मक बात हुई है। लेकिन साथ ही दीदार सिंह ने आगाह भी किया है कि भारत में अब तक रोजगार पैदा करने वाली सूचना प्रौद्योगिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी आधारित सेवाओं को ताजा वैश्विक अनिश्चितताओं से झटका भी लग सकता है। हमने सरकार से इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर दूसरे देशों से द्विपक्षीय संवाद बनाए रखने का अनुरोध किया है।
सिंह का मानना है कि बेरोजगारी के मसले को समग्र नीति के नजरिए से हल करने की जरूरत है। उन्होंने आउटलुक हिंदी से कहा है कि रोजगार को सभी सामाजिक व आर्थिक नीतियों और फैसलों से जोडऩे की जरूरत है। उन्होंने बताया कि पिछले साल फिक्की की वार्षिक आम सभा में रोजगार के मसले पर ही एक किताब पेश किया था जिसमें नीति विशेषज्ञों और उद्योग के दिग्गजों ने बड़े रोचक एवं प्रभावी सुझाव दिए हैं। नीति नियंताओं के साथ उन विचारों को व्यापक रूप से साझा किया गया है। हमें पूरी आशा है कि रोजगार पैदा करने के लिए दिए गए हमारे सुझावों पर सरकार अमल करेगी।
सिंह ने कहा कि नोटबंदी सरकार का एक साहसिक कदम था, आर्थिक गतिविधियों पर उसका थोड़ा प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ा लेकिन वह अस्थायी था। अब फिर आर्थिक गतिविधियां तेज होनी शुरूहो गई हैं। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों से भारत की विकास यात्रा उत्साहित करने वाली है और सतत है। सरकार द्वारा शुरू की गई सुधारों की प्रक्रिया लगातार जारी है। पीएम मोदी के नीतिगत कदम एवं मेक इन इंडिया जैसे फ्लैगशिप कार्यफ्मों पर पैनी निगाह डालें तो सरकार की नीति कभी अपने रास्ते से भटकी नहीं। औद्योगिक विकास के लिए मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया एवं स्टार्ट अप इंडिया जैसे अभियानों के साथ-साथ कारोबार करने को आसान बनाने के लिए उठाए गए नीतिगत कदम उठाने भी जारी हैं।
उद्योग संगठन एसोचैम के नव निर्वाचित अध्यक्ष संदीप जाजोदिया भी मानते हैं कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती आबादी को रोजगार उपलब्ध कराना है। उनका कहना है कि उद्योग जगत ही ऐसा कर सकने में समर्थ हो सकता है। नौकरी तभी बढ़ेगी जब उत्पादन बढ़ेगा। केंद्र सरकार को इसके लिए उद्योग जगत पर भरोसा करना होगा। उद्योग जगत में छोटे एवं मझोले उद्योग भारी संख्या में रोजगार उपलब्ध कराते हैं। बहरहाल, दुनिया में सबसे जवां माने जाने वाले भारत में हर साल करीब एक करोड़ 30 लाख बेरोजगार नौकरी के बाजार में जुड़ जाते हैं। लेकिन उनमें से बहुत कम को मनमाफिक नौकरी मिल पाती है। श्रम ब्यूरो के ताजा आंकड़े से पता चलता है कि पिछले 3 सालों में बहुत सीमित संख्या में रोजगार के अवसर पैदा हो पाए हैं। भले ही अर्थव्यवस्था के विकास की दर 7 प्रतिशत हो लेकिन जाने-माने स्तंभ लेखक एवं अर्थशास्त्र के जानकार अंकलेसरैया ऐय्यर इसे रोजगार विहीन विकास की संज्ञा दे रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी को भी युवाओं में आकांक्षाओं के उफान का अंदाजा है और शायद यह एहसास भी है कि उन वादों को पूरा करना एक साधारण काम नहीं है। इसी संदर्भ में उन्हें 2019 के अहम लोकसभा चुनाव का भी ध्यान है। इसलिए वे इस मोर्चे पर हद से अधिक सक्रिय हो गए हैं क्योंकि वादों की चिंता करने के मामले में सरकार में वे निपट अकेले हैं। सरकार की शीर्ष विचार संस्था नीति आयोग में रोजगार के सृजन को लेकर पिछले कुछ महीनों से जो माथापच्ची की स्थिति है उससे साफ है कि पीएम रोजगार सृजन को लेकर खासे चिंतित हैं। नीति आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि रोजगार पैदा करने की प्रभावी रणनीति तैयार करने को इस विचार संस्था का भारी दबाव है। उन्हें यह एहसास है कि अब तक जो विकास हुए हैं, वह रोजगार विहीन है। अधिकारी ने कहा कि नीति आयोग के चैयरमैन अरविंद पानगढिय़ा को अभी सांस लेने की भी फुरसत नहीं है। वे पर्याप्त रोजगार कैसे पैदा हो, इसके लिए लगातार व्यापार संघों एवं नियोजकों के संपर्क में हैं। नीति आयोग के पास रोजगार बढ़ाने के विभिन्न विकल्पों की लंबी फेहरिस्त है। उन्होंने कहा कि आशा की जानी चाहिए 2019 आते-आते पीएम पर भरोसे को बरकरार रखने लायक रोजगार की स्थिति में सुधार में हो जाएगा। रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए सरकार जल्द ही कुछ खास सेक्टरों के लिए विशेष पैकेजों का एलान जल्दी ही करने वाली है।
फरवरी में पेश बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि भारत दुनिया में अब छठा सबसे बड़ा उत्पादक देश हो गया है। पहले यह नौवें नंबर पर था। हमें वैश्विक विकास का इंजिन माना जाता है। लेकिन रोजगार के अवसर पैदा नहीं हुए तो फिर ये बड़ी-बड़ी बातें जुमले की श्रेणी में ही शुमार हो जाएंगी।
वैसे रोजगार के क्षेत्र में हरी टहनियां दिखनी शुरू हो गई हैं। बीते महीने केंद्र सरकार के लिए रोजगार के मामले में एक फीलगुड खबर आई है, खुशी की खबर कौंधी है। एसबीआई इकोफ्लैश की एक ताजा रिपोर्ट पर विश्वास करें तो बाजार की समझ के उलट 2017 के फरवरी महीने में 2016 के अगस्त के मुकाबले बेरोजगारी की दर 9.5 प्रतिशत से घट कर 4.8 प्रतिशत हो गई है। खास कर उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी में भारी गिरावट आई है। इसे चाहें तो आप मोदी का मिडास टच कह सकते हैं। उनकी छुअन भर से लगता है उत्तर प्रदेश सोना हो गया और उसके हालात सुधरने लगे।
रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी की 17.1 प्रतिशत से घटकर 2.9 प्रतिशत हो गई। इसी तरह मध्य प्रदेश में बेरोजगारी की दर 10 प्रतिशत से घट कर 2.7 प्रतिशत हो गई है। झारखंड में 9.5 प्रतिशत से 3.1 प्रतिशत, ओडिशा में 10.2 प्रतिशत से घटकर 2.9 प्रतिशत हो गई। बिहार में बेरोजगारी की दर 13 प्रतिशत से घट कर 3.7 प्रतिशत हो गई। यह बात दीगर है कि नौकरी के ये आंकड़े असंगठित क्षेत्र के हैं।
बेरोजगारी की हताश करने वाली ताजा भविष्यवाणियों के बीच यह चमत्कार कैसे हुआ। इस पर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के समूह प्रमुख आर्थिक सलाहकार कांति घोष का कहना है कि बेरोजगारी की दर में यह प्रभावी कमी ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने की केंद्र सरकार की कोशिशों का नतीजा है। लेकिन ये अवसर ज्यादा मनरेगा में पैदा हुए हैं। दरअसल, बेरोजगारी की दर को लेकर भी इस देश में भ्रम की स्थिति है। यहां रोजगार के जो आंकड़े संकलित होते हैं, वे सार्थक नहीं होते। नीति आयोग के सूत्रों के अनुसार मोदी ने विचार संस्था को व्यापक रोजगार आंकड़ों का संकलन करने की पद्धति ईजाद करने जिम्मेवारी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस काम को तेज गति से करने की जरूरत है। वृहत पैमाने पर अर्थशास्त्र की नीतियां तय करने के लिए रोजगार के आंकड़े का इनपुट बेहद जरूरी है। समय पर नौकरी का विश्वसनीय आंकड़ा फैसला लेने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन भारत में अभी रोजगार के आंकड़े जमा करने वाली पद्धति बेहद लुंजपुंज है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (नासो), सेंट्रल स्टैटिसटिक्स ऑफिस (सीएसओ) और श्रम व रोजगार मंत्रालय का लेबर ब्यूरो ये तीन संस्थाएं ही रोजगार के आंकड़े जुटाती हैं। नासो हर 5 साल में सर्वे के आधार पर रोजगार के आंकड़े पेश करता है। सीएसओ भी हर 5 साल में रोजगार के आंकड़े सर्वे आधारित जारी करता है। लेकिन इन आंकड़ों की बहुत अधिक विश्वसनीयता नहीं होती। तीनों के आंकड़े रोजगार के परस्पर विरोधी परिदृश्य भी पेश करते हैं।
मिसाल के तौर पर जुलाई 2014 में लेबर ब्यूरो ने अपने छठे आर्थिक जनगणना में अस्थायी नतीजा जारी किया। आंकड़े का इशारा भारत में पिछले 5-6 सालों में नौकरी के अवसर सृजित करने की दर में वृद्धि की तरफ था लेकिन नासो के आंकड़े इससे मेल नहीं खाते थे। वे परस्पर विरोधी पाए गए। आंकड़े के भ्रम की वजह से नीतियों का निर्माण अटक जाता है। नासो को लेकर टीवी में प्रचार भी हो रहा है। मोदी ने रोजगार के आंकड़े के लिए पद्धति दुरुस्त करने को कहा है ताकि वे उनके अनुसार नीतियां बना सकें। नीतियों की सफलता के आकलन के लिए रोजगार की स्थिति की विश्वसनीय निगरानी बेहद जरूरी है।
नौकरी के अवसर पैदा करने का सबसे बड़ा कार्यफ्म मेक इन इंडिया को समझा जा रहा है। मेक इन इंडिया कार्यफ्म राज्यों पर केंद्रित है। इसका लक्ष्य राज्यों में विनिर्माण व निवेश क्षेत्र स्थापित कर रोजगार के अवसर पैदा करना है। राज्यवार जन सांक्चियकियों के विश्लेषण से यह बात सामने आती है कि तेजी से रोजगार बढ़ाने के सरकार की कूवत की असल अग्निपरीक्षा उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान में होगी क्योंकि इन राज्यों में 2011 और 2021 के बीच काम के उम्र वाली आबादी में 50 प्रतिशत की वृद्धि होने वाली है। प्रति व्यक्ति आय के अनुसार, ये सबसे गरीब राज्य हैं। काम करने वाली उम्र में करीब 5 करोड़ 40 लाख की वृद्धि होगी। वहीं अमीर राज्यों, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब में केवल 2 करोड़ 20 लाख कामकाजी उम्र के लोग जुड़ेंगे।
पहले इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक व स्तंभ लेखक राजीव कुमार मानते हैं कि 7 प्रतिशत के कपोल कल्पित सकल घरेलू उत्पाद आकलन से 'सब कुछ ठीक है’ का झूठा एहसास पैदा हो रहा है। वहीं नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में केंद्र सरकार के लिए कोई काम करना आसान भी नहीं है। उनके अनुसार भारत ऐसा लोकतंत्र है जहां हुल्लड़बाजी बहुत होती है। सरकारी संस्था लेबर ब्यूरो के घर-घर जाकर किए गए सर्वे के अनुसार 2016 में बेरोजगारी की दर बढ़ कर 5 प्रतिशत हो गई थी जो पिछले 5 सालों में सबसे अधिक है।
फिलहाल, कुशलता से जुड़े 70 कार्यफ्म 20 अलग -अलग मंत्रालयों में चल रहे हैं। 2015 में खासे तामझाम के साथ स्किल इंडिया मिशन शुरूकिया गया। वादा किया गया था कि 7 साल में 40 करोड़ लोगों को नौकरी मिलने के काबिल तैयार किया जाएगा। पहले साल में यह मिशन करीब 17 लाख 60 हजार लोगों तक ही पहुंच पाया। यह आगे बढ़ेगा भी लेकिन चिंता की बात यह है कि इनमें 580,000 लोग ही पाठ्यफ्म पूरा कर पाए। इनमें 82 हजार ही नौकरी के काबिल बन पाए।

स्टार्ट अप इंडिया का भविष्य नहीं दिख रहा गुलाबी

लगता है स्टार्ट अप इंडिया का अफसाना कड़वा हो गया है। शुरू होने के बाद अप जाने की जगह यह डाउन जा रहा है। यह इसे ताम झाम के साथ लांच करने वाली मोदी सरकार और रोजगार की राह देख रहे युवाओं दोनों के लिए चिंता का सबब है। खस्ताहाल हो रही कई स्टार्ट अप कंपनियों ने सैकड़ों कर्मचारियों को गुलाबी पर्ची थमाना शुरू कर दिया है। आशंका जताई जा रही है, आगे यह सिलसिला जारी रहने वाला है।

भारत की तीसरी सबसे बड़ी ऑनलाइन शापिंग स्टार्ट अप कंपनी स्नैप डील में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। फैशन पोर्टल येपमी और टोलेक्‍सो जैसी स्टार्ट अप कंपनियां पिछले महीने अपने कर्मचारियों को गुलाबी पर्ची थमा चुकी है। स्टेजिला स्टार्ट अप के निवेश में 28 प्रतिशत की कमी आई है। डाटा अग्रीगेटर वेंचर इंटेलिजेंस का कहना है कि 2015 में इस सेक्‍टर में 2 अरब डालर का भारी निवेश था जो घट कर महज 1.4 अरब डालर ही रह गया है। इस क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि 2017 में यह मार-काट जारी रहेगी। माना जा रहा है कि अधिकतर उभभोक्‍ता इंटरनेट कंपनियां इस दौर से गुजरने वाली हैं। कई स्टार्ट अप कंपनियां बंद होने की कगार पर हैं। कुछ तो बंद हो भी गई हैं। नोटबंदी ने भी कई स्टार्ट अप कंपनियों को कर्मचारियों को हटाने पर मजबूर किया।

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