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ज्ञान के नए केंद्र निजी ‍विश्वविद्यालय

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में महत्वसपूर्ण बदलाव ला रहे हैं कॉरपोरेट घरानों से संचालित निजी शिक्षण संस्थान
एनआइआइटी विश्वविद्यालय, नीमराणा के छात्र सफलता के बाद खुशी जताते हुए

कॉरपोरेट घरानों से संचालित निजी विश्वविद्यालय भारत में उच्च शिक्षा की नई कहानी लिख रहे हैं। ये शिक्षा को नई दिशा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इनके पास पैसों की कमी नहीं है और इनका बुनियादी ढांचा काफी सुदृढ़ है। इस तरह के निजी विश्वविद्यालयों में आपका स्वागत है। यह वह क्षेत्र है जहां भारत अभी आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ रहा है। हालांकि सरकार से संचालितऔर वित्त पोषित विश्वविद्यालय भारतीय शिक्षा के मूल आधार रहे हैं, पर पिछले दशक या उससे पहले से निजी विश्वविद्यालयों ने भी भारत में पैर फैलाने आरंभ किए। इनमें से अधिकांश बड़े कॉरपोरेट घरानों से संचालित हैं। इन पर ये परोपकारी भावना से खर्च करते हैं और ये ज्यादातर शिक्षा के पश्चिमी मॉडल पर आधारित हैं। इनमें शिव नाडार विश्वविद्यालय, अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, एनआइआइटी विश्वविद्यालय, ओ.पी. जिंदल विश्वविद्यालय, फ्यूचर इन्नोवर्सिटी, बृजमोहन लाल मुंजाल विश्वविद्यालय वगैरह शामिल हैं।

सभी बड़े व्यापारिक घराने उच्च शिक्षा से जुड़ना चाहते हैं। चाहे यह उनका व्यापारिक उपक्रम हो या कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) की जरूरतें हों या फिर परोपकारी गतिविधियां। ये शिक्षा की अद्वितीय उपयोगिता का वादा करते हुए कई विशेष सेक्टर की जरूरतों के अनुसार पढ़ाई पर ध्यान देते हैं जबकि दूसरे बोर्ड आधारित कोर्स और पाठ्यक्रम चलाते हैं। ग्रेटर नोएडा के शिव नाडार विश्वविद्यालय की कुलपति रूपमंजरी घोष के अनुसार, “1990 और 2000 में परोपकार व्यापार का एजेंडा नहीं था। लेकिन अब वे इसके लिए सक्रिय हो गए हैं। लोग अब इसमें आने लगे हैं और इसने अब आकार ग्रहण कर लिया है। इनमें से कई विश्वविद्यालय सीएसआर में नहीं हैं, लेकिन ये भारत में अच्छी शिक्षा व्यवस्था लाना चाहते हैं।”

इनमें से कई खुद को विदेशों से जुड़ा बताते हैं और शिक्षा के प्रति नया नजरिया पेश करते हुए कहते हैं कि वे उसी तरह की बहु-आयामी शिक्षा देंगे जैसी शिक्षा अमेरिका के निजी विश्वविद्यालयों में उपलब्ध है। भारत में, जहां उच्च शिक्षा की मांग बढ़ती जा रही है, वहीं ये विश्वविद्यालय छात्रों के लिए नए अवसर उपलब्ध करा रहे हैं। इन विश्वविद्यालयों के संचालन का एक महत्वपूर्ण पक्ष इन्हें कॉरपोरेट फंड का उपलब्ध होना है। दूसरी ओर, सरकारी विश्वविद्यालय टैक्स अदा करने वाले लोगों की राशि से चलते हैं। उन्हें यह राशि मिलने में काफी कठिनाई होती है और इनके लिए कई मानक भी तय हैं जबकि कॉरपोरेट घराने धन देने में काफी उदार हैं। निर्णय लेने की केंद्रीकृत व्यवस्था होने के कारण यहां फंड को मंजूरी देना काफी आसान होता है और योजनाएं तेजी से आगे बढ़ती हैं।

इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के संस्थापक डीन और अशोका विश्वविद्यालय के सहसंस्थापक प्रमथ राज सिन्हा कहते हैं कि सरकारी विश्वविद्यालयों की तुलना में निजी विश्वविद्यालयों में फंड की उपलब्धता लंबे समय की जगह सीमित समय तक के लिए ही होती है। वह कहते हैं, “निजी विश्वविद्यालयों पर कुछ समय के बाद खुद का आर्थिक और वित्तीय ढांचा खड़ा करने का थोड़ा दबाव रहता है क्योंकि निजी फंडिंग और दान अथाह खजाने की तरह जारी नहीं रह सकता है।” 

आइजीआइडीआर, मुंबई के निदेशक दिलीप एम. नचाने के अनुसार निजी शैक्षणिक संस्थान हमारी उच्च शिक्षा-व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग बन गए हैं। हाल के दिनों में कई को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है। इनकी मंजूरी के लिए बनी सरकारी नीति भी अधिक आसान बन गई है। परिणामस्वरूप भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों का विस्तार हुआ है। लेकिन, संस्थानों में प्रशिक्षण में गुणवत्ता, पढ़ाए जाने वाले विषयों की व्यापकता, प्रशासनिक ढांचा और सामाजिक प्रतिबद्धता को लेकर बड़े अंतर हैं। इनमें से कई गुणवत्ता के मामले में विश्व स्तरीय केंद्र के रूप में उभरे हैं तो कई इससे थोड़ा पीछे रह गए हैं।

मणिपाल विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके नचाने के अनुसार सिद्धांततः यह माना जाता है कि निजी विश्वविद्यालय उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इन्हें सरकारी ही नहीं केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तुलना में फंड ज्यादा आसानी से उपलब्ध हो जाता है। इतना ही नहीं, तुलनात्मक रूप से ये विश्वविद्यालय राजनैतिक हस्तक्षेप से भी मुक्त रहते हैं, जिनका सामना सरकारी विश्वविद्यालयों को करना पड़ता है। फलस्वरूप, यहां छात्र और शिक्षकों के आंदोलन भी बहुत कम होते हैं। नचाने कहते हैं, “नौकरशाही द्वारा रुकावट नहीं डाले जाने के कारण शिक्षा की जरूरतों के अनुसार ये तत्काल अनुकूल और लचीले हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, कई विश्वविद्यालयों ने बौद्धिक संपत्ति अधिकार (इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट) पर तत्काल कोर्स शुरू कर दिए क्योंकि यह विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में उभरा था। इसी तरह, हाल के वर्षों में डाटा एनालिटिक्स कॉरपोरेट क्षेत्र में महत्वपूर्ण हो गया। इस कारण कई विश्वविद्यालयों को इस पर कोर्स शुरू करने प्रेरणा मिली। जब सरकारी विश्वविद्यालयों से इसकी तुलना करेंगे तो आप पाएंगे कि वहां सिलेबस का आधुनिकीकरण बोझिल शिक्षा समिति और अवरोध डालने वाली नौकरशाही के हाथों में बंधक बनी हुई है।”

संभवतः निजी या कॉरपोरेट से फंड हासिल करने वाले विश्वविद्यालयों के लिए लाभ की सबसे ज्यादा स्थिति इसी कारण है कि वे स्तरीय प्रतियोगी मापदंड उपलब्ध करा रहे हैं जो सरकारी विश्वविद्यालयों को स्तर में सुधार लाने के लिए प्रेरित कर सकता है। नचाने कहते हैं, “इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कई निजी विश्वविद्यालयों की प्राथमिकता कॉरपोरेट क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करना है। इसका मतलब यह है कि प्रबंधन शिक्षा पर ही मुख्य जोर दिया जाता है।”

हालांकि, सिन्हा कहते हैं, “निजी विश्वविद्यालय बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत में 800 से ज्यादा विश्वविद्यालय हैं। इनमें से करीब 70 फीसदी निजी हैं। इन 500 से अधिक निजी विश्वविद्यालयों में मुट्ठी भर ही ऐसे हैं जो कुछ अलग ढंग से करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि 99 फीसदी निजी विश्वविद्यालय सरकारी विश्वविद्यालयों की तरह ही अच्छे या बुरे हैं।” हालांकि सरकारी धन के मिलने के कारण विश्वविद्यालय सुरक्षित स्थान बन गए हैं मगर यहां प्रयोग की संभावनाएं सीमित हो गई हैं। इसी वजह से, विश्वविद्यालय अभी भी यंत्रवत पठन-पाठन की प्रक्रिया में लगे हुए हैं और यहां आधुनिक जरूरतों को पूरा करने के सीमित प्रयास ही हो पा रहे हैं। यही कारण है कि निजी विश्वविद्यालय आगे बढ़ रहे हैं।

घोष कहती हैं, “एक ऐसे स्वतंत्र परोपकारी सेक्टर के उभरने की जरूरत है जो इस बात की चिंता किए बगैर प्रयोग कर सके कि टैक्स देने वाले लोगों का धन सही तरीके से खर्च किया जा रहा है। अगर ऐसा होता है तभी कोई काम करने के लिए जोखिम ले सकता है।” दूसरी महत्वपूर्ण बात पाठ्यक्रम और दृष्टिकोण है। मुश्किल से ही भारत के पुराने विश्वविद्यालयों में बहु-शैक्षिक शोध हो रहे हैं जबकि यह अमेरिका के निजी विश्वविद्यालयों के लिए सामान्य सी बात है। हालांकि, आईआईटी में हाल में मानविकी और अंग्रेजी पढ़ाना शुरू किया गया है। लेकिन कॉरपोरेट और निजी विश्वविद्यालयों की शुरुआत ही इसी भावना से हुई है। घोष कहती हैं, “आज की समस्या किसी एक विषय को लेकर सीमित नहीं है, अगर आपके पास बहु-विषयक सोच नहीं है तो आप अंतर-विषयक समस्या का समाधान नहीं कर सकते हैं। हमारे इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में रचनात्मक डिजाइनिंग है। पहले हम सामाजिक विज्ञान, स्थायी विज्ञान पढ़ाते हैं इसके बाद इंजीनियरिंग पढ़ाते हैं। पठन-पाठन की पूरी प्रक्रिया अब बदल गई है। यह छात्रों को एक-आयामी की जगह 360 डिग्री वाला मनुष्य बनाती है।”

कॉरपोरेट विश्वविद्यालयों में छात्रों को तो ज्ञान के नए संसाधनों से परिचित कराया ही जाता है इस बात पर भी ध्यान दिया जाता है कि यहां पढ़ाने वाले भी हर चीज से वाकिफ रहें। इसके लिए उन्हें साल में छह महीने उन उद्योंगों में काम करने के लिए भेजा जाता है जिनमें उनकी विशेषज्ञता रहती है। ऐसा इसलिए किया जाता है जिससे वे उद्योग की जरूरतों, चुनौतियों और बाजार की वास्तविकताओं को जान सकें। कुछ नए कॉरपोरेट विश्वविद्यालय पूर्व स्नातकों को भी शोध में शामिल कर रहे हैं। यहां बहु-विषयक बातचीत को बढ़ावा देने के लिए एक छत के नीचे इंजीनियरिंग, मानविकी और प्रबंधन की पढ़ाई होती है। एनआइआइटी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वी.एस. राव के अनुसार, “कॉरपोरेट विश्वविद्यालयों के लिए उद्योग काफी सहायक हैं। उद्योगों से रिश्तों के कारण हम छात्रों को छह महीने के लिए यहां की चालू परियोजनाओं में भेजते हैं, जहां ये नियमित कर्मचारी की तरह काम करते हैं।”

इन संस्थानों का जोर शिक्षा के माध्यम से समाज में हिस्सेदारी पर भी रहता है। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के कुलपति अनुराग बेहर के अनुसार, “हमारे विश्वविद्यालय की स्थापना विशेष सामाजिक उद्देश्यों के तहत की गई है। हम अपने शैक्षणिक कार्यक्रमों, शोधों के माध्यम से न्यायसंगत, समान, मानवीय और टिकाऊ समाज के निर्माण में अपनी भागीदारी निभाते हैं। शोध कार्यक्रम शिक्षा के मुद्दों, स्थायित्व, शासन, आर्थिक विकास और आजीविका से काफी गहराई से जुड़े होते हैं। हमारे कार्यक्रम समाज में सहभागिता के लिए इच्छुक छात्रों के लिए प्रायः पहली पसंद बन जाते हैं।” हालांकि, निजी विश्वविद्यालय शिक्षा के मॉडल में बदलाव का प्रयास कर रहे हैं पर इन्हें योग्य शिक्षकों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, परंपरागत विश्वविद्यालय अपनी पुरानी ख्याति के कारण योग्य शिक्षक पा ले रहे हैं, पर निजी विश्वविद्यालयों को योग्य शिक्षकों को अपनी ओर आकर्षित करने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस कारण ये अतिथि या विदेशों से आने वाले शिक्षकों पर आश्रित हो जाते हैं।

शिव नाडार विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश की लाइब्रेरी में पढ़ाई करते छात्र

शिव नाडार विश्वविद्यालय का उदाहरण सबके सामने है। इसने दुनिया में भारतीयों के फैलाव पर ध्यान दिया इस कारण यहां पर प्रवासी भारतीय (एनआरआइ) शिक्षकों की एक मजबूत टीम है। घोष गर्व से कहती हैं कि उनके विश्वविद्यालय में आइआइटी की तुलना में आइआइटी से पीएचडी किए हुए लोग ज्यादा हैं। जबकि आइआइटी भी शिक्षकों की कमी का सामना कर रहा है। पिछले साल आइआइटी दिल्ली में 400 तो आइआइटी बॉम्बे में 350 शिक्षकों की कमी थी। लेकिन इस दृष्टिकोण की आलोचना अपने लोग ही करते हैं। नचाने के अनुसार, ‘‘विदेशी शिक्षकों पर ज्यादा निर्भरता की वजह से सामाजिक विज्ञान (जैसे अर्थशास्‍त्र) के सिलेबस और कोर्स में ऐसी बातें पढ़ाई जाती हैं जिनका भारतीय वास्तविकता के लिए खास महत्व नहीं है।”

क्या निजी विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाना आसान है? प्रवेश की सख्त प्रक्रिया को देखते हुए अधिकांश मामलों में इसका जवाब ‘नहीं’ है। शिव नाडार विश्वविद्यालय का उदाहरण लें। यह संस्थान प्रवेश के लिए अपनी तरफ से परीक्षा आयोजित करता है, जिसमें कई स्तरों पर छात्रों की जांच की जाती है। कक्षा 12 में 80 फीसदी से कम अंक वालों को तो आवेदन करने की भी अनुमति नहीं है। अशोका विश्वविद्यालय के सिन्हा कहते हैं, “अशोका में नामांकन की प्रक्रिया दूसरों की तुलना में ज्यादा समग्रता लिए है। यह सिर्फ अंक और प्रवेश परीक्षा में रैंक पर ही आधारित नहीं है, यहां छात्र की क्षमता के दूसरे आयाम भी देखे जाते हैं।”

इसके बाद जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह है, इन संस्थानों में शिक्षा पर आने वाला खर्च। औसतन निजी विश्वविद्यालयों में सरकारी विश्वविद्यालयों की तुलना में कई गुना ज्यादा खर्च आता है। सरकारी विश्वविद्यालयों में तीन साल के स्नातक कोर्स में औसतन 30,000 रुपये से कम ही खर्च आता है, जबकि इसी कोर्स के लिए एमिटी विश्वविद्यालय में चार लाख या उससे ज्यादा का खर्च आता है। इसी कोर्स के लिए अशोका विश्वविद्यालय में 25 लाख रुपये देने पड़ते हैं। शिव नाडार विश्वविद्यालय और जिंदल विश्वविद्यालय के फीस का ढांचा भी इसी तरह का है। इसका बचाव करते हुए राव कहते हैं, ‘‘सरकारी विश्वविद्यालयों को सरकार से धन मिलता है जबकि कॉरपोरेट विश्वद्यालयों को निजी धन पर निर्भर करना पड़ता है।”

अशोका के सिन्हा भी इस पर सहमति जताते हुए कहते हैं, “उच्च गुणवत्ता वाली उच्च शिक्षा महंगी होती है, पूरी दुनिया में यह संभ्रांत वर्ग के लिए होती है। भारत में ही एक आइआइटी या आइआइएससी या आइआइएसइआर या आइआइएम में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा पर तीन साल में खर्च 25 लाख रुपये आएगा।” परोपकार के लिए फंड पाने वाले कई निजी विश्वविद्यालय सही मायने में लाभ-हानि की चिंता के बगैर चलाए जाते हैं। सिन्हा बताते हैं कि इनमें से कई छात्रवृत्ति के रूप में बड़ी राशि देते हैं। उद्देश्य यह होता है कि योग्यता रखने वाली सामान्य महिला भी यहां पढ़ने का अवसर पा सके।

ऐसे में यह भी स्वाभाविक ही है कि कॉरपोरेट संचालित विश्वविद्यालयों की लोग आलोचना भी करते हैं। नामी शिक्षाविद और आइआइएम लखनऊ के पूर्व निदेशक प्रीतम सिंह के अनुसार, “इन संस्थानों का शिक्षा के प्रति रवैया दोषपूर्ण है। आप कंपनियों की तरह विश्वविद्यालयों का प्रबंधन नहीं कर सकते। आप प्रबंधन के सिद्धांत को एक विश्वविद्यालय के ऊपर नहीं थोप सकते। यही कारण है कि कुछ ने अपने संकाय बंद कर दिए हैं जबकि दूसरे समस्या का सामना कर रहे हैं। इसके अलावा संचालन संबंधी मुद्दों को लेकर भी कई समस्याएं हैं।”

आलोचनाओं के बावजूद, कॉरपोरेट संचालित निजी विश्वविद्यालयों ने उच्च शिक्षा के प्रति नया नजरिया पेश किया है। मजबूत सामाजिक जुड़ाव की वजह से यह हमारे समय के लिए काफी जरूरी है। विदेशों से जुड़ाव होने के कारण यहां बाहरी ज्ञान और नए विचार भी उपलब्ध हैं। अभी यह देखा जाना बाकी है कि क्या भविष्य में ये विश्वविद्यालय उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराकर नौकरी को इच्छुक लाखों युवाओं में रोजगार की क्षमता बढ़ाने में सफल होंगे। इनके व्यापार के ढांचे में स्थिरता और युवा प्रतिभा को आकर्षित करने की इनकी क्षमता वैसे क्षेत्र हैं जिनकी पूरी तरह से जांच अभी बाकी है! लेकिन अभी इनको अपने सही लक्ष्यों पर सही निगाह जमाए रखने की जरूरत है।

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