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राहत पैकेज में देरी क्यों

आज ऐसे लाखों-करोड़ों लोगों को सरकार की मदद की जरूरत है, जिनके जीवन और आजीविका पर भारी संकट
आरबीआइ की पहलः केंद्रीय बैंक के फैसले से मांग कैसे बढ़ेगी

महामारी कोविड-19 की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है। दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं सख्त लॉकडाउन में हैं, जिससे लोगों की जिंदगियां और अजीविकाएं ऐसे संकट में हैं, जैसा आधुनिक सभ्यता के दौर में कभी नहीं दिखा था। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इसे 1930 के दशक की महामंदी के बाद सबसे बुरा आर्थिक दौर कहा है, लेकिन कुछ ताजा आंकड़े तो और भयावह तसवीर का संकेत दे रहे हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था की सेहत के एक अहम संकेत ऊर्जा की कीमतें गोता लगा गई हैं। दुनिया भर में तेल की कीमतें तय करने में अहम भूमिका निभाने वाले वेस्ट टेक्सास क्रूड की वायदा कारोबारी कीमतें शून्य से नीचे पहुंच गईं। प्रति बैरल -37.63 डॉलर की कीमतें 1946 के बाद के सबसे निचले स्तर पर चली गईं। विश्व व्यापार संगठन के मुताबिक, वैश्विक व्यापार का आकार 2020 में 13 से 32 फीसदी तक घट सकता है। ये आंकड़े बताते हैं कि चालू साल में वैश्विक अर्थव्यवस्था पांच फीसदी तक घट सकती है। चिंता की बात यह है कि अभी भी अधिकांश देश कोविड-संकट में फंसे हुए हैं।

तो, अर्थव्यवस्था के इस असाधारण बुरे दौर में वैश्विक प्रतिक्रिया क्या है? पश्चिमी देशों ने इस असाधारण वक्त में घरेलू मांग बढ़ाने और कारोबार की मदद के लिए अब तक के सबसे बड़े आर्थिक राहत पैकेज देने के फौरी कदम उठाए। अमेरिका ने कोरोनावायरस सहायता, राहत और आर्थिक (केयर्स) कानून बनाकर सबसे पहले पहल की। केयर्स कानून के तहत अमेरिका करीब 2.2 लाख करोड़ डॉलर की पूंजी अर्थव्यवस्था में डालेगा, जो उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 10 फीसदी के बराबर है। इसके अलावा फेडरल रिजर्व बैंक ने छोटे और मझोले बिजनेस को बचाने के लिए 2.3 करोड़ डॉलर का राहत पैकेज देने का भी ऐलान किया है। इस भारी भरकम राहत पैकेज ने अमेरिकन रिकवरी ऐंड रिइन्वेस्टमेंट कानून 2009 के तहत 831 अरब डॉलर के दिए गए पैकेज को भी बौना कर दिया है। उस वक्त भी अमेरिकी सरकार ने आर्थिक मंदी से बचाने के लिए राहत पैकेज दिया था।

अमेरिका के मौजूदा राहत पैकेज में सबसे बड़ी राहत वहां के निवासियों को मिलेगी। उन्हें 560 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता दी जाएगी। इसमें से 300 अरब डॉलर कैश ट्रांसफर के रूप में और बाकी राशि बेरोजगारी भत्ते के रूप में दी जाएगी। कैश ट्रांसफर राशि ऐसे चार लोगों के परिवार को मिलेगी, जिनकी कुल आय 1.50 लाख डॉलर से कम है। इसी तरह अगर कोई व्यक्ति अकेले रहता है और उसकी आय 75 हजार डॉलर तक है तो उसे भी कैश ट्रांसफर के तहत सहायता राशि मिलेगी। अहम बात यह है कि सहायता राशि देते समय गरीबी रेखा को पैमाना नहीं माना गया है। अमेरिका ने 2020 के लिए ऐसे चार लोगों के परिवार को गरीबी रेखा के तहत माना है जिनकी आय 26,200 डॉलर से कम है। आसान शब्दों में कहें, तो राहत पैकेज देते समय अमीर-गरीब का पैमाना नहीं माना गया है। यानी सहायता राशि एक निश्चित आय तक सभी लोगों को मिलेगी।

बड़े कॉरपोरेट को भी बड़े पैमाने पर राहत दी गई है। केयर्स कानून के तहत 500 अरब डॉलर की रकम कर्ज, कर्ज की गारंटी और दूसरे निवेश के लिए खर्च की जाएगी। इसी तरह ऐसी छोटी कंपनियां, जिनमें 500 या उससे कम कर्मचारी काम करते हैं, उन्हें राहत पैकेज के तहत 350 अरब डॉलर की सहायता राशि दी जाएगी। ऐसी कंपनियां एक करोड़ डॉलर का कर्ज कर्मचारियों को वेतन देने, उन्हें छंटनी से बचाने, किराया देने और मौजूदा कर्ज को चुकाने के लिए भी ले सकेंगी, जिसे जरूरत पड़ने पर माफ भी किया जा सकता है। यह कदम जून तक कर्मचारियों की छंटनी रोकने के लिए उठाया गया है।

अमेरिका की तरह यूरोपीय संघ के देशों ने भी राहत पैकेज देने में कोई देरी नहीं की है। जर्मनी ने 1.1 लाख करोड़ यूरो का राहत पैकेज दिया है, जो उसकी जीडीपी का एक-तिहाई है। इसके तहत 600 अरब यूरो का आर्थिक स्थायित्व कोष (इकोनॉमिक स्टैबिलाइजेशन फंड) बनाया गया है। इसका इस्तेमाल कंपनियां कर्ज की गारंटी देने और वित्तीय संकट में फंसी कंपनियों की हिस्सेदारी खरीदने में कर सकेंगी।

जर्मनी की तरह फ्रांस की सरकार ने भी कंपनियों के कर्ज की गांरटी ले ली है। इसके अलावा छोटे कारोबारियों के लिए भी राहत पैकेज का ऐलान किया है। फ्रांस की सरकार ने कुल जीडीपी की करीब 14 फीसदी राशि राहत पैकेज के रूप में दी है। इसी तरह जापान ने 990 अरब डॉलर के राहत पैकेज का ऐलान किया है, जो उसकी कुल जीडीपी का करीब 19 फीसदी है।

इन सरकारों के राहत पैकेज का स्पष्ट संदेश है कि असाधारण समय, असाधारण कदमों की मांग करता है। इसके लिए उन्होंने अपनी राजकोषीय नीति को अधिकतम स्तर तक लचीला बना दिया है। मौजूदा संकट में सरकार का खर्च बढ़ाकर ही मांग निकाली जा सकती है। ऐसा करने से बिजनेस डूबने से बच जाएंगे। दूसरे देशों के रुख के मद्देनजर यह हैरान करने वाला है कि भारत सरकार ने अभी तक इस तरह के राहत पैकेज का ऐलान नहीं किया है। अभी तक राहत पैकेज के नाम पर प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के जरिए 1.7 लाख करोड़ रुपये देने का ऐलान किया गया है। इसमें अधिकतर मदों के लिए किए गए प्रावधान नए नहीं हैं। लेकिन अगर इसी को स्वीकार कर लिया जाए, तो भारत का राहत पैकेज, उसकी जीडीपी के मुकाबले केवल 0.7 फीसदी है। गरीबों को राहत पैकेज के तहत 500 रुपये दिए जाने का प्रावधान भी काफी कम है, उन्हें संकट के इस दौर में जीवनयापन के लिए इससे ज्यादा की जरूरत है।

दुनिया के दूसरे देशों के विपरीत भारत सरकार के इस रुख का अगर विश्लेषण किया जाए तो एक संभावना यह लगती है, कि सरकार राजकोषीय घाटे को बढ़ने से रोकना चाहती है। वह राजकोषीय उत्तरदायित्व बजट प्रबंधन कानून के तहत राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखना चाहती है। पिछले कुछ महीनों से भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त पड़ती गई है। इस वजह से लगातार यह मांग उठ रही है कि सरकार आक्रामक राजकोषीय नीति अपनाए। लेकिन भारत सरकार लगातार भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर भरोसा किए हुए हैं, जो निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सस्ते कर्ज की नीति पर भरोसा कर रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि बाजार जब पूरी तरह धराशायी हो गया है, उसके बावजूद रिजर्व बैंक नकदी बढ़ाने की नीति पर ही चल रहा है। उसे लगता है कि ऐसा करने से मांग बढ़ जाएगी। हाल ही में रेपो रेट में की गई कटौती इसी नीति की परिचायक है।

आजादी के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। सरकार का राहत पैकेज का ऐलान नहीं करना काफी चौंकाने वाला है। सरकार को हर हाल में यह समझना चाहिए कि बाजार में मौजूद नकदी का इस्तेमाल उसे करना होगा। इसके लिए सरकार को अपनी उधारी बढ़ानी होगी और उसे अपने राजकोषीय घाटे के बढ़ने की चिंता छोड़नी होगी। इसी तरह के कदम की सलाह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने भी दी है। आइएमएफ ने अप्रैल में जारी अपनी रिपोर्ट (फिस्कल मॉनीटर) में कहा है कि भारत को अपने राजकोषीय प्रबंधन की नीति में बदलाव लाना होगा, ताकि वह महामारी के संकट से निपट सके। उसे स्वास्थ्य पर अपना खर्च बढ़ाना होगा, जिससे अर्थव्यवस्था में जारी गिरावट को संभाला जा सके।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि सरकार जो भी राहत पैकेज बनाएगी, उसका प्रमुख जोर कॉरपोरेट सेक्टर को राहत देने पर ही होगा। लेकिन राहत पैकेज बनाते वक्त दो बातों पर उसे खास तौर से ध्यान रखना होगा। पहली बात यह कि इस संकट में सबसे ज्यादा परेशानी में नौकरीपेशा वर्ग है, उसमें भी प्रवासी मजदूर बड़े संकट का सामना कर रहे हैं। उनके जीवन और आजीविका पर संकट खड़ा हो गया है। दूसरी अहम बात कृषि क्षेत्र के लिए है, जो इस समय प्रवासी मजदूरों की घर वापसी की वजह से दोहरे दबाव का सामना कर रहा है। इस समय सरकारी तंत्र को रबी की फसल की ज्यादा से ज्यादा खरीदारी करने पर जोर देना चाहिए, क्योंकि लॉकडाउन से निजी क्षेत्र का बाजार पूरी तरह से धराशायी हो गया है। इसके अलावा सरकार को राहत पैकेज बनाते समय दूसरे देशों के पैकेज पर भी गौर करना चाहिए। ऐसा करने से उसे यह पता चलेगा कि इन देशों ने अपने छोटे और मझोले बिजनेस को बचाने के लिए क्या कदम उठाए हैं। मसलन, बांग्लादेश ने अपनी गारमेंट इंडस्ट्री को राहत दी है। वहां गारमेंट इंडस्ट्री में ज्यादातर महिलाएं काम करती हैं। भारत में इस तरह के उद्योग-धंधों को बचाने की बेहद जरूरत है, ताकि अर्थव्यवस्था पटरी पर आ सके। अंत में एक बात और, बुरा वक्त एक मौके की तरह होता है। भारत को इसका फायदा उठाकर अपनी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करना चाहिए। ऐसे दौर में यह कहने से कोई गुरेज नहीं है कि आज उन लाखों-करोड़ों लोगों को सरकार की मदद की जरूरत है जिनका जीवन और अाजीविका इस संकट में पूरी तरह से अव्यवस्थित हो गई है। यह समय भारतीय लोकतंत्र की असली परीक्षा का है।

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज ऐंड प्लानिंग स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में प्रोफेसर हैं।)

 

 

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आजादी के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। सरकार का राहत पैकेज का ऐलान नहीं करना काफी चौंकाने वाला है

 

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