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कारोबार: नॉस्टेल्जिया ड्रिंक का सुरूर

पुराने जमाने के ठंडा पेय कैंपा कोला को खरीदकर रिलायंस ने पेप्सी और कोका कोला को चुनौती देने की ठानी, लेकिन क्या यह दांव चलेगा
रिलायंस समूह ने खरीदा कैंपा कोला

अंग्रेजी में एक शब्द है ‘नॉस्टेल्जिया’ जिसका हिंदी में शाब्दिक अर्थ होता है-अतीत की अवधि में लौट जाने की तड़प। भारतीय राजनीति में ‘रामराज्य और सतयुग’ का सपना दिखाकर इसे खूब भुनाया जाता है, लेकिन व्यापार में यह फार्मूला बहुत कम सफल हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि व्यापार में नवाचार चलता है, ‘नॉस्टेल्जिया’ नहीं। हालांकि, भारत के दूसरे सबसे बड़े व्यापारिक समूह रिलायंस ने 1970 के दशक की मशहूर सॉफ्ट ड्रिंक कंपनी, कैंपा-कोला का 22 करोड़ में अधिग्रहण कर एक नया दांव खेला है। भारत के लोगों को सॉफ्ट ड्रिंक्स का स्वाद पहली बार आजादी के दो साल बाद मिला, जब 1949 में प्योर ड्रिंक्स के मालिक चरणजीत सिंह ने अमेरिकी कंपनी कोका-कोला का भारत में डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस खरीदा और देश में बेचना शुरू किया। उस वक्त कोका-कोला एकमात्र ऐसी सॉफ्ट ड्रिंक कंपनी थी, जिसका एकछत्र राज था और खूब मुनाफा भी कमा रही थी। हालांकि 1977 में भारतीय बाजार में कोका-कोला के एकतरफा आधिपत्य को जोरदार झटका लगा। इमरजेंसी के बाद चुनावों में केंद्र में पहली बार जनता पार्टी की गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। उस वक्त के इंडस्ट्री मिनिस्टर जॉर्ज फर्नांडिस ने कोका-कोला को अपनी 60 फीसदी हिस्सेदारी भारतीय शेयरधारकों को हस्तांतरित करने और इसे बनाने का सीक्रेट फार्मूला शेयर करने को कहा। कोका-कोला 60 फीसदी हिस्सेदारी देने को तो तैयार हो गया, लेकिन सीक्रेट फार्मूला बताने को तैयार न हुआ। आखिरकार 1977 में उसे देश छोड़कर जाना पड़ा। उस वक्त जॉर्ज फर्नांडिस ने कहा था, “बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति हमारी नीति एक समान है। अगर वे भारत में व्यवसाय करना चाहती हैं तो कंपनियों को देश के कानून का पालन करना चाहिए।”

एक दौर था जब कैंपा कोला की तूती बोलती थी

कोका-कोला के देश छोड़कर चले जाने पर लोगों को उसका विकल्प चाहिए था। केंद्र सरकार ने डबल सेवन (77) नाम से स्वदेशी कोला ब्रांड लांच किया। लेकिन लोगों की जुबान पर उसका स्वाद न चढ़ सका। वक्त की नजाकत को भांपते हुए प्योर ड्रिंक्स के मालिक चरणजीत सिंह, जो पहले कोका-कोला के देश में एकमात्र डिस्ट्रीब्यूटर हुआ करते थे ने कैंपा-कोला नाम से एक सॉफ्ट ड्रिंक बाजार में उतारा। उन्होंने इसमें स्वदेशी तड़का लगाया और द ग्रेट इंडियन टेस्ट के टैगलाइन से उसकी ब्रॉन्डिंग की। कैंपा-कोला का नाम, लोगो, बोतल का डिजाइन बिल्कुल कोका-कोला से मेल खाता था। देखते ही देखते कैंपा-कोला ने पूरे देश में मार्केट पकड़ लिया। कैंपा-कोला इतना लोकप्रिय हुआ कि भारत के सबसे बड़े स्पोर्ट इवेंट एशियाड 1982 में आधिकारिक सप्लायर बन गया। हालांकि यह प्रसिद्धि ज्यादा दिन नहीं टिकी और कई वजहों से कैंपा-कोला का मार्केट शेयर घटने लगा। इस बीच, पारले कंपनी के मालिक, रमेश चौहान ने ‘थम्स अप’ नाम से दूसरा कोला ब्रांड उतारा। अब कोला इंडस्ट्री में दो मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे, कैंपा-कोला और थम्स अप। दोनों में प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी। कैंपा-कोला अपने प्रोडक्ट की कीमत कम कर बाजार पकड़े रखना चाहता था, तो थम्स-अप ने कीमत कम करने के बजाय, बोतल की साइज 200 मिली से बढ़ाकर 250 मिली कर दी और उसकी मार्केटिंग ‘महा कोला’ के रूप में की। अंत में ‘द ग्रेट इंडियन टेस्ट’ पर ‘महा-कोला’ ने बढ़त हासिल की और यहीं से शुरू हुआ कैंपा-कोला का पतन। उदारीकरण के बाद 1993 में कोका-कोला के साथ एक और विदेशी ब्रांड पेप्सिको ने भारत में कदम रखा और पूरे देश में छा गया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मार्केटिंग के सामने पारले की थम्स अप भी ज्यादा देर टिक न सकी और कोका-कोला ने उसे खरीद लिया। उस वक्त तक कैंपा कोला की हालत खस्ता हो चुकी थी और 2000 आते-आते कंपनी को अपना बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ा।

राह नहीं आसान

रिलायंस द्वारा मृत-प्राय कंपनी कैंपा कोला पर लगाए गए दांव को लोग नॉस्टेल्जिया मार्केटिंग के एक रूप में देख रहे हैं। रिलायंस, कैंपा कोला को उसके प्रतिष्ठित कोला, नीबू और नारंगी फ्लेवर में फिर से लॉन्च करेगी। अनुमान है कि इसे सबसे पहले अपने रिटेल स्टोर पर बेचना शुरू करेगी। रिलायंस द्वारा कैंपा कोला का अधिग्रहण ब्रेवरेजेस मार्केट पर कैसा प्रभाव डालेगा, इस पर रिडिफ्यूजन ब्रांड सॉल्यूशन के प्रबंध निदेशक संदीप गोयल कहते हैं, ‘‘रिलायंस ने नोस्टाल्जिया के आधार पर इसे खरीदा है, जो 30-35 साल पहले सबकी जुबान पर चढ़ा हुआ था। हालांकि, जिन ग्राहकों ने कैंपा कोला का आनंद लिया था, वे एक उम्र को पार कर गए हैं। इसलिए रिलायंस की शुरुआत बिल्कुल जीरो-बेस से होगी।’’ संदीप आगे कहते हैं कि यह क्षेत्र बहुत प्रतिस्पर्धी है इसलिए रिलायंस की राह आसान नहीं रहेगी। हालांकि, सकारात्मक पहलू यह है कि कंपनी के पास पैसा और सफल होने की इच्छाशक्ति दोनों है। रिलायंस का नॉस्टेल्जिया मार्केटिंग कितनी सफल साबित होगी, इस पर एफसीबी ग्रुप इंडिया के अध्यक्ष और सीईओ रोहित ओहरी कहते हैं, ‘‘नोस्टाल्जिया की नाव पर सवार होकर मार्केट में उतरना गलत साबित हो सकता है। कैंपा कोला को युवाओं के लिए प्रासंगिग होना पड़ेगा क्योंकि जिन लोगों की कैंपा कोला के साथ 70 के दशक में यादें जुड़ी हैं, वे अब इस मार्केट के कंजमशन ब्रेकेट से बाहर हो चुके हैं।’’

मार्केट रिसर्च फर्म रिसर्च ऐंड मार्केट्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2020 में भारतीय कार्बोनेटेड ब्रेवरेज मार्केट सेगमेंट 13,460 करोड़ रुपये का था और वित्त वर्ष 27 तक इसके 34,964 करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है। आर्थिक नीति थिंक टैंक इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकानॉमिक रिलेशंस की एक अन्य रिपोर्ट में पाया गया कि भारत में गैर-मादक पेय बाजार 8.7 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़कर 2030 तक 1.47 खरब रुपये हो सकता है। रिलायंस की नजर इसी मार्केट को टैप करने की है। आंकड़ों पर गौर करें तो गैर-मादक पेय बाजार में कोका-कोला और पेप्सिको की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी तक है। इस लिहाज से रिलायंस को मार्केट में पैठ बनाना चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। रोहित ओहरी कहते हैं, ‘‘पुराने ब्रांड को फिर से नया करना चुनौतीपूर्ण कार्य है। ब्रेवरेजेस सेक्टर को पहले से ही झटके लग रहे हैं। बड़े शहरों में लोग अब स्वास्थ्य के प्रति सचेत हो रहे हैं लेकिन छोटे शहरों में अभी भी स्कोप बाकी है। कैंपा कोला का कुछ पॉकेट्स में स्ट्रांगहोल्ड था, रिलायंस पहले इसी मार्केट को टैप करना चाहेगी, न कि मास कंजमशन पर ध्यान देगी। पेप्सी और कोका कोला ने जिस तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है, वह अभी रिलायंस के पास नहीं है। मेरे हिसाब से सीधा टक्कर लेना गलत स्ट्रेटजी होगी। रिलायंस को अभी लोकल लेवल पर ही फोकस करना चाहिए।’’

कैंपा कोला के पुराने दिन लौटाने की कवायद

किसी भी ब्रांड को सफलतापूर्वक पुनर्जीवित करने के लिए समय, धन और भारी निवेश की आवश्यकता होती है। कंपनी को नए उपभोक्ताओं को प्राप्त करने में भी निवेश करने की आवश्यकता होगी, जिन्होंने पहले इस ब्रांड के बारे में नहीं सुना है। जाहिर है, वैश्विक ब्रांडों की पहुंच बहुत गहरी है और कैंपा कोला को अभी भी प्रतिस्पर्धा का निर्माण करना है। जानकारों का कहना है कि कैंपा कोला ज्यादातर भारतीयों से पहले से ही परिचित है और अगर रिलायंस इसकी री-ब्रान्डिंग सही से करता है तो ऐसा हो सकता है कैंपा कोला स्थापित कंपनियों को जोरदार टक्कर देने में सक्षम हो जाए। ऐसा भी हो सकता है कि रिलांयस कैंपा कोला की ब्रॉन्डिंग स्वदेशी का तड़का लगाए और पतंजलि की तरह इसकी ‘स्वदेशी मार्केटिंग’ करे।

एफएमसीजी सेक्टर पर नजर

ईशा अंबानी

कुछ दिनों पहले रिलायंस रिटेल की निदेशक ईशा अंबानी ने कंपनी की वार्षिक आम बैठक में घोषणा की कि रिलायंस इस साल भारत के फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड कंपनी (एफएमसीजी) बाजार में प्रवेश करेगा। देश के दूसरे सबसे बड़े समूह, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) की रिटेल शाखा द्वारा 70 के दशक के प्रतिष्ठित शीतल पेय कैंपा कोला के अधिग्रहण के साथ कंपनी ने उस दिशा में एक कदम उठाया है। इंडियन ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का एफएमसीजी बाजार 2020 में 110 अरब डॉलर से 2025 तक 14.9 प्रतिशत की सीएजीआर से बढ़कर 220 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। रिलायंस इस क्षेत्र में वर्चस्व हासिल करने के लिए कई कंपनियों को खरीदने पर विचार कर रही है, जिसमें फिज़़ी फ्रूट जूस ब्रांड सोस्यो, लाहौरी जीरा, केविनकेयर की गार्डन नमकीन और बिंदू ब्रेवरेजेज शामिल हैं। हालांकि हिंदुस्तान यूनिलीवर, नेस्ले, पतंजलि, डाबर और नेस्ले जैसी स्थापित कंपनियों से रिलायंस कैसे पार पाएगा यह समय ही बताएगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि कंपनी जिस आक्रमकता के साथ आगे बढ़ रही है वह दूसरी कंपनियों के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है।