Advertisement
8 जनवरी 2023 · JAN 08 , 2024

तेलंगानाः युवा जोश को तरजीह

एक तेजतर्रार युवा नेता, जो सबको साथ लेकर चलता है
राज्यपाल के साथ रेवंत रेड्डी (दाएं)

राज्य में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस नेता अनुमुला रेवंत रेड्डी को हैदराबाद में तब के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। यह पहली बार नहीं था कि उन्हें तेलंगाना पुलिस ने गिरफ्तार किया था। भावुक रेवंत रेड्डी ने एक बार कहा था कि वे यह कभी नहीं भूलेंगे कि जब उनकी बेटी की शादी हो रही थी तो वे जेल में थे। रेड्डी तब तेलंगाना तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के अध्यक्ष थे। उन्हें अगले दिन अपनी बेटी की सगाई करनी थी कि आधी रात को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) के पुलिसवाले मुख्य दरवाजा तोडक़र घर में घुसे और सोते हुए रेड्डी को उन्हें घसीटते हुए ले गए। इस 3 दिसंबर को जब शुरुआती रुझानों में राज्य में कांग्रेस की जीत की संभावना दिखने लगी तो डीजीपी अंजनी कुमार और अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को रेड्डी को गुलदस्ता देते और हाथ मिलाते देखा गया। कई लोगों ने इसे मीठा बदला माना।

आंध्र प्रदेश से 2014 में टूटकर बने तेलंगाना में कांग्रेस की पहली बार 119 सदस्यीय विधानसभा में 64 सीटों के साथ वापसी हुई और भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) सत्ता से बेदखल हुई। कांग्रेस आलाकमान ने राज्य के कई दिग्गजों की बनिस्बत प्रदेश अध्यक्ष 54 वर्षीय रेड्डी पर ही भरोसा जताया। वे 7 दिसंबर को राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री बने।

दरअसल कई जानकारों के मुताबिक, यह चुनावी मुकाबला बीआरएस और कांग्रेस से ज्यादा केसीआर और रेवंत रेड्डी के बीच था। केसीआर पिछले 40 वर्षों में कभी भी चुनाव नहीं हारे हैं, चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का। तेलंगाना में 2018 में उन्हें और उनकी पार्टी को भारी जीत मिली थी और कांग्रेस इकाई अंक तक सिमट गई थी।

नगरकुरनूल (पहले महबूबनगर) जिले के कोंडाररेड्डी पल्ली में 8 नवंबर 1969 को जन्मे रेवंत हैदराबाद में उस्मानिया विश्वविद्यालय के आंध्र विद्यालय कॉलेज से बीए पढ़े हैं। उनकी दो दशक की राजनैतिक यात्रा की शुरुआत भाजपा की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के साथ हुई थी। लेकिन 2007 में वे  निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में एमएलसी जीते। युवा रेवंत के जोश-खरोश को देखकर तब के ताकतवर मुख्यमंत्री दिवंगत डॉ. वाइएस राजशेखर रेड्डी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने रेवंत के सामने कांग्रेस में शामिल होने की पेशकश रखी। लेकिन 2007 में रेवंत ने तब विपक्षी टीडीपी को चुना और 2009 में अविभाजित आंध्र प्रदेश में टीडीपी टिकट पर विधायक चुने गए और 2014 में तेलंगाना में विधायक बने।

फिर, तेलंगाना में टीडीपी का कोई भविष्य न देखकर रेड्डी 2017 में कांग्रेस में शामिल हो गए। लेकिन 2018 के चुनाव में अपने गृह जिले से बीआरएस उम्मीदवार से हार गए। पहला स्थानीय निकाय चुनाव जीतने के बाद से यह किसी भी चुनाव में उनकी पहली हार थी। लेकिन चार महीने बाद ही उन्होंने मल्काजगिरी लोकसभा सीट बीआरएस उम्मीदवार को मामूली अंतर से हराकर जीत ली। हालांकि यह आसान नहीं था, क्योंकि मल्काजगिरी देश में मतदाताओं की संख्या के लिहाज से सबसे बड़ी संसदीय सीट है।

उन्हें जुलाई 2021 में प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, तो राज्य पार्टी के नेताओं ने उनकी आरएसएस पृष्ठभूमि को लेकर काफी विरोध जताया लेकिन उन्हें आला पदाधिकारियों का समर्थन हासिल था। उनके सामने चुनौती यह भी थी कि तब कांग्रेस के सिर्फ पांच विधायक थे। इस प्रकार 2023 का विधानसभा चुनाव न केवल कांग्रेस के लिए, बल्कि राज्य में प्रभावशाली रेड्डी समुदाय के लिए भी अस्तित्व की लड़ाई थी, जो एक दशक से सत्ता से दूर था।

रेवंत रेड्डी अपनी चुटीली भाषण कला और मुहावरों के पंच से लोगों से बड़ी आसानी से जुड़ जाते हैं। उन्होंने राज्य में बड़े पैमाने भ्रष्टाचार और बीआरएस नेतृत्व के सत्ता-मद तथा अहंकार से लोगों में सत्ता-विरोधी मूड को भांप लिया, और उसे कहावतों, चुटकुलों और ‘मारपू कावली, कांग्रेस रावली’ (बदलाव जरूरी, कांग्रेस सरकार चाहिए) जैसे आकर्षक नारों से लोगों को नया संदेश दिया। वे फौरन सड़कों पर उतर आए और सिविल सोसायटी संगठनों, बेरोजगार युवाओं, किसानों और महिलाओं को जोड़ा। बीआरएस सरकार के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू किया।

उन्होंने कई चुनावी अभियानों का नेतृत्व किया। सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के साथ कई रैलियां कीं। कांग्रेस की छह ‘गारंटियों’ को दोहराते हुए बीआरएस सरकार पर नए हमले किए। चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले भी, रेड्डी कई मौकों पर बीआरएस सुप्रीमो और साथ ही तत्कालीन भाजपा के तेजतर्रार प्रदेश अध्यक्ष बंदी संजय कुमार को सीधे निशाने पर लेते रहे थे।

कांग्रेस की जीत में वरिष्ठ अनुसूचित जाति नेता मल्लु भट्टी विक्रमार्का पदयात्रा ने भी बड़ा योगदान दिया। वे अब उप-मुख्यमंत्री हैं और वित्त, योजना और ऊर्जा मंत्रालयों को संभाल रहे हैं।