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शहरनामा/बलरामपुर

राप्ती नदी के तट पर बसा शहर
यादों में शहर

हिमालय की गोद में

बलरामपुर उत्तर प्रदेश का छोटा सा जिला है, जो हिमालय की गोद में, नेपाल सीमा के अत्यंत समीप, राप्ती नदी के तट पर बसा हुआ है। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना राजनीतिक सफर यहीं से आरंभ किया और 1957 में यहीं से चुनाव जीतकर संसद गए थे।

छोटी काशी

‘छोटी काशी’ नाम से विख्यात बलरामपुर के लगभग हर गली-मोहल्ले में आठ से दस शिव मंदिर देखने को मिल जाएंगे। महादेव का प्रसिद्ध झारखंडी मंदिर, रानी तालाब हनुमान मंदिर और उतरौला का दुखहरण नाथ मंदिर स्वयं में अनेक चमत्कारी रहस्य समेटे हुए है। ये भक्ति और आस्था के प्रमुख केंद्र हैं जहां कथित तौर पर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, इसीलिए इनके प्रांगणों में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। बलरामपुर से 27 किलोमीटर दूर, तुलसीपुर स्थित अति प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक, मां पाटेश्वरी दरबार अनन्य आस्था का केंद्र है और यहां दूर-दूर से भक्तों की भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि जब महादेव, सती की पार्थिव देह लेकर प्रलयंकारी हुए तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र को मुक्त किया था, परिणामस्वरूप सती का स्कंध भाग बलरामपुर के तुलसीपुर में गिरा था, तभी से यहां मां पाटेश्वरी विराजमान हैं। प्रत्येक वर्ष यहां महीने भर तक बहुत बड़ा देवीपाटन मेला लगता है जहां भारी संख्या में गांव और शहर से आकर लोग मेले का आनंद लेते हैं। बलरामपुर में राप्ती नदी के तट पर मां बिजलेश्वरी का प्रसिद्ध मंदिर है जहां कहते हैं, ‘मां पाटेश्वरी’ प्रकाश रूप में विराजमान हैं।

तराई का ऑक्सफोर्ड

बलरामपुर के महाराजा दिग्विजय सिंह के बाद उनके उत्तराधिकारी राजा भगवती प्रसाद सिंह और पाटेश्वरी प्रसाद सिंह का शासन रहा जिनके राज में यह जिला चहुंमुखी विकास की दिशा में अग्रसर रहा। प्राचीन समय में यहां के राजाओं ने पूरे नगर में करीब 300 से अधिक शिव मंदिरों का निर्माण करवाया था। राजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह ने 1955 में अपनी मां महारानी लाल कुंवरि की स्मृति में महाविद्यालय बनाने के लिए राजमहल दान कर दिया था जो आज तराई का ऑक्सफोर्ड कहा जाता है। यहां महाराजा की विशालकाय हवेली ‘नील कोठी’ व महाविद्यालय एम.एल.के.पी.जी. कॉलेज की वास्तुकला आकर्षण का केंद्र है। यहां कई भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है।

साहित्य सृजन का गढ़

बलरामपुर के महाराजा दिग्विजय सिंह साहित्य प्रेमी थे। अवध क्षेत्र में ये साहित्य सृजन का बहुत बड़ा गढ़ था अत: हिंदी-उर्दू के रचनाकार आकर्षित हुए। साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में यहां के राजाओं का बड़ा योगदान रहा। यहां की मशहूर हस्तियां मो. शफी खां, बेकल उत्साही, देवी प्रसाद राही, सबा बलरामपुरी, सैयद सफदर हुसैन आबिदी आदि रही हैं। अफरोज अहमद भारतीय पर्यावरण वैज्ञानिक तथा प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं। पेशेवर फुटबॉलर आकाश मिश्रा भारतीय राष्ट्रीय टीम का हिस्सा हैं। इन हस्तियों ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी पहचान बनाई और जिले का नाम रोशन किया। इनमें से कुछ सर्वोच्च साहित्य सम्मानों से भी नवाजे गए। समय-समय पर यहां बलरामपुर महोत्सव तथा साहित्य के विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता रहा है जिसमें कई बड़ी हस्तियों का आगमन हुआ।  बलरामपुर ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता अली सरदार जाफरी का जन्मस्थान है, जिनका एक मशहूर शेर है:

फूटने वाली है मजदूर के माथे से किरन

सुर्ख परचम उफुक-ए-सुब्ह पे लहराते हैं

मीठी अवधी बोली

अवध क्षेत्र होने के कारण बलरामपुर की भाषा आम तौर पर अवधी और खड़ी बोली है पर यहां हिंदी के अलावा उर्दू का भी बोलबाला रहा। शहरों में कम लेकिन ग्रामीण इलाकों में अवधी बोली का अधिक प्रचलन है। गांव के लोग अवधी भाषा में एक-दूसरे का हालचाल इस तरह पूछते हैं, ‘का हो, अउर बताओ भईया का हाल है’, तो जवाब मिलता है कि ‘मजे मा हन भईया, टहरै जाइत है खेतेक।’

संतों का अखाड़ा

बलरामपुर में कई सारे पुरातन शैवमठ होने से यहां संतों और अखाड़ों का आवागमन होता रहता है। बलरामपुर की रामलीला और मोहर्रम का ताजिया विशेष आधुनिक कलाकारी के लिए प्रसिद्ध है। 25 मई 1997 को गोंडा से अलग करके बलरामपुर को जिले का दर्जा प्राप्त हुआ और तब से इसके विकास की रफ्तार बढ़ गई। यहां पर एम.एल.के. महाविद्यालय द्वारा प्रत्येक वर्ष राज्यस्तरीय हॉकी टूर्नामेंट आयोजित किया जाता है।

दादी के मालपुए

बलरामपुर के मशहूर राम मिष्ठान भंडार की मिठाइयां लखनऊ, फैजाबाद और अन्य जगहों के लोगों को बहुत पसंद आती हैं। यहां के लोग बेहद स्वादिष्ट ‘बिहारी के मशहूर पेड़े, ज्ञानी के समोसे, जोखू की चाट, अजीत के छोले भटूरे के दीवाने हैं। गांव के देसी व्यंजनों में मिट्टी के चूल्हे पर बनी मक्के की रोटी, सरसों का साग, दादी के हाथ के बने मालपुए के समक्ष शहरी खाने फीके हैं। बलरामपुर आपसी भाईचारे, स्वच्छता और सुविधा की दृष्टि से विकास की ओर अग्रसर है। यहां उतरौला, बलरामपुर, तुलसीपुर में गन्ने से बनने वाली चीनी की तीन मिलें किसानों को राहत देने का काम कर रही हैं। यहां का जनजीवन साधारण और बाजार अपने आप में श्रेष्ठ है। बलरामपुर अपनी तहजीब और ऐतिहासिक धरोहरों के कारण खास और बेमिसाल है।

आयुष्मान गिरि

(युवा कवि)

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