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1 मई 2023 · MAY 01 , 2023

आवरण कथा/नजरिया: ‘यह उर्दू शायरी का सुनहरा दौर है’

एम्स में आयोजित होने वाले मुशायरे में देश का सबसे बेहतरीन दिमाग उर्दू शायरी सुन रहा है
उर्दू शायरों को फिर-फिर खोजा जा रहा

मैंने उर्दू शायरी, शायरों के लिए इससे बेहतर समय नहीं देखा। सोशल मीडिया क्रांति ने उर्दू शायरी की तस्वीर बदलकर रख दी है। आज से 30–35 साल पहले जब मैंने शायरी शुरू की, तब उर्दू शायरी के क्षेत्र में जगह बनाना कठिन था। शायर शिद्दत से गजल लिखकर उर्दू पत्रिकाओं को इस उम्मीद के साथ भेजते थे कि गजलें प्रकाशित होंगी तो नाम होगा, चर्चा होगा। मगर ऐसा केवल लगता था, होता नहीं था। गजल भेजने के बाद हफ्तों, महीनों इंतजार होता था। महीनों बाद जवाब आता भी था तो रचना प्रकाशित न कर पाने के खेद के साथ। बड़ी हिम्मत टूटती थी इससे। पत्रिकाओं, अखबारों के सिवा लोगों तक पहुंचने का जरिया भी नहीं था। सोशल मीडिया ने उर्दू शायरों को इससे मुक्त कर दिया है। आज तो इधर लिखा उधर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते ही लोगों तक चीजें पहुंच जाती हैं और प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। अब न किसी का इंतजार है न ही पाठकों तक पहुंचने की कोई निर्भरता।

उर्दू शायरी के चाहने वालों तक अपनी बात पहुंचाने का एक और माध्यम मुशायरे होते थे। इन मुशायरों का भी अलग अंदाज होता था। आठ से दस शायरों की टीम होती थी, जो हर मुशायरे में बुलाई जाती थी। वही लोग आपको कस्बे के मुशायरे से लेकर लाल किले के मुशायरे में नजर आते थे। नए शायर को उनमें जगह बनाने के लिए जीतोड़ मेहनत और जुगाड़ लगाना पड़ता था। दर्जनों युवा शायरों में से कोई एक ही बड़ी मुश्किल से उर्दू शायरी की मुख्यधारा में पहुंच पाता था। चुनिंदा शायरों और आयोजकों का एकछत्र राज था। गिने-चुने मुशायरे हुआ करते थे। सोशल मीडिया क्रांति के बाद शायर सीधा जनता के साथ जुड़ गया है। उसे किसी मुशायरे की जरूरत नहीं है। अगर उसकी शायरी में दम होता है तो लोग उसे सिर आंखों पर बिठाते हैं। फिर मुशायरा, कवि सम्मेलन आयोजित करने वाले, स्वयं शायर को सोशल मीडिया से संपर्क कर मुशायरे में आमंत्रित करते हैं।

गुजरे जमाने में उर्दू शायरी सुनने वाले बहुत पढ़े-लिखे या बुद्धिजीवी लोग नहीं होते थे। किसी शहर, गांव, कस्बे में कोई मेला लगता था और वहां मुशायरा पढ़ा जाता था। मुशायरे में शामिल होने वाले अधिकतर कम पढ़े लिखे पिछड़े, गरीब वर्ग से आते थे। उनके लिए मुशायरा मनोरंजन का जरिया होता था। इसलिए उनके सामने बहुत गंभीर बात नहीं कही जाती थी। यही कारण है कि इन मुशायरों में मजहबी बातें करने वाले, चुटकुले सुनाने वाले, द्विअर्थी टिप्पणी करने वाले शायर तालियां बटोर ले जाते थे। सांप्रदायिक शायरी पर सीटियां बजती थीं। संवेदनशील और गंभीर किस्म के शायरों को खास तवज्जो नहीं मिलती थी। न उनके शेर जनता को समझ में आते थे न जनता को उनमें दिलचस्पी होती थी। जनता मुख्य रूप से धार्मिक उन्माद से भरी शायरी या चुटकुलेबाजी सुनने आया करती थी। सोशल मीडिया क्रांति के बाद चीजें बदली हैं। उर्दू शायरी का विस्तार हुआ है। आज उर्दू का मुशायरा इंजीनियरिंग कॉलेज से लेकर मेडिकल और मैनेजमेंट कॉलेज तक में हो रहा है। एम्स में आयोजित होने वाले मुशायरे में देश का सबसे बेहतरीन दिमाग उर्दू शायरी सुन रहा है। ऐसे में वहां न शायर ओछी बातें कह सकता है न दोयम दर्जे के शेर पढ़ सकता है। आज इतनी खूबसूरत स्थिति है कि जिन संजीदा शायरों ने कवि सम्मेलन और मुशायरों में जाना छोड़ दिया था, वे आज आईआईटी, आईआईएम, एम्स और अन्य बड़े संस्थानों के मुशायरों में शौक से शरीक होते हैं और खूब पसन्द किए जाते हैं। देश का प्रबुद्ध वर्ग आज उर्दू शायरी की मेजबानी कर रहा है। इससे सुंदर और भला क्या हो सकता है।

गुजरे जमाने में उर्दू शायरी में वही शायर मकबूल होते थे जिनकी शायरी को गजल गायक आवाज देते थे। मिसाल के लिए अहमद फराज़, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, बशीर बद्र की गजलों को जगजीत सिंह, मेहदी हसन, गुलाम अली ने गाया तो ये शायर और इनकी शायरी घर-घर तक पहुंच गई। इसके साथ ही कवि सम्मेलन और मुशायरों में भी वही शायर ज्यादा पसंद किए जाते थे जो किसी खास धुन में अपनी शायरी, कविताएं गाकर सुनाते थे। यानी शायरी की लोकप्रियता उसके कंटेंट से अधिक इस बात पर निर्भर करती थी कि शायर की आवाज कैसी है। शायर अच्छा गाता है तो मुशायरे में हिट रहेगा। सोशल मीडिया ने इस बंधन को तोड़ने का काम किया है। 

सोशल मीडिया के इस दौर में उर्दू शायरी को अच्छे पढ़ने वाले मिले हैं। इसलिए लिखने वालों को भी हौसला मिला है। जब नजर आता है कि सुनने वाले देश के प्रबुद्ध नागरिक हैं तो शायर अपनी तरफ से कुछ अधिक प्रयास करता है। इसके साथ-साथ सोशल मीडिया क्रांति के कारण इंजीनियर, डॉक्टर, प्रशासनिक अधिकारी, बैंकर, शिक्षक जैसे अलग-अलग प्रोफेशन के लोग शायरी कर रहे हैं। इससे उर्दू शायरी का परिवार समृद्ध हो रहा है।

हर दौर और हर माध्यम के कई पहलू होते हैं। सोशल मीडिया क्रांति के साथ भी ऐसा ही है। लिखने वाले बेतहाशा बढ़े हैं। निचले स्तर की शायरी बहुतायत में हो रही है। कीचड़ में ही कमल खिलता है। उर्दू भाषा के भविष्य इसी भीड़ में से निकल रहे हैं। उन्हें भरपूर मौका मिल रहा है और वे इस मौके का अच्छे ढंग से फायदा उठा रहे हैं। यह दौर उर्दू शायरी पर हुई नेमतों को गिनने और शुक्रगुजार होने का है।

शारिक क़ैफी

(उर्दू के वरिष्ठ शायर, मनीष पांडेय से हुई बातचीत पर आधारित)

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