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20 मार्च 2023 · MAR 20 , 2023

महाराष्ट्र: पुरानी सेना के नए नाथ

छह दशक पुरानी राजनीतिक पार्टी का अपने संस्थापक की विरासत से मुक्त हो जाना महाराष्ट्र में राजनीतिक उथल-पुथल का संकेत
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे

ठाकरे परिवार के बगैर शिवसेना की कल्पना करना कल तक संभव नहीं था। केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने एकनाथ शिंदे के पक्ष में फैसला देकर इसे संभव कर दिया है। अब यह 57 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी अपने संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के वंशजों से मुक्त हो गई है। आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न सौंप दिया है। पिछले साल 30 जून को तत्कालीन शहरी विकास मंत्री एकनाथ शिंदे ने शिवसेना से बगावत कर दी थी और पार्टी के 55 में से 40 विधायकों और तीन सांसदों को तोड़ कर पार्टी में दोफाड़ कर दिया था। भारतीय जनता पार्टी की मदद से शिंदे ने महा विकास अघाड़ी (एमवीए) की तीन दलों वाली सरकार को गिरा दिया और उद्धव ठाकरे का तख्ता पलट करके खुद मुख्य़मंत्री बन गए। शिवसेना को तोड़ने में भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शिंदे की मदद की। उसके बाद भी शिवसैनिकों को यह विश्वास था कि 19 जून 1966 को बालासाहेब ठाकरे की बनाई इस पार्टी के ऊपर से ठाकरे परिवार की पकड़ कभी कमजोर नहीं होगी।

मुख्यमंत्री बनने के बाद शिंदे का शिवसेना के विधायक दल के ऊपर पूरी तरह नियंत्रण हो गया। उसके बाद शिंदे ने ठाकरे परिवार से पार्टी को छीनने की वृहद योजना बनाई, जिसमें भाजपा के कानूनी जानकारों ने उनकी मदद की। भाजपा के आलाकमान की राय थी कि एक धड़े के रूप में चुनाव आयोग से मान्यता हासिल करने से कहीं बेहतर है कि शिंदे शिवसेना पर ही अपना दावा ठोंक दें। उन्होंने ऐसा ही किया। दूसरी ओर उद्धव ठाकरे ने बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत के नाम पर पार्टी पर दावा ठोंका।

दोनों गुटों के बीच बाल ठाकरे की सियासी विरासत के स्वामित्व पर दावे को लेकर लड़ाई थी। शिव सैनिकों के लिए शिवसेना भावनात्मक मसला ज्यादा है और वे ठाकरे परिवार के प्रति वफादार रहे हैं लेकिन शिंदे का दावा था कि पार्टी के कार्यकर्ता उनके साथ हैं। शिवसेना में विभाजन के बाद चुनाव आयोग ने पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर रोक लगाते हुए उद्धव ठाकरे वाले धड़े को मशाल चुनाव चिह्न दे दिया था जबकि शिंदे गुट को दो तलवार और ढाल का चिह्न दिया था। दोनों धड़ों ने विधायकों को अयोग्य  ठहराए जाने के मामले में एक दूसरे पर सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा भी किया था।

संजय राउत

संजय राउत का दावा है  कि पार्टी का नाम और चुनावचिन्ह शिंदे गुट को सौंपने के फैसले के लिए दो हजार करोड़ रुपये का सौदा हुआ

बीती 17 फरवरी को चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और तीर कमान वाला चुनाव चिह्न अंतत: शिंदे गुट को सौंप दिया। इसके बाद उद्धव ठाकरे को पार्टी से बाहर कर दिया गया। उद्धव ठाकरे के धड़े के सामने अब अपने पुराने जनाधार को किसी तरह बचाए रखने की भारी चुनौती है। अब ठाकरे केवल एक धड़े के मुखिया हैं, तो यह बात जमीनी स्तीर पर काम कर रहे शिवसैनिकों को हजम होना आसान नहीं होगी। हालांकि ठाकरे के खासमखास तथा मुखपत्र सामना के संपादक, राज्यसभा सदस्य संजय राउत ने दावा किया कि पार्टी और चुनावचिन्ह के लिए 2,000 करोड़ रु. का सौदा हुआ है। 

खासकर, बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) में अपनी सत्ता को बचाए रखना उनकी प्राथमिकता है जो बीते तीन दशक से ज्यादा वक्त  से लगातार कायम है। ठाकरेमुक्त शिवसेना के सामने सबसे पहली चुनौती बीएमसी का चुनाव है जिसकी घोषणा जल्द  ही होने वाली है। जाहिर है, 227 सीटों वाली बीएमसी जो 52,619 करोड़ रुपये के बजट के साथ देश का सबसे ज्यादा पैसे वाला नगरी निकाय है, उस पर दावे की लड़ाई भाजपा, शिंदे और ठाकरे गुटों के बीच खुलेआम सड़क पर लड़ी जाएगी।

कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ मिलकर 2019 में महा विकास अघाड़ी की गठबंधन सरकार बनाने से पहले शिवसेना हमेशा भाजपा के साथ रही थी। उद्धव और भाजपा के बीच मतभेद ऐसे गहराए कि शिवसेना ने वैचारिक विरोधियों का दामन थाम लिया। उससे पहले भी हालांकि समय-समय पर उद्धव ठाकरे की आलोचना इस बात के लिए होती थी कि उन्होंने अपने पिता के हिंदुत्ववादी विचारों से समझौता कर लिया है। शिवसेना के आला नेताओं को उद्धव की उदार और समावेशी राजनीति कभी पसंद नहीं आई। अब, जबकि इसके चलते पिता की विरासत ही उनके हाथ से जा चुकी है, तो भी ऐसा नहीं लगता कि ठाकरे या उनके बेटे आदित्य वापस आक्रामक हिंदुत्व के एजेंडे पर लौटने वाले हैं। जो लोग भी उनके साथ आज हैं, उन्हें उद्धव की उदार राजनीति को स्वीकार करना होगा और ठाकरे को भी उन्हें साथ जोड़े रखने में मशक्कत करनी होगी क्योंकि बीएमसी की सत्ता उनके हाथ से गई तो मामला उद्धव के राजनीतिक अस्तित्व का बन जाएगा। सूत्रों की मानें तो महाराष्ट्र भाजपा के एक पूर्व अध्यक्ष, जो इस वक्त  केंद्र में अहम पद पर हैं, उन्होंने पार्टी को निर्देश दिए हैं कि ठाकरे के धड़े को बीएमसी चुनावों में एक अंक पर लाकर निपटा देना है।

वजूद का संकटः पिता की विरासत शिवसेना और उसका चुनाव चिह्न छिन जाने के बाद अपने आवास मातोश्री में 17 फरवरी को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते उद्धव ठाकरे (दाएं)

वजूद का संकटः पिता की विरासत शिवसेना और उसका चुनाव चिह्न छिन जाने के बाद अपने आवास मातोश्री में 17 फरवरी को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते उद्धव ठाकरे (दाएं)

ऐसे शिवसैनिकों की संख्या पर्याप्त है जो मानते हैं कि इस के पीछे भाजपा की चाल है। कांग्रेस के एक पूर्व मुख्यमंत्री कहते हैं, भाजपा अब क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को खत्म करने में लग गई है। अंतत: शिंदे धड़े का भाजपा में विलय हो जाएगा और भाजपा उन्हें पार्टी का बहुजन चेहरा कहकर प्रचारित करेगी। पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की काट के तौर पर यह भाजपा की रणनीति है। सियासी हलकों में शिंदे गुट के भाजपा में विलय की अटकलें आजकल आम हैं।

शिवसेना में बगावत और विभाजन के पीछे दूसरी कहानी उद्धव ठाकरे तक पहुंचने की मुश्किलों से जुड़ती है। शिवसेना के तमाम मंत्रियों, पार्षदों और जनप्रतिनिधियों की शिकायत रही है कि उद्धव उन्हें मिलने का समय नहीं देते थे। सबके पास सुनाने को अपनी-अपनी कहानी है कि कैसे उन्हें उद्धव से मिलने के लिए इंतजार करना पड़ा। यही असंतोष एक साथ उभर कर सामने आया जब एकनाथ शिंदे ने बगावत कर दी। यहां तक कि राकांपा के मुखिया शरद पवार ने भी उद्धव को कहा था कि वे शिवसैनिकों के साथ मिला जुला करें क्योंकि उनका संपर्क जमीनी कार्यकर्ताओं से कटता जा रहा है। उद्धव ने इस पर अमल तो किया, लेकिन पार्टी के टूटने के बाद, जब बहुत देर हो चुकी थी। आज वे और आदित्य अपने कार्यकर्ताओं और लोगों से मिलने के लिए सहज उपलब्ध हैं।     

इसके बावजूद दोनों धड़ों का सारा जोर अपने-अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को बचाए रखने पर केंद्रित है न कि समर्थकों की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने पर, जो ठीक नहीं है। शिवसेना का मराठी माणूस के साथ एक भावनात्मक रिश्ता रहा है। माना जाता रहा है कि शिवसेना मराठियों की आकांक्षाओं को स्वर देने वाला दल है। आज यह मराठी माणूस शिंदे और ठाकरे दोनों गुटों की राजनीति में कहीं नहीं है।

चुनाव आयोग के फैसले के बाद उद्धव ठाकरे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, हमारी मशाल रौशन है। हम इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। शिवसेना हमारी है और रहेगी।