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19 फरवरी 2024 · FEB 19 , 2024

मंदिर के मायने/दक्षिण भारत: राम का चुनावी असर, उत्तर भारत के पार

राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा की अनुगूंज उत्तर को पार करके दक्षिण के राज्यों तक पहुंच चुकी है, कर्नाटक से लेकर केरल तक प्रचारक और स्वयंसेवक अक्षत लेकर पहुंचे
राम के संगः बेंगलूरू के चौराहे पर राम और मोदी के कट आउट

आपके पूजाघर में रामजी की मूर्ति है क्या?” दक्षिण बेंगलुरू के एक रिहायशी इलाके में घर-घर दस्तक देने वाले कुछ भगवाधारी स्वयंसवकों में से एक ने यही सवाल पूछा था। ऐसे पांच से दस लोगों का समूह परचा और अक्षत लेकर यहां अन्य राज्यों की तरह इस राज्य के हिस्सों में लगातार हर दरवाजे घूम कर यही पूछ रहा था। जवाब के बाद उनका एक ही रटा-रटाया अनुरोध होता था कि 22 जनवरी को अयोध्या के नवनिर्मित राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के दौरान जरूर राम की पूजा करें। दक्षिण बेंगलुरू में साठ साल से रह रहे चरण तेजा (बदला हुआ नाम) इस संपर्क अभियान से सकते में थे। आज तक उन्होंने कर्नाटक में घर-घर जाकर किसी धार्मिक मसले पर किया गया ऐसा संपर्क अभियान नहीं देखा। वे खुद भी राम के उपासक नहीं हैं। राम मंदिर के नाम पर चलाया गया यह अभियान सत्ताधारी भाजपा के दक्षिण में प्रवेशद्वार माने जाने वाले कर्नाटक की सरहद को पार कर केरल तक पहुंच गया, जहां आज तक भाजपा को कोई चुनावी कामयाबी नहीं मिली है।

विभि‍न्न भारतीय भाषाओं में 25000 से ज्यादा गाने गा चुकी और ‘केरल की कोकिला’ कही जाने वाली मलयाली गायिका केएस चित्रा ने सोशल मीडिया पर 22 जनवरी को सामूहिक पूजा और दीप प्रज्ज्वलन का आह्वान कर के खास सुर्खियां बंटोरीं। चित्रा वैसे तो अपनी गायन प्रतिभा और राजनीतिक विमर्श से दूर रहने के लिए जानी जाती हैं, लेकिन अयोध्या के आयोजन के समर्थन में जारी हुआ उनका वीडियो विवाद का विषय बन गया। उनकी यह कह कर आलोचना की गई कि राम मंदिर को उनके समर्थन ने बाबरी मस्जिद विध्वंस से भारतीय मुसलमानों के साथ हुई ‘नाइंसाफी’ को सहज बना डाला है।

एक युवा मलयाली गायक सूरज संतोष ने टिप्पणी की, ‘‘असल बात वह ‘मासूमियत’ है जिसमें इस तथ्य को भुला दिया गया है कि मंदिर का निर्माण मस्जिद ढहा कर किया गया है। जल्द ही और भी लोग चित्रा की तरह बेपर्द होंगे।’’

दक्षिण में गणेशः चेन्नै में विसर्जन जूलूस

दक्षिण में गणेशः चेन्नै में विसर्जन जूलूस

एक और लोकप्रिय गायक वेणुगोपाल ने चित्रा की तरफ से सार्वजनिक माफी जारी करते हुए चित्रा का बचाव किया कि राजनीतिक मामलों में उनकी सीमित जानकारी के चलते ऐसा हुआ होगा। 

केरल के समाज में हो रहा यह ‘हिंदूकरण’ वहां भाजपा की छाप का गवाह बन रहा है। पटकथा लेखक और पत्रकार श्रीजित दिवाकरन कहते हैं, ‘‘राम जन्मभूमि के प्रकरण ने केरल के सांस्कृतिक परिदृश्य पर धीरे-धीरे असर छोड़ा है। मलयाली सिनेमा में हम अब उच्च जाति के हिंदुओं की पीड़ा को ज्यादा देखते हैं जिसका कारण पिछड़े समुदाय का आरक्षण बताया जाता है।’’ श्रीजित राम मंदिर आंदोलन के वक्त छात्र हुआ करते थे। बाद में उन्होंने दिल्ली में मातृभूमि दैनिक में काम करते हुए अयोध्या से कई रिपोर्टें की थीं।

ऐसा लगता है कि राम जन्मभूमि आंदोलन ने देवभूमि केरल के सिनेमा में हिंदुत्व को वैधता दिलवाने का काम किया है। सुपरस्टार मोहनलाल की 1996 में आई फिल्म कालापानी में हिंदू महासभा के नेता वीडी सावरकर को गौरवान्वित करने का काम किया गया था। मलयाली सिनेमा में धीरे-धीरे मुसलमानों को खलनायक दिखाने का चलन भी उसी के बाद शुरू हुआ।

भगवाकरण की यह मद्धम रफ्तार हालांकि केरल के चुनावी परिदृश्य में जगह नहीं पा सकी, जहां सत्ता वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) के बीच ही आकार लेती रही।

केरल में 1989 से 1996 के बीच भाजपा के पास पांच प्रतिशत के आसपास वोट हुआ करते थे, बावजूद इसके कि वही दौर एलके आडवाणी की रथयात्रा और बाबरी विध्वंस का था। इस अवधि में उत्तर भारत के मुकाबले केरल और तमिलनाडु में भाजपा का चुनावी असर अतिसीमित रहा।      

तमिलनाडु में तो केरल के मुकाबले भी भाजपा का जोर काफी कम रहा है। 1996 में हिंदू मुन्नानी के निरंतर प्रयासों के बावजूद भाजपा को केवल तीन प्रतिशत वोट मिले थे। यहां पार्टी की चुनावी तरक्की नहीं के बराबर है। 2019 के आम चुनाव में भाजपा को 3.66 प्रतिशत वोट मिले, बावजूद इसके कि उसने मजबूत स्थानीय दल अन्नाद्रमुक के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था।

भगवा राजनीति की बढ़त को अकेले वोट प्रतिशत से नहीं नापा जा सकता। राम मंदिर आंदोलन के समानांतर तमिलनाडु में भगवा समूहों ने गणेश चतुर्थी के जुलूस निकाले जिसके चलते सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ। हिंदू मुन्नानी और आरएसएस ने 1983 में चेन्नै के एक मंदिर के पास गणेश की प्रतिमा लगा दी थी। 1990 तक निकाले गए विशाल जुलूसों ने ट्रिपलिकेन में आइस हाउस मस्जिद के पास झड़पों को अंजाम दिया। विद्वान लेखक सीजे मुलर इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के मई 2001 के अंक में इन झड़पों को ‘निर्णायक मोड़’ की संज्ञा देते हैं।

मुलर याद दिलाते हैं कि 1980 के शुरुआती दिनों में गठित हिंदू मुन्नानी आरएसएस के समानांतर तमिलनाडु का प्रमुख हिंदू राष्ट्रवादी समूह है जो भाजपा से करीबी संबंध रखता है और उत्तर में विश्व हिंदू परिषद के समकक्ष धार्मिक-राजनीतिक भूमिका निभाता है, जबकि राज्य में वीएचपी का भी स्वतंत्र अस्तित्व है। केरल के भगवा संगठन विनायक चतुर्थी की ही तर्ज पर विजयादशमी मनाते हैं और श्रीकृष्ण जयंती पर जुलूस निकालते हैं।

मलयाली इतिहासकार और युनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया में फुलब्राइट स्कॉलर पीके यासिर अराफात कहते हैं, ‘‘हो सकता है कि राम जन्मभूमि आंदोलन ने केरल में तात्कालिक असर न डाला हो लेकिन उसका महीन प्रभाव समाज के विभिन्न तबकों पर बेशक पड़ा है जिसकी दीर्घकालिक छाप राजनीतिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक ताने-बाने पर देखी जा सकती है। तात्कालिक प्रभाव न डालने के बावजूद आंदोलन ने आबादी के एक खास तबके के नजरिये को धीरे-धीरे आकार देने का काम किया है। विजयादशमी के जुलूस में भारी संख्या में लोगों की भागीदारी में इसे देखा जा सकता है, जिसे भाजपा और संघ आयोजित करते हैं।’’

अराफात कहते हैं कि अस्सी के दशक से ही भगवान राम का महत्व केरल में बढ़ा। इसके पीछे 1987 में टीवी पर आने वाला रामायण धारावाहिक अहम भूमिका निभा रहा था, जो एक सांस्कृतिक परिघटना बनकर उभरा और राज्य में सबसे ज्याादा देखा जाने वाला धारावाहिक बन गया। इसके पहले 1982 में विशाल हिंदू सम्मेलन ने रामायण मास के पालन का आह्वान किया था।

द स्टोरी ऑफ हिंदुत्व पॉलिटिक्स  के लेखक पीएन गोपीकृष्णन कहते हैं, ‘‘राम जन्मभूमि आंदोलन ने एक नए किस्म की आबादी को उभारा- संघ की शाखाओं में प्रशिक्षण लेने वाले उसके समर्थक।’’ उनके मुताबिक हिंदुत्ववादी आकांक्षाओं को अब सामाजिक वैधता मिल गई है, जो कभी प्रगतिशील वाम-लिबरल रुझान के माने जाने वाले केरल में कलंक समझा जाता था।  

केरल में भले ही दक्षिणपंथी भगवा ताकतें चुनावी कामयाबी हासिल नहीं कर सकी हैं लेकिन कर्नाटक में ऐसा जरूर हो चुका है। भाजपा के लिए कर्नाटक दक्षिण भारत का ऐतिहासिक द्वार रहा है जिसने दक्षिण के पांच राज्यों में उसे सबसे ज्यादा चुनावी लाभ दिया है। एक वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता शिवसुंदर कहते हैं कि नब्बे के दशक में कांग्रेसी राज में भी आरएसएस का कर्नाटक में पर्याप्त प्रभाव रहता था। तब तात्कालिक कामयाबी सीमित थी, लेकिन उसके प्रयासों ने आखिरकार भाजपा को 2008 में सूबे की सत्ता तक पहुंचा ही दिया।  

ऐसे प्रयासों में एक घटना उल्लेखनीय है, जो कर्नाटक के चिकमंगलुरू जिले में बाबा बूदनगिरि की दरगाह में हुआ विवाद था। यह अयोध्या से 1900 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यहां हिंदुत्ववादी समूहों ने दरगाह को हिंदू तीर्थ बताकर ऐसा दावा करते हुए एक रथयात्रा निकाली थी। इस दरगाह का नाम ‘श्री गुरु दत्तात्रेय स्वामी बाबा बूदन दरगाह’ अपने आप में इसकी सामासिक पहचान का परिचायक है। यहां हिंदू देवता दत्तात्रेय की मान्यता है, साथ ही 16वीं सदी के सूफी संत बाबा बूदन और 11वीं सदी के सूफी संत दादा हयात की भी मान्यता है। बाबा बूदन को भारत में कॉफी का पौधा लाने वाला माना जाता है। बाबरी विध्वंस और राम मंदिर आंदोलन के उत्कर्ष तक पहुंचने की प्रक्रिया में हिंदुत्ववादी धड़ों ने दरगाह को दत्तात्रेय मंदिर बनाने के लिए यहां लोगों को एकजुट किया। शिवसुंदर बताते हैं कि जब पाले खिंच गए तो कर्नाटक को गुजरात मॉडल की नकल करने पर मजबूर होना पड़ा और बाबा बूदन की दरगाह कर्नाटक की अयोध्या बन गई।

वे कहते हैं, ‘‘उस समय कांग्रेस की सरकार थी और सरेकोप्पा गंगारप्पा मुख्यमंत्री थे। इसके बावजूद इसे दक्षिणपंथियों की जीत के रूप में देखा गया।’’ इसके बाद बजरंग दल जैसे हिंदू संगठनों ने शोभायात्राएं और दत्तमाला तीर्थ का आयोजन शुरू कर दिया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1975 के पहले वाली यथास्थिति कायम रखने के एक आदेश के बावजूद कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 2022 में 21 साल के गतिरोध के बाद बाबा बूदन की दरगाह पर हिंदू कर्मकांडों को अनुमति दे डाली।

जो दरगाह पहले से ही हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को जगह देती थी, वहां अब अदालती आदेश से हिंदू पुजारी के हाथ में नियंत्रण आ चुका है। कन्नड़ के प्रतिष्ठित दलित लेखक अरविंद मल्लगट्टी कहते हैं कि ‘‘विवादित स्थल को मुक्त कराने और कथित इस्लामीकरण से बचाकर वापस लेने के लिए हिंदुत्ववादी समूहों ने यही शर्त रखी थी।’’

नब्बे के दशक की शुरुआत में आडवाणी द्वारा सोमनाथ से निकाली गई रथयात्रा उत्तरी कर्नाटक से होकर गुजरी थी। यहां स्वयंसेवकों का एक बड़ा जत्था यात्रा में शामिल हुआ था। कुछ लोग तो अपने घरों की ईंट अयोध्या तक लेकर इस उम्मीद में गए थे कि राम मंदिर में उसे लगाया जाएगा। कई स्थानीय यात्राएं भी आयोजित की गई थीं जिनके कारण अकसर ही सांप्रदायिक तनाव पैदा हो जाता था।

मंगलुरु में 1992 के घटनाक्रम को याद करते हुए मल्लगट्टी कहते हैं, ‘‘माहौल सांप्रदायिक रूप से नाजुक था। उल्लातल में कई दुकानों को फूंक दिया गया था। दुकानें हिंदुओं और मुसलमानों दोनों की जली थीं। धारा 144 भी लगी हुई थी। इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों ने यातायात रोकने के लिए सड़क पर पड़े टायर जला दिए थे।’’

बाबरी विध्वंस के बाद बेशक उत्तर भारत के जैसे दक्षिण में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति नहीं बनी, लेकिन मल्लगट्टी कहते हैं कि समूचे कर्नाटक में मौखिक और लिखित सर्वे का एक चलन शुरू हो गया जिसका लक्ष्य विभिन्न धार्मिक स्थलों को मंदिर में तब्दील करना था। इस परिघटना ने हिंदुत्ववादी ताकतों को बढ़ावा दिया।

रथयात्रा से पहले 1989 में कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को 4.14 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि कांग्रेस 43.76 प्रतिशत वोटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी रही। इसके बाद जनता दल को 27.08 प्रतिशत मिले थे। 1994 तक भाजपा के वोट प्रतिशत में उछाल आया और वह 16.99 प्रतिशत तक पहुंच गया। नतीजतन, कांग्रेस की हिस्सेदारी गिरकर 26.95 प्रतिशत पर आ गई और जनता दल की वोट हिस्सेदारी बढ़कर 33.54 प्रतिशत हो गई। इसके चलते चुनावी परिदृश्य में उथल-पुथल घटी। यह भाजपा के उभार का दौर था जिसने इस अवधि में कर्नाटक की सत्ता की चाल को बदल डाला।

भाजपा भले 2023 के विधानसभा चुनाव में कर्नाटक हार गई हो, लेकन पार्टी ने फिर भी 2018 में मिले 38 प्रतिशत वोट को कायम रखा। लोकसभा चुनाव में भाजपा को और ज्यादा कामयाबी मिली। शिवसुंदर इस पर जोर देते हैं कि दक्षिण में भले राम मंदिर की वैसी अनुगूंज न सुनाई दे लेकिन भाजपा ने फिलहाल तो राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी बढ़त हासिल कर ही ली है। वे कहते हैं, कि आम चुनाव की दौड़ में राम मंदिर का लोकार्पण और उससे संबंधित अभियान दक्षिण के राज्यों में भाजपा के प्रभाव को मजबूत करने के काम जरूर आएगा।

अराफात कहते हैं, ‘‘अयोध्या में बने राम मंदिर को लेकर चौतरफ सनक दिखाती है कि 1990 के बाद से राम जन्मभूमि आंदोलन ने कैसे आबादी के एक बड़े हिस्से को प्रभावित किया और अपने साथ जोड़ लिया।’’

चुनावी राजनीति से इतर, अराफात एक व्यापक प्रभाव पर प्रकाश डालते हैं। जिस तरह से दक्षिण के फिल्मकार, गीतकार और लेखक सहित तमाम लोग आंदोलन की सांस्कृतिक और भावनात्मक अपील से आकर्षित हो रहे हैं, वह इस प्रक्रिया में एक सामाजिक खलबली का संकेत देता है। बहुत संभव है कि भाजपा आगामी चुनावों में द‌क्षिण भारत में राम के नाम पर चुनावी कार्ड खेले।