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प्रथम दृष्टि: जाति सर्वेक्षण के बाद

हर पार्टी उसी अनुपात में हर जाति की नुमाइंदगी आश्वस्त करे जिस अनुपात में उसकी संख्या है। अगर हर दल में...
प्रथम दृष्टि: जाति सर्वेक्षण के बाद

हर पार्टी उसी अनुपात में हर जाति की नुमाइंदगी आश्वस्त करे जिस अनुपात में उसकी संख्या है। अगर हर दल में ऐसा करने का जज्बा दिखता है तो बिहार का जाति सर्वेक्षण देश की सियासत में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

वर्ष 2010 में बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर सुकून देने वाली सुर्खियां प्रकाशित हुई थीं। एक अंग्रेजी अखबार ने लिखा, ‘ग्रोथ इन, कास्ट आउट’, यानी विकास जाति पर भारी पड़ा। चुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में जनता दल-यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन की शानदार जीत हुई थी और चुनाव विश्लेषकों के बीच इस बात पर आम सहमति बनी कि जीत का प्रमुख कारण राज्य सरकार की समावेशी विकास का एजेंडा था, जिसे उसने पूरी शिद्दत से पांच वर्षों तक प्रदेश में लागू किया था।

इसमें दो मत नहीं कि नवंबर 2005 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के गठन के बाद बिहार में विकास ने तेज रफ्तार पकड़ी, जिसका श्रेय मुख्य तौर पर इसके मुखिया नीतीश कुमार को मिला। कहा गया कि सरकार के कामकाज से प्रभावित प्रदेश की जनता ने तमाम जाति समीकरण को दरकिनार कर सिर्फ और सिर्फ विकास के नाम पर उन्हें पांच साल के लिए सत्ता की चाबी फिर सौंपी। वैसे तो विकास कार्य की बदौलत किसी दल या गठबंधन का चुनाव जीतना कोई हैरानी की बात नहीं होती है, लेकिन बिहार के संदर्भ में यह अभूतपूर्व घटना थी क्योंकि राज्य के चुनावों को पहले जाति से अलग कर कभी नहीं देखा गया था। जाति समीकरण के सामने वहां हर चुनाव में बाकी सारे मुद्दे बेअसर हो जाते थे। यही कारण था, सभी दल विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में जातियों की संख्या के आधार पर ही अपने-अपने उम्मीदवारों का चयन करते रहे। यहीं नहीं, वे यह बताने से भी परहेज नहीं करते थे कि उन्होंने किस जाति के कितने उम्मीदवारों का चयन किया है। जाहिर है, 2010 के प्रदेश चुनावों में जाति कार्ड फेल हो गया और एक उम्मीद की किरण नजर आई कि शायद बिहार जातिगत पूर्वाग्रहों को पीछे छोड़ विकास के रास्ते पर आगे बढ़ चला है। लेकिन क्या आने वाले वर्षों में ऐसा वाकई हुआ? उस ऐतिहासिक चुनाव के तेरह साल बीत जाने के बाद तो कम से कम ऐसा प्रतीत नहीं होता क्योंकि वहां आज भी जाति का मुद्दा उतना ही प्रभावी दिखता है जितना पहले था। 2010 का चुनाव इस लिहाज से अपवाद के रूप में देखा जा सकता है।

आजकल बिहार जाति सर्वेक्षण के कारण फिर से सुर्खियों में है। नीतीश सरकार ने गांधी जयंती के अवसर पर प्रदेश की जातियों के सर्वेक्षण के आंकड़ों को सार्वजानिक कर दिया है। सरकार ने यह सर्वेक्षण इस दलील के साथ करवाया है कि इससे उसे तमाम पिछड़ी जातियों के उत्थान के लिए नए सिरे से नीतियों और कार्यक्रमों को बनाने में सहायता मिलेगी। इससे खासकर वैसी जातियों के सर्वांगीण विकास में मदद मिलेगी, जो आजादी के इतने वर्षों के बाद भी समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाए हैं। अगर वाकई नीतीश सरकार का यही उद्देश्य है तो जाति सर्वेक्षण की कवायद तारीफ के काबिल है। बिहार में आज भी मुसहर जैसी कई जातियां हैं जो समावेशी विकास के दायरे से कोसों दूर हैं। राजनीति हो या शिक्षा, किसी भी महत्वपूर्ण क्षेत्र में उनकी उपस्थिति नगण्य है। अगर इस तरह के सर्वेक्षण से ऐसी जातियों का भला होता है और इसके आधार पर उन्हें बाकी जातियों के समकक्ष आने के पर्याप्त अवसर मुहैया कराये जाते हैं तो प्रदेश सरकार का यह कदम निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। इससे उम्मीद जगती है कि इस सर्वेक्षण से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर आने वाले दिनों में ऐसी नीतियां बनेंगी जिनसे एक पिछड़े प्रदेश में समाज के हाशिये पर रहने वाली तमाम जातियों का विकास संभव हो सकेगा। लेकिन क्या यह कवायद महज नेक इरादों के साथ की गई है या यह महज चुनाव जीतने का पुराना स्टंट मात्र है?

आखिरकार जाति सर्वेक्षण या इस तरह की किसी भी गणना को आज के संदर्भ में चुनावी राजनीति से अलग कर नहीं देखा जा सकता। आज इसके पैरोकार जातियों की संख्याबल के आधार पर उनके लिए हर क्षेत्र में हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं। शायद यही वजह है कि इसके सियासी नफा-नुकसान का आकलन करते हुए बिहार के तर्ज पर अब कई अन्य राज्य भी जाति सर्वेक्षण कराने का मन बना रहे हैं। कांग्रेस जैसी पार्टियां भी अब इसके पक्ष में हैं जो कभी मतदाताओं को जात-पात की संकीर्णता से ऊपर उठकर वोट डालने की अपील करती थीं। उन्हें शायद लगता है कि इसके माध्यम से मतदाताओं को गोलबंद करके चुनावों में लाभ मिल सकता है। लेकिन, अगर जाति सर्वेक्षण सिर्फ चुनावी हथकंडे के रूप में सामने आता है तो यह उन तमाम पिछड़ी जातियों के साथ नाइंसाफी होगी जिनके विकास के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। वैसे यह देखना भी दिलचस्प होगा कि हर क्षेत्र में समान हिस्सेदारी की वकालत कर रहे नेता क्या अपनी-अपनी पार्टियों में टिकट वितरण से लेकर मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व के सवाल पर भी ऐसी ही नीति का पालन करते हैं? वैसे इस मुद्दे को लेकर चुनावी समर में जाने वाले हर नेता से यह उम्मीद तो जगती ही है कि वे अपनी पार्टी में भी हर स्तर पर उसी अनुपात में हर जाति की नुमाइंदगी आश्वस्त करेंगे जिस अनुपात में उनकी संख्या है। अगर हर दल में ऐसा करने का जज्बा दिखता है, तो बिहार का जाति सर्वेक्षण देश की सियासत में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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