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हुसेन जन्‍मशती: देशनिकाले का कैनवास

इमर्जेंसी के दिनों में हुसेन को इंदिरा गांधी प्रेम के कारण बदनामी भी मिली। उन्होंने इंदिरा में दुर्गा छवि खोज ली थी। लेकिन हिंदुवादी फासिस्ट ताकतों ने बाद में हुसेन पर जो हमले किए, जिस तरह से उन्हें बदनाम किया उसके पीछे असली हुसेन को न जानना और धर्मांधता ही थी।
हुसेन जन्‍मशती: देशनिकाले का कैनवास

क अगस्त, 2010 रविवार का दिन था। लंदन में मकबूल फिदा हुसेन के स्टूडियो में जब मैंने 95 साल के इस मशहूर निर्वासित भारतीय कलाकार से विदा ली, तो मुझे यकीन था कि अपनी जन्म शताब्दी के अवसर पर 17 सितंबर, 2015 के दिन भी हुसेन हमारे बीच होंगे और खूब काम कर रहे होंगे। उस दिन वह सुबह पांच बजे से अकेले एक बड़े कैनवास पर काम कर रहे थे। मैं उनसे सुबह ग्यारह बजे मिला था। उनकी पारिवारिक मित्र राशदा सिद्दिकी भी उनके स्टूडियो में मौजूद थीं। फर्श पर कोई पेंट गिर जाता था, तो वह बहुत प्यार से उसे कपड़े से साफ कर देती थीं। हुसेन 95 साल की उम्र में भी किसी असिस्टेंट के सहारे नहीं काम कर रहे थे। मैं 1975 के बाद से हुसेन से कई बार मिल चुका था। हम लोग खूब बातें कर रहे थे। बीच-बीच में हुसेन पेंट करने लगते थे- एक स्त्री के बड़े चेहरे को वह पेंट कर रहे थे। स्टील के अमीर व्यापारी लक्ष्मी मित्तल के लिए वह एक बड़ी सीरीज पर काम कर रहे थे। मेरे कैनन के कैमरे में छोटा सा वीडियो बनाने की गुंजाइश थी। मैं जानता था कि हुसेन कैमरे के सामने, खासतौर पर जब फिल्म बन रही हो- बहुत सजग हो जाते थे। बाकायदा डिजाइनर ड्रेस में तैयार होने के बाद शूटिंग होने देते थे। मैंने बिना इजाजत के पेंट करते हुए हुसेन का वीडियो बनाना शुरू कर दिया। मुझे यह भी डर था कि वह एतराज कर सकते हैं। अचानक उन्होंने मुझे वीडियो शूट करते हुए देखा पर वह मुस्कराये और हाथ से इशारा किया-ठीक है, शूट कीजिए। नतीजा यह हुआ कि मैंने पेंट करते हुए हुसेन का एक दुर्लभ वीडियो बना लिया जिसमें हुसेन किसी तैयारी के बाद कैमरे के सामने नहीं बैठे हैं। हुसेन के जून, 2011 में लंदन में निधन के बाद 'आर्ट दुबई’ महोत्सव में यह वीडियो दिखाया भी गया था। इस वीडियो में फटा सुथन्ना पहने हुसेन पेंट कर रहे हैं।

हम सबको यकीन था कि हुसेन सौ साल बाद भी जिएंगे, पेंट करेंगे और भारत वापस भी आ सकेंगे (जहां क्रूर सांप्रदायिक शक्तियां इस महान पेंटर की उंगलियां काट देने की धमकी देती रहती थीं)। राशदा से मैंने हुसेन के निधन के बाद एक बार लंबी बातचीत की। उन्होंने बताया कि हुसेन निर्वासित जीवन में कभी-कभी मुंबई जाने के लिए बेचैन हो जाते थे। एक बार बोले, क्या कराची चला जाऊं? वह शहर मुंबई की याद दिलाता है। काफी मिलता-जुलता है मुंबई से।

राशदा को निधन से कुछ सप्ताह पहले मई, 2011 में लंदन के हवाई अड्डे पर जब छोड़ने आए थे, तो अचानक उन्होंने कहा, 'तुम जब फूल डालोगी तो मैं तुम्‍हारे हाथ पहचान जाऊंगा।’ राशदा इस बात पर काफी सोचती रहीं। हुसेन को शायद अपने निधन का पूर्वाभास हो गया था। हिंदी में हुसेन फाउंडेशन ने 2002 में 'एम.एफ. हुसेन की कहानी अपनी जुबानी’ (वितरक:वाणी प्रकाशन) छापी थी, तो राशदा सिद्दिकी ने बड़ी मेहनत से अपनी लिखावट में यह पूरी किताब तैयार की थी। साथ में हुसेन ने विशेष रेखाकंनों की मदद से अपनी आत्मकथा का अद्भुत बयान किया था। इस आत्मकथा के पहले पन्ने पर एक छोटा सा रेखांकन घोड़े के साथ खड़े टोपी पहने किशोर हुसेन का है और नीचे लिखा है, 'दादा की उंगली पकड़े एक लड़का, मां दे गई नाम मकबूल और बने फिरते हैं एम. एफ. हुसैन।’

प्रसिद्ध हिंदी लेखक निर्मल वर्मा ने इस आत्मकथा की भूमिका 'मकबूल की हुसेनी कलम’ में लिखा है, 'क्या यह अजीब विडंबना नहीं है कि हुसेन के भीतर पहली बार जिस व्यक्ति ने भारतीय संस्कृति के महाकाव्यों-रामायण और महाभारत के प्रति प्रेम जगाया था, वह एक नास्तिक और समाजवादी हिंदू थे- उनसे कितना अलग-जिन्होंने कुछ वर्षों बाद उसी 'संस्कृति’ के नाम पर अहमदाबाद की गुफा में उनके चित्रों को तहस-नहस कर डाला था।’

यह नास्तिक समाजवादी थे डॉ. राममनोहर लोहिया। अपनी आत्मकथा के एक छोटे पर सुंदर अध्याय 'रामलीला’ में हुसेन ने कहा है, 'लोहियाजी ने लड़के की पीठ थपकी, जैसे शाबाशी दी हो और विषय बदलते हुए कहा, 'यह जो तुम बिरला और टाटा के ड्राइंगरूम में लटकने वाली तस्वीरों में घिरे हो, जरा बाहर निकलो। रामायण को पेंट करो। इस देश की सदियों पुरानी दिलचस्प कहानी है। गांव-गांव गूंजता गीत है, संगीत है और फिर इन तस्वीरों को गांव-गांव ले जाओ। शहर के बंद कमरे जिन्हेेंं आर्ट गैलरी कहा जाता है, लोग वहां सिर्फ पतलून की जेबों में हाथ डाले खड़े रहते हैं। गांव वालों की तरह तस्वीरों के रंग में घुलमिल कर नाचने गाने नहीं लगते।’

लोहिया के आकस्मिक निधन के तुरंत बाद उनकी याद में हुसेन ने 'रामायण’ से प्रेरित करीब डेढ़ सौ चित्र हैदराबाद में बदरी विशाल पित्ती के मोती भवन में बनाए। दस साल काम किया। कोर्ई दाम भी नहीं मांगा, 'सिर्फ लोहियाजी की जबान से निकले शब्दों का मान रखा।’

एक आधुनिक चित्रकार के रूप में हुसेन की पहचान प्रोगेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप की तत्कालीन बांबे में 1947 की ऐतिहासिक प्रदर्शनी से हुई थी। फ्रांसिस न्यूटन सूजा एक तरह से हुसेन के गुरु कहे जा सकते हैं, हुसेन उन्हें अपना गुरु मानते भी थे। आज इस ग्रुप के मूल छह सदस्यों में से सिर्फ एक सैयद हैदर रजा जीवित हैं। हुसेन, सूजा, आरा, गाडे और बाकरे सभी का निधन हो चुका है।

हुसेन और सूजा दोनों ही पिकासो से अपने-अपने ढंग से प्रभावित थे। पिकासो की तरह वे खूब काम करना पसंद करते थे। सूजा स्वतंत्रता के तुरंत बाद लंदन चले गए और बाद में न्यूयॉर्क में रहने लगे। हुसेन ने अपनी 'जमीन’ से जुड़े रहना पसंद किया। नई दिल्ली के राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय में हुसेन की एक बहुत बड़ी पेंटिंग का नाम भी 'जमीन’ है। पिकासो ने पेंटिंग के दाम बढ़ाने, उसकी छवि को समाज में प्रबलित करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत में हुसेन ने पेंटर की छवि प्रबलित की, उसकी 'न्यजू वैल्यू बढ़ाई’, उसकी पेंटिंग के दाम बढ़ाए।

हुसेन हिंदी के लेखकों के भी काफी निकट संपर्क में रहे। हैदराबाद में बदरी विशाल पित्ती 'कल्पना’ निकालते थे और हुसेन अक्सर उनके निजी मेहमान होते थे। दिल्ली में कवि-लेखक मुक्तिबोध की शवयात्रा में हुसेन नंगे पैर शामिल हुए थे। बाद में वह नंगे पैर चलने वाले आधुनिक पेंटर के रूप में मशहूर हो गए। एक बार कलकत्ता के एक अंग्रेजीदां क्लब ने मशहूर हुसेन को नंगे पैरों में घुसने नहीं दिया था।

इमर्जेंसी के दिनों में हुसेन को इंदिरा गांधी प्रेम के कारण बदनामी भी मिली। उन्होंने इंदिरा में दुर्गा छवि खोज ली थी। लेकिन हिंदुवादी फासिस्ट ताकतों ने बाद में हुसेन पर जो हमले किए, जिस तरह से उन्हें बदनाम किया उसके पीछे असली हुसेन को न जानना और धर्मांधता ही थी। हुसेन को कतर की नागरिकता लेनी पड़ी और अपने निर्वासन के अंतिम कुछ वर्ष उन्होंने दुबई, कतर और ब्रिटेन में बिताये। गर्मियों में वह लंदन में रहकर काम करते थे। हुसेन का फिल्म प्रेम भी बहुत  जबरदस्त था। शुरू में बांबे में उन्होंने होर्डिंग पेंटर के रूप में लगभग एक मजदूर की तरह खूब काम किया। वैसे तो वह दुनिया के श्रेष्ठ सिनेमा से भी अच्छी तरह परिचित थे पर मुंबइया सिनेमा की ग्लैमर कन्याएं उन्हें हमेशा आकर्षित करती रहती थीं। कभी वह दारासिंह की हीरोइन मुमताज की बी ग्रेड फिल्में देखते हुए दर्शकों के साथ चवन्नी फेंकन में भी व्यस्त देखे जा सकते थे। 'हम आपके हैं कौन’ में माधुरी दीक्षित की त्रिभंग मुद्रा के तो वह दीवाने हो गए थे- 'गजगामिनी’ फिल्म के रूप में हुसेन की कमजोर कृति ही कही जाएगी। अपनी डाक्यूमेंट्री 'थ्रू द आइज ऑफ ए पेंटर’ से बर्लिन के प्रतिष्ठित फिल्म महोत्सव में सिल्वर बियर पाने वाले हुसेन अपनी आखिरी फिल्म 'मीनाक्षी ए टेल ऑफ थ्री सिटीज’ में भी वो ऊंचाई नहीं हासिल कर सके जो 'थू्र द आइज ऑफ ए पेंटर’ के राजस्थान, बूंदी की बावड़ियों में वह पा सके थे। लेकिन हुसेन लोकप्रिय और चालू सिनेमा के व्याकरण में भी अपनी अलग बात कह लेते थे। मद्रास की सड़कों पर लगे फिल्मी पोस्टरों की तस्वीरें खींच कर उन्होंने अस्सी के दशक में सड़कछाप संस्कृति को एक सशक्त और अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति प्रदान की थी। अपनी आत्मकथा के अंत में हुसेन ने कहा है, 'यह जलन क्यों ? आज के एम.एफ. हुसेन को देखकर? मुड़ के कल के मकबूल को देखा है? जो प्लेहाउस के हुसेनी खिचड़ी वाले ढाबे में पांच पैसे की खिचड़ी पर दाल या कढ़ी मुफ्त डलवाने खड़ा रहता था। दो आने के सिनेमा के टिकट के लिए दो घंटे लाइन में। कई महीनों बीस-बीस फीट लंबे फिल्मी हीरोइनों के होर्डिंग सीढ़ियों पर चढ़ के पेंट करना....’  हुसेन की यही पाठशाला थी। आखिरी दिनों में लंदन में सात करोड़ की बुगाती आलीशान कार में भी वह इन्हीं दिनों को याद करते थे। यह मस्ती की पाठशाला नहीं थी।