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चार नृत्यांगनाओं ने रज़ा के चित्रों पर किया नृत्य, नृत्य और चित्रकला के बीच अनोखा संवाद

कला के इतिहास में चित्रकला और नृत्य के बीच आपसी संवाद की घटनाएं बहुत ही दुर्लभ हैं।आज से 28 साल पहले...
चार नृत्यांगनाओं ने रज़ा के चित्रों पर किया नृत्य, नृत्य और चित्रकला के बीच अनोखा संवाद

कला के इतिहास में चित्रकला और नृत्य के बीच आपसी संवाद की घटनाएं बहुत ही दुर्लभ हैं।आज से 28 साल पहले जयपुर घराने की वरिष्ठ कथक नृत्यांगना प्रेरणा श्रीमाली ने पहली बार रज़ा साहब के चित्रों पर फ्रांस में नृत्य का कार्यक्रम किया था।तब रज़ा साहब जीवित थे।कला की दुनिया में वह अपनी तरह का पहला अनूठा प्रयोग था।करींब तीन दशक बाद रज़ा साहब की अनुपस्थिति में उनके चित्रों पर चार जानी मानी नृत्यांगनाओं ने रज़ा साहब के चित्रों पर नृत्य का कार्यक्रम कर एक अभिनव प्रयोग किया।

वैसे तो हिंदी साहित्य ही नहीं कला की दुनिया में भी आपसी संवाद का संकट आज भी विद्यमान है।ऐसे में कलाओं की विभिन्न विधाओं के बीच संवाद की कामना करना थोड़ा और मुश्किल है पर गाहे बगाहे संवाद होता बनाने के छिटपुट प्रयास होते रहते हैं जो भले ही दुर्लभ घटना हो। साहित्य का संगीत तथा चित्रकला के बीच थोड़ा बहुत संवाद कभी कभी रचनाओं में दिखाई देता है लेकिन संगीत का चित्रकला से चित्रकला का नृत्य से संवाद नहीं के बराबर है।


रज़ा फाउंडेशन ने इस दिशा में कुछ अभिनव कदम उठाएं हैं। पिछले दिनों देश की चार प्रसिद्ध नृत्यांगनाओं कथक के जयपुर घराने की प्रेरणा श्रीमाली भरतनाट्यम की नर्तकी रमा वैद्यनाथन मोहिनीअट्टम की गोपिका वर्मा और सत्तरिया नर्तक अन्वेषा महन्ता ने नृत्य और चित्र के बीच आत्मीय और अंतरंग संवाद किया। मौका था रज़ा जन्मशती का इन नृत्यांगनाओं ने चित्रों पर एकल और सामूहिक नृत्य कर एक अनोखा प्रयोग किया।यूँ तो प्रेरणा जी ने 95 में ही पहली बार रज़ा के चित्रों पर फ्रांस में नृत्य प्रस्तुत कर संवाद बनाने का पहला प्रयास किया था पर अब इस संवाद को बनाने में चार नृत्यांगनाएं भी शामिल थीं। अगर काविता की भाषा में उन प्रस्तुतियों को कहा जाए तो वह इस प्रकार था।
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नृत्य में चित्र
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उसकी आँखों में एक कैनवास था
पांव थे कुचियों के मानिंद
होठों पर थे कुछ वाटर कलर
लय में थीं रेखाएं
मुद्राओं में भाव

 

 

नर्तकी एक चित्र बना रही थी
मंच पर अपने नृत्य से
कर रही थी वह एक संवाद
पूरे ब्रह्मांड से
दूर अंतरिक्ष में जाती हुई
खोजती हुई
अपनी अस्मिता
अपना जीवन अर्थ


लोगों के मन में यह सवाल पहले भी उठता होगा कि क्या नृत्य के जरिये भी चित्र बनाया जा सकता है? क्या दो विधाओं में इस तरह संवाद बनाया जा सकता ?

रजा फाउंडेशन ने गत सप्ताहांत दो दिन तक अद्भुत कलात्मक प्रयोग कर इस संवाद को संभव किया।यह नवाचार देखकर दर्शक खुद अपने भीतर एक आंतरिक लय में डूब गए।एक दूसरी ही दुनिया में चले गए जिसमें ताल भंगिमा मुद्राएं आंगिक भाव और बोल भी शामिल थे।इस तरह उन्होंने एक कॉस्मॉस की भी रचना की।एक शून्य का निर्माण किया और जीवन सत्य और आनंद का संधान किया।एक अलौकिक संसार को विन्यस्त किया। नृत्य की भाषा और रंगों की भाषा मानो एकाकार हो गईं।मंच पर रज़ा साहब के चित्र मानो बोलने लगे।


यह तीसरा अवसर था जब रजा साहब के चित्रों पर इस तरह नृत्य का कार्यक्रम हो रहा था।
यूँ तो कविताओं पर नृत्य के कार्यक्रम होते रहते हैं, बिस्मिल्लाह खान की शहनाई रविशंकर के सितारवादन पर तथा कुमार गन्धर्व मल्लिकार्जुन मंसूर भीमसेन जोशी की गायकी पर कविगण कविताएं लिखते रहे हैं निराला दिनकर बच्चन रघुवीर सहाय अशोक वाजपेयी आदि की कविताओं पर नृत्य भी होते रहे हैं लेकिन चित्रों पर नृत्य के कार्यक्रम दुर्लभ ही हैं। शम्भू महाराज से लेकर बिरजू महाराज या सितरादेवी ने भी इस तरह के प्रयोग नहीं किये।


लेकिन प्रसिद्ध कवि एवम संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी के प्रयासों से पहली बार यह नवाचार संभव हुआ।वे हमेशा कला की दुनिया में नवोन्मेष पर जोर देते रहे हैं और कला की विधाओं के बीच आपसी संवाद पर बल देते रहे हैं पर दुर्भाग्य से यह आपसी संवाद बहुत कम और विरल है।
संगीत नाटक अकेडमी पुरस्कार से सम्मानित प्रेरणा श्रीमाली रमा वैद्यनाथन और संगीत नाटक अकेडमी के बिस्मिल्लाह खान पुरस्कार से सम्मानित युवा नृत्यांगना अन्वेषा महन्त गोपिका वर्मा ने बहुत ही गरिमा तल्लीनता और गहन मुद्राओं भंगिमा तथा ताजगी के साथ रजा साहब के चित्रों पर नृत्य किया।
रमा ने मंच पर रजा के चित्रों को पार्श्व में रख कर नृत्य किया तो गोपिका वर्मा ने पार्श्व में रजा साहब का बड़ा सा चित्र स्क्रीन पर पेश कर नृत्य किया।
इस तरह रजा साहब अपने चित्रों और अपनी तस्वीरों में उपस्थित थे।दर्शक भी उनसे संवाद कर रहे थे उनकी अनुपस्तिथि में क्योंकि वे इस संसार में न रहते हुए मंच पर मौजूद थे।
अशोक वाजपेयी ने समारोह के प्रारंभ में बताया कि रज़ा साहब की जन्मशती पर यह अभिनव कार्यक्रम इस लिए भी हो रहा है कि रज़ा साहब को नृत्य में भी रुचि थी।उनकी चित्रों में भी एक लय है। एक दार्शनिकता भी है।यह प्रस्तुति रजा साहब के चित्रों की नृत्य में अनुकृति नहीं है बल्कि एक संवाद है।नृत्य का चित्रकला से संवाद।

संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भरत नाट्यम की नृत्यांगना रमा वैद्यनाथन ने भी सुंदर प्रस्तुति की।उन्होंने रजा साहब के चित्रों को मंच पर प्रस्तुत कर अपना नृत्य पेश किया।यह बिल्कुल नया प्रयोग था।

कला की दुनिया में शायद ही किसी नर्तकी ने ऐसा प्रयोग किया हो।इस तरह कल की शीत लहरी से भरी शाम में नृत्य के भाव और मुद्राओं ने एक तरह की ऊष्मा भर दी। एक ताजगी और सुखद अहसास भी दिया।चित्रों के रंग और नृत्य की मुद्राएं दर्शकों के भीतर उतरती चली गईं।


92 वर्षीय राजनेता डॉक्टर कर्ण सिंह 87 वर्षीय आलोचक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और 82 वर्षीय अशोक वाजपेयी इस ठंड में एक दर्शक के रूप में इस नृत्य का अवलोकनऔर रसास्वादन ही नहीं कर रहे थे बल्कि एक संवाद भी कायम कर रहे थे।

 

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