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कर्ज उर्फ वोट

“बड़ा कर्जदार जब तक इंडिया में होता है, बहुतों को अपने साथ उड़ाता है। बाद में खुद उड़ लेता है वहां,...
कर्ज उर्फ वोट

बड़ा कर्जदार जब तक इंडिया में होता है, बहुतों को अपने साथ उड़ाता है। बाद में खुद उड़ लेता है वहां, जहां से उसके लौटने की बस आशा ही रह जाती है

किसानों को कर्जमाफी देने के लिए सरकारें इस कदर प्रतिबद्ध हैं कि किसानों को हर हाल में कर्जदार रखना सरकारों के लिए जरूरी हो जाता है। किसान अगर कर्जदार नहीं होंगे, तो कर्जमाफी कैसे हो पाएगी। भारतवर्ष में तीन प्रकार के किसान होते हैं। पहले, फार्म हाऊस वाले जो महंगाई की कमी या बढ़ोतरी इस बात से आंकते हैं कि स्कॉच की कीमतों में कितने सालों में कितना इजाफा हुआ। दूसरे, नेता टाइप जो तमाम टीवी चैनलों पर बहस करते पाए जाते हैं। तीसरे, आम किसान जो बहुत सारे वोट होते हैं। भारत में लोकतंत्र है और लोकतंत्र में वोटों की चिंता की जाती है। वोट किसानों के कर्ज माफ कर दिए जाने की घोषणा की जाती है। छत्तीसगढ़ में किसानों के कुल 6,100 करोड़ का कर्ज माफ होने की घोषणा हुई। इस रकम से दोगुनी रकम अकेले नीरव मोदी पार कर गए और ड्योढी रकम विजय माल्या उड़ा गए हैं। विजय माल्या, नीरव मोदी न सिर्फ रकम उड़ा गए बल्कि खुद भी उड़ लिए।

बड़ा कर्जदार जब तक इंडिया में होता है, बहुतों को अपने साथ उड़ाता है। बाद में खुद उड़ लेता है वहां, जहां से उसके लौटने की बस आशा ही रह जाती है। छोटा कर्जदार माफी की आशा करता है। थिंक बिग। बड़ा सोचो। ऐसी मोटीवेशनल स्पीच देने वालों के दिमाग में यकीनन कर्जा ही रहा होगा। बड़ा कर्जदार सेलिब्रिटी बन जाता है। भारत के बैंकों में स्वच्छता अभियान चला गए मेहुल चोकसी ने एक भारतीय एजेंसी को बताया कि वह 41 घंटे की हवाई यात्रा करके भारत नहीं आ सकता। यात्रा कंफर्टेबल नहीं है। विजय माल्या ने ब्रिटेन में कोर्ट को कहा कि भारत के जेलों का लेवल उसके स्टैंडर्ड का नहीं है। भारतीय जेल अधिकारियों ने जेल के फोटू भेजे और ब्रिटेन की कोर्ट को राजी किया कि हमारी जेल में सारी सुख-सुविधा मौजूद है। बड़े कर्जदार की सुख-सुविधा का ख्याल एजेंसियों को, भारतीय जेलों को करना पड़ता है।

छोटा कर्जदार मर जाता है, फांसी लगाकर और बमुश्किल एक संख्या बन पाता है। 230 ने नहीं 231 ने आत्महत्या कर ली। छोटा कर्जदार किसान सिर्फ नंबर होता है, बड़ा कर्जदार सेलिब्रिटी हो जाता है। उसकी फोटू अखबारों में छपती है। छोटा कर्जदार सिर्फ संख्या है जो दुखी जनसंख्या का हिस्सा है। बड़ा कर्जदार परम तृप्त समुदाय का हिस्सा होता है, जिसका वड्डा नाम होता है, एक खास पहचान और बहुत ही खास वाली जान-पहचान होती है। कर्ज जब भी लें, बंदे को थिंक बिग होना चाहिए।

किसान वोट देता है, वोट से नेता नोट बनाते हैं। उन नोटों का एक हिस्सा किसानों को दिया जाएगा, ऐसा कहा जाता है। पर ऐसा होता नहीं है। इसलिए हर साल किसान सड़क पर होता है। अर्थव्यवस्था में काम कर रहे लगभग हर बंदे को उसकी सेवा या वस्तु का मुनाफे वाला भाव मिल जाता है पर किसान को पांच रुपये की लागत वाले प्याज के पचास पैसे दिए जाते हैं। जैसा कि पहले बताया गया है, प्रतिबद्धता किसान को कर्जमाफी देने की है, सही भाव देने की नहीं। किसान को सही भाव मिल जाएंगे तो वह नेताओं को भाव देना बंद कर देगा। कर्जदार किसान शानदार वोट होता है। बेरोजगार नौजवान वोट होता है। इनसे वोट लिया जाता है। आश्वासन दिए जाते हैं। आश्वासन पूरे न हों तो सरकार बदल जाती है। बदले गए नेता फिर इंतजार करते हैं इस उम्मीद में कि कब नौजवान नई सरकार से नाराज हो जाएं। लोकतंत्र इसी तरह पब्लिक की नाराजगी से चल रहा है। खुद कुछ करने की जरूरत नहीं है, बस इतना धैर्य काफी है कि नेता या नौजवान सरकार से नाराज हो जाएं। एंटी इंकंबेंसी, सरकार से नाराजी बहुत ही पावरफुल राजनीतिक विचारधारा है। कुछ करना नहीं है, सिर्फ धैर्य धारण करना है। फुल निकम्मेपन के साथ कई नेता यही करते हैं। किसान और नौजवान को अपने बूते ही करना है सब। राजनीतिक दलों का एजेंडा साफ है, किसानों को कर्जदार बनाए रखो ताकि कर्जमाफी का वादा कर सकें। उनके आइटमों की सही कीमत देना किसी का एजेंडा नहीं है।

कर्जमाफी का हल्ला सुनकर मिर्जा गालिब अपने जन्मदिन 27 दिसंबर पर बोले, “मेरा भी कर्ज माफ करो। कर्ज के प्रति मेरी गहन प्रतिबद्धता है। मैंने तो शेर भी लिखा है- “कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां, रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।” चचा को बता दिया गया कि चचा तुम किसान नही दारूबाज हो। दारूबाजों के वोट लोकतंत्र में बहुत कम होते हैं। जिनके वोट नहीं होते, उनसे कर्जमाफी का झूठा वादा तक नहीं किया जाता। झूठा वादा हासिल करने तक के लिए वोट होना जरूरी है।

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