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पुस्तक समीक्षा : सिमसिम

भारत के विभाजन पर केंद्रित फिक्शन का अधिकांश हिस्सा या तो पंजाब के दर्द का चित्रण करता है, या बंगाल का,...
पुस्तक समीक्षा : सिमसिम

भारत के विभाजन पर केंद्रित फिक्शन का अधिकांश हिस्सा या तो पंजाब के दर्द का चित्रण करता है, या बंगाल का, लेकिन कम किताबें हैं, जो सिंधियों की पीड़ा की बात करती हैं। गीत चतुर्वेदी का उपन्यास ‘सिमसिम’ उन कम किताबों में शामिल है, जो भारत के विभाजन को एक सिंधी भुक्तभोगी की संवेदनशील निगाहों से देखती है। 

 

‘सिमसिम’ के बुज़ुर्ग नायक बसरमल जेठाराम पुरस्वाणी की कई पीड़ाओं में से एक यह भी है कि उसके जीवन का एक बड़ा हिस्सा शरणार्थी के रूप में गुज़रा। दरअसल, सिंध का कभी विभाजन हुआ ही नहीं, वह पूरा का पूरा पाकिस्तान में ही रह गया, लेकिन सिंधी भारत चले आए। मातृभूमि सिंधियों ने भी खोई, रिफ़्यूजी बनने का अभिशाप उन्होंने भी झेला, लेकिन सिंधी हिन्दुओं की पीड़ाओं का कोई बड़ा नैरेटिव नहीं बन पाया। पंजाब और बंगाल के उलट सिंधियों के पास एक इंच सिंध भी नहीं बच पाया। 

 

एक मोनोलॉग में बसरमल कहता है- ‘‘मैं सिन्धी हूँ। मैं भारत में रहता हूँ। जबकि सिन्ध, पाकिस्तान में है। भारत में कितने सिन्धी हैं? लाखों। भारत में कितना सिन्ध है? राष्ट्रगान में एक शब्द जितना। जो जगह भारत में नहीं है, उसका उल्लेख भारत के राष्ट्रगान में है। इसी को ‘स्मृति’ कहा जाता है। स्मृति मेरी मातृभूमि है। इसे मुझसे कोई छीन नहीं सकता। जो अपनी मातृभूमि खो देते हैं, स्मृति उनकी मातृभूमि बन जाती है।’’

 

इक्कीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले लेखक गीत चतुर्वेदी का समग्र लेखन दरअसल स्मृति पर की गई विपश्यना है और ‘सिमसिम’ उसका ताज़ा उदाहरण है। वह प्रूस्त जैसी गहराई और कोएट्ज़ी जैसी विचारवान सजगता के साथ नायपॉल जैसे सुंदर-सुगठित वाक्य लिखते हैं, जिस कारण ‘सिमसिम’ स्मृति, कल्पना और यथार्थ का एक नायाब कलात्मक मिश्रण बन गया है। 

 

यह उपन्यास एक साथ समय के दो धरातलों पर चलता है- एक 1947-48 का समय, दूसरा 2007 का। विभाजन के समय अठारह साल का नौजवान बसरमल सिंध के कस्बे लड़काना में रहता है। जब दंगे भड़क जाते हैं, तब उसका परिवार अपना सामान बांधकर भारत के लिए रवाना हो जाता है और कराची रिफ्यूजी कैम्प पहुंचता है। लेकिन बसरमल वहां से बिना किसी को बताए, चोरी-छिपे, लड़काना लौट आता है, ताकि वह अपनी प्रेमिका जाम को अपने साथ भारत ले जा सके। जब वह जाम के घर पहुंचता है, तो पाता है कि दंगाइयों ने उसे तहस-नहस कर दिया है। जाम का कोई पता नहीं चलता। उसे खोजने की कोशिश में वह कई तरह के नाटकीय जोखिम उठाता है, सियासत, सांप्रदायिकता, लालच और हिंसा के कई अनजाने पहलुओं से परिचित होता है और नाकाम हो जाता है। अपनी जान बचाते हुए वह किसी तरह मुंबई पहुंचता है। तब तक उसने अपना सबकुछ खो दिया है। मुंबई में एक भटकता दरवेश उससे कहता है, तुमने जो कुछ खोया है, वह तुम्हें किताबों में मिलेगा। बसरमल एक लाइब्रेरी खोलता है- सिंधु लाइब्रेरी, जहाँ किताबों के माध्यम से सिंध की संस्कृति, भाषा और स्मृति को जीवित रखने का प्रयास करता है। 

 

वर्ष 2007 में घर में बंदिशों से परेशान एक बेरोज़गार युवक सड़क किनारे एक खिड़की पर खड़ी लड़की के प्रेम में पड़ जाता है। उस खिड़की के ठीक सामने सिंधु लाइब्रेरी है। नौजवान सिंधु लाइब्रेरी में घुसकर बूढ़े बसरमल से दोस्ती कर लेता है और वहाँ से खिड़की वाली लड़की तक पहुंचने का रास्ता तलाशने लगता है। अपने पिता के साथ नौजवान का रिश्ता द्वंद्वों से भरा हुआ है। पुराने ख़्यालों के पिता चाहते हैं कि जो भी नौकरी मिले, बेटा वह कर ले, लेकिन नौजवान कहता है, मैंने बड़ी डिग्री हासिल की है, बडी नौकरी करूंगा। दोनों की इस तनातनी से उनके घर का माहौल ख़राब है, जिससे बचने के लिए नौजवान अपना ज़्यादातर समय लाइब्रेरी में गुज़ारता है। 

 

लाइब्रेरी की विशाल ज़मीन पर मुंबई के लैंड माफ़िया की काली निगाह है। बसरमल को बार-बार मौत की धमकी मिलती है, जिनसे वह इतना परेशान है कि चिंतन के अपने संक्षिप्त क्षणों में एक दिलचस्प निष्कर्ष निकालता है। वह कहता है, दूसरे देशों पर हमला करने वाले इतिहास के तमाम राजा दरअसल राजा नहीं, लैंड माफ़िया थे, जिनका एकमात्र लक्ष्य दूसरों की ज़मीन पर क़ब्ज़ा था। अपनी धुन का पक्का बसरमल हार नहीं मानता और अपनी ज़मीन माफ़िया को देने से इंकार कर देता है। वह कहता है, यह ज़मीन मेरे बच्चों की है। वह अपनी किताबों को अपने बच्चों की तरह मानता है। 

 

किताबें ‘सिमसिम’ में एक बड़ी भूमिका निभाती हैं। यह उपन्यास किताबों को समर्पित एक शोकगीत है। उपन्यास में एक चरित्र की तरह उपस्थित एक बातूनी बुक-कवर के तीन चैप्टर्स को पढ़कर अनिता की यह बात बिल्कुल सही जान पड़ती है। जब लाइब्रेरी में कोई नहीं होता, यह बातूनी बुक-कवर पाठकों को किताबों की यात्रा और पीड़ा की मार्मिक कहानियां सुनाती है। वह कहती है- “मैं किताब हूँ और मैं यह बात अच्छे-से जानती हूं कि मनुष्यों के सबसे पुराने पुरखे की कहानी को मैंने ही बचाया है। लेकिन क्या कोई जानता है, इस दुनिया की पहली किताब कौन-सी थी? वह बची भी या नहीं।” 

 

‘सिमसिम’ में एक मार्मिक दृश्य है, जिसमें चांदनी रात की रोशनी खिड़की से झरते हुए लाइब्रेरी की फ़र्श पर बिखरी हुई है और सारी किताबें एक-दूसरे का हाथ पकड़कर नाच रही हैं। बुक-कवर इस बात को रेखांकित करती है कि हर वर्ग ने किताबों से कभी न कभी दुश्मनी निकाली है- “दुनिया का ऐसा कोई कोना नहीं है, जहाँ किताबें न जलाई गई हों। कभी किसी मस्जिद का मुल्ला किताबों को जला देता। कभी किसी चर्च का पादरी, तो कभी किसी मंदिर का महंत। सैनिकों ने जलाया। नेताओं ने जलाया। सेठों ने जलाया। ग़ुलामों ने जलाया। कार्यकर्ताओं ने जलाया। नात्सियों ने जलाया। उनका विरोध करने वाले कम्युनिस्टों ने जलाया। उनका विरोध करने वाले लोकतंत्र-समर्थकों ने जलाया। आतंकवादियों ने जलाया। आतंकवाद का विरोध करने वालों ने जलाया।”

 

गीत भाषा के साथ अपने रचनात्मक प्रयोग के लिए जाने जाते हैं। ‘सिमसिम’ का मूल स्वर हानि-बोध, अवसाद और करुणा का स्वर है। यही उनकी भाषा को सांगीतिक बनाता है। विध्वंस और हिंसा की आंधी में ‘सिमसिम’ प्रेम की मद्धम लौ को संजोने का आख्यान है। किताब में एक जगह गीत कहते हैं, ‘इस दुनिया को प्रेम बचाता है। इस दुनिया को प्रेम की स्मृति भी बचाती है।’

 

बसरमल की पत्नी जालो किताब में थोड़ी देर के लिए मौजूद है, लेकिन उसके व्यक्तित्व का जादू देर तक महसूस होता है। आरंभिक हिस्से में वह एक चंचल युवती है, लेकिन अंत में वह एक ख़ामोश बुढ़िया है। किसी को नहीं याद कि कितने बरसों से उसने किसी से कोई बात नहीं की, सिवाय अपने प्लास्टिक के गुड्डे के। वह उस बच्चे की माँ है, जो इस संसार में कभी आया ही नहीं।

 

 ‘सिमसिम’ के चरित्र हमारे आसपास के साधारण लोग हैं, लेकिन वे अपनी उपस्थिति में यादगार और असर में मार्मिक हैं। अपने समूचे प्रभाव में ‘सिमसिम’ कई किरदारों द्वारा बजाई गई सिम्फ़नी है, स्मृति की रेत पर गद्य की टहनी से उकेरी गई कविता है। पाकिस्तान से भारत आए सिंधी हिन्दुओं की त्रासदी जैसे अनछुए विषय को विचारोत्तेजक, प्रयोगधर्मी और ग़ैर-पारंपरिक शैली में लिखना, उपन्यास के क्षेत्र में एक नई ज़मीन तोड़ने जैसा है।

 

पुस्तक : सिमसिम

लेखक : गीत चतुर्वेदी

प्रकाशक : हिन्द युग्म

मूल्य : रु. 249

 

(समीक्षक आशुतोष कुमार ठाकुर बैंगलोर में रहते हैं. पेशे से मैनेजमेंट कंसलटेंट हैं और कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल के सलाहकार हैं.)

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