Advertisement

यादें: एक उड़नतश्तरी, 'हाथों में आ गया जो कल' और दोस्त की घर वापसी

वैसे वह दौर तो जादुई था। जब हवाओं में वायलिन बजाता कोई एक राज था और हवाओं में सूखे पत्ते, पीले फूल तैरते...
यादें: एक उड़नतश्तरी, 'हाथों में आ गया जो कल' और दोस्त की घर वापसी

वैसे वह दौर तो जादुई था। जब हवाओं में वायलिन बजाता कोई एक राज था और हवाओं में सूखे पत्ते, पीले फूल तैरते थे। चिट्ठी-पतरियों में लोगों का भरोसा था। कोई एक दीवाना राहुल भी था, जिसके आने से दुनिया का सारा तम बिखर जाता था। सिंगल स्क्रीन से उपजी बयार में महुए की मादकता तैरती थी। अलका याग्निक, कविता कृष्णमूर्ति, शानू, उदित जैसों के कंठ थे और नदीम-श्रवण, अनु मलिक, जतिन-ललित, उत्तम सिंह आदि का संगीत जीवन की बड़ी नेमत लगता था। कुछ उम्र का तकाजा था, कुछ हमारे सिनेमा की माया और बाकी का काम पर्दे के रास्ते आकर अंजली, माया, पूजा, निशा, मेघा, सिमरन सब हमारी गलियों में दिखने लगीं थी। कमोबेश सबकी यह हालत थी कि स्कूल, कोचिंग, यहाँ तक कि मेलों या शादियों में भी आंखें उस 'अज्ञात' नायिका को वैसे ही ढूँढती, अगोरती जैसे राहुल रॉय ने अनु अग्रवाल को मुम्बई की गलियों में 'जाने जिगर जानेमन ...जानम जाने जहाँ', गाकर ढूँढा था। हवा ही कुछ ऐसी थी। हमारे हीरो हर्षवर्द्धन कोई अवतारी नहीं थे, जो इस हवा से बच जाते। वह भी तो इसी जादुई दौर में नमूदार हुए थे, खालिस मानव रूप में। सिनेमची अव्वल दर्जे के थे और उनके जीवन का सत्य ही रोटी, कपड़ा, मकान और सिनेमा के आसपास निर्मित हुआ था। सो, उनका इस बयार में बचना संभव भी न था। फिर वह तो ईश्वर शुगर मिल के रहस्यमयी माहौल से हमारे बीच आते थे।

ऐसे ही जनवरी की सर्दी में एक रोज 'ऊपरी तौर पर गंभीर' छात्र हर्षवर्द्धन रोज की तरह स्कूल के लिए निकले। मिल के गेट से निकलते ही उनके आगे से तिरछा कन्नी मार जाती एक लड़की सायकिल लेकर दन्न से निकली। हर्ष बाबू व्यंग्य से मुस्कुराए - 'गज़ब! एकदम उड़नतश्तरी।'- पर पैरों ने उनके व्यंग्यात्मक मुस्कान का साथ नहीं दिया। वह भी उस उड़नतश्तरी के पीछे तनिक तेज हुए। मिल के गेट से निकली वह उड़नतश्तरी उड़ी तो सही पर रेलवे क्रासिंग से आगे नहीं जा सकी। सर्दियों के दिन था। ठंड और कुहरे की अच्छी-खासी संगत थी। मिल की ओर आते गन्नों के टायर गाड़ियों की वजह से ढाले पर बैलों के गोबर, पेशाब और ओस के मिश्रण के प्रभाव में उड़नतश्तरी धरती पर लैंड करते-करते बची। लेकिन उसके कैरियर में दबा बस्ता झुककर जमीन को सलाम कर गया और बैग की देखा-देखी अंदर के कुछ सामान भी। बैग और एकाध किताबों ने जमीन चूमकर उसके रंग में रंग गयी थी। जब तक वह संभलती, तब तक हर्षवर्द्धन बबुआ मेरे महबूब के राजेन्द्र कुमार बन सामने आ गए -

'ठीक हो! चोट तो नहीं लगी?'- अप्रत्याशित रूप से उड़नतश्तरी ने सहज ही तरीके से पर बाकायदा जवाब दे दिया - 'नहीं नहीं सब ठीक है। थैंक यू।'

किसी लड़की का किसी लड़के को बीच रोड में सहज ही जवाब दिया जाना जिले की परम्परानुसार नया था। वह अलग थी। उसने देसवाली लड़कियों की तरह पलट कर ये नहीं कहा - 'भागते हो कि नहीं। बेसी हितैषी न बनो। बुलाएं क्या भैया/ पापा को?' 

रूप-गज़ब, आँखें ओहोहो क्या कहें। हर्ष ने बिना पूछे बता दिया - 'आपको देखा मैंने। आप मिल से निकली अभी। मैं भी मिल में ही रहता हूँ। बड़े पापा ऑफिसर हैं।' - लड़की अब संयत थी। बैग और एकाध किताबें जमीन की छापी लिए बस्ते के अंदर आ गयीं थी। उसने एक उड़ती-सी नजर हर्षवर्द्धन पर डाली और एक वाक्य में दो सूचनाएँ देकर उसी सहजता से चली गयी की 'वह मिल के नए अकाउंटेंट की बेटी है और ये लोग बंगाली हैं।'- हीरो के लिए दोनों सूचनाएँ काफी थी। बुद्धि में तो वह तेनाली था ही - 'अहा! ये लोकल नहीं है तभी न हमसे बतिया ली!'- लेकिन जब लडक़ी अपने बस्ते को वापस उड़ान के लिए तैयार करते हुए कैरियर पर रख रही थी, तभी हीरो ने उसका नाम एक किताब पर देख लिया था - "'महुआ दत्ता' आठवीं 'ए', मिडिल स्कूल।"- वह मन-ही-मन बुदबुदाया - 'महुआ ! अहा !!-जिसके मद से हाथी माते यह मानुस क्या चीज है'। उस रोज उड़नतश्तरी तो फिर उड़ गई थी पर मिल वाले बबुआ यानी हमारे हीरो को बूस्टर डोज लग गया था। जब माहौल मिल में ही तो कौन रेगिस्तान सरीखे स्कूल में देर तक रुके। पर इस बूस्टर डोज की वह उस पहली रोज से ही जुड़ा हुआ था। लड़की ने उस रोज हड़बड़ी में जमीन के रसायन में लिपटा एक रुमाल भी गलती से छोड़ दिया था, जिसे हमारे मामलों में ओसीडी के पेशेंट टाइप व्यवहार करने वाले हर्ष ने ओस, बैलों के पेशाब, गोबर की परवाह न करते हुए उठाकर अपने रजिस्टर से एक पन्ना फाड़कर उसमें लपेट कर रख लिया।

'महुआ' सिनेड़ी के माथे चढ़ चुका था। वह भी उस बौराया, लहराता हुआ स्कूल पहुँचा था। अब रुमाल था, जनता सिनेमा में देखा सिनेमा 'आओ प्यार करें' भी था और उस फ़िल्म का गीत होंठों पर - 'हाथों में आ गया जो कल रुमाल आपका/बेचैन कर गया हमें ख्याल आपका"। - कई दिनों तक इस खूबसूरत हादसे को हर्ष ने सबसे छुपाए रखा पर पेट का पानी अधिक समय तक पचने को तैयार न था। सो, उसने सारा माजरा मंडली में कह सुनाया। जैसाकि सबको उम्मीद थी, ज्ञान पंकज की ही तरफ से आया था - 'अरे फेरा में न फंसना, बंगाली लोग तेज होता है।' आनंद हँसा - 'बंगाली लोग तेज होता है कि होती है? हर बात में चचा बन जाते हो बे?' - पंकज झट से पिनकता भी था। वह उलटकर बोला - 'हमसे बेसी ज्ञानी न बनो। तुम क्या जानते हो बे। कभी गोपालगंज से बाहर गए हो? आंय?- आनंद भी चूल्हे पर चढ़ा चाय का पतीला था। उसको क्षणिक ताप आया था पर पंकज ने 'आंय' के साथ उसके चूल्हे की नॉब कम कर दी। ताप बैठ गया और आनंद कुनमुनाकर चुप हो गया। पर इन सब ठिठोलियों से इतर सच ये था कि हमने उस रोज से हमने अगले चंद हफ्तों के लिए अपने साथी हर्षवर्द्धन को खो दिया था। वह भी उन दिनों में अपने नए बांग्ला साथी से मिल के कैन्टीन से मोटी चिनिया जलेबियाँ खरीदते, अंदर के साह जी के किराने से सामान लेते, पहले मुस्कान, फिर हाय, हेलो, फिर थोड़ा आगे तक परिचय में आ गए थे। ईश्वर शुगर मिल बिहार में था पर उसकी परिधि में एक कहानी आकार ले रही थी, जिसमें बंगाल थोड़ा इधर डोल रहा था, बिहार तो खैर पहले से ही लहालोट था। मिल के भीतर के कुछ हमउम्र हमस्कूल साथियों में यह 'शुरू हो रही है प्रेम कहानी' वाली हरकतें खटकने लगी थी। हर्ष उनकी तरह ही छिलका था पर बादाम होने चला था।

पर जो भी कहिए, उस रोज के बाद से वह सायकिल मिडिल स्कूल के समय पर ले जाता, अपने स्कूल में पहली कक्षा में आ जाता। पर यह भी सच्चाई है कि वह हमेशा मातल रहता था। हम सब गेट पर मिलकर सबके साथ स्कूल में जाते थे। पर हमने देखा कि बंगाल आगे निकला और पीछे से बिहार के ब्रेक हाई स्कूल से लगते-लगते मिडिल तक जाकर लगे। यह हमारी भी बेइज्जती थी। पंकज ने उसके इन लक्षणों को देख फोफी में उंगली डालते हुए कहा - 'उसको बंगाली महुआ का नशा हुआ है, चार दिन रुको बस। दौड़ के यही आएगा। केतनो पंछी उड़िहें आकास, फेर करीहे धरती के आस।'- पर हवा रंगीन थी। कब उतरेगा यह पंछी जमीन पर। हमारे भी सिनेमा को उसका स्पांसर नहीं मिल रहा था और महेश ने सायकिल की घंटियों को खोलने से मना कर दिया था।

एक रोज हर्ष वही रुमाल धोकर, इस्त्री कर लेकर हमलोगों के पास आया और बोला - 'पांड़े इस पर पेन से जैसा तुम लिखते हो वैसा थ्रीडी टाइप में महुआ लिख दो।'- दोस्त भले एलओसी के पार चला गया हो पर था तो दोस्त ही। उसके लिए हमें आगे आना ही था। तो तमाम शिकवे परे रख पेन से थ्रीडी आर्ट करके लिखा गया 'महुआ'। - यह लिखा जाना था कि पंकज की बेचैनी बढ़ गयी -'रे! हमको लगता है, सेटिंग हो गया है। मने एकदम गजब।'- यही होता है ऐरोप्लेन हर्ष बना हुआ था और दर्द एरोड्रम स्टॉफ को हो गया था।

दो और लड़के दिनेश और अतुल भी मिल से ही आते थे। अब पंकज उनसे टोह लेने में लगा। उनको भी कुछ खास पता नहीं था और वैसे भी वह मिल के कर्मचारियों के पद में वह दोनों छोटे कर्मचारियों के बच्चे थे तो हर्षवर्द्धन तक उनकी पहुँच उतनी न थी। पर पंकज की महिमा थी कि यह उनको भी यह सूचना दूसरे ढंग से मिली कि मिल की फलाँ लड़की ने थ्रीडी में अपना नाम लिखकर हर्षवर्द्धन को दिया है। बस क्या था, बात एक से दो, दो से तीन वर्जन में तैरने लगी। पंकज के दिल्लगी ने दी हवा, थोड़ा-सा धुँआ उठा और मामला हर्ष के जॉनी लीवर आनंद के पहुँच से भी बाहर हो गया। और उधर मदमस्त हीरो 'वक़्त कटे नहीं कटता है, तेरे बिना मेरे साजन', 'दीवारों पे लिखा है मीनारों पे लिखा है' से गुजरता 'तुमसे कोई प्यारा कोई मासूम' पर इतराता इस दावे तक चला गया था कि 'वो आँख ही क्या, जिसमें सूरत नहीं तेरी'।-
पर इस तीन वर्जन के बिहार-बंगाल पैक्ट को स्टॉफ क्वार्टर की दीवारों के बहनापे ने भी खूब रूप दिया।उन्होंने भी चीनी की कटोरियों की उधारी-देनदारी के साथ मिल की छोटी-सी दुनिया में पसारना शुरु किया था। सुनने में यह भी आया था कि लड़की ने कोई स्लैम बुक भी हर्ष से भरवाया था। हर्ष ने इसे स्वीकारा और उसकी वजह से 'स्लैम बुक' नामक जादुई चीज से एक और जादुई शब्द हमारी देहाती डिक्शनरी में बढ़ा -'स्लैम बुक, जिसमें कुछ कुछ होता है को केटूएचटू और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे को डीडीएलजे लिखा जाता है। दुनिया कहाँ से चली गयी और हम कुमार शानू में ही अटके हुए हैं। हद है। सोचो हमलोग कंपटीशन में कहाँ हैं भाई?'- हर्षवर्द्धन आगे निकल रहा था और उस रोज तो एक पल के लिए आनंद डिप्रेशन में जाते-जाते बचा था।

इन दिनों 'हम तेरी मोहब्बत में यूं पागल रहते हैं' और उसके चाल-चलन उर्फ प्रेम कहानी में सच कितना था, यह तो मालूम नहीं पर वह किस्सागो बढ़िया हो गया था। वह अब कैप लगाकर स्कूल में अयूब खान बना फिर रहा था - 'खूबसूरत है वो दिल का मेहमान है/मेरे महबूब की यही पहचान है।'- मिजाज में शायर समाया हुआ था और ऐसे में ही आदमी जमीन से बित्ता भर ऊपर चलने लगता है। और महुए का माते मन का उबाल चंद हफ़्तों में ही 'तू शायर है, मैं तेरी शायरी' टाइप तिलंगी हुआ पड़ा था। पर मिल वाले गुलेल-चमेल अतुल-दिनेश से पंकज की नजदीकियाँ गहरे खतरे का संकेत थी। उसने हमारे टटका 'अयूब खान' के स्लैम बुक का लोड लिया हुआ था। बमुश्किल उसको पता चला कि स्लैम बुक? वह तो केवल गुलाबी, लाल रंग का कॉपी होता है और वह 'चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतरकर' टाइप गीतों या चवनिया शायरी से भरा रहता है।' पर हमारी सूचना के हिसाब से वह इसके बाद एक शाम मिल में घुसता दिखा था और अगले दिन पूछने पर उसने कहा कि हर्ष के भैया से कुछ समझने गया था।

यह उसी साँझ को स्पष्ट हो गया कि वह समझने गया था कि कुछ समझाने।

हर्ष के बड़े भैया के अगले रोज ही उसको छत पर एक कम्बल की रखवाली में पकड़ा था। वह इतवार की सुबह थी और उड़नतश्तरी अपने हिस्से से ऊपर छत पर कम्बल को धूप दिखाने आयी। मौके पर हर्ष ने अन्दाज़ा लगाया - 'शाम को कंबल लेने वही तो आएगी।'- बस हिसाब-किताब पक्का हो गया। उसने शाम को छत पर मिलने की सोची और तय समय पर ऊपर पहुँचा। लेकिन प्रेमीजनों की खुशियाँ लोगों के बुरी नज़र से कब बची है! उस दिन चार बजे हमारा हीरो छत पर किताब लेकर बैठा और सवा चार बजे दिनेश कहीं से आकर 'क्या हाल है? सोचे तुमसे मिलें' के साथ चिपक गया। वह इधर के रिहाइश में आता नहीं था। पर आज ! हर्ष को चिढ़ तो बड़ी हुई पर क्या किया जा सकता था। महुवे के गंध से तो सारा माहौल गमक रहा था। बस एक संतोष की बात थी कि वह 'स्लैम बुक' हर्षवर्द्धन ने भरा था तो उसका उत्साहित और कॉन्फिडेंस अधिक था। यह 'हेड या टेल प्यार मोहब्बत दिल का खेल' तो बाद में होना था। बस यही कॉन्फिडेंस (ओवर) था कि हर्ष बाबू दिनेश से बोल पड़े - 'अभी तक कंबल लेने कोई नहीं आया, ओस पड़ने लगी है। सब भींग जाएगा। अंधेरा घिरने लगा।' - जवाब दिनेश से नहीं, पीछे से आया - 'वह नहीं आएगी। सबको पता है कि आप उसकी रखवाली में हैं और ये बताओ दिन में तो पढ़ नहीं पाते हो, अंधेरे में कैसे पढ़ने की सूझी बबुआ?"- हीरो पीछे मुड़ा तो पाया भैया खड़े हैं। दिनेश खिसक लिया था। मामला उल्टा पड़ गया था या नायक बड़ी साजिश का शिकार हुआ था? बाद में, पता लगा स्लैम बुक में 'व्हाट्स योर फेवरेट फ़िल्म' में 'केटूएचटी', 'डीडीएलजे' जैसे गूढ़ कूट डिकोड किये जा चुके थे। भैया से पंकज की शाम वाली मीटिंग रंग लाई थी।

छत से नीचे आने के पहले पंद्रह मिनट में यह पता लगा गया था कि उधर दो दीवार बाद स्लैम बुक भी शहीद हो चुका है। हर्ष को अपने देखे तमाम फिल्मी संघर्ष हवा होते लगे। वह कौन-सी दुनिया है जहाँ लोग 'जब-जब प्यार पे पहरा हुआ है/प्यार और भी गहरा हुआ है'- वाली फिलॉसफी में जीते-मरते हैं। हद है, अगर उसको सनी देओल वाली इच्छाशक्ति विरासत में नहीं मिली होती तो वह भैया के इस प्रचंड रूप के बाद कब का किसी कोने में बिसूरता 'तूने जमाने ये क्या कर दिया, लौ को दिए से जुदा कर दिया'- गा रहा होता। हीरो को जरूरी डोज के बाद, स्टडी टेबल पर बैठाया जा चुका था। लेकिन जैसाकि सत्य के होते हैं वैसे ही इस किस्से का एक पहलू अभी बाकी था क्योंकि बिहार में अभी तूफान के झोंके थमे ही थे कि बंगाल वाले दीवार को पार करके अकाउंटेंट दत्ता साहब घर में आ गए। वह बैठक में पिताजी के सामने आए और हर्ष के कान बैठक में चले गए। उसके मन ने पूछा - 'उधर क्या हुआ?' कैसी है वह? क्या उसको भी...' - तब तक बड़े पापा की आवाज़ गूँजी - 'बताओ अब यही करेगा यह। लड़की खुद कह रही है मैं तो बस पड़ोसी के नाते बतियाती... उसका तो स्कूल भी अलग है।'- अवक्ज़ अब अंदर आयी '...क्या बबुआ कहीं चैन से रहने दोगे कि...'- बड़े पापा बोलते रहे, भैया उसमें चटनी लगाकर स्वादानुसार चटक करते रहे।'- फिर ये तूफान कई दिनों तक हर जायज़-नाजायज़ मौके-बेमौके उठता-शांत होता रहा। अकाउंटेंट साहब किसी और मिल में तबादला ले गए थे। एक कहानी के रुप-आकार लेने से पहले ही चंद हफ्तों में ही उसके पन्ने बड़ों ने फाड़ दिए थे स्याही सूख ही गयी थी। पंकज को देख हमें लगता 'ऐसा भी देखो वक्त जीवन में आता है/अच्छा खासा दोस्त भी ...'- हाँ! स्टाफ क्वार्टर में एक नई इमेज बन गयी थी, उसका कोई खास फर्क तो नहीं पड़ा पर हीरो की खाल थोड़ी मोटी जरूर हो गई थी। मिल में आये इस तूफ़ान से हमारे ग्रुप में हलचल ना हो ऐसा भला हो सकता था। असल मौक़ा तो पंकज को ही मिला था। बाबा पंकज पूरी बेशर्मी से ज्ञान लेकर मौजूद थे - ' बंगाल के फेरा में बोले थे नहीं पड़ने को। बन गए न भेड़ा?'- झुके कंधे क्या कहते। महुआ चू गया था और उड़नतश्तरी क्रैश। उस रोज पंकज का ज्ञान लंबा गया । वह विज्ञान में भी काम भर ठीक था और वह विश्व की दस कुख्यात महिलाएं, बीस चमत्कार, चालीस आश्चर्य टाइप कचहरिया/फुटपाथिया किताबें खूब पढ़ता भी था। उसने आगे एक रोज ज्ञान दिया -'वैज्ञानिकों की नज़र में उड़नतश्तरी जैसा कुछ होता नहीं है। हालांकि कई देशों में इस तरह का दावा जरूर है पर वह होता भी है, इसको पक्के रुप में हम अभी कह नहीं सकते।'- उड़नतश्तरी वाला मामला तो आया-गया हो गया था पर इस स्थापना पर हर्षवर्द्धन ने ही नहीं हम सबने भी उसको घूरकर देखा। पंकज दाँतों के बीच मूंगफली तोड़ते हुए बोला - 'हाँ भाई सच ! बै!! अब तुमलोग मानेगा ही नहीं।'- वैसे हमारा तो कोई स्टैंड नहीं था पर हर्षवर्द्धन के लिए तो उड़नतश्तरी वहम ही हो गया था। वह क्यों न मानता। पर उस भैया वाली घटना के बाद हमने पाया कि वह हफ्ते भर तक फिल्मी गीत नहीं, ग़ज़ल हुआ पड़ा था - 'इतना टूटा हूँ कि छूने से बिखर जाऊँगा/अब अगर और दुआ दोगे तो मर जाऊँगा।'- लेकिन वह टूटकर क्या बिखरता अगले हफ्ते ही आदतन सनी देओल हुआ और गुलेल-चमेल ने बताया कि उसने कयामत के अगली शाम ही उड़नतश्तरी की सायकिल को रोककर थ्रीडी लिखाई वाला रुमाल फाड़कर उसके सामने फेंक दिया था। ईश्वर शुगर मिल के जेनरल स्टोर के पास रुमाल पर दर्ज थ्रीडी महुआ, म- हु-आ हुआ पड़ा था । पर हमें क्या, दोस्त की घर वापसी हो गयी थी। आनंद के हिसाब से पंकज उस घटना में दोस्त था कि दुश्मन यह तो हर्षवर्द्धन ही सही- सही बता सकता है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं)

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से