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यादें: सिंसियर लड़का, ब्रूटस मामा और 'दिल तो पागल है' से 'इसे समझो ना रेशम' का सफर

मन का क्या है, किसी भी मौसम में मचल सकता है । दिल का क्या है बेवजह भी गुलाटियां भर सकता है। पंकज का मन...
यादें: सिंसियर लड़का, ब्रूटस मामा और 'दिल तो पागल है' से 'इसे समझो ना रेशम' का सफर

मन का क्या है, किसी भी मौसम में मचल सकता है । दिल का क्या है बेवजह भी गुलाटियां भर सकता है। पंकज का मन ग्यारहवीं में ही मचला और दिल ग्यारहवीं में ही धाराशायी भी हुआ। दसवीं के पहले हादसे के बाद जब पंकज मैट्रिक सर्टिफिकेटधारी हुआ तो उसके बाबा ने कहा - "अब तुम गोपालगंज में नहीं पढ़ेगा। यहाँ का सब संगत संघतिया छोड़ो वरना आईआईटी तो छोड़ो आईटीआई में भी एडमिशन नहीं मिलेगा। फिर छीलते रहना प्याज़।"- बाबा कोर्ट में ताईद थे और उनकी दुनियादारी की समझ पंकज से कम-से-कम बीघा भर अधिक थी। उनके ऐसा कहने के पीछे वजह भी थी क्योंकि पंकज ने दसवीं में जो रंग दिखाए थे, उसके परिणाम ने घर में चिंता दे दी थी। वह दसवीं में फेल हो गया था। जबकि वह अंधों में काना राजा ही सही पर वह हमारे ग्रुप में पढ़ने में बढ़िया था। यहाँ तक कि वह अपने चाल-चलन-व्यवहार से भी स्कूल के एकाध शिक्षकों से 'सिंसियर' होने का टैग हासिल किए हुए था। सुधांशु सर ने एक रोज हमारे सामने ही कहा - "तुम सिंसियर छात्र हो,फिर इन चकोड़ा सबके साथ क्यों रहते हो?"- सर तो चले गए पर हर्षवर्द्धन ने पंकज को लपेट लिया - "अच्छा हुआ दो-चार और टीचर लोगों ने सिंसियर नहीं कहा। वरना तुम्हारा नाम बदलना पड़ जाता बेटा- पंकज कुमार सिंसियर।"- सब चकोड़े हँस दिए। 'सिंसियर' पंकज चिढ़ कर रह गया था।

उस समय दसवीं में एडवांस मैथेमेटिक्स ने बहुतों की लुटिया डुबोई थी। कई छात्र के.सी. सिन्हा को ढूंढ रहे थे कि काश! कहीं मिल जाते सिन्हा जी फिर बताते। एलिमेंट्री मैथ कम था, जो यह एडवांस मैथ पढ़ना पड़ा। तो निन्यानबे फीसदी छात्र लटके एडवांस मैथ में और सिंसियर पंकज डूबे संस्कृत में। बिहार बोर्ड के इतिहास में यह अकेला कैंडिडेट रहा होगा, जो संस्कृत में फेल हुआ। खैर! दूसरी बार के दसवीं में उसने गुड फर्स्ट डिवीजन पाया और बाबा ने तय किया कि उसका दाखिला मुजफ्फरपुर के प्रतिष्ठित कॉलेज में होगा। कतालपुर देहात का लड़का मुजफ्फरपुर गया। उसका तो पता नहीं पर परिवार का लक्ष्य स्पष्ट था, आईआईटी। वैसे भी हमारे यहाँ परीक्षा परिवार ही देता है और लक्ष्य भी वही तय करता है।
मुजफ्फरपुर गोपालगंज से क्षेत्रफल में ही बड़ा नहीं था बल्कि हर लिहाज से भी बड़ा था। विद्यार्थी जी तो अटल देहात से दूर इतने बड़े शहर में डेरा लेकर रहने आ गए थे। साथ में उनसे उम्र में पसेरी भर बड़े मामा भी रहने आए। उनका दाखिला भी उनकी प्रतिभा अनुसार उसी कॉलेज में इंटर आर्ट्स में हुआ था। मामा भांजा सेन रेले की साइकिल पर बैठे कॉलेज आते-जाते। इस शहर में फ़िल्म देखने, घूमने, पढ़ने हर तरह की आज़ादी थी। डी.ए.वी. गोपालगंज के पुराने सिनेमची के लिए यहाँ सिनेमा हॉल के भी कई विकल्प मौजूद थे। बड़े शहर आकर पंकज ने ग्यारहवीं में 'सिंसियर' होने का भरपूर परिचय दिया। ग्यारहवीं के शुरू के तीसरे-चौथे महीने में ही उसने अपने शिक्षकों में यह धारणा स्थापित कर दी कि वह एक सिंसियर लड़का है। पर अभी इस नए और बड़े शहर में वह ढंग से समाए भी नहीं थे कि कॉलेज में 'उसका' आना हुआ। 'उसका' एडमिशन पहले से था, किन्हीं वजहों से क्लास में एंट्री देर से हुई। अब तक तो सब ठीक था पर 'उसके' ममता कुलकर्णी कट बालों का असर ऐसा हुआ कि पंकज कृष्णा टॉकीज में देखी उस फिल्म का गीत बन गया - "तुमको देखा और हो गया दुनिया से बेगाना मैं"- उम्र के हिसाब से यह स्वभाविक भी था। अब तक उसने इस शहर में पंकज ने मौके-बेमौके ग्रीटिंग कार्ड लेन-देन और वैलेंटाइन डे जैसे त्योहारों का अतिरिक्त ज्ञान भी ले लिया था। पर मन के भीतर बैठा कतालपुर आगे बढने नहीं देता था। हालांकि पढ़ने में उसकी धाक जमी हुई थी।

वैसे यह गोपालगंज नहीं था, जो क्लास की लड़की चुपचाप टीचर के साथ ही एंट्री-एक्जिट करती। यह बड़ा शहर था। यहाँ लड़कियाँ सशक्त थीं। एक रोज 'उस' लड़की ने फीजिक्स के क्लास नोट्स उसको रोककर मांग लिए - "हलो, सुने हैं कि आपके पास सब क्लास नोट्स है। क्या आप टी. एन. सिंह सर के फिजिक्स और हुलास बाबू के केमेस्ट्री के नोट्स दे देंगे। हम लेट आए हैं तो सब छूट गया है।"- नोट्स!!- पंकज सिंसियर लड़का था, छूटते ही बोला - "कल एकदम दे दूँगा।"- उस रोज मामा कॉलेज में छूट गए । डेरे जाते रास्ते भर पंकज ने सेन रेले को सीट पर बैठकर नहीं, लहरिया कट स्टाइल में चलाया। टेबल के पास के रैक से नोट्स निकाले, बैग में डाला। उधर बगल वाली खिड़की से गीत बज रहा था - "चाँद ने कुछ कहा, रात ने कुछ सुना/तू भी सुन बेखबर, प्यार कर"। पंकज ने बिस्तर पर लेट कर करवट बदल ली। होंठों की मुस्कान चौड़ी होती कि मामा ने इंट्री ली - "आज किस दुनिया में थे बबुआ, हमको छोड़कर अकेले ही चले आए? अब चाय वाय पिलाओगे कि ऐसे ही पसरे रहोगे?"- पंकज उठा स्टोव पर सॉसपैन में पानी डाल कर चढ़ा दिया। मुस्कान और सुरहुरी कम न होती थी और आज तो पड़ोसी भी गज़ब ढाए हुए था। उस पार अगला गीत बज रहा था -"मेरे दिल जिगर से गुजरी है एक लड़की इधर से गुजरी है"। चाय पीकर मामा आदतन बाहर टंडेली काटने चले गए थे।

अगले रोज पंकज ने नोट्स दिए लड़की ने लिए और चली गयी। जिस जगह से वह आया था वहाँ यह बड़ी बात थी। अब तक उसका जीवन लड़कियों से बात करने में रेगिस्तान था, पर उस रोज उसका दिल पुरकस हरियाली ओढ़कर उन्हीं नोट्स में ही कहीं घुसकर लड़की के साथ ही चला गया । दिन बीते, हफ्ता बीता, पाक्षिक हुआ,महीना बीता, लड़की न आयी। उधर पंकज का सिन्सियर मन "आँखों में नींदे ना दिल में करार मोहब्बत भी क्या चीज" हुआ पड़ा था। पूरे डेढ़ महीने बाद नोट्स वापिस मिले। पर आश्चर्यजनक रूप से इसके बाद से वह कॉलेज तो आती रही पर अब वह पंकज से बतियाना तो दूर उसकी ओर देखती तक न थी। हालांकि मुखामुखम यह किस्सा सबमें फैल गयी थी कि पंकजवा से उसका नोट्स लेनदेन है। पंकज सबकी नजर में चढ़ गया था। इन मामलों में उसमें खुद तो हिम्मत नहीं थी पर एक बार ही सही नोट्स देकर वह लाइन में नेचुरली आगे हो गया था। लड़की उसको भले न देखे बतियाए पर पंकज की सिन्सियरिटी और कंसीसटेंसी नोट्स बनाने में बढ़ गयी थी। आखिर इंटर दो साल का है क्या पता किसी रोज...। उधर अनजाने ही पड़ोसी ने भी अपने डेक पर बजते गानों से इस एकतरफा खेती में यूरिया का काम करना शुरू कर दिया था। पर असल में आग लगी, श्याम सिनेमा में देखी गयी 'करीब' से। नाईट शो के बाद मामा के साथ डेरा लौटते पंकज को रास्ते भर साइकिल की घंटी नहीं, 'करीब' का मैंडोलिन और व्हिसिल ही सुनाई देता रहा - "ये क्या हुआ, कैसे हुआ, ये कब हुआ क्या पता/ चोरी चोरी जब...।"- समय गुजरा, अब सब पूछा पाछी करते और वह कुढ़कर रह जाता। क्या करता, पता नहीं किस नक्षत्र में उसे यह सूझी पर उसने बसंत पंचमी के महीने में एक ग्रीटिंग खरीदा, खुद की राइटिंग बदली और लिखा - " प्रिय पंकज जी, एक बात मैं अपने दिल में लिए, जाने कब से मैं...आप मुझे अच्छे लगते हैं। किसी से मत कहिएगा वरना मैं... बस आपकी... "- खुद से खुद को किसी और के नाम से लिखी चिट्ठी सपनों की अमानत की तरह तह करके एक किताब के बीच में रखी गयी। और एक जो मन था, वह 'कुछ कुछ होता है' में डूबने लगा था। उधर मामा इन दिनों में भांजे के बदलते फिल्मी टेस्ट से डिस्टर्ब थे। कहते "तुम्हारा टेस्ट मउगा जैसा हो गया है। खाली इश्क मोहब्बत का फ़िल्म देखता है। मार-पीट बिना भी कोई फ़िल्म होता है?"- पर लड़का इन सब बातों से अलग एकतरफा इश्क और खुद की खुद को की जा रही चिट्ठीबाजी में छेना का रसगुल्ला हुआ जा रहा था -"तेरे प्यार में डूब गए हैं, हम खुदको ही भूल गए हैं"। इन दिनों वह अधिक मुस्कुराता, बाल सही से बनाता और बड़ी क्रांति तो ये कि इन्हीं दिनों वह शर्ट भी 'इन' करके पहनने लगा था। मामा हमउम्र थे,बदलाव देख रहे थे पर आर्ट्स वाला होने की वजह से चुप हो जाते। वह आम जिंदगी वाले थे और हादसे हमेशा हीरो के साथ होते हैं।

लड़की और मौसम अपनी गति से कॉलेज आते-जाते रहे और पंकज के किताबों में मौसमी, मासिक, पाक्षिक और साप्ताहिक स्व-लिखित चिट्ठियाँ 'बस आपकी...' के नाम से किताबों में मन की मिठाई बन समाते रहे। इस दिनों वह खुश रहता, गुनगुनाता रहता। पर मौसमों का एक चक्र होता है। इस चक्र में एक मौसम पतझड़ भी होता है। अब तक सब ठीक था। उस रोज पंकज चांपाकल पर नहा रहा था और मामा अखबार वाले को पैसे देने के चक्कर में पंकज के विज्ञान की पुस्तकों के पन्ने पलट बैठे। दर्जन भर चिट्ठियाँ, कार्ड्स बेशर्मी से टेबल और उसके नीचे पसर गईं और उन पर पसरी मामा की नजर। मामा का हमउम्र मन भांजे के प्रति ईर्ष्या से भर गया -"इतना प्रेमपत्र ? ओह ! तो बबुआ के रंग-ढंग बदलने का कारण यह है"। आधे घण्टे में ही चौक के 'हलो जी पीसीओ एसटीडी/आईएसडी' से कतालपुर के पड़ोसी परेशान (पीपी) नम्बर पर यह खबर घर पर पहुँची - "जीजा लड़का, लड़की के फेर में फँसा हुआ है, लगता है फिर फेल होगा"- बम की तरह फूटा। अब पिताजी को आईआईटी तो क्या आईटीआई भी मुश्किल में दिखा। आर्ट्स पढ़ने वाले, बढ़िया दाल-भात चोखा बनाकर दुपहरिया में दो घण्टा पसरकर सोने वाले मामा एकाएक होशियारचंद बन गए थे। उन्होंने कार्ड चिट्ठियाँ छुपा दी थी। पंकज अगली सुबह उठा तो उसने देखा कि बाहर रिक्शे से पिताजी उतर रहे हैं। अब तक गाँव से पिताजी चावल, दाल, अचार, घी लेकर आते थे इस बार अकेले, खाली हाथ! बात क्या है? - उसने पैर छुए पिताजी ने आशीर्वाद न देकर इतना ही पूछा - "कॉलेज केतना बजे खुलता है? आज हम देखने चलेंगे कैसा पढाई चल रहा है।"- पंकज कंफ्यूज था और 'ब्रूटस' मामाजी अंजान बने हुए थे। तय समय पर पिताजी मामाजी के साथ प्रिंसिपल के ऑफिस पहुँचे और चिट्ठियों और कार्ड्स का रबड़ लपेटा बंडल टेबल पर फेंक कर फट पड़े - "क्या सिंह साहब! यही कल्चर बना रहे हैं आप? मेरा लड़का इतनी दूर से पढ़ने आया है और यहाँ एक लड़की ये सब कर रही है। इतना फारवर्ड कल्चर! आंय!! बताइये भला। "- प्रिंसिपल ने इशारे से बैठने को कहकर एक नजर में सब देख-पढ़-सुन लिया। पंकज की हवा टाइट थी। प्रिंसिपल ने पूछा - "कौन लड़की है"- पंकज ने अटकते हुए कहा- "ऐसा कुछ नहीं है सर! हम आपको सब बताते हैं..."तब तक मामा ने उगल दिया कि वह आपकी... लिखने वाली लड़की वही नोट्स लेनदेन वाली है।"- मामा बहनोई के साथ हो गए थे। उनके झटपटिया बयान पर पंकज चौंक गया - "लेनदेन कैसा वह तो एक बार ही..." पर अब बात हाथ से निकल गयी थी। अब ऑफिस में अंग्रेजी वाली सिन्हा मैडम के साथ लड़की बुलवाई गयी। पंकज के पिता की जिद पर लड़की के पिता, जो दूसरे कॉलेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर थे, उनको भी बुलवाया गया। लड़की मामले की गंभीरता को देख जोरों से रोने लगी थी। मैडम उसको दिलासा दे रही थी। सबके आँखों में कई तरह के सवाल थे। पंकज के पापा लड़कों के पिताओं की परंपरा में लड़की और उसके पिता को नैतिकता, संस्कार का ज्ञान दे रहे थे। तभी सिन्हा मैडम ने पूछा "तुम इसको जानती हो?" लड़की सुबकते हुए इंकार कर गयी। यह इंकार था कि पंकज के दिल में पिछले कई महीनों से जो मैंडोलिन और व्हिसिल बज रहा था वह नसीरुद्दीन शाह के हाथों के आगे पसरा पिआनो हो गया और कहीं दूर एक गीत बजा - "ऐ काश कहीं ऐसा होता/ कि दो दिल होते सीने में"- अब जीवन में बचा क्या? पहचानती तक नहीं उफ्फ़!! - लड़की ने अपने पापा से कहा - "पापा! आप मेरी हैंडराइटिंग चेक कर लीजिए। हम ये सब नहीं लिखे हैं। प्लीज पापा..."। लड़की के पिताजी जेएनयू से पढ़े थे, उन्होंने नोटबुक लेकर कार्ड और चिट्ठियों से हैंड राइटिंग मिलान करके प्रिंसिपल की ओर देखा और बोले - "ये मेरी बेटी की राइटिंग नहीं है। ये सरासर इस लड़के की बदतमीजी है।"- पंकज किसी को वह भाव और सिचुएशन क्या समझाता, ये मैटेरियलिस्टिक दुनिया क्या समझती। वह टूट गया था। राजफाश हुआ, सबने उसके इकरारनामे को सुन सिर पीट लिया। पिताजी का ज्ञान अब लाइन बदल कर बेटे पर आ गया और प्रिंसिपल साहब ने कान पकड़कर लड़की से माफी मांगने का फरमान सुना दिया। मामाजी कंफ्यूज थे, ये क्या हो रहा है, उसकी समझ से परे था। पंकज ने कान पकड़ कर माफी मांगी तभी बायोलॉजी वाले सर पीछे से बोले - "हद है ! इसको तो हम बहुत 'सिंसियर' लड़का समझते थे। ये तो साफे... भक्क।"- पंकज के पिताजी अब बैकफुट पर और मामाजी प्रिंसिपल कार्यालय से बाहर निकल गए थे। तभी प्रिंसिपल ने कहा - "ई कान पकड़ने से कुछ न होगा। अब तुम इससे राखी बंधवाओगे। पंकज का मन बोल उठा - "फट जाओ धरती, अब फट जाओ"- पर ऑप्शन क्या था? 'उससे' राखी बंधवाई गयी। लड़की पिता के साथ चली गयी। पंकज के पिताजी दाँत निपोरते हुए प्रिंसिपल से बोल रहे थे - "बेवकूफ है, जनबे करते हैं, गलती होइए न जाता है लड़का सब से।"- लड़का कहाँ तो मिथुन की फिल्मों से शिफ्ट होकर 'दिल तो पागल है', 'कुछ कुछ होता है' - की दुनिया में आ रहा था और कहाँ तो जमाने ने उसके एकतरफा ही सही "दिल दीवाना है/दिल तो पागल है" वाले प्यार को "इसे समझो ना रेशम का तार भैया/मेरी राखी मतलब है प्यार भैया" - से रिप्लेस कर दिया गया था। मूल कारण, आर्ट्स वाला मामा और उसकी ईर्ष्या। कृष्ण ने कंस वध कर ठीक ही किया था। लड़का इस घटना से ऐसा टूटा कि छूने से बिखर जाता। पर पिताजी ने आईआईटी का सपना देख रखा था सो बेटे को पटना के कोचिंग में दाखिला दिलाया गया। सपना जो पूरा करना था। यह बात भी है कि बाद में सिंसियर बेटे ने इंजीनियर बन वह सपना पूरा किया। आईआईटी से या छंगामल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से, क्या फर्क पड़ता है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं)

 

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