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कहानी: श्यामल सखी तेरी

किशोर चौधरी रेडियो में काम करते हैं और जिंदगी की कहानियां लिखते हैं। चौराहे पर सीढ़ियां बहुत ही चर्चित कथा संग्रह रहा है। उसके बाद धूप के आइऩे में और जादू भरी लड़की को बहुत प्रशंसा प्राप्त हुई। उनकी भाषा और कहानी को बुनने का तरीका उनकी कहानियों को खास बनाता है। उनके तीनों कहानी संग्रह हिंद युग्म से प्रकाशित हुए हैं।
कहानी: श्यामल सखी तेरी

वे लड़कियां एक नदी के दो किनारों जैसी थीं। एक किनारा धूसर था, दूसरा उजला। एक किनारा जरा गुदगुदा,  दूसरा पतला और लंबा। वे सफेद और भूरे फूलों जैसी भी कही जा सकती थीं। एक साथ उपस्थित किन्हीं भी दो रंगों में उन लड़कियों को देखा जा सकता था। जिस तरह नदी किसी जगह को दो टुकड़ों में विभाजित करती है, उसी तरह इन लड़कियों का शहर भी दो तरफ बंटा हुआ था। इस शहर को कोई नदी नहीं वरन एक सड़क दो हिस्सों में बांटती थी। ये सड़क पुराने चुंगी नाके से लेकर कस्टम के नए दफ्तर तक जाती थी। इस सड़क के दोनों तरफ बसे हुए जीवन में इन दो लड़कियों के घर भी थे। एक लड़की सड़क के इस पार रहती थी, दूसरी उस पार-सड़क के इस तरफ सफेद झाग जैसी और उस तरफ श्याम रंग के पतले कांटे जैसी लड़की रहती थी।

 

दोपहर का समय था। शहर को दो हिस्सों में बांटने वाली सड़क पर ट्रेफिक की उलटी दिशा में चलते हुए सफेद झाग जैसी दिखने वाली धवल ने साथ चल रही, श्यामल का हाथ मजबूती से पकड़ लिया। उन दोनों लड़कियों ने एक साथ अंग्रेजी में कहा, ‘ओह गॉड।’ एक बड़ी कार लगभग चूमती हुई पास से गुजर गई। तेजी से उन दोनों के हाथ एक-दूसरे के हाथ में आए। तेजी से वे अलग भी हो गए।

 

इस तरह अचानक हाथ छूट जाने से श्यामल को अच्छा नहीं लगा। काश एक और गाड़ी फिर से ऐसे ही गुजरे और उसकी दोस्त उसका हाथ फिर से पकड़ ले। वे दोनों कुछ कदम साथ चलने के बाद अलग हो गईं। अपने-अपने घर जाने के लिए सड़क के बीच से दो अलग किनारों पर चल रही थीं। ठीक उसी समय एक और गाड़ी उनके बीच से गुजरी। श्यामल को लगा कि गाड़ी सड़क के बीच से नहीं वरन उन दोनों के बीच से गुजरी है। वह गाड़ी धवल से बिछोह की धुंधली होती आखिरी छवि को भी अपने साथ ले गई। धवल अपने घर की गली में मुड़ गई थी।

 

वह एक बेकार गली थी जो बेरहमी से नब्बे डिग्री के मोड़ पर मुड़ जाती थी।

 

गाड़ी सीधे चलते हुए दोनों के बीच से निकल गई थी। ये सोचकर श्यामल को खुशी हुई कि गाड़ी धवल के उपर से न निकली और अब वह उससे दोबारा मिल सकेगी। वह गाड़ी धवल की लघुतम छवि को देख पाने में एक बाधा की तरह आई थी। मगर उसका बिना कोई नुकसान किए गुजर जाना अच्छा रहा।

 

धवल ने घर की सीढ़ियां चढ़ीं। अंदर जाने का दरवाजा खोला। एंट्रेंस के पास ही पीसी पर छोटी बहन खेल रही थी। वह किसी मूविंग ऑब्जेक्ट को निशाने साध रही थी। छोटी बहन ने कोई हरकत न की। धवल ने भी उसे कुछ न कहा। वह सीधे कपड़े बदलने चली गई। धवल ने एक धावकों वाला पजामा डाला, एक हल्का टीशर्ट पहना और कंबल में घुस कर सो गई।

 

दोपहर का समय था। गरम दिन थे। उसके पलंग के ठीक ऊपर एसी लगा हुआ था। बड़े हाल में कोई शोर न था,  सिवा इसके कि कोई चिड़िया डेस्कटॉप के स्क्रीन पर शिकार होती तो आवाज आती च्यां। इस च्यां-च्यां के सिवा चुप्पी थी।

 

धवल सुबह जब श्यामल से मिलने गई थी तब वह उसे बताना चाह रही थी कि किसी अजनबी को चुन लेना जरूरी हो गया है। क्या कोई अजनबी और सपना एक से नहीं होते। हम ऐसे लोगों को सपनों में देखते हैं, जिनको नहीं जानते। अक्सर ऐसा होता है कि उस पूरे आदमी की कोई हल्की छवि ही देख पाते हैं। या उसकी शक्ल का एक हिस्सा भर याद रह पाता है। ऐसा कम होता है जब हम किसी पूरे जाने-पहचाने को देखें। तो किसी अजनबी को चुन लेना एक सपना भर देखा हुआ। नासमझी भरा सपना।

 

श्यामल ने सुबह ही जब धवल को देखा तो खुशी से उछल पड़ी। उसने उसका हाथ पकड़ा और कमरे में ले गई। वे दोनों एक सोफे पर बैठ गई। श्यामल उससे सटकर बैठी। श्यामल का घुटना धवल की जांघ के बाहरी हिस्से को पूरी तरह छू रहा था।

 

धवल ने कहा, ‘शादी जरूरी है। किसी आदमी को चुनना ही होता है।’

 

श्यामल ने कहा, ‘तुमको क्या लगता है ये चुनाव करने कि बाध्यता किसने बनाई है। आदमियों ने या औरतों ने?’

 

‘हम सब किसी न किसी को चुनकर उसके साथ रहते ही हैं।’

 

‘आदमी किसी औरत को क्यों चुनता है?’

 

धवल कुछ नहीं कहती। वह अपने दोनों बाजुओं को बांधते हुए उसकी तरफ देखने लगती है। श्यामल भी उसी को देखती है। फिर से पूछती है, ‘क्यों चुनता है?’  श्यामल इस तरह देख रही थी। जैसे उसने उत्तर दे दिया है। जबकि उसने सिर्फ सवाल भर किया था।

 

धवल असमंजस में थी- “क्या आदमी सचमुच किसी औरत के पास आता है या ये भी एक स्वप्न भर है। एक बुरा या अच्छा स्वप्न। स्वप्न ही वह जगह है जो हमें हमारी इस भूल की ओर संकेत करती है कि भौतिक जान-पहचान का हमारा हिसाब बहुत एकतरफा है।”

 

श्यामल इसी बात का एक सिरा पकड़ना चाहती है, “जैसे कि स्वप्नों में अनजाने लोग ही सबसे ज्यादा उपस्थित होते हैं। इसी तरह आदमी को भी कोई नहीं जान सकता।”

 

“नहीं, एक से अधिक जगह पर होने में किसी एक का रोल थोड़े ही होता है”

 

“एक का नहीं होता होगा मगर धोखा तो आदमी ही देता है, वही तो छोड़कर जाता है...”

 

“औरत भी जा सकती हिया छोड़कर, वह भी धोखेबाज हो सकती है”

श्यामल कुछ समझ रही थी या उसको कोई आशंका घेरने लगी थी। खीज की ओर बढ़ने लगी, “आदमी असल में धोखेबाज होता है। मगर औरत धोखेबाज होती है तो फिर पर वो आदमी औरतों के जीवन में क्यों होता है?”

 

“मेरी बात को सुनो कि जैसे जिस व्यक्ति से हमारा लगभग न्यूनतम या न के बराबर संवाद होता है, उसे हम अपने स्वप्न में उपस्थित पाते हैं. हम ये सोचते हैं कि इस व्यक्ति से कोई वास्ता नहीं मगर वह इस अजाने संसार में निकटतम रूप में उपस्थित होता है. तो क्या जो आदमी हमारी जिंदगी में आएगा, वह पूरा हमारे साथ रहेगा? और ऐसा ही होता हो तो कई बार किसी के पूरे साथ होने पर भी कोई और सपने में क्यों आता है. भले ही थोड़ा सा भी सही.” श्यामल का घुटना अब धवल की जांघ के ऊपर था।

 

श्यामल को सब बातें उलझती हुई लगीं। वह जो बात सीधे कहना समझाना चाह रही थी उससे अलग विषय पर धवल बोल रही थी। श्यामल ने उसकी हथेली को अपने दोनों हाथों में लिया और सहलाने लगी, “औरत किसी दूसरे आदमी को नहीं सोचती। आदमी खुद चला जाने के लिए बना होता है। वह अनेक-अनेक जगहों पर आता जाता है। तो जिसके साथ हम रहते हैं, वह भी उसी तरह कहीं जाता है। कोई सबसे कम पहचान का अजनबी हमारे जीवन में कई बार आ जाता है। वो भूल से नहीं आता, ये सब आदमी जानबूझकर ऐसा करते हैं।”

 

धवल ने अपना हाथ खींच कर वापस दूसरे हाथ के साथ बांध लिया, “मेरे घर की लगभग सब औरतें किसी अनजाने पुरुष से बात नहीं करतीं। उन्होंने कभी बताया नहीं कि उनके सपने में कोई अजनबी आया था। फिर तो बहुत औरतें ऐसी हैं जिन्होंने किसी आदमी के साथ रहते हुए किसी अजनबी को न सोचा या पास न आने दिया होगा।”

 

श्यामल थोड़ी निराशा से सोफे से खड़ी हुई। उसने धवल का हाथ पकड़ा और रसोई की तरफ खींचने लगी। धवल नंगे पांव रसोई की ओर उसके साथ चल पड़ी। श्यामल ने पूछा, “कुछ गरम बनाएं?” धवल ने कहा, “चाय नहीं कॉफी।”

 

धवल ने मग हाथ में लिया। वह कॉफी और चीनी को फेंटने लगी। श्यामल ने उसके सफेद कुरते की किनारी को अपनी ऊंगुलियों से टटोलते हुए जरा सी खुशबू अंगूठे पर लपेट ली। उसकी आंखें धवल के चेहरे पर ही टिकी थी। उसने एक-दो बार दाएं-बाएं देखा। उसने अंगूठे को किसी चोर की भांति अपने होठों के पास रखा और सूंघ लिया। एक बार उसकी आंखें धीरे से बंद हुई और फिर अचानक चमक कर खुलीं, “तुमको ये जानकार आश्चर्य होगा कि दूर के रिश्ते की मेरी एक बुआ ने हर आदमी को ठोकर मार दी थी। वे अपने पापा और भाइयों से भी नहीं मिलती थीं। एक बार आदमियों की दुनिया से चली गईं तो कभी लौटकर न आईं. वे जहां रहती थीं वहां सब रिश्तेदार जाते लेकिन उस घर में उनको अकेले काम करते हुए देखकर लौट आते। किसी कि हिम्मत न होती कि उनसे बात करे या उनके घर में जाए।” ऐसा कहते हुए श्यामल के हाथ आपस में खुशी से बंधे हुए थे। वह आंखें बंद किए छत की तरफ देख रही थी।

 

श्यामल की बातें सुनते हुए धवल को कोई ख़ुशी नहीं आ रही थी। फिर भी उसे खुश देखकर अच्छा लगा। वे दोनों फिर से सोफे पर बैठ गयी। श्यामल ने ख़ुशी में अपना कंधा धवल के कंधे से सटा लिया, “कहीं कुछ है तो सही मगर वह क्या है ये अभी मालूम नहीं।”

 

“क्या”

 

“यही कि... जाने दो”

 

धवल एक खास तरह से उठती बैठती थी. उसमें हर काम के करने को लेकर सलीका था. एक चौकन्नापन. किसी ढब में बंधा हुआ बैठना, चलना और बोलना. उसके कपड़े चुनने में भी संभ्रांत होने का भाव आता था। उसके पास जींस-टीशर्ट जैसे अनेक अनेक परिधान थे। वह अक्सर उनको घर में पहनती थी। बाहर जब भी निकलती सफेद रंग का सलवार-कुरता पहना होता। चिकन का काम जिसे कहते हैं उसी सुई-धागे की कला को देखकर पहचाना जा सकता था कि ये कुरता अलग है। कल जो पहना था वह दूसरा था। ये सफेद सलवार कुरते इतने दोष रहित होते थे जैसे पहली बार पहने गए हों। उनकी सफेदी और कपड़े का नयापन सबका ध्यान अपनी ओर खींच सकते थे। जब वह श्यामल के पास पहली बार आई थी तब भी उसने ऐसा ही सलवार कुरता पहना हुआ था।

 

उसे समाजशास्त्र के नोट्स चाहिए थे। उसकी प्रोफेसर मेम ने श्यामा सिंह का पता दिया था। एक साल सीनियर है। फलां जगह रहती है। बड़ी अच्छी सी लड़की है। मेम ने फोन नंबर भी दिए थे। लेकिन जब फलां जगह रहने का मालूम तो उसे खूब आश्चर्य हुआ कि पड़ोस में सड़क पार रहने वाले इस परिवार के एक भी आदमी औरत को वह नहीं जानती थी।

 

धवल ने डोरबेल बजाई। दरवाज़ा खुलते ही धवल ने देखा कि सामने एक थोड़े गहरे रंग की बड़ी आंखों वाली दुबली सी लड़की खड़ी थी। धवल ने पूछा, “श्यामा सिंह.” श्यामा “हां” कहकर उसे देखती रह गई। धवल ने अपना हाथ आगे बढाया, ‘मैं सुहानी जिंदल हूं। आपसे फोन पर बात हुई थी. इसके पल भर बाद वे दोनों दोस्त हो गयी थी. हर जगह साथ दिखाई देती थी. उनकी सुबहें और शामें एक साथ होती थी।

 

उनमें से किसने, किसे अपनी तरफ खींच लिया थे ये कहना कठिन था. धवल में क्या खास था, ये उसकी दिनचर्या से नहीं जाना जा सकता था. वह सुबह जागती, नाश्ता करती, कोई किताब पढ़ती और फिर नहाकर सो जाती थी. दोपहर बाद जागती तब दिन का भोजन करती और शाम ढले अपने कम्प्यूटर पर कुछ एक मामूली चीज़ें देखतीं. ये कोई खास काम न था. उसने कुछ एक वेबपन्नों पर अपनी उपस्थिति बना रखी थी. उन पन्नों पर अनजाने लोग आते थे और कुछ लिख-पूछ कर चले जाते थे. वह कुछ एक को जवाब देती थी. ज्यादातर को कोई जवाब नहीं देती. उसके पास कई सारे अनुत्तरित संदेसे बरस भर से पड़े थे. उन पर नए अनुत्तरित संदेसे चढ़ते जाते. वह कभी-कभी गोरे लड़कों को देखा करती थी. बर्फ के देशों वाले गोरे लड़के. कुछ को वह संदेसे भेजती और कुछ को सिर्फ देखती. रात का भोजन करके वह फिर से उसी अपने बिस्तर में घुस जाती.

 

श्यामल के आने से ही उसका कहीं बाहर निकलना होता था. इसके सिवा बिस्तर के पास की बंद पड़ी रहने वाली खिड़की में नावेल रखे होते. पांच-सात सौ भूरे पन्नों की उस दुनिया में वह नियम से प्रवेश करती और कुछ घंटों बाद बाहर आ जाती थी. घर के लोग जब किसी पार्टी में जाते तब वह ज़रूर बाहर जाया करती थी. उसी सफ़ेद परिधान में.

 

कुछ रोज़ पहले दोपहर की तन्हाई में धवल और श्यामल के पास कोई न था. उपन्यास के किसी पात्र से चलती हुई चर्चा आत्मा और रूह पर आ गयी. धवल ने कहा कि उसे लगता है रूह जैसी कोई चीज़ होती है. वह सबकुछ जो होता है और जिसके कारण समझ में न आये, वह रूह का किया होता है. हम जिसे गलत समझते हैं, उसी से बात करने को कौन उकसाता है? वह हमारी रूह ही होती है. श्यामल ने जब ऐसी बातें सुनी तो कहा कि तुम मेरी रूह सा प्यारा बच्चा हो. मैं अक्सर डर जाती थी कि सिर्फ मैं ही ऐसा सोचती हूँ. हमें ये मान लेना चाहिए कि वह व्यक्ति जो हमारे साथ हैं असल में कहीं और भी होता है. मगर हमारी समझ सिर्फ भौतिक उपस्थिति को चीन्हती है. हम उस उपस्थिति को कभी चीन्ह नहीं पाते हैं जो चेतन मन के दूसरी ओर दर्ज़ हुई है.

 

उस दिन वे दोनों खूब खुश रही थी.

 

उनका रिश्ता रेत जैसा कोमल था. रेत तलवे नहीं छीलती मगर उसपर आगे बढ़ने में अधिक परिश्रम करना पड़ता है. वे दोनों जिनके बारे में बातें करती थी वे आदमी पहाड़ की तरह सख्त थे. उन पर आसानी से कदम जमाकर आगे बढ़ा जा सकता था किसी भी आदमी के साथ होना पहाड़ पर चलने जैसा ही था कि बहुत जल्दी पैरों के तलवे कच्चे पड़ जाते. वे आगे बढ़ने से रोक लेते. 

 

उन दोनों सखियों की बातों में वस्तुतः जो कुछ भी था, वह दुधारू था. उसकी दो परतें थी. उसके दो परिणाम थे. इकहरा कुछ नहीं था. सुबह धवल जो बात करने गयी थी वह कह न पाई. आदमियों के प्रति श्यामल के दृढ विरोध को देखते हुए बात को टाल दिया. धवल ने घर पहुंचकर श्यामल को फोन किया. उससे कहा कि वह यहाँ आ जाये. श्यामल भी चिंतित थी कि कुछ बुरा होने को है इसलिए वह किसी भी तरह धवल के पास जाने का बहाना सोच ही रही थी. इस फोन के आते ही वह प्रसन्न हो गयी.

 

श्यामल जब घर पहुंची तो वहां उसको कुछ तस्वीरें दिखाई. एक सुन्दर लड़के की फोटो स्टूडियो में खींची हुई तस्वीरें थी. उसके बाल से लेकर जूते तक चमक रहे थे. चेहरे पर लाली थी. आँखों में शरारत थी. श्यामल ने जैसे ही तस्वीरें हाथ में ली उसके चेहरे का रंग ज़र्द हो गया. लेकिन उसने कुशलता से ऊँची आवाज़ में बोलना शुरू किया.- “ओह वाव, ये वाला मुझे दिला दो कोई.” उसने दो तीन बार धवल और उसकी छोटी बहन के सामने एक आँख मिंची.

 

धवल की मम्मी आ गयी.- “बेटा कैसा लग रहा है?”

 

श्यामल चहक कर बोली- “विनोद खन्ना लग रहा है. लाइफ बन जाये टाइप...”

 

जब श्यामल इस तरह का रिएक्शन दे रही थी तब धवल उसे हैरत से देख रही थी. आज सुबह ही श्यामल ने कहा था, वह बुआ की तरह रहेगी. आदमी जात गन्दी होती है. उनको कभी अपने पास न फटकने देगी. अब वह खुश होकर चहक रही थी. धवल का जी उदास हो गया. वह उसकी सबसे अच्छी नहीं वरन इकलौती दोस्त भी थी.

 

लड़के के फोटो वहीँ पलंग पर बिखरे रहे. श्यामल वापस अपने घर चली गयी और धवल कम्बल ओढ़कर सो गयी.

 

घर लौटते हुए श्यामल ने एक धमाका सुना. ये कोई धमाका न था. ये किन्हीं दो चीज़ों के टकराने और फिर बिखर जाने की आवाज़ थी. श्यामल का जी घबरा उठा. ये अगर दो के आपस में टकराने और फिर बिखर जाने की आवाज़ है तो वे दोनों भी तो दो ही हैं. क्या वे आपस आपस टकरा गयी हैं? और एक दूजे से दूर बिखरती जा रही हैं.

 

श्यामल, पल में जिस सदमे में आई थी पल भर में उससे बाहर भी आ गयी.

 

उसने हादसे वाली जगह पर एक आदमी को देखा तो उसे लगा कि ये वही जाता हुआ आदमी है. आदमी जो किसी को छोड़ जाते हैं. श्यामल के मन में जाते हुए लोगों की एक छवि थी जो उसे भयभीत करती थी. उसने दो लोगों को इस शक्ल में देखा था. एक बार अपने पिताजी को देखा था. वे माँ के रुक जाने के निवेदन ठुकराकर वे सीढियाँ चढ़कर ऊपर चले गए थे. जैसे ही माँ को मालूम हुआ कि सामने के कमरे में बेटी जाग रही है तो वे एकदम चुप हो गयी और घर में रात का सन्नाटा बिखर गया. कमरे से माँ की आवाज़ आना बंद होने के बाद घर भयावह अँधेरी गुफा हो गया था. दूसरी बार पड़ोस में एक आंटी और किसी आदमी को तहमद के लिए खींचतान करते हुए. उस खींचतान के बाद आदमी चुप था और आंटी रुआंसा. वह तहमद वाला आदमी खिड़की के पीछे कहीं खो गया था और देर तक दिखाई नहीं दिया था. 

 

धवल के घर से लौटते हुए श्यामल ने सोचा कि जो टकराकर बिखर जाने की आवाज़ उसने सुनी है वह पूर्व निर्धारित थी. क्या ये कोई ईश्वरीय संकेत है कि जल्दी ही कोई छोड़कर चला जाने वाला आदमी आएगा और धवल उससे दूर हो जाएगी.

 

श्यामल हांफने लगी.

 

वह जल्दी से अपने घर पहुँच जाना चाहती थी. सड़क से पचास कदम दूर अपने घर तक पहुँचने के लिए श्यामल खुद को घसीट रही थी. जैसे उसके बदन में किसी ने पत्थर भर दिए थे. इसी सड़क पर रेडियो की दूकान से लेकर स्कूल के पिछवाड़े तक उसको जाना था. इस दूरी के ठीक बीच में एक प्याऊ थी. श्यामल को लगा कि उसे बहुत सारा पानी चाहिए. वह प्यासी है. उसे फिर से नासमझी ने घेर लिया कि अगर वह पत्थर की हो गयी है तो पत्थरों को पानी कहाँ चाहिए.

 

वह प्याऊ अपने गौरवशाली अतीत के साथ पुण्य के घमंड में सीधे तनी हुई खड़ी थी. लड़की ने उसके पास पहुँचते ही सोचा कि वह स्वर्ग नरक के बीच आखिरी दुनियावी चीज़ के पास है.

 

एक कुत्ते की लंबी हूक ने फिर से उसे डराया. श्यामल को कुत्ते का रोना किसी अनिष्ट के निकट आते जाने की चेतावनी की तरह लगा. इसी चेतावनी से घबरा कर या उससे सहमती जताते हुए कई कुत्तों के छोटे स्वरों की जुगलबंदी सुनाई दी.

 

उसने प्याऊ के पास से दौड़ लगायी. उसने अपने घर का दरवाज़ा खटखटाया. अन्दर से कोई आवाज़ न आई. श्यामल का डर बढ़ता ही गया. उसने किसी प्रेमी के बाँहों में कूद जाने की तरह दरवाजे में पनाह लेनी चाही मगर दरवाज़ा अंदर से बंद न था. दरवाज़ा खुला और वह आँगन में गिर पड़ी. जब आँख खुली तो पाया कि कुत्ते शांत हो गए थे. अब कोई एक दो आवाज़ें रह-रहकर आ रही थीं. वे आवाज़ें सिर्फ उन कुत्तों के होने भर का संकेत थी.

 

श्यामल ने अपनी ताकत जुटाई और वह आगे अपने कमरे की तरफ गयी. उसने तुरंत कमरे का दरवाज़ा बंद किया. दरवाज़े के सामने की दीवार से पीठ टिकाई और लम्बी साँस लेने लगी. दो चीज़ों के आपस में टकराने और बिखरने, भारी प्यास लगने और कुत्तों के रोने की आवाजें जा चुकी थी. या वे आवाज़ें और प्रभाव बाकि थे मगर उनसे वह चेतावनी जा चुकी थी जो किसी अनिष्ट की ओर संकेत था.

 

श्यामल की चेतना का अल्पांश लौटा.

 

उसने अपने पाजामें में हाथ डाला और फोन निकाला. उसने तुरंत फोन का स्क्रीन ऑन किया. उस पर दो चेहरे चमकने लगे. एक धवल और एक श्यामल का. धवल फोन में मौजूद थी. उसने कॉन्टेक्ट्स खोले. धवल के चेहरे पर आहिस्ता से अपना अंगूठा फेरा. उसने रिंग करने से पहले एक लम्बी सांस ली. उसी समय श्यामल की माँ की आवाज़ आई.

 

श्यामा, श्यामा.

 

डर, बिछोह और हांफ से भरी हुई श्यामल ने फोन जेब में रखा. चेहरे की ज्यामिति को दुरस्त किया. उसने अपने दोनों अंगूठों से होठों को खींचा. दोनों हथेलियों से गालों को रगडा. लोवर को ऊपर, अपर को नीचे किया. छातियों पर हाथ रखकर उनका कम्पन बंद किया. दो बार भोहें उपर की और दरवाज़ा खोल कर बाहर आ गयी.

 

“हाँ माँ”

 

“क्या कर रहा था बच्चा”

 

श्यामल का मुस्कान और ख़ुशी से भरा हुआ चेहरा कोई गीत गाने लगा. उसने लगभग लहराते बलखाते हुए माँ को पीछे पकड़ा.- “तुम कहाँ चली गयी थी?”

 

माँ ने उसके हाथों पर हाथ रखे हुए कहा- “मैं कहीं भी जाऊं तुम खुश रहती हो”

 

“हाँ माँ खुश क्यों न रहूँ. तुम जो हो मेरे साथ”

 

“क्या उम्र भर माँ के साथ ही रहोगी?”

 

“तुम हुकुम करो माँ अभी चली जाऊं किसी दुल्हे के पीछे शरमाती सिकुड़ती हुई” इतना कह कर वह उछली और सोफे पर बैठ गयी. माँ ने फिर ख़ुशी और शक से उसे देखा.

 

दोपहर बीत चुकी थी. धवल से बिछुड़े हुए दो घंटे हो गए थे. श्यामल ने धवल को फोन किया- “मेरे घर आ जाओ.“

 

धवल के मन में खूब अचरज था कि आज श्यामल ने कैसा बिहेव किया. जाने उसके मन में और मुंह पर इतनी अलग बातें कैसे आ जाती है. यही सोचते हुए उसने बिना किसी ख़ुशी के कहा- “देखती हूँ.” फोन रखने के बाद वह कुछ देर सोचती रही फिर उसने तय किया कि हो आना चाहिए. वह उसके घर पहुंची. श्यामल के पापा और माँ टीवी देख रहे थे. वह अपने कमरे में थी. धवल कमरे में गयी और पलंग के पास रखी कुर्सी पर बैठ गयी. श्यामल चुप बैठी रही.

 

थोड़ी ही देर में उसने तकिये के पास से कुछ अख़बार और पत्रिकाओं की कतरनें निकल कर धवल की ओर बढ़ा दी.

 

धवल ने उन कतरनों को देखा. उसके माथे पर लकीरें बनती गयीं.- “ये क्या हुआ है तुमको? यही सब सोचती रहती हो”

 

“ये मैं सोच नहीं रही, ये अख़बारों और पत्रिकाओं में लिखा है.छपा हुआ है. सच है”

 

“ये पागलपन है”

 

“गलतियाँ सब आदमियों की है और पागलपन मेरा है?

 

“ये मामूली बातें हैं”

 

“तुम इनको मामूली बातें कहती हो. मार डाला, टुकड़े किये, जलाया, भोगा, धंधा करवाया... छी... तुम इनको मामूली कहती हो”

 

“नहीं मैं इनको मामूली नहीं कहती हूँ... असल में ये कम ही लोग है जो ऐसे हैं बाकि दुनिया में कितने लोग है”

 

“कम है माने तुम उस विनोद खन्ना टाइप वाले के पास जाकर देखना चाहती हो कि एक और होगा या नहीं?”

 

“क्या हुआ है तुमको...”

 

“मुझे इन सबसे नफरत है...”

 

उन दोनों में श्यामल की आवाज़ ऊंची थी. माँ अन्दर चली आई.- “क्या हुआ बच्चों?”

 

श्यामल के चेहरे पर हल्की सी ख़ुशी आ चुकी थी. उसका रंग तेज़ी से बदल गया. श्यामल ने माँ का हाथ पकड़ा और पलंग पर बिठा लिया.- “देखो तुम्हारी इस दूसरी वाली बेटी के लिए एक रिश्ता आया है और ये मान नहीं रही. मैं कहती हूँ मेरे लिये होता तो मैं अब तक खुद उसके पास पहुँच जाती.” ऐसा कहते हुए श्यामल माँ की गोदी में गिर पड़ी. वह हंस रही थी.

 

माँ मुस्काई और बाहर चली गयी.

 

माँ के जाते ही श्यामल का चेहरा फिर से उदासी से भर गया.

 

ये सब देखते हुए धवल फिर हतप्रभ. वह खिन्न भी हो गयी थी. उन दोनों के बीच का रिश्ता लिजलिजा हो रहा था. कुर्सी से उठाकर उसने कहा- “मैं जाती हूँ”

 

श्यामल पलंग से उठी और उसे चूमने लगी. चूमते हुए एक दो बार बोली- “तुमको कुछ नहीं होना चाहिए. तुम मेरी इकलौती दोस्त हो.” धवल ने अपने आप को छुड़ाया- “कुछ नहीं हो रहा किसी को...” वह तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गयी.

 

उसके जाते ही श्यामल ने अपना फोन और पर्स लिया. वह भी तेज़ क़दमों से बाज़ार की ओर चली गयी. लौट कर आई तो उसके पास एक सफ़ेद सलवार कुरता था. एकदम नया. वही चिकन कढाई वाला. एकदम कुआंरा. उसने कैरी बैग को एकतरफ टांग दिया. रात का खाना खाने गयी.

 

रात के खाने में वे तीनों एक साथ थे. माँ, पापा और श्यामल. माँ ने श्यामल के पापा से कहा- “जिंदल साहब ने लड़का खोज लिया है, आज श्यामल उसकी तस्वीर देखकर आई है” श्यामल के पापा ने खाना खाते हुए ख़ुशी जाहिर की. उन्होंने एक बार अपनी बेटी की तरफ देखा. श्यामल मुस्कुराने लगी- “आपका प्लान भी समझ आ रहा है मुझे...” वे तीनों हंसने लगे.

 

रात का अँधेरा आ चुका था सिर्फ बत्तियां गुल होनी थीं.

 

श्यामल बिस्तर से आहिस्ता से उठी.

 

जब पागलपन, मोड़ लेती किसी जवाँ नदी की तरह उफान लेता हो तो इसे हर जुबां में कुछ तो कहा जाता ही होगा. असल में मगर देखो तो धूल उड़ती ही जाये और कच्चे रास्ते से गुज़रते रेवड़ की तरह बेचैनी की पूँछ न दिखाई दे. बिना किसी दुःख के ज़िंदगी बोझ सी हो जाये. न ठहरे न गुज़रे.

 

 

 

श्यामल के मन में जाती हुई धवल ठहर गयी थी. वह सिर्फ और सिर्फ धवल को खुद से दूर जाते हुए देख रही थी.

 

 

 

श्यामल ने रात के अँधेरे में मुंह देखने का छोटा आइना हाथ में लिया. वह अपना मुंह देखते हुए कहने लगी. “आदमी जिसे प्यार करना कहता है वह उसका बदन की भूख मिटाना है. वह धवल को चूमेगा. धवल के करीब आएगा. धवल से...” उसने एक झटके से आयान अफेंक दिया. आएना कहीं बिस्तर पर ही गिरा कि कोई आवाज़ न आई.

 

 

 

“सुनो आईने, मेरी धवल के हलके और ज़रा खुशी भरे कदम रखना. उसके लिए मेरे जैसी नरम नाज़ुक अंगुलियां रखना. उसका एक आदमी न बनाना जो उसे जीवन भर भोगता जाये. उसके मन की न सुन सके. “

 

 

 

आईने ने कोई जवाब नहीं दिया. “बदतमीज धवल भी तो नहीं समझती मेरी बात...”

 

 

 

उसने अपने नाइट-अपर को एक तरफ फेंका. दोनों पांवों को नर्तक की तरह बनाया. हाथ सर के ऊपर कमल के फूल की तरह किये. बारी-बारी से एक पाँव उठाने और रखने लगी. वह लयबद्ध होने लगी. उसका नर्तन द्रुत की ओर बढ़ने लगा. उसके होठ कोई प्रार्थना बुदबुदा रहे थे. वह निर्मल हो रही थी. जैसे बुद्ध के ललाट से चाहतो के रेशे छिटक कर गिर रहे हो. ग्रीक देवों की नाक तीखी नोक वाली कलम में ढल रही हो . ऐसी तीखी जिससे दुआएं लिखी जा सकें. प्रार्थना स्थलों के प्रवेश द्वारों और भित्तियों पर कमनीय सौन्दर्य स्वतः आकार ले रहा हो.

 

वह तेज़ से तेज़ होती गयी. उसने कभी नृत्य की शिक्षा नहीं ली थी लेकिना वह निष्णात जान पड़ रही थी. वह अचानक दीवार से टकराई और बिस्तर पर गिर पड़ी.

 

वह होश में थी मगर थककर चूर. उसने अपना फोन खोजा. धवल को एक मेसेज किया. “जीवन व्यक्ति की निजी है. इसे किसी के साथ मत बांटों” फोन के निचले कोने से ऊपर की तरफ मेसेज जा चुका था. जैसे कोई परिंदा उड़ता हुआ तिरछा चला गया हो.

 

उसने जवाब का इंतजार किया. उसने करवट बदली. फिर से करवट बदली. फोन को देखा. पलंग से उठ बैठी. टहल कर देखा. जवाब नहीं आया. उसने कहा- “आओ” जवाब फिर भी नहीं आया. उसने कहा- “मैं रो पडूँगी” मगर फोन में कुछ हलचल न हुई.

 

उसने कमरे की बत्ती ऑन की. कैरी बेग से सफ़ेद सलवार कुरता निकाला. उसे हेंगर में दीवार पर टांगा. वह तेज़ी से स्याही के पेन को तलवार की तरह चलाने लगी. सफ़ेद कुरते पर गहरी नीली लकीरें बनती गयी. छींटे फैलते गए. उसकी आँखों से उबलते हुए आंसू टप-टप गिरते गए. कुरता और सलवार बीच से पूरे बदरंग हो चुके थे. कहीं-कहीं मामूली छींटे थे.

 

आख़िरकार उसके हाथ थक गए और पेन आँगन में गिर पड़ा.

 

श्यामल गुस्से भरी बेहद थकी हुई बिस्तर पर पड़ी थी. उसने देखा कि वर्जित रेखा के पास हवा में शैतान स्थिर था. आदमी ही असल में शैतान था. बुझती हुई आँखों में उसे भस्म जंगल की ज़मीन से फूटती हरी कोंपलें दिखीं. अग्नि नृत्य में मृत्यु को चूमकर पुनः जीवित होता पंछी दिखा.

 

वह फिर से लरज़िश भरे कदमों से दीवार की तरफ गयी जहाँ सलवार कुरता दुश्मन सिपाही की डमी की तरह टंगे हुए थे. उसने स्याही से गीले हुए कुरते को इस तरह बाहों में भरा जैसे वह धवल ही है. उसने अपना मुंह कुरते में डाल दिया. कुरते की ताज़ा स्याही से उसका मुंह नीला हो गया. चेहरे पर लगा स्याही का गीलापन छूते ही वह मुस्कुराई.- “मैं तुमको कहीं नहीं जाने दूंगी.”

 

उसने फोन उठाया और रिंग की.

 

धवल ने कहा- “हेलो” जवाब में धवल को एक सरगोशी सुनाई दी- “आई लव यू, आल द बेस्ट.” धवल सोच में पड़ गयी. वह अचम्भों और अनिश्चितता से घिरी हुई थी.- “लव यू टू”

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