रामायन ही नाम था उसका। जब मैंने देखा था तब भी लगभग 60 के ऊपर जाकर चारों मौसम देख चुका होगा ऐसा लगता था। झक गोरा, छोटा कद और सिर पर थोड़े से बाल जिनका होना न होना एक-सा था फिर सफेदी ने भी अपना रंग खूब डाल दिया था। वह बनियान और अगर कह सकें तो धोती पहना करता था। उसके पहने धोती और बनियान में जमाने से सौतिया डाह था। बनियान चाहे जैसी हो पर वह उसे अपने मटके नुमा पेट पर चढ़ाकर रखता और धोती इतनी खोंटी होती कि वह एड़ी छोड़िए, घुटनों से ऊपर जाते-जाते बस थोड़े लंबे कच्छे की शक्ल में आकार लिए रहता। इस वजह से बनियान और धोती का मेल जमता नहीं था। रामायन उसी वेशभूषा में पूरे गाँव में चक्कर काट लेते। करते तो वह मजदूरी ही थे। मजदूरी यानी दिहाड़ी। गाँव के कई सम्पन्न लोग रामायन की बतरस के लिए भी मजदूर रख लेते । वह बात का उस्ताद था। इसी उस्तादी में वह गाँव घर की महिलाओं का भी प्रिय था।
जब काम के बीच मे जब खाने-सुस्ताने की छुट्टी होती तो रामायन खैनी मलते हुए अपने समय के किस्से सुनाता कि कैसे उसने अमुक जगह काम करते लोगों के हाथ भी देख देख भविष्य भी बताया और लौटते वक्त दक्षिणा भी कमा ली। एक दफे मैंने कहा कि केतिया हाथ देखs लेबे ल हो। तब उसने खैनी मुँह के भीतर रखते हुए कहा - कुछ खास ना। बस हमरा लगे जोगाड़ी मंतर बा।खाली एके बतिया फेंट देबे के बा ऐने ओने। तो उसका मंतर मिला जो अब तक यादों की पोटली में गांती बांध के बैठा है - जीवन मे ऊँच खाल लागल रहेला, पैसा आवत जात रहेला बाकी रुकेला ना, सुख जोहेनी दुःख भेंटाला, ननद आ पाटीदार लोग हरदम टेंट बेसाहत रहेला, हाथ मे तनिको जस नईखे, निमनो करेनी त बेजांय बन जानी - कहीं गलत कहतानी का? - ना ए देवता! त उपाय का बा जी? - ई लागल रही जिनगी में त तुलसी आ सुरुज के जल चढ़ाई, बियफे के कुछु दान मत दिही। ऊँच आ तीत नईखे बोलेके, सब निमन होइ। - रामायन का यह ज्ञान उसके मजदूरी के कष्ट को कम कर देता । उसके हरबोलिया प्रकृति के कारण मिस्त्री से लेकर गाँव के काम कराने वाले लोग भी उसको इतनी छूट दे देते थे। पापा का मुँहलगा वह उनसे भी मजाक का मौका नहीं छोड़ता कहता - ऐ बसुधा भाई आज सांझी के झींगा ना त पटेया खियाव ना।बड़का मालिकार बनल बाड़ s।
पापा हंसकर कहते देहचोरई क लs पहिले ससुर तुनाही। - एक रात खाना खाते रामायन साथ थे। रामायन पापा के साथ बिरछा ब्रह्म वाले प्राथमिक स्कूल में सहपाठी रहे थे पर पापा ने कहा हमनी के क्लास में रहीं जा आ ई बैलमुत्ता पढ़ाई पढस। ना त गरई मारस। -मैंने आश्चर्य से पूछा - बैलमुत्ता पढ़ाई?- पापा रामायन से बोले - ए मोहब्बत! बतावs। - रामायन चवनिया मुस्की मार कर बोले - बै ई लोग पढ़ो आ हम चीनी मिलवा से लौटत टायर पर (बैलगाड़ी) बैठ के आगे ले चल जाई आ टायर के चलत में बैलवन के मुतत चले के आदत रहे त उहे टेढ़ मेढ़ लकिरवा देखत कई दिन कटले बानी। - बात आई गयी हो गयी, बैलमुत्ता पढ़ाई नाम का नया ज्ञान भी मिला उस रोज।
गाँव के बड़े बुजुर्गों का कहना था कि रामायना को आसपास ले पांच गाँव का जमीन का ओरिजिनल पैमाइश पता है। चाहे एक जमीन दस फरीक में बंट गया हो पर रामायन खड़ा होकर अपनी मस्ती में कह दे कि एहिजा ईंटा होइ, मारी कुदारी, भेंटा जायी। सच में रामायन के दावे के आगे मेरे गाँव से लेके दु चार गाँव तक के अमीन उसके मुँह न लगते थे। मुँह न लगना मतलब रामायन के दावे पर गुरु गंभीर बने रहने वाले और दु चार आने पर ईमान डिगाने वाले अमीन भी खीसें निपोरते रह जाते। पर रामायन के लिए परिवार के बँटवारे का दर्द सालता था। अपने घर के बनते समय जब रामायन ने मुस्कुराकर साहेबजान मिस्त्री को ईंट देते हुए ज्ञान दिया - बाबू हो, लड्डू फुटेला नु, त बुनिया झरेला। - उस बात का मर्म तो तब क्या समझ आता। तब तक तो रविंदर राजू का खेत बारी बंट जायी, अंगना दुअरवा पाई पाई बिरना...। यह वही था घर फूटे गँवार लुटे।
साहेबजान जूझ रहे थे, हमारे यहाँ शुरू था, अड़ोस-पड़ोस, गाँव के हर पटी-पटीदार का यही मामला चल रहा था। हर दूसरा-तीसरा युवा खाड़ी के देशों की तरफ या दिल्ली, गुजरात, बम्बे, कलकत्ता जिसको देश के किसी कोने में संभावना दिख रही थी निकल रहा था। कुछ नौजवान रोज भिनसार में सेना में भर्ती की दौड़ का सपना देखते दौड़ते। सब भाग रहे थे, अब भी भाग रहे हैं, रामायन ने सही ही कहा था- लड्डू फुटेला बुनिया झरेला। रामायन जब तक अपनी शारीरिक शक्ति से उस ढलती उम्र में खड़ा रह सकता था मुस्कुराकर ज्ञान बांटता रहा, मजदूरी करता रहा पर वह भी कब तक होता बुढ़ौती एक अलग ही बीमारी है और तिस पर लड्डू तो हर जगह बुनिया हो रहा था।
रामायन भी बुढ़ौती में बुनिया हुए और कुनबे से अलग हुए। बस वही दुआर पर भुसउल में मुस्कियाते रहते जांघ तक धोती खोंटे खटिया पर रहे, जब अंतिम बार देखा तो गाल धसक गए थे और पेट झूल गया था, हां बनियान नहीं था। बस एक चादर थी जो रामायन के जाते समय उनके साथ गयी। यकीन कीजिए रामायन जैसों के जाने से गाँव से एक बुनिया भर नहीं झरा, पूरे गाँव के मुहानी से गोया नजरौटा गिरकर टूट गया। फिर इधर कोई गाँव न बसा। बस बसा-सा दिखता भर है।
(लेखक डॉ. एम. के. पांडेय , सत्यवती कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसियेट प्रोफ़ेसर हैं)