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बदलते भारत को नई ताकत देतीं देवियां

महिला शिक्षा और सशक्तीकरण का बीड़ा उठा रहीं महिला हस्तियों की दिलचस्प और अनुकरणीय पहल, जो कारोबार, खेल और बैंकिंग क्षेत्रों में कामयाबी की बुलंदी छू रही हैं
बदलते भारत को नई ताकत देतीं देवियां

राजेश रंजन

घर की रसोई तक सीमित दक्षता से आगे निकलकर आंगन के किसी छोटे हिस्से से आसमान की ओर देखने की महत्वाकांक्षा ने महिलाओं को अब अंतरिक्ष तक पहुंचा दिया है। कारोबार का क्षेत्र हो, सेना हो या बैंकिंग, महिलाएं किसी मायने में पुरुषों से पीछे नहीं रह गई हैं। भारत में अब असाधारण और प्रतिभावान महिला उद्यमियों की कोई कमी नहीं रह गई हैं। भारतीय महिला उद्यमियों की सबसे दिलचस्प खासियत यह है कि या तो उन्होंने अपनी पैतृक विरासत को बखूबी संभाला है या फिर साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं शिक्षा-दीक्षा से निकलकर असाधारण बुलंदियों को छुआ है। देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक की पहली महिला अध्यक्ष अरुंधति भट्टाचार्य ने फोर्ब्स पत्रिका की हालिया सूची में छह पायदान की छलांग लगाते हुए लगातार दूसरे साल दुनिया की 30वीं सबसे शक्तिशाली महिला होने का गौरव पाया है तो यह उनके चार दशक की मेहनत का ही नतीजा है। शिक्षा के क्षेत्र में ही श्रीराम स्वरूप की निदेशक पूजा अग्रवाल, आइसेञ्चट की निदेशक पल्लवी राव चतुर्वेदी और श्री रामस्वरूप मेमोरियल यूनिवर्सिटी, लखनऊ की प्रो-चांसलर पूजा अग्रवाल के असाधारण कार्य ने समाज में खास पहचान बनाई है। देश के सबसे बड़े निजी बैंक आईसीआईसीआई बैंक की प्रबंध निदेशक और मुक्चय कार्यकारी अधिकारी चंदा कोचर की शिक्षा-दीक्षा देश के ही सामान्य स्कूल और विश्वविद्यालय में हुई है। ऐसी ही कुछ हस्तियों की अपने पेशे से हटकर एक अलग पहचान यह है कि उन्होंने महिला सशक्तीकरण का भी बीड़ा उठाया है।  

अरुंधति भट्टाचार्य

अक्सर कहा जाता है कि महिलाओं की तरक्‍की की राह में महिलाएं ही रोड़े अटकाती हैं। लेकिन सन 2014 में जब फोर्ब्स ने उन्हें दुनिया की शक्तितशाली महिलाओं की सूची में 36वें स्थान पर रखा तो यह पहचान उन्हें महिलाओं की मदद के लिए ही मिली। दरअसल, वह न सिर्फ देश के 22.5 करोड़ ग्राहकों और 2.5 लाख कर्मचारियों वाले बैंक की प्रमुख हैं बल्कि उन्होंने महिला कर्मचारियों के लिए दो साल की अवकाश नीति भी लागू की ताकि वे मातृत्व सुख या परिवार की देखभाल का भी दायित्व उठा सकें। चार दशक से बैंकिंग सेवा से जुड़ीं अरुंधति महसूस करती हैं कि महिलाओं को घर और दक्रतर में कई सारी भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं इसलिए नौकरी में रहते हुए दो साल का विश्राम अवकाश लेना उनका हक है। इतना ही नहीं, अपनी सभी महिला कर्मचारियों की सेहत का क्चयाल रखते हुए इस बार वह महिला दिवस (8 मार्च) के मौके पर उन्हें सर्वाइकल कैंसर के नि:शुल्क टीके लगवाने पर विचार कर रही हैं। इस साल की योजनाओं के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने महिलाओं की सेहत और करिअॅर की ओर विशेष ध्यान देने पर जोर दिया। हालांकि वह इसी साल फरवरी में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) का अध्यक्ष पद संभालने की भी इच्छुक थीं जो किसी कारणवश संभव नहीं हो पाया। खाली समय में पुस्तक पढऩे की शौकीन अरुंधति कथा-साहित्य पढ़ लिया करती हैं लेकिन चाहकर भी फिल्म नहीं देख पाती हैं।

 नए साल में भारतीय स्टेट बैंक को पूर्ण डिजिटल बैंक बनाने की योजना के बारे में पूछे जाने पर वह बताती हैं, ‘इसके लिए नियामक बदलाव, प्रौद्योगिकी, प्रतिस्पर्धा और विîाीय समायोजन अपनाने की जरूरत है। आज देश की 62 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम युवाओं की है। मुझे बताया गया कि 80 प्रतिशत ई-कॉमर्स कारोबार अब भी नकद हस्तांतरण के जरिये होता है ञ्चयोंकि यहां भरोसे की कमी है। लिहाजा हर कोई डिजिटल बैंकिंग पर यकीन नहीं करता लेकिन युवा पीढ़ी के लिए यह सहूलियत मुहैया कराना हमारा लक्ष्य है। महिलाओं के सशक्तीकरण में वह सरकार की जन धन योजना का अहम योगदान मानती हैं। उनका कहना है कि पहले हमारे बैंक में 97 प्रतिशत जीरो बैलेंस खाते थे जो अब घटकर 40 प्रतिशत पर आ गए हैं। लोगों को गलतफहमी रहती है कि कई सारे खाते होने का उन्हें फायदा मिलेगा लेकिन जन धन योजना के जितने ज्यादा खाते सक्रिय होंगे लोगों को खाते में सीधा नकद हस्तांतरण का भी फायदा मिलेगा। महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और आर्थिक समृद्धि के लिए वह कर्ज देने का समर्थन करती है। उनका कहना है कि ग्राहकों की बदौलत ही अर्थव्यवस्था में  हमारा योगदान 22-23 प्रतिशत हो गया है। नकद हस्तांतरण के बजाय इलेञ्चट्रॉनिक तरीके से लेन-देन की परंपरा को वह न सिर्फ भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए बल्कि नकद राशि का रखरखाव खर्च बचाने के लिए कारगर मानती हैं।

चंदा कोचर

राजस्थान में जन्मीं चंदा कोचर ने जयपुर में स्कूली शिक्षा पाई जबकि उनकी उच्च शिक्षा मुंबई में हुई। इसके बावजूद वह देश के सबसे बड़े निजी बैंक आईसीआईसीआई बैंक की प्रबंध निदेशक और सीईओ हैं और फोर्ब्स पत्रिका की प्रभावी महिलाओं की सूची में इस बार भी आठ छलांग लगाते हुए 35वें स्थान पर पहुंच गई हैं। उनका विशेष जोर अधिक से अधिक ग्राहकों तक पहुंच बनाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल बैंकिंग को बढ़ावा देने पर है। नए साल में उनका लक्ष्य डूबे कर्ज (एनपीए) का बोझ कम करना है। सन 2011 में देश के प्रतिष्ठिïत पद्यभूषण सक्वमान से सक्वमानित कोचर लगभग 125 अरब डॉलर की संपदा का संचालन करती हैं और हाल ही में उन्होंने पिछले साल के मुकाबले इस बैंक के लाभ में 14 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की है। उन्हें देश निजी क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक में उल्लेखनीय बदलाव का श्रेय जाता है जिसे सन 2008 की आर्थिक मंदी का बड़ा नुकसान झेलना पड़ा था। ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल बैंकिंग की उनकी पहल को देश में कम खर्च में बैंकों के विस्तार मॉडल के रूप में देखा गया। बैंकिंग कानून पर अच्छी पकड़ होने के कारण उन्होंने बैंक का भारत के अलावा 17 देशों में विस्तार किया है।

चंदा कोचर मानती हैं कि महिलाओं पर कामकाज और परिवार में से किसी एक को चुनने का बड़ा दबाव रहता है। कंपनियां आज भी महिलाओं की नियुक्ति सिर्फ बदलते माहौल को देखते हुए करती हैं लेकिन उनका वेतन अपेक्षाकृत कम ही रहता है। उनका मानना है कि महिलाओं की नियुक्ति उनकी प्रतिभा के आधार पर ही होनी चाहिए। देश में महिलाओं की स्थिति पर चर्चा करते हुए वह अपना अनुभव बताती हैं, ‘आज भी लोग कामकाजी महिलाओं के प्रति लिंगभेद रखते हैं। मुझे याद है पहली बार जब हमने परियोजनाओं का निरीक्षण करने के लिए फैक्‍टरियों का दौरा किया था तो वहां लोगों को अपने बीच एक महिला को देखकर बड़ा अजीब लगा। उस वक्त इनमें से ज्यादातर कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए शौचालय तक की व्यवस्था नहीं थी। लेकिन आज वक्त बदल चुका है।’ महिलाओं की शिक्षा और तरञ्चकी के बारे में उनका कहना था कि महिलाओं के लिए किसी सही संरक्षक की तलाश करना जितना जरूरी है, उतना ही दूसरी महिलाओं के लिए भी संरक्षक का दायित्व निभाना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं का शिक्षित होना उतना ही जरूरी है जितना कि शहरी महिलाओं का। उनकी नए साल की रणनीति और योजना भी ग्रामीण विकास पर ही केंद्रित है। इसके अलावा ग्रामीण विकास के लिए वह अपने पति के पवन ऊर्जा कारोबार में भी हाथ बंटाती है।

सुनीता रेड्डी

अपोलो हॉस्पिटल ग्रुप की प्रबंध निदेशक सुनीता रेड्डी की वित्तीय कुशलता ने समूह को तरक्‍की और मुनाफे के अभूतपूर्व मुकाम तक पहुंचा दिया है। उनकी सूझबूझ और प्रबंधन कौशल की बदौलत अपोलो हॉस्पिटल और भारत में चिकित्सा के लिए आने वाले विदेशी पर्यटकों की तादाद बढ़ाने में अहम योगदान किया है। अपोलो हॉस्पिटल के संस्थापक प्रताप सी. रेड्डी ने सन 1983 में जब अस्पताल की स्थापना की थी यह चेन्नई में महज 150 बिस्तरों वाला अस्पताल था लेकिन अब यह एशिया का सबसे बड़ा हेल्थकेयर प्रदाता समूह बन गया है जिसके देश-विदेश में 46 अस्पताल और 8,000 से अधिक बिस्तर हैं। अस्पताल का प्रबंधन रेड्डी की चारों बेटियों- प्रीथा, सुनीता, शोभना और संगीता ने संभाल रखा है। इन चार बहनों ने समूह को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और महानगरों, बड़े तथा छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में मरीजों के लिए 2,418 अतिरिक्त बिस्तर मुहैया कराने के लिए 1290 करोड़ रुपये का निवेश किया है। सुनीता बताती हैं कि देश के विकास के लिए महिलाओं की शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। अपनी बेटियों पर गौरवान्वित पिता प्रताप रेड्डïी कहते हैं, ‘मेरी बेटियां जुनून के तौर पर इस कारोबार को संभाल रही हैं। वे कोई भी काम कर सकती हैं। उन्होंने अपोलो हॉस्पिटल का पहला ब्राउसर निकाला तो अमेरिका के लोगों को यकीन ही नहीं हुआ कि यह भारत में बनाया गया है।’

साइना नेहवाल

भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल कुछ समय के लिए विश्व रैंकिंग में नंबर वन खिलाड़ी होने के साथ पहली भारतीय खिलाड़ी हैं जिन्होंने ओलिंपिक में बैडमिंटन का पदक जीता। पिछले कुछ वर्षों के दौरान सानिया मिर्जा, दीपिका पल्लीकल, साइना, ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा जैसी महिला खिलाडिय़ों ने देश का नाम रोशन किया है। लेकिन विश्व में दूसरी रैंकिंग की साइना मानती है कि वैश्विक स्तर पर भारतीय खिलाडिय़ों की बड़ी कामयाबी के बावजूद देश में लड़कियों की खेल शिक्षा को कम तरजीह दी जाती है। वह बताती हैं, ‘तेजी से दुनिया बदल रही है और हर क्षेत्र में लड़कियां बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं। महिलाओं को परंपरागत रूप से खेलने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है।’ अपनी इस मुहिम को कामयाब बनाने के लिए उन्होंने ‘उक्वमीदें’ शीर्षक से एक वीडियो भी जारी किया है जिसमें भारतीय युवाओं को अपने सपने साकार करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है और लड़कियों के सभी स्कूलों में खेल को बढ़ावा देने की पहल की गई है। नए साल का उनका सपना रियो ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का है। हैदराबाद की इस युवा खिलाड़ी ने महिलाओं की शिक्षा पर भी जोर दिया है। लेकिन वह बताती हैं, ‘लड़कियों की शिक्षा पर सभी बड़े उत्साह से पहल करते हैं लेकिन जब लड़कियों के खेल में करिअॅर बनाने की बात आती है, ज्यादातर अभिभावकों का उत्साह ठंडा पड़ जाता है।’

पल्लवी राव चतुर्वेदी

दक्षता विकास पर केंद्रित आइसेक्ट यूनिवर्सिटी की निदेशक (मार्केटिंग, सेल्स, एचआर) पल्लवी राव चतुर्वेदी का विशेष ध्यान देश के छोटे शहरों और ग्रामीण हिस्सों में महिलाओं की शिक्षा पर है। उनका मानना है कि महिलाओं में नई-नई सीखने की प्रवृत्ति अधिक रहती है। पहले लड़कियों का रुझान अध्यापन, नर्सिंग और अन्य परंपरागत करिअॅर की ओर ही रहता था लेकिन अब रिटेल, बैंकिंग, वित्त, ऑटोमोटिव आदि क्षेत्रों की शिक्षा पाने में भी उनकी दिलचस्पी बढऩे लगी है। अपनी दो यूनिवर्सिटी के जरिये उनका प्रयास है कि ज्यादा से ज्यादा महिलाएं शिक्षित हो सकें। इन विश्वविद्यालयों में शिक्षामित्र छात्रवृत्ति के जरिये न सिर्फ लड़कियों की आर्थिक मदद की जाती है बल्कि उनके लिए अनुकूल माहौल की व्यवस्था भी है। महिलाओं के दक्षता विकास और आत्मनिर्भरता के लिए उन्होंने व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण की पहल की है ताकि लड़कियां बीच में ही पढ़ाई छोडऩे के बाद भी भविष्य में स्वावलंबी बन सकें। एक सवाल के जवाब में पल्लवी बताती हैं, ‘आजादी के बाद महिलाएं खेल से लेकर साहित्य, मनोरंजन और राजनीति तक में बड़ी कामयाबी हासिल कर रही हैं। लेकिन आज भी महिलाओं की बड़ी तादाद कृषि, टेञ्चसटाइल, शिक्षा, समाज सेवा, स्वास्थ आदि जैसे परंपरागत क्षेत्रों से ही जुड़ी हुई हैं। संसद में महिलाओं की भागीदारी बढऩी चाहिए। एक अनुमान है कि यदि महिलाओं को पुरुषों के बराबर रोजगार का अवसर मिल जाए तो देश का जीडीपी 25 प्रतिशत बढ़ जाएगा। समाज में गलत अवधारणा बन गई है कि ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं अपने पेशे में उतनी कुशल नहीं होतीं। लेकिन मेरा मानना है कि मैरी कॉम, किरण बेदी, अरुंधति राय और कंगना रानौत जैसी हस्तियां छोटे शहरों से आकर ही बड़ा मुकाम पाई हैं।’ उन्होंने महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा, ‘कन्या भ्रूण हत्या और कन्या हत्या के खिलाफ सक्चत कानून अमल में लाना चाहिए। लड़कियों को शिक्षा का समान अधिकार मिलना चाहिए। सरकार द्वारा की जा रही कोशिश नाकाफी है।’

पूजा अग्रवाल

आईआईटी से शिक्षित पूजा अग्रवाल मानती हैं कि एक महिला होने के नाते मुझे अपनी क्षमता पर कम विश्वास तो था लेकिन मैंने इसे चुनौती के रूप में लिया। एक सफल स्त्री के पीछे उसका परिवार, मित्र और विशेष रूप से जीवनसाथी की अहम भूमिका रहती है। इस आधी दुनिया के बगैर खुशहाली संभव नहीं है। लिहाजा उन्होंने श्री रामस्वरूप मेमोरियल यूनिवर्सिटी में ‘अपनी पाठशाला’ के जरिये जनचेतना एवं  जागरूकता बढ़ाकर लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहित करने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने कहा, ‘बचपन से ही यदि लड़कियों के प्रति भेदभावपूर्ण नजरिया रखा जाए तो लड़कियां हीनभावना से भर जाती हैं और उन्हें हर कदम पर उपेक्षाभाव महसूस होता रहता है। इसी को ध्यान में रखते हुए हमने विश्वविद्यालय में ‘प्रतिभा प्रकोष्ठ’ की स्थापना की है जहां लड़कियों को सुरक्षा के साथ शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसके अलावा यहां एनसीसी विंग और 1090 वीमेन पावर लाइन के क्रियान्वयन द्वारा लड़कियों को आत्मरक्षा के गुर सिखाए जाते हैं।

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