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बॉलीवुडः हीरोइनों के भाव आसमान पर

हिंदी सिनेमा परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। जबसे छोटे शहरों से आए कहानीकार, फिल्मकार हिंदी सिनेमा की...
बॉलीवुडः हीरोइनों के भाव आसमान पर

हिंदी सिनेमा परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। जबसे छोटे शहरों से आए कहानीकार, फिल्मकार हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा में निर्णय लेने की हैसियत रखने लगे हैं, तब से हिंदी सिनेमा का कैनवास बड़ा हुआ है। अब हिंदी सिनेमा को समृद्ध करने में बड़ी भूमिका ओटीटी प्लेटफॉर्म निभा रहा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म में नई कहानियों, प्रतिभावान कलाकारों के लिए नए आसमान की तरह है। इसका बड़ा प्रभाव हिंदी सिनेमा की अभिनेत्रियों के काम और करियर में भी देखने को मिल रहा है। हाल के दिनों में माधुरी दीक्षित, रवीना टंडन, सुष्मिता सेन, जूही चावला, उर्मिला मातोंडकर जैसी अभिनेत्रियों की लीक से हटकर वेब सीरीज और फिल्में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई हैं। उन्हें देखकर हर कोई चकित है। किसी को उम्मीद नहीं थी कि नब्बे के दशक की इन अभिनेत्रियों को नए कलेवर में देखा जा सकेगा। इस परिवर्तन को समझने के लिए हमें हिंदी सिनेमा में अभिनेत्रियों की यात्रा को समझना पड़ेगा।

 

जब हिंदी सिनेमा की शुरुआत हुई तो अभिनय करने के लिए लड़कियां-महिलाएं मुश्किल से मिलती थीं। समाज में फिल्म में काम करना अच्छा नहीं समझा जाता था। जो महिलाएं फिल्म में काम करने को राजी होती थीं, उनमें से अधिकतर की आर्थिक मजबूरी होती थी। ज्यादातर मामलों में उन्हें फिल्म में केवल सुंदर नजर आने और पुरुष दर्शक वर्ग को आकर्षित करने के उद्देश्य से शामिल किया जाता था। नायक उनके लिए गीत गाते थे और वे दांत में साड़ी का पल्लू दबाए शर्माती रहती थीं। मदर इंडिया, बंदिनी, सुजाता जैसे अपवाद थे मगर इन फिल्मों की संख्या बहुत कम थी। जैसे समाज में सशक्त महिला किरदारों की कमी थी। नौकरी, राजनीति, शिक्षा, नीति-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम थी। इसलिए फिल्मों से उनकी कहानियां भी नदारद थीं

 

मगर जैसे-जैसे समय बदला और आधुनिकता समाज को अपनी गिरफ्त में लेने लगी, वैसे-वैसे स्त्रियों की स्थिति में भी बदलाव नजर आए। अब स्त्रियों के पास अधिकार थे। स्त्रियां अपने अधिकारों को लेकर जागरूक थीं। वे घर से बाहर निकल रही थीं। उच्च शिक्षा हासिल कर रही थीं, नौकरी कर रही थीं। इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। फिल्मकारों ने इसका संज्ञान लिया और कुछ सार्थक फिल्में बनाईं, जिनके केंद्र में महिलाएं थीं। इसी दौर में शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, दीप्ति नवल जैसी अभिनेत्रियों आईं, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में महिला किरदारों की परिभाषा बदली। मगर इन फिल्मों को आर्ट सिनेमा या पैरलल सिनेमा कहकर किनारे कर दिया गया। दर्शकों के मन मस्तिष्क पर अभी भी परवीन बाबी, डिंपल कपाड़िया, जीनत अमान, टीना मुनीम, मीनाक्षी शेषाद्री हावी थीं। नब्बे के दशक में म्यूजिकल लव स्टोरी फिल्में बन रही थीं। इन घनघोर कमर्शियल फिल्मों में रवीना टंडन, करिश्मा कपूर, सुष्मिता सेन, दिव्या भारती, श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, ऐश्वर्या राय केवल सुंदरता का प्रदर्शन करने के लिए मौजूद रहती थीं। रानी मुखर्जी, काजोल, तब्बू जैसी अभिनेत्रियों का दमदार अभिनय समीक्षकों और दर्शकों द्वारा सराहा जा रहा था मगर फिल्में कारोबार के मामले में पिछड़ जाती थीं। निर्माता समझ चुके थे कि ग्लैमर, मसाला और फॉर्मूला फिल्में ही कमाई देती हैं। इसलिए समाज में स्त्रियों की स्थिति बेहतर होने के बावजूद निर्माता उसी पुराने ढर्रे पर चल रहे थे। यही कारण है कि 2000 के दशक में बिपाशा बसु, तनुश्री दत्ता, उदिता गोस्वामी, आयशा टाकिया, जैकलीन फर्नांडीस, कैटरीना कैफ, लारा दत्ता कठपुतली की तरह मौजूद रहती थीं। अधिकतर फिल्मों में महानगरों की कहानी और किरदार थे। सबका तय ढर्रा था। इस दौर में करीना कपूर, विद्या बालन, कोंकणा सेन शर्मा सार्थक काम करती थीं मगर उसे लाइमलाइट नहीं मिलती थी।

 

फिल्म की कहानी महानगरों की होती थी तो उनमें पुरुष किरदार ही हावी रहते थे। हिंदी सिनेमा से महिलाओं की कहानी गायब थी। फिल्म निर्माता फॉर्मूला, मसाला, कॉपी फिल्में बनाकर प्रसन्न थे। डिट्रीब्यूटर, सिनेमाघर मालिकों को भी स्टार चाहिए होता था। ऐसे में कोई हिम्मती निर्देशक महिलाओं पर केंद्रित इक्का-दुक्का फिल्में बनाता भी था तो उन फिल्मों को सिनेमाघर में स्क्रीन नहीं मिलती थी। ऐसे में अभिनेत्रियों के पास दो ही विकल्प थे। पहला, लंबे समय तक एक ही तरह की भूमिका निभाते जाओ। दूसरा, दो-चार फिल्में करने के बाद किसी बिजनेसमैन से विवाह करके घर गृहस्थी संभालो। इससे अधिक विकल्प थे नहीं।

 

लेकिन छोटे शहरों से आए फिल्मकारों, कहानीकारों ने सारे समीकरण बदल कर रख दिए। तिग्मांशु धूलिया, अनुराग कश्यप, इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज ने हिंदी सिनेमा का समीकरण बदला। ये लोग छोटे शहरों, गांव, कस्बों की कहानियों को लेकर बॉलीवुड में आए। छोटे शहर और कस्बों में महिलाएं केंद्र में होती हैं। उनसे ही परिवार का आधार और उद्धार होता है। जब छोटे शहर की कहानियां आईं तो महिलाओं की कहानियां खुद-ब-खुद मुख्यधारा में आ गईं। इस तरह हिंदी सिनेमा में प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों की आमद हुई। कंगना रनौत, आलिया भट्ट, दीपिका पादुकोण, ऋचा चड्ढा, तापसी पन्नू ने कुछ बेहद शानदार किरदार निभाए और यह यकीन दिलाया कि हिंदी सिनेमा बदल रहा है। एक ओर छोटे शहर की कहानियों को मुख्यधारा में जगह मिल रही है, वहीं दर्शक भी नए किस्म के किरदारों, कहानियों, प्रयोगों को स्वीकार कर रहे थे। नीना गुप्ता, सीमा पाहवा, शीबा चड्डा, रसिका दुग्गल, सुनीता रजवार जैसे नाम घर-घर में लोकप्रिय हो रहे थे। मगर एक दिक्कत अभी भी जस की तस थी। महिलाओं को केंद्र में रखकर फिल्में बन तो रही थीं मगर उनकी संख्या कम थी। क्योंकि सिनेमाघर में इन फिल्मों को स्क्रीन मिलना, सही शो टाइमिंग मिलना टेढ़ी खीर थी। इस समस्या के समाधान के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म संजीवनी बूटी बनकर उभरा। ओटीटी प्लेटफॉर्म ने सारी कहानी पलट कर रख दी।

 

 

ओटीटी प्लेटफॉर्म आने के बाद नए कलाकारों, पुराने कलाकारों, छोटे शहर के कलाकारों के सामने अवसरों का विशाल समुद्र उपलब्ध हो गया था। अमेजन प्राइम, नेटफ्लिक्स, डिज्नी, एमएक्स प्लेयर, सोनी लिव, वूट, जी 5 जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म खुले दिल से नए और अच्छे कॉन्टेंट का स्वागत कर रहे थे। इन ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए विशेष रूप से नए सिरे से कहानियां लिखी गईं। इन कहानियों को सभी ओटीटी प्लेटफॉर्म ने सहयोग किया और अपने मंच पर प्रदर्शित होने का अवसर दिया। जब दर्शकों ने इन कहानियों को देखा और पसंद किया तो फिल्मकारों, ओटीटी प्लेटफॉर्म के मालिकों का हौसला बढ़ा। दोनों ने मिलकर सार्थक सिनेमा निर्माण का मिशन शुरु किया। पहले जो ओटीटी प्लेटफॉर्म को छोटा पर्दा समझकर दरकिनार कर रहे थे, उन्हें धीमे-धीमे ओटीटी प्लेटफॉर्म की अहमियत समझ आने लगी। ओटीटी प्लेटफॉर्म पैसा लगाकर फिल्में बना रहे थे। 100 करोड़ रुपये खर्च कर फिल्म खरीद रहे थे। मिर्जापुर, सेक्रेड गेम्स के निर्माण से ओटीटी प्लेटफॉर्म घर-घर तक पहुंच रहा था। अब हर बड़ा स्टार, बड़ा कलाकार ओटीटी प्लेटफॉर्म पर काम करने के लिए बेचैन था। आज इसी का नतीजा है कि घटिया बॉलीवुड कंटेंट दर्शक बिना देर किए नकार रहे हैं। उन्हें ओटीटी प्लेटफॉर्म पर स्तरीय कंटेंट मिल रहा है। इस स्थिति में दर्शक समझौता करना नहीं चाहते। इसी का परिणाम है कि आज अभिनेत्रियों को अभिनय के अपार अवसर मिल रहे हैं। उनके लिए तरह-तरह के किरदार लिखे जा रहे हैं। उनके सामने चुनौतीपूर्ण किरदार हैं निभाने को। जिस तरह से सुष्मिता सेन ने वेब शो आर्या में काम किया है, वह अपने आप में ओटीटी प्लेटफॉर्म की ताकत दिखाने के लिए काफी है। आज किसी वेब शो की चर्चा होती है और पूरा देश उस शो के किरदारों को सर आंखों पर बैठा लेता है।

 

सुष्मिता सेन के अलावा जूही चावला, रवीना टंडन, महिमा चौधरी, उर्मिला मातोंडकर, माधुरी दीक्षित ने ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और साबित किया है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म ही अब न्यू नॉर्मल है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर न केवल अभिनेत्रियों का अनुभव प्रतिभा नजर आ रही है, बल्कि अभिनेताओं की ही तरह अब उनकी भी स्क्रीन लाइफ बढ़ी है। अब उन पर चार फिल्म करके विवाह करने और ग्लैमर जगत से दूर जाकर घर गृहस्थी संभालने का दबाव नहीं है। असल मायने में यह नारी सशक्तीकरण है। स्त्रियों को हिंदी सिनेमा में समान अवसर, समान अधिकार मिलते दिखाई दे रहे हैं।

 

 

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