Advertisement

‘मंडली’ - सच्ची आस्था की विजय का उद्घोष करती ‘राकेश चतुर्वेदी ओम’ की फिल्म

‘रामायण’ विश्वविख्यात हिंदू महाकाव्य है। रामलीला मंडलियों द्वारा भारत के शहरों, कस्बों-गांवों...
‘मंडली’ - सच्ची आस्था की विजय का उद्घोष करती ‘राकेश चतुर्वेदी ओम’ की फिल्म

‘रामायण’ विश्वविख्यात हिंदू महाकाव्य है। रामलीला मंडलियों द्वारा भारत के शहरों, कस्बों-गांवों में दशहरे से पहले नवरात्रि उत्सव के नौ दिवसों के दौरान और वर्षपर्यन्त, विश्व भर में रामलीला का मंचन किया जाता है। बेहद प्रतिभाशाली अभिनेता-निर्देशक ‘राकेश चतुर्वेदी ओम’ ने फिल्म ‘मंडली’ का निर्देशन किया है। उन्होंने ‘मंडली’ में दिखाया है कि उत्कृष्ट लोककला रामलीला कैसे लुप्त होने की कगार पर है। ‘मंडली’ में सांस्कृतिक, पारंपरिक मूल्यों के पतन और घटती सामाजिक चेतना के समय में धार्मिकता को बनाए रखने हेतु एक कलाकार की संघर्ष यात्रा दर्शाई गई है। रामलीला के कलाकारों को होने वाली कठिनाइयों, आर्थिक लाभ हेतु आयोजकों द्वारा रामलीला मंचों पर बार-बालाओं के फूहड़ नृत्य करवाना जैसे मुद्दों पर सवाल उठाते हुए ये फिल्म समाज को आईना दिखाती है। ‘मंडली’ का लोकाचार बीते युग में निहित है, जो धीरे-धीरे भारतीय चेतना से गायब हो रहा है। ‘मंडली’ पारंपरिक लोककला को जीवित रखने के लिए प्रतिबद्ध, दृढ़प्रतिज्ञ और समर्पित लोगों का समर्पण दर्शाती है। राकेश चतुर्वेदी की सच्ची अपील कहानी के चित्रण में स्पष्ट परिलक्षित होती है। राकेश चतुर्वेदी ने यथार्थवादी फिल्म बनाने हेतु, ‘मंडली’ के निर्माण के दौरान अपना दिल-दिमाग-आत्मा, स्वास्थ्य और धन समर्पित करके पूरी आस्था और विश्वास सहित अथक परिश्रम किया है। महान लेखक प्रेमचंद की कहानी ‘रामलीला’ से प्रेरित कहानी बड़े पर्दे पर जीवंत करके निर्देशक ने सराहनीय कार्य किया है। सुरुचिपूर्ण, सार्थक सिनेमा पसंद करने वाले संवेदनशील दर्शक इस रचनात्मक कृति को निश्चित रूप से पसंद करेंगे।

रामलीलाओं में आज के दौर में अश्लीलता, फूहड़ता ने मंचों को प्रदूषित कर दिया है। आयोजक बदलती रुचियों का ठीकरा दर्शकों के सर फोड़कर सुरक्षित खेल खेलते हैं। ‘मंडली’ ऐसे कठिन समय में संस्कृति बचाने और धार्मिकता, शालीनता बनाए रखने हेतु एक कलाकार का संघर्ष दर्शाती है। ‘मंडली’ में प्रेमचंद की कहानी में निहित घटनाओं, परिवेश और पात्रों की सरलता यथार्थ रूप से व्याख्यायित की गई है। ‘मंडली’ की कहानी राकेश चतुर्वेदी, विनय अग्रहरि और पल्लव जैन ने लिखी है। मथुरा के परिवेश में ब्रज भाषा में रचे संवाद उल्लेखनीय हैं जो कहानी को प्रामाणिकता प्रदान करते हैं। ये ईमानदार फिल्म दर्शकों को आकर्षित करने में सफल रहेगी। 

‘मंडली’ की कहानी मथुरा निवासी रामभक्त, महंत रामसेवक चौबे (विनीत कुमार) और उनके परिवार पर केंद्रित है। रामसेवक अपनी मंडली द्वारा रामलीला मंचित करते हैं जिसमें अपने बेटे सीताराम (अश्वथ भट्ट) को राम और भतीजे पुरुषोत्तम उर्फ़ पुरू (अभिषेक दुहन) को लक्ष्मण की भूमिकाएं निभाने हेतु प्रशिक्षित करते हैं। रामलीला के मंचन में रामसेवक शुचिता एवं प्रामाणिकता के कट्टर समर्थक हैं। उनकी धार्मिक आस्था दृढ़ है लेकिन वे फूहड़ता और व्यावसायिकता के कट्टर विरोधी हैं। फिल्म के आरंभ में आभास होता है कि फिल्म का नायक सीताराम है, लेकिन थोड़ी देर बाद कहानी पुरुषोत्तम की ओर मुड़ती है। तब सीताराम और रामसेवक परिधीय भूमिकाओं में दिखते हैं। 

सीताराम से अज्ञानतावश हुई एक भूल के कारण अराजकता फैलती है, परिणामस्वरूप रामलीला का प्रदर्शन रद्द हो जाता है। भगवान का नाम कलंकित होने के अपमान से व्यथित, अपराधबोध से ग्रस्त, रामसेवक प्रायश्चित स्वरूप मंडली भंग करके आजीवन रामलीला मंचित ना करने का प्रण लेते हैं। इस दुखद घटना से पुरुषोत्तम के जीवन में भी नाटकीय मोड़ आता है। रामसेवक द्वारा मंडली भंग करने के निर्णय को चुनौती देते हुए पुरुषोत्तम संघर्ष करने का निर्णय करता है, लेकिन जान जाता है कि संघर्ष आसान नहीं है। उसके निर्णय का विरोधी उसका परिवार, फूहड़ नृत्यों की मांग करते दर्शक, पात्रों का मुंहमांगा पारिश्रमिक, राजनेताओं और पुलिस की कुटिल साठगांठ जैसे कई कारक उसके संघर्ष पथ में बाधाएं बनते हैं।

पुरुषोत्तम अन्य रामलीला मंडलियों में लक्ष्मण की भूमिका पाने का प्रयास करता है। वो आयोजकों को कलाकारों द्वारा फूहड़ नृत्य करवाकर रामलीला का अनादर करते देखता है। दुखी पुरुषोत्तम जूनियर कलाकार के रूप में दूसरी मंडली में सम्मिलित होता है। इस मंडली में अविश्वसनीय घटनाओं और चुनौतियों का सामना करते हुए उसका जीवन अत्यधिक जटिल हो जाता है। वो हार मानने की बजाए दृढ़तापूर्वक चुनौतियों का सामना करता है। इस बीच, पुरुषोत्तम का परिचय एक मंचन में बिट्टन कुमारी उर्फ बंटी (आंचल मुंजाल) से होता है और थोड़े मिथ्याबोध के उपरांत, उसके लिए हृदय में कोमल भावनाएं विकसित होती हैं। रजनीश दुग्गल सांसद पुत्र नेता ओंकार सिंह के रूप में क्रूर, कुटिल आचरण वाले चरित्र का प्रतीक है। पुरुषोत्तम का आत्मसम्मान, चालाक-धूर्त ओंकार सिंह (रजनीश दुग्गल) के रुतबे से टकराता है। पुरुषोत्तम बंटी से विवाह करता है और स्वयं की मंडली बनाने का निर्णय लेता है। लेकिन फूहड़, अश्लील नृत्यों के प्रति दर्शकों की बढ़ती रुचि के कारण वो अपनी मंडली द्वारा रामलीला मंचन के दौरान भीड़ जुटाने में असफल होता है।

‘मंडली’ सिद्धहस्त अभिनेताओं के उत्कृष्ट अभिनय से सुसज्जित है। रामसेवक चौबे की भूमिका में वरिष्ठ अभिनेता विनीत कुमार ने शानदार, स्वाभाविक अभिनय किया है। पुरुषोत्तम चौबे की भूमिका में अभिषेक दुहन का गंभीर, परिपक्व अभिनय सुनिश्चित करता है कि भविष्य में अच्छी भूमिकाओं में वे अपनी क्षमता का यथेष्ट परिचय देंगे। फिल्म के अधिकांश दृश्यों में उनके पात्र में बदलाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। ओंकार सिंह के साथ के दृश्यों में अभिषेक ने पराधीनता की स्वभावगत विवशता सफलतापूर्वक व्यक्त की है। साहसी लड़की ‘बंटी’ की भूमिका में आंचल मुंजाल प्रभावित करती है। रामसेवक की सहधर्मिणी की भूमिका में अलका अमीन, सांसद राजीव नारायण सिंह के रूप में कंवलजीत सिंह और नौशाद अंसारी के रूप में अनोखे अभिनेता बृजेंद्र काला ने चंद दृश्यों के बावजूद अनूठी प्रतिभा का परिचय दिया है। अन्य कलाकारों में सहर्ष कुमार शुक्ला, नीरज सूद ने अपने पात्रों के साथ न्याय किया है।

राकेश चतुर्वेदी की पैनी निर्देशकीय दृष्टि और कसे हुए निर्देशन का नियंत्रण पूरी फिल्म पर दिखता है। निर्माता प्रशांत कुमार गुप्ता, गीतिका गुप्ता और नीतू सबरवाल हैं। रेल्टिक पिक्चर्स के बैनर तले बनी ‘मंडली’ छोटे बजट और सीमित संसाधनों की बजाय बड़े बजट में निर्मित होने पर और भव्य होती। जातिगत भावना से उत्पन्न भेदभाव को उपदेशात्मक होने की बजाए मनोरंजक ढंग से दिखाया गया है। कैमरामैन आयुष जैन ने वास्तविक स्थानों पर अच्छे दृश्य फिल्माए हैं। फिल्म की एडिटिंग बेहतरीन है। संदीप नाथ के लिखे गीतों को दिग्गज गायक सुखविंदर सिंह, देव नेगी, मुग्धा करहड़े, प्रतीक्षा श्रीवास्तव ने सुरीले स्वरों से सजाया है। राहुल मिश्रा द्वारा संगीतबद्ध मधुर पार्श्वसंगीत फिल्म की मनोदशा से पूरी तरह मेल खाता है। फिल्म में चंद कमियां नज़रअंदाज़ की जा सकती हैं। स्क्रिप्ट में कुछ दृश्य पूर्वानुमानित होने के बावजूद फिल्म का प्रवाह बरकरार रहता है, फिल्म की सफलता इस बात में निहित है।

 

‘मंडली’ में रामलीला के कलाकारों का वास्तविक जीवन संघर्ष दर्शाया गया है। जिस मंच पर पुरुषोत्तम के परिवार को अपमानित होकर मंच छोड़ने के लिए विवश किया गया था, अंत में उसी मंच पर अपने नियमों और शर्तों के साथ, सम्मानपूर्वक रामलीला करके वो अपने परिवार को उनका खोया सम्मान वापस दिलवाता है। अंततः राजनीति पर आस्था की जीत विश्वास को दृढ़ करके निराश हृदयों में आशा का संचार करती है। ‘मंडली’ दर्शकों के दिमाग पर बोझ साबित नहीं होती। रामलीला के सांस्कृतिक महत्व से परिचित विशेषकर उत्तर भारतीय दर्शकों को ये फिल्म अवश्य पसंद आएगी। बीते दौर की स्मृति के तौर पर ये असाधारण फिल्म 80 के दशक के अंत और 90 के दशक के प्रारंभ में प्रसारित दूरदर्शन के धारावाहिक का स्मरण कराती है। इस अनूठे प्रयास के लिए राकेश चतुर्वेदी ओम भरपूर प्रशंसा और प्रोत्साहन के पात्र हैं। ‘मंडली’ का चयन नवंबर 2023 में गोवा में आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में दिखाए जाने हेतु हुआ है। ऐसे प्रतिष्ठित फिल्म महोत्सव में इस फिल्म का चयन साबित करता है कि अपार संभावनाओं वाले प्रतिभाशाली, संवेदनशील अभिनेता, निर्देशक राकेश चतुर्वेदी की प्रतिभा को बेहद कम करके आंका गया है। ‘मंडली’ 27 अक्टूबर को रिलीज़ हुई है। हिंदी फिल्मों के फालतू एक्शंस और चकाचौंध भरे ग्लैमर की जगह ये साफ-सुथरी फिल्म परिवार के साथ देखने योग्य है। ये फिल्म सार्थक सिनेमा में दोबारा विश्वास स्थापित करने में यकीनन मददगार साबित हो सकती है। भारतीय संस्कृति और पुरातन परंपराओं में आस्था रखने वालों को ये फिल्म अवश्य देखनी चाहिए। 

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से
Advertisement
Advertisement
Advertisement
  Close Ad