भीमा कोरेगांव मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबडे की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। साथ ही कोर्ट ने नवलखा और तेलतुंबडे को तीन सप्ताह में सरेंडर करने और जल्द से जल्द अपना पासपोर्ट जमा कराने को कहा है।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता नवलखा और तेलतुंबडे को 16 मार्च तक गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की थी। मुंबई हाई कोर्ट ने 14 फरवरी को नवलखा और तेलतुंबडे की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी और उन्हें सुप्रीम कोर्ट अपील करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया था। सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से अपील करते हुए, अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी ने पीठ को बताया था कि हाई कोर्ट द्वारा दोनों को दी गई सुरक्षा 14 मार्च को समाप्त हो जाएगी और शीर्ष अदालत को इसका विस्तार करना चाहिए।
सरकार ने लिए 348 मामले वापस
पिछले दिनों महाराष्ट्र सरकार ने भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में दर्ज कुल 649 मामलों से से 348 को वापस लेने का फैसला लिया था। पहली जनवरी, 2018 को पुणे जिले के भीमा कोरेगांव में हिंसा के बाद गौतम नवलखा, आनंद तेलतुंबड़े और कई अन्य कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुणे पुलिस ने केस दर्ज किया था। उन पर माओवादियों से संबंध होने का आरोप है।
एनआईए को सौंप दी थी जांच
केंद्र ने पिछले महीने पुणे पुलिस से जांच एनआईए को स्थानांतरित कर दी थी, इस कदम की शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की महाराष्ट्र विकास अघाडी सरकार ने आलोचना की थी। हालांकि, बाद में राज्य सरकार ने अपना रुख बदल दिया था और कहा था कि उसे केंद्रीय एजेंसी द्वारा जांच को लेकर कोई आपत्ति नहीं है। बाद में मुख्यमंत्री और शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने बहुचर्चित भीमा कोरेगांव मामले पर यू-टर्न ले लिया। उद्धव ठाकरे ने कहा,"एलगार परिषद का मामला और भीमा कोरेगांव का मामला अलग-अलग है। भीमा-कोरेगांव का मामला दलित भाइयों से जुड़ा हुआ है। इसकी जांच केंद्र को नहीं दी जा सकती। इसे केंद्र को नहीं सौंपा जाएगा, जबकि एलगार परिषद के मामले को एनआइए देख रही है।