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मध्यप्रदेश स्थापना दिवस: खेती में आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश

एक समय था जब कृषि में मध्यप्रदेश की कोई खास पहचान नहीं थी। सिंचाई और बिजली पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध...
मध्यप्रदेश स्थापना दिवस: खेती में आत्मनिर्भर  मध्यप्रदेश

एक समय था जब कृषि में मध्यप्रदेश की कोई खास पहचान नहीं थी। सिंचाई और बिजली पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थी, नतीजन प्रदेश का कृषि क्षेत्र भी इतना व्यापक नहीं था। लेकिन मध्य प्रदेश में कृषि आज रोजगार का बड़ा माध्यम बनी है जो पिछली सरकारों में अनेक विसंगतियों का शिकार रही है। देश में जब भी कृषि विकास की उल्लेखनीय गाथा लिखी जाएगी, देश का हृदय स्थल मध्य प्रदेश का नाम उसमें स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। हाल के कुछ वर्षों में क्षेत्रफल की दृष्टि से देश के दूसरे बड़े राज्य मध्यप्रदेश मध्य प्रदेश ने खेती में अपनी पताका फहराई है। आज प्रदेश की कृषि विकास की उल्लेखनीय उपलब्धियां पूरे देश के लिए चर्चा का विषय बनी हैं ।

 

 

मध्यप्रदेश कृषि प्रधान प्रदेश है और यहां की सारी अर्थव्यवस्था कृषि से ही चलती है। प्रदेश की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी खेती पर निर्भर है। प्रदेश का कुल भौगोलिक क्षेत्र 3 करोड़ 08 लाख 25 हजार हेक्टेयर है। इसमें से 1 करोड़ 72 लाख 52 हजार हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। यानी प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्र में 56 फीसदी जमीन पर खेती होती है। एक दौर ऐसा भी था जब नीति नियंताओं की अदूरदर्शी नीतियां प्रदेश में किसानों पर बोझ बन गई थी जिसके चलते प्रदेश कृषि की तमाम समस्याओं का हल खोज पाने में कामयाब नहीं हो पाया लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पूरी ऊर्जा के साथ खेती की तमाम समस्याओं का निदान करने में लगाया है ,वह अभूतपूर्व है। मुख्यमंत्री चौहान खेती को लाभ का सौदा बनाने में की दिशा में शिद्दत के साथ जुटे हुए हैं। मध्यप्रदेश ने 7 बार राष्ट्रीय स्तर पर कृषि कर्मण अवार्ड लेकर कृषि के क्षेत्र में अपनी शानदार उपलब्धियां हासिल कर पूरे देश में अपना मान बढ़ाया है । यह मुख्यमंत्री शिवराज की किसानों की समस्याओं के प्रति गहरी समझ और किसानों के प्रति संवेदनशीलता का ही परिचायक है कि वे दिन –रात किसानों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने की दिशा में रहकर सारे प्रयास कर रहे हैं।

 

 

 

 

 

किसानों के चेहरों पर लौटी फिर से मुस्कराहट 

 

 

 

कोरोना काल की विषम चुनौतियों के बीच प्रदेश के मुखिया शिवराज ने किसानों के चेहरों पर सही मायनों में मुस्कुराहट लाने का काम किया है। किसान पुत्र मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की कृषि को लेकर दिखाई गई विशेष दिलचस्पी के चलते आज प्रदेश का किसान जहां खुशहाल नजर आता है वहीं उसे फसलों का सही मूल्य भी मिल रहा है। बीते साल कोविड कोरोना लॉकडाउन के कारण प्रदेश की अर्थव्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। किसानों की फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदना बहुत बड़ी चुनौती थी। कोरोना संक्रमण उस समय चरम पर था। दिन पर दिन कोरोना के केस बढ़ते जा रहे थे, ऐसे में कोरोना से बीच बचाव करते हुए फसलें खरीद लेने और उन्हें मंडी तक लाने की विकराल चुनौती सरकार के सामने खड़ी थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी मुख्यमंत्री ने किसानों के साथ खड़ा होकर उन्हें सरकार का समर्थन दिलवाया । एक ओर किसानों के ट्रैक्टर , फसल कटाई, , हार्वेस्टर, कृषि उपकरणों के सुधार आदि की पहल सरकार द्वारा की गई वहीं हर दिन किसानों को एस.एम.एस भिजवाकर खरीदी केंद्रों पर सोशल डिस्टेंसिंग, सेनेटाईजेशन आदि करवाकर समर्थन मूल्य पर खरीदी का कार्य शुरू किया गया। इतनी विषम परिस्थिति में भी मध्यप्रदेश ने गेहूं का ऑलटाइम रिकार्ड उपार्जन किया।

 

 

 

 

 

खेती में हो रहे हैं लगातार नवाचार

 

 

 

खेती किसानी मध्यप्रदेश का आधार है। पहले प्रदेश को बीमारू राज्य माना जाता था। आज सरकार और प्रदेश के किसानों के समन्वित प्रयासों ने मध्य प्रदेश का नाम देश के अग्रणी राज्यों में शुमार कर दिया है जहाँ खेती किसानी खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक बन गई है। आज देश के कुल गेहूँ उपार्जन में एक तिहाई योगदान मध्य प्रदेश का है। एक दौर में पंजाब जो एतिहासिक रूप से गेहूँ उपार्जन में अग्रणी हुआ करता था, वह आज मध्यप्रदेश से काफी पीछे हो गया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में खेती को लाभ का सौदा बनाने के लिए प्रयास पहले से ही प्रारंभ किये थे। सिंचाई सुविधाएँ बढ़ाकर खेती का सिंचित रकबा बढ़ाया गया। किसानों को रियायती दर पर बिजली दी गई। किसानों के लिए सरकार ने शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराने की सुविधा प्रारंभ कराई साथ ही पिछले वर्षों की फसल बीमा की राशि किसानों के खातों में अंतरित की गई।किसानों को उनकी उपज का अधिकतम मूल्य दिलाए जाने के लिए मंडी अधिनियम में संशोधन किया गया, जिससे किसानों को मंडी और सौदा पत्रक के माध्यम से अपनी फसल बेचने की सुविधा दी गई । राज्य में किसान उत्पादक संगठन को स्व-सहायता समूहों की तरह सशक्त बनाने की भी तैयारी भी हुई । गरीब तबके को हर प्रकार की सहायता देने के लिए संबल योजना पुन: प्रारंभ की गई जो आज गरीबों का सुरक्षा कवच बनकर सामने आई है। सरकार ने सहकारी बैंकों की सेहत में सुधार के लिए सहायता भी दी। प्रधानमन्त्री किसान सम्मान निधि , प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना , किसान क्रेडिट कार्ड योजना को प्रदेश में बेहतरीन ढंग से लागू किया गया है। राष्ट्रीय दलहन अनुसंधान केन्द्र भोपाल, अंतर्राष्ट्रीय बोरलॉग इंस्टीट्यूट जबलपुर, अंतर्राष्ट्रीय शुष्क क्षेत्रीय अनुसंधान अमलाहा जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की स्थापना से प्रदेश की खेती को नई दिशा मिली है। कस्टम हायरिंग सेंटर, मार्केटिंग एवं लॉजिस्टिक हब से किसानों को फारवर्ड बेकवर्ड लिंकेज मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। प्रदेश में दो नये कृषि महाविद्यालय बारासिवनी जिला बालाघाट और पंवारखेड़ा जिला होशंगाबाद में स्थापित किये गये हैं। अंतर्राष्ट्रीय-स्तर के दो कृषि संस्थान इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया खमरिया जिला जबलपुर में और अंतर्राष्ट्रीय शुष्क कृषि अनुसंधान केन्द्र (ईकारडा) की स्थापना अमलाहा जिला सीहोर में की गयी है। साथ ही भोपाल में भारत सरकार द्वारा क्षेत्रीय दलहन अनुसंधान केन्द्र स्थापित किया गया है।

 

 

 

 

 

सिंचाई क्षेत्र में वृद्धि

 

 

सोयाबीन उत्पादन में मध्यप्रदेश की भागीदारी 46 प्रतिशत के साथ देश में पहले स्थान पर है । गेहूं, दलहन, मोटे अनाज में भी आज मध्य प्रदेश का देश के अग्रणी राज्यों में जगह बनाने में सफल हुआ है। सिंचाई के क्षेत्र में आज प्रदेश ने आशातीत वृद्धि दर्ज की है। राज्य में सिंचित रकबा वर्ष 2005 में मात्र 6 लाख हेक्टेयर होता था जो बढक़र 42 लाख हेक्टेयर हो गया है। प्रदेश में कुल सिंचित क्षेत्रफल शासकीय एवं निजी स्त्रोतों से लगभग 110.97 लाख हेक्टेयर है।

 

 

 

उद्यानिकी फसलों के क्षेत्र और उत्पादन में भी सफलता

 

 

मध्य प्रदेश में पिछले डेढ़ दशक में उद्यानिकी फसलों के क्षेत्रफल में 5 गुना और उत्पादन में 7 गुना से अधिक वृद्धि हुई है। वर्ष 2006 में उद्यानिकी फसलों का कुल रकबा 4 लाख 69 हजार हेक्टेयर था, जो अब बढ़कर 23 लाख 43 हजार हेक्टेयर हो गया। उद्यानिकी फसलों के क्षेत्रफल में वृद्धि होने का सीधा प्रभाव उत्पादन में हुई वृद्धि में भी दिखाई देता है। इस अवधि में उद्यानिकी फसलों का उत्पादन भी 42 लाख 98 हजार मीट्रिक टन से बढ़कर अब सात गुना से अधिक 340 लाख 31 हजार मीट्रिक टन हो गया है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की नीतियों से उद्यानिकी फसलों के क्षेत्र और उत्पादन में हुई इस उल्लेखनीय वृद्धि का ही परिणाम है कि मध्यप्रदेश मसाला, सब्जी, फल और फूल उत्पादन में देश के पहले 5 राज्यों में शामिल है। प्रदेश मसाला फसलों के उत्पादन में देश में पहले, सब्जी में तीसरे, फूल में चौथे और फल उत्पादन में पाँचवें स्थान पर है।

 

 

मध्यप्रदेश ने किसानों की आय पाँच वर्षों में दोगुना करने का रोड-मेप बनाया है। कृषि, उद्यानिकी, पशुपालन, मछली-पालन, वानिकी, सिंचाई विस्तार, रेशम, कुटीर एवं ग्रामोद्योग आदि विभागों द्वारा रोड-मेप पर कार्य प्रारंभ कर दिया गया है। आदिवासी विकासखण्डों में 50 प्रतिशत उत्पादकता वृद्धि के लिए उन्नत बीज वितरण, उन्नत कृषि आदानों और बेहतर कृषि पद्धतियों की योजना तैयार की गई हैं। प्रदेश के सभी ग्रामों के मिट्टी परीक्षण के डाटा के आधार पर, उर्वरकता मानचित्र तैयार कर जी.आई.एस. पोर्टल से जोड़ा जा रहा है।

 

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से किसानों के हित में चलाई जा रही योजनाएँ प्रदेश के करोड़ों किसानों की आँखों में खुशी, जिंदगी में खुशहाली की गारंटी हैं। आज मध्यप्रदेश उनके नेतृत्व में खेती में देश का सर्वश्रेष्ठ राज्य बन गया है। 

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं ) 

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