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परीक्षा फर्जीवाड़ा: जानें सबसे बड़ा 'जानलेवा घोटाला' के बारे में अहम बातें

“इस घोटाले से जुड़े 11 की जान सड़क दुर्घटना में गई, पांच ने खुदकुशी की, दो की मौत तालाब में डूबने से और...
परीक्षा फर्जीवाड़ा: जानें सबसे बड़ा 'जानलेवा घोटाला' के बारे में अहम बातें

“इस घोटाले से जुड़े 11 की जान सड़क दुर्घटना में गई, पांच ने खुदकुशी की, दो की मौत तालाब में डूबने से और तीन की शराब पीने से हुई”

1982 में गठित व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) के खिलाफ पहली शिकायत जुलाई 2013 में आई थी। मामला मेडिकल प्रवेश परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक का था। घोटाले के रूप में यह जुलाई 2013 में सामने आया। परीक्षा के दिन पुलिस ने इंदौर के होटल पथिक पर छापा मारा। वहां एक व्यक्ति को पकड़ा तो उसने अपना नाम ऋषिकेश त्यागी बताया और कहा कि परीक्षा देने आया है। लेकिन जन्म की तारीख और पिता का नाम उसके कागजात से मेल नहीं खा रहे थे। सख्ती करने पर उसने अपना असली नाम रमाशंकर बताया और कहा कि ऋषिकेश त्यागी की जगह परीक्षा देने उत्तर प्रदेश से आया था। इसके बदले उसे 50 हजार रुपये मिले थे। रमाशंकर के अलावा 20 और नकली परीक्षार्थी पकड़े गए।

उनसे पूछताछ में इंदौर के ही डॉ. जगदीश सागर का पता चला जिसने दूसरों की जगह परीक्षा देने वाले मेडिकल छात्रों का नेटवर्क बना रखा था। व्यापम में नितिन मोहिंद्रा नाम का सिस्टम एनालिस्ट था। डॉ. सागर उसकी मदद से अपने क्लाइंट परीक्षार्थियों के रोल नंबर एक क्रम में लगवाता और हर रोल नंबर के लिए 25 हजार रुपये देता था। पुलिस के अनुसार 2009 से 2013 के दौरान मोहिंद्रा ने सागर के दिए 737 मेडिकल परीक्षार्थियों के रोल नंबर बदले थे।

व्यापम मेडिकल कॉलेज में दाखिले के अलावा सरकारी नौकरियों के लिए भी परीक्षाएं आयोजित करता था। घोटाला करने वालों का पूरा नेटवर्क था जिसके पीछे राजनीतिक ताकत थी। परीक्षाओं में इस तरह की धांधली कोई नई बात नहीं, लेकिन जिस पैमाने पर यह फैला हुआ था वह चौंकाने वाला था।

घोटाला सामने आने पर अगस्त 2013 में शिवराज सिंह चौहान सरकार ने एसआइटी का गठन किया। जून 2015 में एसआइटी ने कहा कि घोटाले से जुड़े सभी 23 लोगों की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई। वैसे, मौतों का गैर-सरकारी आंकड़ा 46 का है। इनमें डॉक्टर, मेडिकल छात्र, पुलिसकर्मी और प्रशासनिक अधिकारी शामिल हैं। राज्य सरकार इन सभी मौतों को संयोग बताती रही। तत्कालीन गृह मंत्री बाबूलाल गौर का बयान था कि जिसने भी जन्म लिया है, एक दिन उसकी मौत होनी ही है।

व्यापम से जुड़ी एक मौत जनवरी 2012 में रिटायर्ड स्कूल शिक्षक मेहताब सिंह डामोर की 19 साल की बेटी नम्रता डामोर की हुई थी। उसकी लाश रेलवे ट्रैक पर मिली। ऊपर के दो दांत टूटे थे और होठों पर भी चोट के निशान थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आश्चर्यजनक रूप से कहा गया कि ‘प्रेम संबंध टूटने से निराश होकर’ उसने खुदकुशी की। तीन साल बाद नम्रता के पिता से मिलने गए दिल्ली के टीवी पत्रकार अक्षय सिंह की भी 4 जुलाई 2015 को संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। उसके बाद सीबीआइ को जांच का जिम्मा दिया गया। सीबीआइ की एफआइआर में भाजपा नेता गुलाब सिंह किरार का भी नाम था, जिसे पार्टी ने निलंबित कर दिया।

एसटीएफ ने 2,235 लोगों को गिरफ्तार किया था, पर उनमें से 1807 को पूछताछ के बाद जमानत पर छोड़ दिया गया। इस मामले में सबसे बड़ी गिरफ्तारी वरिष्ठ मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की हुई, जिनके पास स्वास्थ्य, शिक्षा और खनन विभागों का जिम्मा था। कई मंत्रियों के करीबी गिरफ्तार किए गए। जांच का दायरा बढ़ने के साथ लोगों की मौत होने लगी। जुलाई 2014 में जबलपुर स्थित नेताजी सुभाष मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. डी.के. साकल्ले अपने ही घर के सामने मृत पाए गए। उनका नाम घोटाले में तो नहीं था लेकिन उन्होंने धोखाधड़ी करने वाले कई छात्रों को निकाल दिया था। पुलिस ने कहा कि डॉ. साकल्ले ने खुद केरोसिन डालकर आग लगा ली। उनकी जगह डॉ. अरुण शर्मा डीन बने तो दिल्ली के एक होटल में वे भी एक दिन मृत पाए गए। तब फिर हंगामा हुआ जब मध्य प्रदेश के पूर्व राज्यपाल रामनरेश यादव के 50 वर्षीय बेटे शैलेश यादव की तथाकथित ब्रेन हेमरेज से मौत हो गई। घोटाले में दोनों का नाम आया था।

कांग्रेस ने जून 2014 में शिवराज सिंह की पत्नी साधना सिंह के फोन का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया। आरोप लगाया कि उस फोन से व्यापम घोटाले के जिम्मेदार नितिन मोहिंद्रा और पंकज त्रिवेदी को 139 कॉल किए गए थे। शिवराज ने इसे बेबुनियाद बताया और पुलिस ने कभी उस आरोप की जांच नहीं की।

2013 में मोहिंद्रा की गिरफ्तारी के बाद साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट प्रशांत पांडे का नाम जुड़ा। राज्य सरकार कई मामलों में उनकी मदद ले चुकी थी। कांग्रेस की तरफ से फोन कॉल की सूची जारी करने के बाद पुलिस ने गोपनीय फोन रिकॉर्ड बेचने के आरोप में पांडे को गिरफ्तार किया। उनके कंप्यूटर सीज कर लिए गए। मीडिया से बातचीत में पांडे ने दावा किया कि पुलिस ने उन्हें धमकी दी थी कि अगर किसी को कोई जानकारी दी तो खत्म कर दिए जाओगे। पांडे के अनुसार उनके पास मोहिंद्रा के हार्ड ड्राइव की मिरर इमेज थी। कोर्ट में जमा पुलिस की रिपोर्ट देखकर उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने सबूतों के साथ छेड़छाड़ की है।

मध्य प्रदेश सरकार ने एक बुकलेट भी जारी किया, जिसमें व्यापम से जुड़ी कुछ मौतों का जिक्र था। इसमें बताया गया कि 11 की जान सड़क दुर्घटना में गई, पांच ने खुदकुशी की, दो की मौत तालाब में डूबने से और तीन की अत्यधिक शराब पीने से हुई।

सीबीआइ जांच शुरू होने के बाद मौतों पर ब्रेक लगा। तत्कालीन चीफ जस्टिस एचएल दत्तू ने 9 अक्टूबर 2015 को कहा था, “आश्चर्य है कि सीबीआइ जांच का आदेश दिए जाने के बाद एक भी मौत नहीं हुई।” हालांकि इसके एक सप्ताह बाद ही रिटायर्ड अफसर विजय बहादुर की रेल पटरी पर गिर कर मौत हो गई। उनके साथ सफर कर रही पत्नी ने बताया कि वे डिब्बे का दरवाजा बंद करने गए थे और कभी नहीं लौटे। 29 अगस्त 2015 को व्यापम का नाम बदल कर प्रोफेशनल एक्जामिनेशन बोर्ड कर दिया गया। मौतों का सिलसिला भले रुका हो, घोटालों का सिलसिला जारी है।

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