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कौन थे भारत की पहली निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति राजा महेंद्र सिंह, अब ऐसे किए जाएंगे याद

मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया।...
कौन थे भारत की पहली निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति राजा महेंद्र सिंह, अब ऐसे किए जाएंगे याद

मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजा महेंद्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया। उत्तर प्रदेश सरकार ने 2019 में जब राज्य स्तरीय इस विश्वविद्यालय की घोषणा की थी, तब से ही यह चर्चा में बना हुआ है। इस यूनिवर्सिटी के शिलान्यास कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलीगढ़ पहुंचने और इस यूनिवर्सिटी को खोले जाने को लेकर राज्य सरकार और भाजपा जिन बातों को प्रचारित कर रही थी उसमें कहा जा रहा था कि वह उन लोगों को सम्मान देने का काम कर रही है जिन्हें पिछली सरकारों में भुला दिया गया।

यूनिवर्सिटी का शिलान्यास करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "हमारी आजादी के आंदोलन में कई महान व्यक्तित्वों ने अपना सबकुछ खपा दिया, लेकिन यह देश का दुर्भाग्य रहा है कि आजादी के बाद ऐसे राष्ट्र नायक और नायिकाओं को अगली पीढ़ियों से परिचित ही नहीं कराया गया।"

बीबीसी की खबर के मुताबिक, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर राजा महेंद्र प्रताप सिंह थे कौन और उनका जाट समाज के लिए क्या योगदान रहा है। राजा महेंद्र प्रताप सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के मुरसान रियासत के राजा थे। जाट परिवार से निकले राजा महेंद्र प्रताप सिंह की शख्सियत के कई रंग थे। वे अपने इलाके के काफी पढ़े-लिखे शख्स तो थे ही, लेखक और पत्रकार की भूमिका भी उन्होंने निभाई। पहले विश्वयुद्ध के दौरान अफगानिस्तान जाकर उन्होंने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई। वे इस निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति थे।

एक दिसंबर, 1915 को राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अफगानिस्तान में पहली निर्वासित सरकार की घोषणा की थी।

निर्वासित सरकार का मतलब है कि अंग्रेजों के शासन के दौरान स्वतंत्र भारतीय सरकार की घोषणा। राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने जो काम किया था, वही काम बाद में सुभाष चंद्र बोस ने किया था। इस लिहाज से देखें तो दोनों में समानता दिखती है।

हालांकि सुभाष चंद्र बोस कांग्रेसी थे और राजा महेंद्र प्रताप सिंह घोषित तौर पर कांग्रेस में नहीं रहे। हालांकि उस दौर में कांग्रेस के बड़े नेताओं तक उनकी धमक पहुंच चुकी थी। इसका अंदाजा महेंद्र प्रताप सिंह पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ से होता है जिसमें उनके महात्मा गांधी से संपर्क का जिक्र है।

बहरहाल, सुभाष चंद्र बोस निर्वासित सरकार के गठन के बाद स्वदेश नहीं लौट सके, लेकिन राजा महेंद्र प्रताप सिंह भारत भी लौटे और आजादी के बाद राजनीति में भी सक्रिय हुए। 32 साल तक देश से बाहर रहे राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने भारत को आजाद कराने की कोशिशों के लिए जर्मनी, रूस और जापान जैसे देशों से मदद मांगी। हालांकि वे उसमें कामयाब नहीं हुए।

1946 में जब वो भारत लौटे तो सबसे पहले वर्धा में महात्मा गांधी से मिलने गए, लेकिन भारतीय राजनीति में उस दौर की कांग्रेस सरकारों के जमाने में उन्हें कोई अहम जिम्मेदारी निभाने का मौका नहीं मिला।

जवाहर लाल नेहरू की विदेश नीति में जर्मनी और जापान मित्र देश नहीं रहे थे और राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने इन देशों से मदद मांगकर आजादी की लड़ाई शुरू की थी। ऐसे में राजा महेंद्र प्रताप सिंह को कांग्रेस में बहुत ज्यादा तरजीह नहीं मिली।

बहरहाल, 1957 में वे मथुरा से चुनाव लड़े और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने जीत हासिल की। इस चुनाव की सबसे खास बात यह थी कि जनसंघ के उम्मीदवार के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी भी यहां चुनाव मैदान में खड़े हुए थे।

उस चुनाव में राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने कांग्रेस के चौधरी दिगंबर सिंह को करीब 30 हजार वोटों से हराया था।  

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गौरतलब है कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र थे। जब वे यहां पढ़ते थे, तब इस यूनिवर्सिटी को मोहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेजिएट स्कूल कहा जाता था। महेंद्र प्रताप ने इस विश्वविद्यालय के विकास के लिए जमीन भी दी थी। उन्होंने 1929 में करीब तीन एकड़ की जमीन दो रुपये सालाना की लीज पर दे दी थी। यह जमीन मुख्य कैंपस से अलग शहर की ओर है जहां आज आधे हिस्से में सिटी स्कूल चल रहा है और आधा हिस्सा अभी खाली है। राजा महेंद्र प्रताप सिंह के योगदान को यूनिवर्सिटी कैंपस में किस तरह से संजोया गया है, इस बारे में पूछने पर उमर पीरजादा ने बताया, हम लोगों की सेंट्रल लाइब्रेरी, मौलाना आजाद लाइब्रेरी में उनकी बड़ी तस्वीर लगी है, उन पर कई किताबें हम लोगों ने खास तौर पर रखी हैं और समय-समय पर उनके सम्मान में सेमिनार और संगोष्ठियां होती रही हैं।

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