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2जीः 2000 पन्नों का फैसला, कठघरे में अभियोजन पक्ष का रवैया

2जी घोटाले में सीबीआई जज ओपी सैनी ने सभी आरोपियों को बरी करते हुए गुरुवार को कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों...
2जीः 2000 पन्नों का फैसला, कठघरे में अभियोजन पक्ष का रवैया

2जी घोटाले में सीबीआई जज ओपी सैनी ने सभी आरोपियों को बरी करते हुए गुरुवार को कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित नहीं कर पाया। एक पंक्ति में फैसला सुनाते हुए उन्होंने कहा, ‘पैसों का लेनदेन साबित नहीं हो सका इसलिए मैं सभी आरोपियों को बरी कर रहा हूं।’ आनंद ग्रोवर, केके गोयल और एके राव अभियोजन पक्ष के वकील थे। 2000 पन्नों के फैसले में जज ने अभियोजन पक्ष पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। बताया है कि किस कदर सुनवाई बढ़ने के साथ अभियोजन की दलीलें कमजोर पड़ती गई। पढ़िए फैसले का अंश,

सुनवाई की शुरुआत में अभियोजन पक्ष काफी उत्साहित था। जैसे-जैसे सुनवाई आगे बढ़ती गई अभियोजन पक्ष काफी सशंकित लगने लगा। उनकी दलीलों से यह तय करना मुश्किल होने लगा कि वे क्या प्रमाणित करना चाहते हैं। सुनवाई खत्म होते-होते वे दिशाहीन लगने लगे। साक्ष्यों के अवलोकन से चीजें स्पष्ट होने के कारण बहुत कुछ लिखने की जरूरत नहीं है। अभियोजन पक्ष के रवैए को बताने के लिए कुछ उदाहरण पर्याप्त होंगे। अभियोजन की ओर से अदालत में कई आवेदन और जवाब दाखिल किए गए। सुनवाई के अंतिम चरण तक किसी वरिष्ठ अधिकारी या अभियोजकों ने इन आवेदनों और जवाबों पर हस्ताक्षर करने की तत्परता नहीं दिखाई। सबसे कनिष्ठ अधिकारी इंस्पेक्टर मनोज कुमार के दस्तख्त के साथ इन्हें पेश किया गया। वरिष्ठ अभियोजक से जब इस संबंध में पूछा जाता तो वे कहते थे कि विशेष अभियोजक दस्तख्त करेंगे। जब विशेष अभियोजक से इस संबंध में सवाल किया जाता था तो उनका जवाब होता था कि सीबीआई के अधिकारी दस्तख्त करेंगे। आखिरकार याचिका/ जवाब इंस्पेक्टर के दस्तख्त के साथ दाखिल किए गए। यह बताता है कि न तो कोई जांचकर्ता और न ही कोई अभियोजक कोर्ट में दाखिल जवाबों की जिम्मेदारी लेने को तैयार था। जब अंतिम बहस शुरू हुई, विशेष अभियोजक ने अदालत को बताया कि वे लिखित जवाब पेश करेंगे। लेकिन, वे कई महीनों तक मौ‌खिक रूप से बहस करते रहे। आखिरी बहस तक अभियोजन पक्ष ने लिखित जवाब दायर नहीं किया। विशेष अभियोजक ने कहा कि यदि बचाव पक्ष लिखित में अपनी दलीलें देगा तभी वे लिखित जवाब दायर करेंगे। यह बेहद अनुचित था। अभियोजन पक्ष को मौखिक बहस की शुरुआत के सा‌थ तो कम से कम लिखित जवाब दायर कर देना चाहिए था। बचाव पक्ष ने ऐसा किया था। जवाबी बहस शुरू हुई तो अभियोजन पक्ष लिखित जवाब दायर करने लगा। सबसे दुखद यह था कि विशेष अभियोजक ने जो जवाब दायर किए उस पर वे दस्तख्त करने को तैयार नहीं थे। कानून की नजर में ऐसे दस्तावेज का क्या मतलब है जिस पर किसी के दस्तख्त नहीं हो? जब विशेष अभियोजक से पूछा गया कि उन्होंने ऐसे दस्तावेज क्यों दायर किए जिस पर हस्ताक्षर नहीं हैं तो उनका जवाब था कि बचाव पक्ष के कुछ वकीलों ने भी ऐसा किया है। अदालत को आदेश जारी करना पड़ा कि वे दस्तख्त कर ही जवाब दायर करें। ऐसा नहीं करने पर अदालत ने इस पर गौर नहीं करने की चेतावनी दी। विशेष अभियोजक और रोजाना सुनवाई पर पेश होने वाले वकील दो अलग-अलग दिशाओं में जा रहे थे। उनके बीच कोई तालमेल नहीं था। कई चीजें कहने को हैं, लेकिन इससे आदेश की कॉपी के पन्नों में ही इजाफा होगा।"

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