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भीमाकोरेगांव केस में नौ कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमा चलाए ही सजा मिल रही

मानवाधिकार मामलों के अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग की पत्नी मीनल गाडलिंग कहती है, “उनका साथ न होने से...
भीमाकोरेगांव केस में नौ कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमा चलाए ही सजा मिल रही

मानवाधिकार मामलों के अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग की पत्नी मीनल गाडलिंग कहती है, “उनका साथ न होने से हमारे लिए बहुत मुश्किल है। मुझे कोई सकारात्मक नतीजा निकलने की कोई उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है।” सुरेंद्र गाडलिंग को पुणे की यरवदा जेल में बंद हुए एक साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है। छह जून, 2018 की तड़के जब सुरेंद्र को उनके घर से गिरफ्तार किया गया था, मीनल ने कभी यह कल्पना नहीं की थी कि उन्हें इतने लंबे समय तक पति के बिना रहना होगा। पुलिस आरोल गता है कि वह उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने एलगार परिषद की बैठक आयोजित की थी। दावा है कि इस बैठक में भाषणों के कारण महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में जनवरी 2018 के दौरान हिंसा भड़की। भीमा-कोरेगांव हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे।

इन लोगों को किया गया था गिरफ्तार

जिस दिन सुरेंद्र गाडलिंग को गिरफ्तार किया गया, उसी दिन पूरे देश में छापे मारे गए और चार अन्य लोगों- कवि एवं प्रकाशक सुधीर धवाले, शिक्षाविद एवं महिला अधिकार कार्यकर्ता शोमा सेन, लोकतांत्रिक अधिकार कार्यकर्ता महेश राउत और रोना विल्सन को भी हिरासत में ले लिया गया। इन सभी पांचों पर प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) से संबंध रखने का आरोप लगाया गया और अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट (यूएपीए) के तहत केस दर्ज किया गया। दो महीने बाद, 28 अगस्त को कवि-कार्यकर्ता वारावर राव, वकील एव यूनियन नेता सुधीर भारद्वाज, वकील, लेखक एवं कार्टूनिस्ट अरुण फरेरा और कार्यकर्ता एव कॉलमिस्ट वेरनोन गोंजाल्विस को भी हिरासत में ले लिया गया।

सुरेंद्र गाडलिंग की पत्नी को कोई उम्मीद नहीं बची

एक साल से ज्यादा अरसा गुजर जाने के बाद भी पुणे के सेशन कोर्ट में सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत प्रक्रिया चल रही है। मीनल को न्यायपालिका से भी कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। वह कहती हैं कि उनके पति के खिलाफ फर्जी केस बनाया गया है। उन्हें चुप करने के लिए केस दर्ज किया गया। आम गृहिणी मीनल अब अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए छोटा कारोबार चला रही हैं। मीनल कहती हैं, “एक वकील होने के नेता उनका कर्तव्य दलितों और आदिवासियों को न्याय दिलाना था। वह सिर्फ अपना काम कर रहे थे। लेकिन पुलिस ने उन्हें नक्सली बता दिया।” कई वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कार्यकर्ताओं के परिजनों की भावना है कि अदालती कार्रवाई में उन्हें असामान्य देरी, अनिश्चितता झेलनी पड़ रही हैं। यहां तक कि उन्हें जमानत भी नहीं मिल पा रही है और वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है। विचाराधीन कैदियों के लिए मूलभूत सुविधाओं जैसे चारपाई, कुर्सी, पंखा और टेबल की कमी भी चिंता का विषय है।

अधिवक्ता मानते हैं केस बहुत कमजोर

कार्यकर्ताओं के परिवारी सदस्य मानते हैं कि पुलिस कार्रवाई उनकी आवाज को दबाव का स्पष्ट मामला है। पिछले एक साल के दौरान पुलिस का बयान बार-बार बदलना इसी ओर संकेत देता है। पहले भीमा-कोरेगांव हिंसा का आरोप लगाया गया, बाद में कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रची गई। सबूत के दौर पर पुलिस ने 18 अप्रैल 2017 के एक ईमेल का हवाला दिया। दावा किया गया कि यह ईमेल विल्सन के लैपटॉप से बरामद किया गया। कई वकीलों ने इस ईमेल और दूसरे पत्रों की सत्यता पर सवाल उठाए। दावा किया गया कि कार्यकर्ताओं ने ये पत्र लिख थे। एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “अभियोजन पक्ष बहुत कमजोर है।  पुलिस ने किसी के कंप्यूटर से बरामद डाटा पर केस बनाया है। पत्र किसी भी कार्यकर्ता को संबोधित नहीं हैं और न ही उन पर हस्ताक्षर हैं। स्कैन की गई प्रतियों पर भी हस्ताक्षर नहीं हैं।”

वेरनोर गोंजाल्विस के केस में पुलिस ने उनके घर से जब्त कुछ पुस्तकों की सूची बनाई है जिन्हें उनके खिलाफ सबूत के तौर पर दिखाया गया है। अधिवक्ता ने कहा कि ये प्रतिबंधित पुस्तकें नहीं हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को डर है कि यह नए आपातकाल क शुरूआत है क्योंकि कमजोर सबूतों और उनकी रिहाई के लिए चारों ओर से मांगें उठाने के बावजूद आरोपियों को जमानत नहीं मिल रही है।

सुप्रीम कोर्ट का दखल देने से इन्कार

ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के कोलिन गोंजाल्विस के अनुसार सुप्रीम कोर्ट को इन कार्यकर्ताओं को सुरक्षा देनी चाहिए थी लेकिन प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर और चार अन्य लोगों की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देने से इन्कार कर दिया। गोंजाल्विस कहते हैं, “यह बड़ी गलती है। पुलिस जानती है कि उनके पास कोई सबूत नहीं है। उनकी मंशा दोषी साबित करने की नहीं है बल्कि वह जहां तक संभव हो, उन्हें सलाखों के पीछे रखना चाहती है।”

पिछले शुक्रवार को बांबे हाईकोर्ट में भारद्वाज की जमानत याचिका पर तर्क देते हुए अधिवक्ता युग मोहित चौधरी ने कहा कि पुणे पुलिस ने उनके खिलाफ कोई सबूत पेश नहीं किया जो उनके इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज से बरामद किया गया हो। पिछले साल जमान देने से पुणे सेशन कोर्ट के इन्कार के बाद हाई कोर्ट फरेरा, गोंजाल्विस और भारद्वाज की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।

कानूनी प्रक्रिया में देरी पर नाराजगी

सुनवाई के दौरान, वकीलों ने तर्क दिया कि पुलिस ने बिना किसी पुख्ता सबूत के गिरफ्तारियां कीं। न्यायिक प्रक्रिया में देरी पर नाराजगी जताते हुए इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपुल्स लॉयर्स (आइएपीएल) के उपाध्यक्ष एम. वेंकन्ना ने कहा कि भारद्वाज की गिरफ्तार मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता का खुला उल्लंघन है। उन्होंने कहा, “एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता भारद्वाज ने वंचित लोगों के लिए संघर्ष करने का काम चुना। वह छत्तीसगढ़ में कोल माइनिंग क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा कर रहे आदिवासियों और श्रमिकों की रैली कर रही थीं।” भारद्वाज आइएपीएल की सदस्य भी हैं।

मुश्किलों से जूझ रहे परिजन

शोमा सेन की पुत्री, मुंबई में फिल्म निर्माता कोइल सेन कहती हैं कि अनावश्यक देरी और केस में पेचीदगी के कारण जमानत मिलने में मुश्किल आ रही है। कोइल के लिए पिछला एक साल अपना मां के बिना बहुत कठिनाई भरा रहा। वह कहती हैं, “अपनी मां के विपरीत, मुझ में मजबूती और इच्छा शक्ति की कमी है। हम जानते हैं कि जहां तक संभव हो, केस को लंबा खींचने के प्रयास होंगे। ताकि गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के परिवार शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक तौर पर टूट जाएं। मेरी मां बहुत ही मजबूत इंसान हैं। उन्होंने महिलाओं और दबे-कुचले लोगों के अधिकारों के लिए पूरे जीवन में संघर्ष किया।”

पुणे के सेशन कोर्ट में शोमा का केस देख रहे अधिवक्ता राहुल देशमुख कहते हैं कि उनकी गिरफ्तार कमजोर आधारों पर किया गया।  कथित तौर पर विल्सन के लैपटॉप से बरामद किए गए पत्र ही उनकी गिरफ्तारी के लिए सबूत हैं। पूरा मामला धारणा के आधार पर है। कोइल के अनुसार अभियोजन पक्ष और अन्य वजहों से प्रक्रियागत देरी ही परीक्षण के दौरान आरोपियों के लिए सजा बना गई है जो उन्हें बिना दोषी ठहराए मिल रही है। वह कहती हैं कि पुणे जिला अदालत के जज का जून के अंत में अनायास ट्रांसफर हो गया।  इसलिए जमानत के तर्क दोबारा सुने गए। इससे प्रक्रिया में स्वतः ही देरी हो गई।

लंबी खिंच रही अदालती लड़ाई

वारावर राव के साले, सांस्कृतिक कार्यकर्ता और पत्रकार एन. वेणुगोपाल कहते हैं कि वह छह सितंबर को पुणे कोर्ट से जमानत याचिका खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। दो प्रकार के जमानत आवेदन हैं। डिफॉल्ट बेल गुण-दोष पर आधारित होती है। दूसरा सभी आरोपियों का जमानत आवेदन है। इस आवेदन को लंबित रखा गया है। इस आवेदन पर सुनवाई बरामद किया गया डिजिटल मैटीरियल के क्लोनिंग प्रोसेस के बाद ही होगी। पूरे डाटा की कॉपी करने में तीन साल का वक्त लग सकता है। हालांकि राव को दूसरे आरोपों में गिरफ्तार किया गया था, उनकी छोटी बेटी, स्कूल लेक्चरर पवन कहती हैं कि यरवदा जेल की खराब स्थिति होने के कारण ज्यादा परेशानी है। उनके पिता 80 साल के हो गए हैं। दूरी भी उनके लिए बाधा बन गई है। जब वह तेलंगाना जेल में थे, वहां कम से कम जेल मेनुअल का पालन होता था। लेकिन यरवदा जेल में ऐसा कुछ भी नहीं है। जब गाडलिंग ने मेनुअल के बारे में पूछा तो जेल सुपरिंटेंडेंट ने कहा कि कैदियों के लिए इसका कोई मतलब नहीं है। यह बिना मुकदमे के सजा है। पुलिस ने उन्हें यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया है। कोइल कहती हैं, “मैं सभी को बताना चाहती हूं कि नौ निर्दोष लोग मानवाधिकार कार्यकर्ता जेल में एक साल से ज्यादा समय से सड़ रहे हैं। जबकि उनका कोई दोष नहीं है।”

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