मीडिया ट्रायल को हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। झूठे मामले को आगे बढ़ा रही जांच एजेंसी जानती थी कि अदालत में उनका पक्ष टिक नहीं पाएगा। इसलिए उसने हमारे खिलाफ एक कहानी गढ़ने के लिए मीडिया का सहारा लिया
मुझे वे अंतहीन रातें याद हैं। मैं ये शब्द गहरे, अनसुलझे दर्द के साथ लिख रही हूं। ऐसा दर्द जिसे समय कम तो कर देता है लेकिन पूरी तरह मिटा नहीं पाता। मेरे पति, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित, 1994 में भारतीय सेना में शामिल हुए और उन्होंने सैन्य खुफिया (मिलिट्री इंटेलिजेंस) में सेवा दी। उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में तैनात किया गया, जिनमें एक कार्यकाल जम्मू-कश्मीर में भी शामिल था। वहां वे सुरक्षा खतरों से जुड़ी जानकारियां जुटाने जैसे दायित्व निभा रहे थे। सितंबर 2008 में मालेगांव बम धमाके के बाद महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने पुरोहित को गिरफ्तार किया। एटीएस ने आरोप लगाया कि वे भी साजिश का हिस्सा थे। ये आरोप झूठे थे। उनकी गिरफ्तारी ने मुझे झकझोर कर रख दिया। आतंकवाद के आरोप से जुड़ा कलंक बहुत बड़ा होता है। एक सेना अधिकारी के लिए तो और भी अधिक। हमें इस सच्चाई को स्वीकार करने और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने का साहस जुटाने में कुछ समय लगा। यह ऐसी लड़ाई साबित हुई, जो 17 वर्षों तक चली। मैंने कभी, एक पल के लिए भी उनकी बेगुनाही पर संदेह नहीं किया। कानूनी संघर्ष 2008 से 2025 तक खिंचा। 2011 में ही सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिकाएं दायर की गई थीं। मेरी याचिका पर सुनवाई होने में ही सात साल लग गए। 2011 में मामला एटीएस से राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) को स्थानांतरित कर दिया गया। एनआइए की पैरवी कर चुके एक वकील ने एक बार मुझसे कहा था, “मैडम, आप हर सुनवाई में आती थीं, लेकिन हमें कहा गया था कि इस मामले को सूचीबद्ध ही न किया जाए।” 2014 में जाकर बात आगे बढ़ना शुरू हुईं। मैं लगभग हर सुनवाई में मौजूद रहती थी, बार-बार यात्रा करती, इस उम्मीद में कि एक दिन सच सामने आएगा। वह सामने आया भी। जिन सेना अधिकारियों ने गवाही दी, उन्होंने पुरोहित की किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया। पुलिस अधिकारी यह नहीं बता सके कि उन्होंने उन्हें गिरफ्तार क्यों किया। मुझे याद है, वे बार-बार यही कहते रहे कि उन्हें ऐसा करने के लिए कहा गया था। पुरोहित लगभग नौ वर्षों तक, 2017–2018 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने तक तालोजा सेंट्रल जेल में विचाराधीन कैदी के रूप में बंद रहे।
हमारे देश में अदालती लड़ाइयां वर्षों चलती हैं, लेकिन ऐसे कठिन समय में ही यह पता चलता है कि आपके असली दोस्त और शुभचिंतक कौन हैं। जो लोग उन्हें अच्छी तरह जानते थे, उन्हें पूरा यकीन था कि वे निर्दोष हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी थे जिन्हें इसी में आनंद आता था कि वे बदनाम हो रहे हैं। हमें उन जगहों से समर्थन मिला, जहां से हमने कभी उम्मीद भी नहीं की थी। जिन अधिकारियों और सैनिकों ने अलग-अलग तैनातियों में पुरोहित के नेतृत्व में या उनके साथ काम किया था, वे संपर्क में बने रहे। उन्होंने पत्र लिखे, फोन किए और उनकी बेगुनाही का भरोसा दिलाया। वर्षों तक दोहराए गए उनके ये स्नेहपूर्ण शब्द मुझे लड़ाई जारी रखने की ताकत देते रहे।
हम दो बातों के शिकार बने, पहली अन्यायपूर्ण जांच और दूसरी मीडिया ट्रायल। मीडिया ट्रायल को हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। झूठे मामले को आगे बढ़ा रही जांच एजेंसी जानती थी कि अदालत में उनका पक्ष टिक नहीं पाएगा। इसलिए उसने हमारे खिलाफ एक कहानी गढ़ने के लिए मीडिया का सहारा लिया।
मीडिया ट्रायल बेहद पीड़ादायक था। आज भी मैं एक अहम सवाल का जवाब ढूंढ रही हूं कि मीडिया को एकतरफा नैरेटिव लिखने के लिए जानकारी कौन देता है? प्रेस कॉन्फ्रेंस की गईं, बयानों के हिस्से बार-बार टीवी पर दिखाए गए और हमारी निजी पीड़ा को सार्वजनिक तमाशा बना दिया गया। हालांकि इस पूरे समय में सेना हमारे साथ खड़ी रही। मामला लंबित होने के कारण पदोन्नति रोक दी गई थी लेकिन कुछ समय बाद उसका कोई महत्व नहीं रह गया। उससे भी ज्यादा दर्दनाक यह था कि एक अच्छे अधिकारी को अपने कर्तव्य निभाने और देश की सेवा करने से वंचित कर दिया गया।
व्यक्तिगत स्तर पर यह यात्रा और भी अधिक कष्टदायक थी। उनकी गिरफ्तारी के बाद से ही मैं हमारे दोनों बच्चों की एकमात्र अभिभावक बन गई। उस वक्त हमारे बच्चे बहुत छोटे थे। आपसी सहमति से ही हमने तय किया कि हमारे बच्चे, कभी भी जेल जैसी अंधेरी जगह नहीं जाएंगे। इसके बजाय, जब भी संभव होता, मैं उन्हें अदालत की सुनवाइयों में साथ ले जाती थी। वे अपने पिता के साथ बड़ा होने से वंचित रह गए। उन नौ वर्षों में पुरोहित स्कूल की उपलब्धियों, त्योहारों और पारिवारिक अवसरों पर अनुपस्थित रहे। इस नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती। उनके बरी होने के बाद क्या हम दोबारा उन पलों को जी पाएंगे? तो इसका जवाब नहीं है।
जेल की सजा भावनात्मक रूप से इंसान को तोड़ देती है। जेल जीवित श्मशान की तरह है। जब कोई शव श्मशान पहुंचता है, तो वह सिर्फ एक शरीर रह जाता है, उसकी सारी पहचानें छिन जाती हैं। जब पुरोहित को जेल भेजा गया, तो उनकी सारी पहचानें छिन गईं, शीर्ष सेना अधिकारी की, देशभक्त नागरिक की, समर्पित पेशेवर की, स्नेही पति और पिता की। वे सिर्फ एक विचाराधीन कैदी रह गए, एक बैज नंबर के साथ। जो व्यक्ति गर्व से सेना की वर्दी पहनता था, उसे विचाराधीन कैदियों की वर्दी पहननी पड़ी। उन्होंने उस समय क्या महसूस किया होगा, इसे शब्दों में बयान करना मेरे लिए असंभव है।
जेल में बंद कैदियों को आपकी पहचान से कोई मतलब नहीं होता। आप बस उन्हीं में से एक होते हैं। अंततः आपके चरित्र की मजबूती ही दूसरों को यह समझने में मदद करती है कि आप वास्तव में कौन हैं। प्रसाद का अन्य कैदियों के साथ बहुत ज्यादा मेलजोल नहीं था। वे ज्यादातर समय किताबें पढ़ते थे। डायरी लिखना उन्हें मानसिक रूप से संतुलित बनाए रखता था। उनका झुकाव हमेशा से आध्यात्म की ओर रहा है। जेल में उन्होंने उपनिषद और भगवद्गीता पढ़ी। दर्शन पर चर्चा हमारे पारिवारिक संवादों का हिस्सा रही है। दर्शन की ओर मुड़ना जेल में उनके लिए सहारा बना। उन्होंने प्रकृति पर कई किताबें पढ़ीं। उनकी स्वतंत्रता छीन ली गई थी। वे काम के दीवाने थे, लेकिन जेल में उनके पास करने को कुछ नहीं था। किताबें रखने या साधारण दवाइयां भी अपने पास रखने के लिए उन्हें औपचारिक अनुमति लेनी पड़ती थी।
वे जेल से अक्सर हमें पत्र लिखते थे। उन्होंने अपने अनुभवों के बारे में भी लिखा। अपनी कुछ रचनाएं उन्होंने मेरे और हमारे बच्चों के साथ साझा की। पूरे मुकदमे के दौरान बच्चे सामान्य रहने की कोशिश करते रहे, लेकिन भीतर ही भीतर उन्हें पता था कि कुछ बहुत भयानक घटित हुआ है। मुझे वह दिन याद है जब 2017–18 में उन्हें जमानत मिली। हमारा बड़ा बेटा तब कॉलेज के पहले वर्ष में था। सभी जानते थे कि उसके पिता कौन हैं। उसके दोस्तों ने उससे कहा कि उसे अपने पिता पर गर्व होना चाहिए। शायद यह मेरी अपनी घबराहट थी, जो मुझे डराती थी। वास्तव में, लोग मेरी कल्पना से कहीं ज्यादा खुले और करुणामय थे।
31 जुलाई 2025 को मुंबई की विशेष एनआइए अदालत ने अपना फैसला सुनाया। मुकदमे का सामना कर रहे सभी सातों आरोपियों, जिनमें पुरोहित और प्रज्ञा सिंह ठाकुर भी शामिल थे, को बरी कर दिया गया। अदालत ने दर्ज किया कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे आरोप सिद्ध करने में असफल रहा। किसी भी साजिश को साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय सबूत नहीं थे। आरडीएक्स की खरीद और भंडारण से जुड़े आरोप भी ठोस प्रमाण के अभाव में सिद्ध नहीं हो सके।
इस बरी होने के साथ, गिरफ्तारी से लेकर अंतिम फैसले तक 17 वर्षों की कानूनी प्रक्रिया आखिरकार खत्म हुई। पुरोहित को रिहा किया गया और जल्द ही उन्हें सेना में फिर बहाल कर दिया गया। सितंबर 2025 में उन्हें कर्नल के पद पर पदोन्नत किया गया। बीच के वर्षों की उनकी मूल वरिष्ठता बहाल की गई। उन्हें दत्ताजी शिंदे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
जब वे पुणे में घर लौटे, तो सोसायटी के सदस्यों ने फूलों, पटाखों, पोस्टरों से उनका स्वागत किया। हमारे लंबे संघर्ष के साक्षी रहे पड़ोसी जश्न मनाने के लिए इकट्ठा हुए। वर्षों की चुप्पी और अलगाव के बाद मिला यह समर्थन भावनाओं से भर देने वाला था।
हालांकि, ये घाव बने रहेंगे। सत्रह साल का विछोह, सार्वजनिक कलंक, आर्थिक बोझ और भावनात्मक थकावट कम नहीं होता। हमारे बच्चे अपने पिता के मार्गदर्शन के बिना बड़े हुए। बहुत लंबे समय तक मैंने सारी जिम्मेदारियां अकेले उठाईं। इस अनुभव ने व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर किया, जैसे लंबी अवधि तक विचाराधीन कैद, मीडिया कवरेज, सबूतों के दुरुपयोग पर जवाबदेही का अभाव।
भारत की जेलों में वर्षों से फंसे हर विचाराधीन कैदी और हर उस परिवार के लिए, जिनके मामले दशकों तक खिंचते हैं, जिनके घर टूट जाते हैं और जिनकी जिंदगियां ठहर जाती हैं, उनके लिए सुधार अनिवार्य है। मुकदमों का निपटारा तेजी से होना चाहिए। जांच में मजबूत जवाबदेही होनी चाहिए। गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) जैसे कानूनों का दुरुपयोग न हो, यह ध्यान रखा जाना चाहिए। ये बदलाव विकल्प नहीं, अनिवार्य होना चाहिए। ताकि किसी दूसरे के परिवार को वह सब न झेलना पड़े, जो हमने झेला।
हम बिना किसी शर्त के इस देश से प्रेम करते हैं। राष्ट्र सर्वोपरि है और संस्थाओं में कमियों के बावजूद अंततः हमें न्याय मिला। पुरोहित वापस सेवा में हैं और उसी समर्पण के साथ अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। हम आगे बढ़ते हैं, उन कठिन वर्षों से मिले सबक को साथ लिए हुए, इस उम्मीद के साथ कि किसी और परिवार को ऐसा दौर न देखना पड़े।
(रमजान के दौरान 8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव में एक मस्जिद के पास हुए बम विस्फोटों में 30 से अधिक लोग मारे गए थे। पुलिस ने शुरुआत में मुसलमानों को दोषी ठहराया, लेकिन एनआइए की जांच के बाद हिंदुत्ववादी उग्रवादियों को आरोपी बनाया गया। शुरुआती गिरफ्तारियों में नौ मुस्लिम युवक शामिल थे, लेकिन बाद में लोकेश शर्मा, धन सिंह, राजेंद्र चौधरी, मनोहर नरवरिया, स्वामी असीमानंद, प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित सहित संदिग्धों के नाम सामने आए।)