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विवादों में एक और जूदेव

छत्तीसगढ़ के जशपुर राजघराने के जूदेव खानदान का विवादों से पूरा नाता रहा है। कभी भाजपा के पूर्व सांसद दिवंगत दिलीप सिंह जूदेव कैमरे पर पैसे को खुदा के बराबर करार देते पकड़े गए थे और अब भाजपा के राज्यसभा सासंद रणविजय सिंह जूदेव के छोटे भाई विक्रमादित्य सिंह जूदेव की एक हरकत ने आखिर यह साबित कर दिया कि छत्तीसगढ़ के पिछले इलाकों में आज भी सामंतवादी ताकतें लोकतंत्र पर हावी हैं।
विवादों में एक और जूदेव

जशपुर राजघराने के सदस्य विक्रमादित्य सिंह जूदेव ने गत 6 अप्रैल को जशपुर शहर के भागलपुर क्षेत्र में निजी स्कूल के संचालक परमेश्वर गुप्ता के साथ मारपीट कर उसे अपने पजेरो वाहन से रौंद दिया। वह रांची के एक अस्पताल में भर्ती हैं। विवाद यह बताया जा रहा है कि विक्रमादित्य द्वारा दस साल पहले बेची गई जमीन की कीमत वर्तमान दर से मांगी जा रही थी जिसे गुप्ता परिवार देने को तैयार नही था। यह विवाद काफी समय से चला आ रहा था। वैसे विक्रमादित्य का विवादों से पुराना नाता रहा है। उस पर अपहरण और हत्या के प्रयास जैसे मामले पहले से चल रहे हैं और दो मामलों में स्थाई वारंट जारी है। जशपुर के एसपी गिरिजाशंकर जायसवाल ने आउटलुक को बताया कि विक्रमादित्य की गिरक्रतारी के लिए न केवल सीमावर्ती राज्यों में घेरेबंदी की गई है बल्कि उसका सुराग देने वाले के लिए पांच हजार रुपये का इनाम भी घोषित किया गया हैं। पुलिस रिकार्ड में वह फरार घोषित हैं।
इधर राज्यसभा सांसद रणविजय सिंह जूदेव ने इस पूरे मामले को इस लिहाज से दुर्भाग्यपूर्ण बताया कि उनके छोटे भाई के इस कृत्य में उन्हेें घसीटा जा रहा है जबकि पिछले बीस साल वह अलग रह रहे हैं। रणविजय सिंह ने आउटलुक को बताया कि उनके बीच संपîिा का बंटवारा 20 साल पहले ही हो गया और वैसे भी राजनीतिक विचारधारा के रूप मे देखें तो वह कांग्रेस में था और हम भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं। रणविजय सिंह की मानें तो जशपुर की जनता आज भी राजघराने के साथ खड़ी है। रहा सवाल विक्रमादित्य की हरकतों का तो कानून अपना काम कर रहा है। कानून के तहत उसे सजा मिलनी चाहिए। गौरतलब है कि घटना के समय रायपुर में रहे रणविजय सिंह घटना के बाद सीधे रांची के अस्पताल पहुंचकर पीडि़त परिवार से मिले। रणविजय सिंह के समर्थकों ने आज तक न्यूज चैनल के खिलाफ दिल्ली में सूचना प्रसारण मंत्रालय में शिकायत की है। चैनल पर आरोप है कि वे गलत तथ्यों को प्रसारित कर रहा है। दूसरी तरफ भाजपा के सांसद रहे दिवंगत दिलीप सिंह जूदेव के बेटे व चंद्र्रपुर विधानसभा से विधायक युद्धवीर सिंह पूरे मामले में आक्रामक हैं। आउटलुक से वे कहते हैं कि हम पिछले पांच साल से इस आदमी के खिलाफ शिकायत कर रहे हैं कि यह गुंडा प्रवृति का आदमी है। इसका बंदूक का लाइसेंस जद्ब्रत किया जाए लेकिन जिला और पुलिस प्रशासन के कान पर जूं तक नही रेंगी। युद्धवीर सिंह ने कहा कि जूदेव राजमहल से इसका कोई वास्ता नही हैं। हम जूदेव हैं और वे सिंहदेव हैं फिर भी जूदेव ञ्चयों लिखते हैं यह समझ से परे है। इनकी हरकतों के चलते हमें राजमहल छोडऩे की नौबत आई। जब 2003 में जोगी के शासनकाल में विक्रमादित्य कांग्रेसी बने तब से ही हमारे परिवार से इनका कोई नाता नहीं है।
युद्धवीर जो भी कहें लेकिन विक्रमादित्य की इस करतूत के साथ राज्य में राजघरानों ,राजे-रजवाड़ों के व्यवहार को लेकर फिर बहस शुरू हो गई हैं। राज्य के वरिष्ठ पत्रकार विजय केडिय़ा कहते हैं कि राजघराने लोगों के दिलों पर नहीं राजनीतिक दलों की छाती पर राज करते हैं। अधिकाश राजघराने कांग्रेस के साथ थे लेकिन राज्य बनने के बाद छîाीसगढ़ की जनता ने कांग्रेस के साथ इन घरानों को नकारना शुरू किया। पिछले तीन चुनावों से कांग्रेस सîाा से बाहर है। जो घराने भाजपा से जुड़े हैं वे पाटी नेटवर्क की बदौलत सîाा सगंठन के शीर्ष पर पहुंच रहे हैं। लेकिन मैदानी हकीकत ठीक इससे उलट हैं। लोकतंत्र में राजशाही को लोग अब पसंद नही करते। इसका उदाहरण खैरागढ़ राजघराने के राजनीतिक पतन से देखा जा सकता हैं। खैरागढ़ के पूर्व विधायक देवव्रत सिंह जब 2002 में राजनांदगांव लोकसभा का उपचुनाव जीते तो अपनी खाली हुई सीट से उन्होंने अपनी पत्नी पद्मा सिंह को चुनाव लड़वा दिया। इस उपचुनाव में भाजपा ने एक किसान परिवार के सदस्य कोमल जंघेल को खड़ा किया जिसे कोई नहीं जानता था। भाजपा ने नारा दिया हल और महल की लड़ाई। इस लड़ाई में हल जीता और महल बुरी तरह हारा। वैसे राजनांदगांव से भी उसके बाद से राजपरिवार का कोई सदस्यचुनाव नहीं जीत पा रहा है।
इसी प्रकार बस्तर राजपरिवार की जनता पर बेहतर पकड़ मानी जाती है। पिछले चुनाव में भाजपा प्रवीरचंद भंजदेव को पार्टी में लाई और यह उक्वमीद लगाई कि इससे पार्टी को फायदा होगा लेकिन बस्तर में भाजपा को शिकस्त खानी पड़ी। जिस भाजपा के पास पहले 11 सीटें थीं अब वहां चार बची हैं। जशपुर की घटना के बाद पिछले पचास साल में पहली बार ऐसी स्थिति आई है कि किसी राजपरिवार के खिलाफ जनता सडक़ पर उतरी है।

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