जंगलों के कटने से ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम में बस्तियों में हाथियों की घुसपैठ और हमले से लोगों की मौत के आंकड़ों में भारी इजाफा चिंता का सबब
जनवरी की शुरुआत में झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में, खासकर चाईबासा और कोल्हान वन प्रमंडल क्षेत्रों में, हाथियों ने नौ दिनों के भीतर 22 लोगों की जान ले ली। किसी एक ही क्षेत्र में एक ही सप्ताह के भीतर इतनी बड़ी संख्या में मौतें पहले कभी दर्ज नहीं की गई थीं। भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार, 2017 से 2022 के बीच बस्तियों में हाथियों के हमले में सबसे ज्यादा 499 मौतें ओडिशा में हुईं, उसके बाद झारखंड में 462, पश्चिम बंगाल में 384 और असम में 358 मौतें हुईं। 2018–19 से 2022–23 के बीच छत्तीसगढ़ में 337 मौतें हुईं। पांच वर्षों के झारखंड के आंकड़ों को महीने के हिसाब से देखें, तो हाथियों ने हर महीने औसतन 7.7 लोगों की जान ली। 2020 से 2025 के बीच, झारखंड में हाथियों ने 525 लोगों की जान ली, यानी औसतन 8.75 मौतें प्रति माह। ऐसे आंकड़ों पर आधारित ज्यादातर रिपोर्टें हाथियों को दोषी ठहराती हैं। रिपोर्ट में कई जगह “हाथियों का आतंक” इस्तेमाल किया गया है।
गांव जिसने पहले कभी हाथी नहीं देखे थे
1 जनवरी से 9 जनवरी के बीच पश्चिमी सिंहभूम जिले में हाथियों ने 22 लोगों की जान ले ली। 6 जनवरी की रात, नोआमुंडी रेंज के अंतर्गत बावड़िया गांव में एक हाथी ने छह लोगों को मार डाला। बावड़िया गांव के निवासी और प्रत्यक्षदर्शी रूप सिंह लागुरी कहते हैं कि उन्होंने अपने 49 वर्षों के जीवन में कभी भी गांव में हाथी नहीं देखा था। लागुरी बताते हैं, “हम अपने घरों के बाहर फूस की झोपड़ियों में बेफिक्र होकर सोते थे। यहां पहले कभी हाथी की कोई घटना नहीं हुई थी, इसलिए डर भी नहीं था। लेकिन 6 जनवरी की रात से पूरे गांव में डर फैल गया है। अचानक शोर मचा कि हाथी आ गया है। वन विभाग ने भी फोन कर बताया कि हाथी गांव में घुस आया है। लेकिन जब तक वे पहुंचे, तब तक कई लोग मर चुके थे।”

डर का सायाः झारखंड का सिंहभूम में हाथियों के झुंड को भगाते स्थानीय लोग
हाथी ने घर से बाहर फूस की झोपड़ी में सो रहे एक ही परिवार के चार लोगों को मार डाला और पास के एक टोले में दो अन्य लोगों को भी मार दिया। घटना के बाद गांव दहशत के साये में जी रहा है। लगभग 2,000 की आबादी वाले इस गांव में कई टोले हैं। वन विभाग ने हाथियों को भगाने के लिए दो टॉर्च और कुछ पटाखे दिए हैं, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यह नाकाफी है। पटाखे पहले ही खत्म हो चुके हैं और इतनी बड़ी आबादी के लिए सिर्फ दो टॉर्च पर्याप्त नहीं हैं।
बंद गलियारे, भटके हुए हाथी
झारखंड में “हाथी मित्र” समूह मानव–हाथी मुठभेड़ों से जुड़े जागरूकता और संघर्ष-रोकथाम के लिए काम करता है। इसके संस्थापक तपस करमाकर कहते हैं कि जहां ये घटनाएं हो रही हैं, वह इलाका ऐतिहासिक रूप से हाथियों का गलियारा रहा है। वे बताते हैं, “ओडिशा के मयूरभंज जिले में स्थित सिमलीपाल टाइगर रिजर्व का जंगल झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। हाथी हमेशा से इस क्षेत्र से आते-जाते रहे हैं। जो हाथी सारंडा जंगल में आते हैं, वे अक्सर चाईबासा मार्ग से सिमलीपाल आते हैं। लेकिन अब इस गलियारे में भारी दखल हो रहा है। घर बन रहे हैं, सड़कें बन रही हैं। इसी वजह से हाथी भटककर अनजान दिशाओं में चले जा रहे हैं।”
इस क्षेत्र में स्थित सारंडा जंगल एशिया की सबसे बड़ी साल वन पट्टी के रूप में जाना जाता है। यह बेहद घना है और 82,000 हेक्टेयर में फैला हुआ है, जो झारखंड के कई जिलों तक फैला है और ओडिशा से जुड़ता है। यह क्षेत्र 2,000 मिलियन टन से ज्यादा लौह अयस्क भंडार का भी घर है, जो विश्व प्रसिद्ध है।
सारंडा को झारखंड का प्रमुख हाथी आवास माना जाता है। 1990 के दशक की शुरुआत तक यह हाथियों के लिए समृद्ध क्षेत्र बना रहा। लेकिन खनन ने उनके आवास को गंभीर रूप से बाधित कर दिया है। इन इलाकों और खासकर हाथियों की पारिस्थितिकी पर शोध करने वाले डॉ. राकेश कुमार सिंह का मानना है कि इस संघर्ष की जड़ नीतिगत विफलता में है।
उनके शोध के अनुसार, खनन ने हाथियों के आवास को गहरा नुकसान पहुंचाया। राजमार्गों और अन्य परियोजनाओं के लिए वन भूमि का इस्तेमाल किया गया, जिससे हाथियों के रास्ते बाधित हुए। कई कंपनियां दावा करती हैं कि वे हाथी गलियारों को नहीं छेड़तीं। डॉ. सिंह का कहना है कि वे अक्सर गलियारे का असली मतलब समझती ही नहीं हैं। वे समझाते हैं, “गलियारे का मतलब सिर्फ एक संकरा रास्ता नहीं होता।” कंपनियां कागजों पर गलियारा छोड़ती हैं, लेकिन हाथियों के पारंपरिक मुख्य आवास में खनन और विकास कर देती हैं। इससे हाथियों की आवाजाही भ्रमित हो जाती है और संघर्ष बढ़ जाता है।”
हाथी को भगाना मौत का कारण
अब हाथी अपने पारंपरिक आवासों से बचने लगे हैं और नए इलाकों में जा रहे हैं। जब वे गांवों में घुसते हैं, तो संघर्ष प्रतिशोधी हिंसा में बदल जाता है, जिससे दोनों तरफ मौतें होती हैं। हाथियों को एक जगह से दूसरी जगह अक्सर आक्रामक तरीके से भगाया जाता है। 9 जनवरी को पश्चिमी सिंहभूम के मंझगांव प्रखंड के हल्दिया और बेनीसागर गांवों में हाथियों ने तीन लोगों की जान ले ली। मृतकों में 18 वर्षीय दामोदर कुल्दी भी शामिल था।
दामोदर के टोले के निवासी दिनेश हेम्ब्रम ने बताया, “सुबह करीब छह बजे शोर मचा कि हाथी आ गया है। गांव वाले उसे भगाने लगे और दामोदर भी उनके साथ गया। लेकिन अचानक हाथी पलटकर लोगों पर टूट पड़ा। दामोदर चपेट में आ गया। हाथी ने उसे पकड़कर पटका और उसकी मौत हो गई।” सारंडा में अनियंत्रित और अवैध खनन के कारण बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हुई है। शाह आयोग की 2010 की जांच में कहा गया था कि सारंडा की जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (2015–16) के एक अध्ययन में पाया कि सारंडा में पौधों की प्रजातियां 300 से घटकर सिर्फ 87 रह गई है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 15 वर्षों में झारखंड में लगभग 16,000 हेक्टेयर वन भूमि को खनन और विकास के नाम पर गैर-वन उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया। अहम बात यह है कि ज्यादातर खनन हाथियों के प्रमुख आवास क्षेत्रों में ही हुआ है। सिर्फ पिछले पांच वर्षों में सिंहभूम क्षेत्र में 101 मौतें हुई हैं, जिससे यह रांची क्षेत्र (जहां 173 मौतें हुईं) के बाद दूसरा सबसे प्रभावित इलाका बन गया है। दोनों क्षेत्रों में कई वन प्रमंडल शामिल हैं।
दावे और आंकड़ों में अंतर
झारखंड वन विभाग का दावा है कि मानव–हाथी संघर्ष से होने वाली मौतों में कमी आई है। लेकिन जब पांच साल के आंकड़ों की तुलना की जाती है, तो संख्या बढ़ती हुई दिखती है। 2017 से 2022 के बीच झारखंड में 462 मौतें दर्ज की गईं। 2020 से 2025 के बीच यह संख्या बढ़कर 525 हो गई। झारखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) परितोष उपाध्याय ने आउटलुक से बातचीत में माना कि जंगलों में मानवीय हस्तक्षेप बढ़ा है।
उन्होंने कहा, “पलामू टाइगर रिजर्व के अंदर तक कई गांव बस गए हैं। जंगलों के भीतर आबादी और मानवीय गतिविधियां बढ़ रही हैं। सबसे चिंताजनक बात है आवास का विखंडन। पहले हाथियों को बड़े, जुड़े हुए इलाके मिलते थे। अब विकास गतिविधियां उन्हें टुकड़ों में बांट रही हैं। जब संपर्क टूटता है, तो हाथी भटकने लगते हैं। जिन पारंपरिक गलियारों से वे एक इलाके से दूसरे में जाते थे, वे भी टूट गए हैं। अब उन गलियारों की फिर से पहचान की जा रही है ताकि उनका विकास किया जा सके।”
राज्यों के बीच गलियारे, हाथियों की मौतें
पूरे भारत में अब तक लगभग 150 हाथी गलियारों की पहचान की जा चुकी है। सबसे ज्यादा 26 पश्चिम बंगाल में हैं, इसके बाद झारखंड में 17 और ओडिशा में 14 हैं। लेकिन इंसानों की मौतों की खबरों के बीच एक सच्चाई अक्सर अनदेखी रह जाती है, हाथियों की अस्वाभाविक मौतें। आरटीआई के जरिये मिली जानकारी से पता चलता है कि 2009 से 2023 के बीच पूरे भारत में 1,381 हाथियों की अस्वाभाविक मौतें हुईं, जिनमें करंट लगने से लेकर जहर देने तक के मामले शामिल हैं। केवल झारखंड में ही 2018 से 2025 के बीच 100 हाथियों की अस्वाभाविक मौतें हुईं।