एंजेल चकमा की मौत और छठी अनुसूची वाले कार्बी आंगलोंग में कार्बी समुदाय को ‘चीन वापस जाओ’ के नारे से पैदा हुए नए नैरेटिव से नागरिकता संकट के नए आयाम पर रोशनी
असम के कार्बी आंगलोंग में हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें कुछ लोग स्थानीय कार्बी समुदाय के युवाओं पर चीखते-चिल्लाते दिखते हैं, ‘‘चीन वापस जाओ।’’ इस घटना के बमुश्किल चंद दिन बाद धुर उत्तर के देहरादून में त्रिपुरा के एक छात्र एंजेल चकमा पर नस्लीय छींटाकशी के बाद हमला किया गया। चोटों की वजह से उसकी मौत हो गई। बताया जाता है कि हमले के दौरान वह बोलता रहा कि वह चीनी नहीं, भारतीय है। लेकिन हमलावरों ने उसकी एक नहीं सुनी। दिल्ली विश्वविद्यालय में पूर्वोत्तर छात्र सोसायटी (एनईएसएसडीयू) के एक सदस्य ने कहा, ‘‘पूर्वोत्तर के लोगों को हमेशा सफाई देनी पड़ती है।’’
कार्बी आंगलोंग की वारदात आपसी झगड़े का नतीजा बताया जा रहा है, तो देहरादून की घटना को नस्लीय हिंसा कहा जा रहा है। लेकिन दोनों को जोड़कर देखें, तो ज्यादा परेशान करने वाली बात यही है कि पूर्वोत्तर में अपनेपन की भावना कमजोर हो गई है। अपने इलाके के बाहर वहां के लोगों को शक की नजर से देखा जाता है। वारदात अलग-अलग हैं, लेकिन वजहें एक जैसी हैं। ये शक-शुबहे समय के साथ बढ़ते जा रहे हैं।
कार्बी आंगलोंग में कार्बी लोगों को ‘चीनी’ कहना मामूली अपमान या गुस्से में कही गई हल्की-फुल्की बात नहीं है। इसका गहरा राजनैतिक नतीजा होता है, जो मूल निवासी होने के ऐतिहासिक आधार को खत्म कर देता है और उसे संदिग्ध बना देता है। यह बताता है कि पूर्वजों की मौजूदगी को आबादी में हेरफेर से नकारा जा सकता है और पहचान तभी तक बनी रहती है जब तक उसे ज्यादा जोरदार ढ़ंग से बहुसंख्यक आबादी आक्रामक चुनौती न दे।

देहरादून में पीट-पीटकर मारा गया एंजेल चकमा
यह इत्तेफाक नहीं है कि ऐसी बातें खुलेआम छठी अनुसूची वाले इलाके में कहने के मायने यह हैं कि यह अनुसूची खास तौर पर मूल निवासी होने के रोज के रोज विवादों को दूर करने के लिए लगाई गई थी, ताकि जमीन, प्रशासन और सांस्कृतिक अधिकार को संख्याबल या ऊंची आवाज में बेतुके आरोपों से बचाया जा सके। लेकिन उसका मकसद कभी भी सिर्फ प्रतीकात्मक या महज औपचारिक पहचान नहीं था। इसका मकसद अपनेपन को मजबूत करना था।
हालांकि, कार्बी आंगलोंग में स्वायत्त परिषद भी मौजूद है, सीमाएं अधिसूचित हैं और सरकारी भाषा में उसका लगातार जिक्र होता है। फिर भी, जब कार्बी लोगों की चीनी कहकर तौहीन की गई, तो भावनाएं भड़क गईं। विरोध प्रदर्शनों में शामिल एक कार्बी युवक ने कहा, ‘‘हमारी अपनी जमीन से ‘‘वापस जाओ’’ कहना सिर्फ अपमानजनक नहीं बल्कि इससे हमें एहसास होता है कि हमारी पहचान और सुरक्षा कितनी कमजोर हो गई है।’’
इस पर सरकार की प्रतिक्रिया सख्त थी। एहतियात के तौर पर कार्बी आंगलोंग में इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगा दी गई। कानून-व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा के पांच दिन बाद कनेक्टिविटी बहाल की गई। लेकिन यह राजनैतिक हल की कोशिश नहीं, बल्कि प्रशासनिक नियंत्रण की कवायद थी। उससे न तो स्थानीय अधिकार स्पष्ट हुआ न ही ऐसे आरोपों की रोकथाम की कोई पहल हुई, जिसकी वजह से ये हालात बने।
यही रुझान बाद में सरकारी पहल में भी जारी रहा। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में त्रिपक्षीय बातचीत हुई और घोषणा की गई कि कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद विवादित जमीन पर चल रहे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के ट्रेड लाइसेंस रद्द कर देगी और बेदखली और बाड़ लगाने के अभियान शुरू करेगी। ये ऐसे उपाय थे जिनका मकसद घटना के बाद प्रशासनिक कार्रवाई थी, न कि स्थानीय लोगों के अधिकार की रक्षा करने की कोई कवायद।
कार्बी आंगलोंग की घटना मूल निवासी की पहचान को कमजोर करती है, तो एंजेल चकमा की हत्या जाहिर करती है कि पूर्वोत्तर का आदमी अपने इलाके से बाहर निकलते ही पराया हो जाता है। यह पूर्वोत्तर के लोगों के लिए नया अनुभव नहीं है। उनके दस्तावेजों की जांच या सफाई पेश करने का बोझ उन पर आ जाता है। नाम जानने से पहले चेहरे से ही उन्हें विदेशी मान लिया जाता है। उनकी बोली-भाषा का मजाक उड़ाया जाता है। हॉस्टलों, सड़कों और कार्यस्थलों पर पूर्वोत्तर के लोगों को शक की निगाह से देखा जाता है।
चकमा की मौत सरकार और कानून-व्यवस्था की घोर नाकामी है। वह अपने ही देश के आदमी को उसके चेहरे-मोहरे के कारण सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती। संविधान का पाठ कुछ भी वादा करे, मगर नागरिकता को व्यवहार में सशर्त बना दिया गया है।
देहरादून में भी सरकार और प्रशासन की प्रतिक्रिया जानी-पहचानी पटकथा जैसी ही थी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने पीड़ित परिवार को फोन कर, रस्मी ‘अफसोस’ जताया और दोषियों को कड़ी सजा का वादा किया। पुलिस ने कहा कि कई आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है और जांच चल रही है।
कार्बी आंगलोंग और देहरादून दूर-दराज के इलाके हैं, लेकिन धारणाएं अस्पष्ट-सी मिलती-जुलती हैं, जिससे लंबे समय से पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति नजरिया बनता-बिगड़ता है। लेकिन सरकार ने कभी भी साफ नहीं किया कि जब जनसंख्या और आर्थिक दबाव बढ़ता है तो मूल निवासियों के अधिकार की रक्षा कैसे की जाए। सरकारी तंत्र ने कभी भी जोर देकर नहीं कहा कि पूर्वोत्तर के लोग भी उतने ही भारतीय हैं, जितने देश के बाकी हिस्सों के लोग हैं। उन्हें बिना किसी स्पष्टीकरण या सबूत के सुरक्षा और सम्मान का अधिकार है।
उनकी जमीन पर मूल निवासी समुदायों को कभी-कभी परोक्ष, कभी-कभी सीधे याद दिलाया जाता है कि जमीन और अधिकार पर उनके दावों की जांच की जा सकती है, या नजरअंदाज किया जा सकता है। बाहरी इलाकों में उन्हें छींटकशी और हिंसा झेलनी पड़ सकती है और यह एहसास कराया जा सकता है कि वे पराए या विदेशी हैं।
नागरिक समाज की प्रतिक्रियाएं अधिक सीधी रही हैं। कार्बी आंगलोंग में पक्ष में लगाए गए नारों की निंदा करते हुए ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने कहा कि ‘‘असम की जमीन पर मूल निवासियों के प्रति ऐसा व्यवहार असहनीय है।’’
यह अस्पष्टता इत्तेफाक नहीं है। दशकों से पूर्वोत्तर में सरकार समाधान के बजाय टालमटोल पर निर्भर रही है, जिससे उस क्षेत्र में लगातार माइग्रेशन होता रहा है, जबकि स्थानीय लोगों की चिंताओं को प्रवासियों की असुरक्षा की समस्या माना जाता रहा है।
छठी अनुसूची क्या बेमानी
छठी अनुसूची इसके केंद्र में इसलिए है, क्योंकि यह सिद्धांत में तो बनी हुई है, लेकिन व्यवहार में उसे खोखला कर दिया गया है। उसके तहत बनी परिषदों की अहमियत कम हो गई है, उनके फैसलों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है और स्वायत्तता सिर्फ सलाह-मशविरे तक सीमित रह गई है। जिसे ढाल की तरह काम करना था, वह धीरे-धीरे ऐसा जरिया बन गया है, जिसका इस्तेमाल रोकथाम के लिए ही नहीं, बल्कि विवाद रफा-दफा करने के लिए किया जाता है।
कार्बी आंगलोंग इस बदलाव को दिखाता है। छठी अनुसूची के प्रावधान अब धमकियों को नहीं रोक पाते क्योंकि उनसे जमीनी स्तर पर लोगों के व्यवहार तय नहीं होते। जब सुरक्षा के उपाय रोकथाम के बजाय बाद में सक्रिय होने लगें, तो उनका मतलब बदल जाता है। वे सीमाएं तय करना बंद कर देते हैं और उसके बजाय नतीजों को मैनेज करने लगते हैं। यह कोई प्रशासनिक चूक नहीं है। यह आजादी का दिखावा बनाए रखने का राजनैतिक फैसला है। उसका ढांचा तो बनाए रखा जाता है, लेकिन उसे दंतहीन बना दिया जाता है। अमल के लिए जरूरी अधिकार नहीं दिए जाते। ऐसा करके राज्य-व्यवस्था मूल निवासी होने को औपचारिक रूप से स्वीकार तो करती है लेकिन असल में उन्हें असुरक्षित छोड़ देती है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने देहरादून जिला प्रशासन और पुलिस को नोटिस जारी कर रिपोर्ट मांगी है और पूर्वोत्तर के छात्रों की सुरक्षा तय करने के लिए कदम उठाने को कहा है।
दरअसल पूर्वोत्तर का समाज हमेशा पहाड़ियों, घाटियों और सीमाओं के आर-पार आवाजाही से बना है और इस सच्चाई को स्वीकार करने के लिए उसकी वैधता से इनकार करने की दरकार नहीं रही है। नई दिक्कत यह है कि उस आवाजाही का प्रबंधन ईमानदारी से करने से लगातार इनकार किया जा रहा है। सामाजिक समझौते कभी साफ नहीं किए जाते और समुदायों को किसी मध्यस्थता या राजनैतिक सुलह-सफाई के बिना खुला छोड़ दिया जाता है। इस खालीपन में नाराजगी को जड़ से पकड़ने के लिए विचारधारा की जरूरत नहीं होती। जब सुरक्षा कमजोर होती है और जिम्मेदारियां साफ नहीं होतीं, तो चिंता शक में बदल जाती है, शक नस्लीय भाषा ढूंढ लेता है और उससे उपजा तनाव हिंसा में बदल जाता है।
इसका विकल्प सद्भाव की अपील या सुलह की प्रतीकात्मक बातें नहीं होंगी, बल्कि अधिकार, जिम्मेदारी और नतीजों के बारे में स्पष्टता से ही इसका हल निकलेगा। देहरादून में हुई हिंसा और कार्बी आंगलोंग की वारदात का सबसे बड़ा खामियाजा यह हुआ कि दोनों घटनाओं की वजहों से सब कुछ अनसुलझा रह गया।
(लेखक रिसर्चर और कौटिल्य स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के पूर्व छात्र हैं। विचार निजी हैं)