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शहरनामा/कौड़िया: ककड़ी, डंगरा, कलींदा वाला कस्बा

नदी, ककड़ी, डंगरा, कलींदा कहने को वह गांव था, पर ऐसी खूबियों से भरा जो उन दिनों गांव में होती नहीं...
शहरनामा/कौड़िया: ककड़ी, डंगरा, कलींदा वाला कस्बा

नदी, ककड़ी, डंगरा, कलींदा

कहने को वह गांव था, पर ऐसी खूबियों से भरा जो उन दिनों गांव में होती नहीं थीं। ग्यारह का होने को था तब पहुंचा था पहली बार। वह मेरा ननिहाल था भरापूरा। मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा तहसील के बिलकुल पास बसे इस गांव का नाम है कौड़िया। बारिश में यह दुनिया से कट जाता था। दो-ढाई किलोमीटर की दूरी पर शक्कर नदी बहती थी। मैंने देश-विदेश की नदियां देखीं, समुद्र तट देखे पर इस नदी की रेत जैसी रेत कहीं नहीं देखी, एकदम बारीक और धूप में निहायत चमकती हुई। पानी उसका एकदम साफ, प्राकृतिक और अधिकतम पारदर्शी। हम बच्चे गर्मी के दिनों में पैदल चलते हुए वहां पहुंच जाते और घंटों नहाते। उस नदी में घंटों तैरते हुए स्नान फिर कभी और कहीं नहीं हुआ। वह डुबो लेना चाहती थी और डूबना भयाक्रांत नहीं करता था। पूरे वक्त लगता डूबते जाएं। यह डूबना जीवन था। अब जाओ, तो देखो वह नदी सूख चुकी है। अब वहां न पहले जैसी ककड़ी होती है, न डंगरा, न कलींदा।

तब तक न देखीं खूबियां

कह ही चुका हूं कि अपनी ग्यारह वर्ष की उम्र में मैं पहली बार अपने नलिहाल कौड़िया पहुंचा था, अपने जन्मस्थल छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जैसे कस्बे से। उस उम्र तक राजनांदगांव के इर्द-गिर्द के कुछ निहायत ही पिछड़े गांव मैंने देखे थे, जो बहुत अविकसित और अव्यवस्थित थे। किसी भी मौसम में वहां रहना दुश्वारी थी। इसके बरक्स कौड़िया, 1964 में पूर्ण विकसित और व्यवस्थित गांव था। बच्चा था तो बहुत विस्मित होकर देखा गांव। मेरे ख्याल से वयस्क लोग जो वहां पर पहली बार पहुंचे होंगे, उसे उसी तरह देखा होगा। विश्वास हो न हो पूरे गांव में सीमेंट से बनाई गई सड़कें थीं। बिजली सभी घरों के लिए उपलब्ध थी और सबसे बड़ी बात यह कि लोगों के घरों में नल से पानी आता था, पीने का। गांव में कुएं ही कुएं थे तब भी। मैं लौटकर जब अपने राजनांदगांव में दोस्तों को और बुजुर्गों को यह सब बताता तो कुछ ध्यान से सुनते, कुछ झूठ मानकर हंसी उड़ाते, कुछ तो यह भी कहते कि तुमने सपने में देखा होगा ऐसा गांव।

झिन्ना, पतंग और साइकिल

दो सपने, जिन्हें भरपूर रोज ही सोते-जगते देखता वे कौड़िया में पहुंचकर पूरे होते लगते थे। एक दूर तक खुले आकाश में पतंग उड़ाना और दूसरा खूब चिकनी सड़क पर साइकिल चलाना। मैं जब पहली बार कौड़िया पहुंचा, उसके ठीक तीन-चार महीने पहले साइकिल चलाना सीख चुका था। पिता साइकिल नहीं चलाते थे, तो घर में थी नहीं, सो किराये पर लानी पड़ती थी। तो जी भर के चलाने की हसरत पूरी होती ही नहीं थी कभी।

कौड़िया आया तो वहां दो साइकिलें थीं। एक चौबीस इंची दूसरी बाइस इंची। चौबीस इंची बड़े मामा की और बाइस इंची संझले मामा की। मैं बाइस इंची उठाता और साथ में पतंग और धागे की चकरी लेकर काफी दूर जहां से रेल की पांतें गुजरती वहां पहुंचकर घंटों पतंग उड़ाता, तृप्त होने पर ही लौटता।

यह शौक सुबह नौ बजे से ग्यारह बजे तक पूरा हो पाता। लौटते तो पसीने-पसीने। नहाने की जरूरत होती। याद आता, गांव में पांच-छह झिन्ना (झरने) हैं। ममेरे भाइयों से कहता, वहीं चलें नहाने। वे तैयार हो जाते, तो हम झिन्नों में नहाने जाते। ये झिन्ने गजब के थे, बिलकुल स्वीमिंग पूल जैसे। मैं पूछता तो कोई बता नहीं पाता कि उन्हें किसने बनाया था।

रविवारीय हाट, ढोर बाजार और गाद के पापड़

गांव के अंदरूनी छोर के पहले मालगुजार की बखरी थी। वहां से चलो तो गांव से सीमेंट की चिकनी सड़क से गुजरते हुए, गांव के अंतिम छोर तक पहुंच जाते थे। ग्राम पंचायत के पक्के भवन के पास मैदान में ढोर बाजार लगता था। यह वहां ही पता चला कि ऐसा बाजार भी होता है। उसी के थोड़ा पहले रविवारिया हाट लगता। रविवार वहां का सबसे चहल-पहल भरा दिन होता। खूब भीड़ रहती। आसपास के गांव की बैलगाड़ियों का तांता लगा रहता। मेरे लिए उस बाजार की सबसे प्रिय पर अजनबी चीज होती गाद (गोंद) के पापड़। उसके पहले कभी नहीं खाए थे। उस गांव के अलावा वह फिर कभी खाने को मिले भी नहीं। बाजार में वे पापड़ हाथों-हाथ बिक जाते। खरीदने में देरी की तो गए काम से। मीठा और सौंधा स्वाद भूलने लायक नहीं था।

हर तरफ स्वाद

हमारे यहां बुंदेली बोली जाती है। आज भी सुनो तो लगता है, वैसी लयात्मक बोली और कहीं नहीं। इतनी मिठास है इस बोली में कि सुनने पर लगता है कान में जैसे मिसरी घुल गई हो। मैंने वहां पर ही गाद के पापड़ ही नहीं बल्कि न जाने कितने तरह के नए और अनोखे स्वाद वहां चखे। अब वह स्वाद जबान की स्वाद ग्रंथियों से होते हुए, मन-मस्तिष्क में कहीं बसा हुआ है। यहां न सिर्फ खाने में बल्कि अनुभव में भी कई तरह के नए अनुभव स्मृतियों में बसे हुए हैं। बाद के वर्षों में गांव का वही स्वाद किसी न किसी तरह मेरी कहानियों, कविताओं और संस्मरणों में आता रहा। स्वाद था ही ऐसा जिसे भूला नहीं जा सकता। अब जाओ, तो वह स्वाद नहीं मिलता। मिल भी नहीं सकता। दुनिया बदल रही है। तो वह गांव भी इस बदलाव से बच नहीं सकता। पर मैंने अपनी जीभ पर उसे आज भी बचा कर रखा है। वैसे ही जैसे वहां की कई यादें मेरे दिल के कोने में सहेजी रखी हुई हैं। जब मन चाहता है, दिल के कोने में झांक कर वहां की यादों को एक बार जी लेता हूं, जी भर कर।

राजेन्द्र दानी

(सुपरिचित साहित्यकार)

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