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इंटरव्यू - बृजेंद्र काला: ‘मैं कभी नर्वस नहीं होता’

दर्शकों की एकाधिक पीढ़ियों को अभिनय से कायल करने वाले बृजेंद्र काला हिंदी सिनेमा के चुनिंदा...
इंटरव्यू - बृजेंद्र काला: ‘मैं कभी नर्वस नहीं होता’

दर्शकों की एकाधिक पीढ़ियों को अभिनय से कायल करने वाले बृजेंद्र काला हिंदी सिनेमा के चुनिंदा अभिनेताओं में हैं। अपने दिलचस्प अंदाज के कारण बृजेंद्र काला भारतीय फिल्म दर्शकों के बीच जाना-पहचाना चेहरा हैं। हासिल, जब वी मेट और पान सिंह तोमर जैसी शानदार फिल्मों का हिस्सा रहे बृजेंद्र काला बीते दिनों रिलीज हुई फिल्म कटहल में नजर आए। आउटलुक के मनीष पाण्डेय ने बृजेंद्र काला से उनके जीवन, अभिनय सफर और कई अन्य मुद्दों पर बातचीत की। मुख्य अंश:

 

जिस सपने को लेकर अभिनय की शुरुआत की, वह कितना साकार हुआ है?

 

मैं पौड़ी गढ़वाल में पैदा हुआ मगर मेरा लालन-पालन मथुरा में हुआ। पिताजी का सपना था कि मैं पशु चिकित्सक बनूं। मेरा बचपन से ही गायिकी में रुझान था। मैं संगीत में ही अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था। पिताजी इसके खिलाफ थे। अंतत: मैंने बॉयोकेमिस्ट्री से ग्रेजुएशन किया। तब तक मेरा ऐसा कोई सपना नहीं था कि अभिनय जगत में कुछ करना है। मैं गाने के कार्यक्रम में प्रस्तुति देने आकाशवाणी केंद्र जाता था। आकाशवाणी केंद्र में अचला नागर कार्यरत थीं, जिनका स्वास्तिक नाम का थियेटर ग्रुप था। आकाशवाणी केंद्र में कार्यरत विमल अरोड़ा दीदी ने मुझसे कहा कि मैं डॉक्टर अचला नागर का थियेटर ग्रुप स्वास्तिक जॉइन कर लूं। मैं स्वास्तिक से जुड़ गया। फिर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अभिनेता अनिल चौधरी ने मथुरा में थियेटर वर्कशॉप आयोजित की, जिसमें मैं शामिल हुआ। मैंने कभी नहीं सोचा कि मैं बड़ा अभिनेता बनूंगा। मैं सिर्फ रंगमंच करना चाहता था, लेकिन फिल्मों में मौका मिला तो दर्शकों से काफी प्यार मिला।

 

आपने कहा कि रंगमंच आपका सपना था। फिर मुंबई आने की योजना किस तरह से बनी?

 

जब मैं मथुरा में स्वास्तिक थियेटर ग्रुप के साथ रंगमंच कर रहा था, तो वहां मेरे सहयोगी थे संदीपन नागर। ये डॉक्टर अचला नागर के सुपुत्र थे। मैं और संदीपन अच्छे मित्र थे। संदीपन ने इसी बीच एक फिल्म बनाने का निर्णय लिया और उसी फिल्म के सिलसिले में मुंबई आना हुआ। मुंबई आकर एक झटका सा लगा। यहां देखा कि अभिनेता, अभिनेत्री, सहायक कलाकार, विलेन सभी का सुंदर होना अनिवार्य है। जो सुंदर होगा, तभी सिनेमा में काम मिल सकेगा। डॉक्टर अचला नागर कई फिल्मों में लेखन कार्य कर रही थीं। मैंने उन सभी फिल्मों में उन्हें सहयोग किया। नाटकों के कारण मुझे स्क्रिप्ट और भाषा की जानकारी थी, इसलिए यह काम मेरे लिए आसान था। उन्हीं दिनों भारत में टीवी चैनल्स का आगमन हुआ, लेकिन मैं तय कर चुका था कि टीवी सीरियल में काम नहीं करूंगा। मेरे मन में था कि बनना तो बड़े परदे का एक्टर ही है। जब स्थिति हाथ से निकलने लगी, तो आखिरकार मैंने टीवी सीरियल में काम करना शुरू किया। इससे पैसे आए और जीवन स्थिर हुआ। यह सिलसिला 2008 तक चला और फिल्म जब वी मेट के आने के बाद मुझे काम की कोई कमी नहीं रही।

 

एक जमाने में औसत रूप रंग, कद-काठी के कलाकार हीन भावना से ग्रस्त रहते थे। सिनेमा में उन्हें खास तरह के ही किरदार दिए जाते थे। आज परिस्थितियां कितनी बदली हैं?

 

यह सत्य है कि पहले आम शक्ल-सूरत के कलाकार का हीरो बन पाना बहुत मुश्किल था। उस समय में कहानियों में भी बहुत अधिक गुंजाइश नहीं थी। आज परिस्थितियां बदल गई हैं। आज फिल्म की कहानियों में विविधता आई है। किसी फिल्म का मुख्य किरदार ग्रामीण आदिवासी, किसान है तो उसका रंग रूप, कद काठी, भाषा किसी रोमांटिक म्यूजिकल फिल्म के हीरो जैसी नहीं हो सकती। इसलिए अब सभी तरह के कलाकारों को काम मिलता है। इसका एक दूसरा पक्ष भी है। हम सभी देख रहे हैं कि सिनेमाघरों में आज भी स्टार की फिल्म ही कारोबार कर रही है। आप लाख अच्छे अभिनेता हों मगर दर्शक आपको ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ही देखेगा। ऐसा कम ही होता है कि दर्शक भारी संख्या में किसी नॉन स्टार की फिल्म देखने सिनेमाघर पहुंचें। मेरा मानना है कि कोई भी सिस्टम कभी परफेक्ट नहीं होता। उसमें बदलाव आते रहते हैं और सुधार की गुंजाइश रहती है।

 

 

किसी अभिनेता पर किस तरह के दबाव रहते हैं, जो आम तौर पर दुनिया नहीं देख पाती?

 

आज प्रतिस्पर्धा का दौर है। सोशल मीडिया ने सभी को स्टार बना दिया है। सभी आज सेलिब्रिटी हैं। सभी के अपने फैन हैं। ऐसे में गुम हो जाने का डर कलाकारों को बहुत सताता है। जब तक मीडिया कवरेज मिलती है, व्यूज आ रहे होते हैं, तब तक सब ठीक होता है मगर जब थोड़ी सी भी गिरावट आती है तो व्यक्ति बेचैन हो जाता है। दूसरी बात यह है कि चकाचौंध भरी दुनिया ने सभी को अकेला कर दिया है। पहले आपके बुरे समय में दोस्त, परिवार के लोग आपके साथ होते थे। ग्लैमर जगत में शीर्ष पर पहुंचने की चाहत व्यक्ति को अकेला कर देती है। तब आप अपने बुरे समय में किसी को नहीं पुकार पाते। इससे घुटन महसूस होती है,जो डिप्रेशन और आत्महत्या की तरफ ले जाती है। एक कलाकार के रूप में मैंने महसूस किया है कि आपके साथ फिल्म या टीवी सीरियल में काम करने वाले सह-कलाकारों से आप अच्छे संबंध रखें तो चीजें बेहतर हो सकती हैं। डिप्रेशन या आत्महत्या का क्षण बहुत सीमित होता है। उस समय कोई हमें सुन ले, समझ ले, हिम्मत दे तो चीजें संभल जाती हैं। मेरा मानना है कि सेट्स पर ऐसा कल्चर जरूर होना चाहिए जिससे कलाकारों में आपसी संवाद स्थापित हो।

यूं तो आप तमाम तरह की भूमिकाएं निभाते हैं लेकिन सभी भूमिकाओं के केंद्र में एक हास्य, एक ह्यूमर रहता है। यही हास्य आपको हर दिल अजीज बनाता है। अपने अभिनय के इस पक्ष के बारे में क्या कहना चाहेंगे?

 

हिंदी सिनेमा में हास्य या ह्यूमर की समृद्ध परंपरा रही है। जिस तरह का स्टारडम महमूद साहब या जॉनी वॉकर साहब ने देखा है, वैसा सम्मान कम कलाकारों को नसीब हुआ है। मैंने जब से सिनेमा देखना शुरू किया सामने इन्हीं महान कलाकारों को पाया। उनके काम में एक गरिमा होती थी। भाषा का ज्ञान होता था। परिस्थिति की समझ होती थी। मैंने इनके काम से और अपने जीवन के अनुभवों से प्रेरणा ली। वह प्रेरणा ही मेरे अभिनय में झलकती है। मैं अपने काम को लेकर स्पष्ट रहता हूं। मैं जानता हूं मुझे कोई ओछी बात नहीं करनी है। समाज हमें देखता है और सीखता है। इसलिए हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। आज स्टैंड अप कॉमेडी के नाम पर गाली गलौज, अश्लीलता, फूहड़ता को स्वीकृति मिलती जा रही है, लेकिन मैं आज भी स्वस्थ मनोरंजन का पक्षधर हूं। मैं बहुत कुछ अपने हिसाब से करता हूं, जो स्क्रिप्ट में नहीं लिखा होता। यही दर्शकों को पसंद आता है। युवा निर्देशक भी मुझ पर विश्वास करते हैं और स्वतंत्रता देते हैं।

 

अभिनय ने आपके व्यक्तित्व के विकास पर क्या असर डाला है?

मैं मानता हूं कि जो व्यक्ति नाटक करता है, उसके व्यक्तित्व का रूपांतरण हो जाता है। मैंने पूरी शिद्दत से 19 साल रंगमंच किया है। रंगमंच ने मेरे अंदर अनुशासन और आत्मविश्वास पैदा किया है। थियेटर ने मेरे अंदर वह यकीन पैदा किया है कि चाहे कितना ही बड़ा स्टार मेरे सामने क्यों न हो, मैं कभी नर्वस नहीं होता। मुझे हमेशा भरोसा होता है कि मैं कुछ ऐसा कर जाऊंगा कि दर्शक मुझे याद रखें। यह सब कुछ अभिनय साधना से आया है। अन्यथा एक समय ऐसा भी था कि मुझे अपने रूप-रंग और कद-काठी को देखकर लगता था कि सिनेमा में मुझे काम नहीं मिलेगा। संशय से विश्वास की यह जो यात्रा है, वह मैंने रंगमंच से तय की है।

 

 

 

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