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नक्‍सलियों से भिड़ेगा नया सलवा जुडूम: छवींद्र कर्मा

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के खिलाफ सरकारी समर्थन से आदिवासियों का हथियारबंद संघर्ष ‘सलवा जूडूम’ भले ही सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद बंद हो गया हो मगर इस अभियान की परिकल्पना और शुरुआत करने वाले कांग्रेसी नेता दिवंगत महेंद्र कर्मा के बेटे छबिंद्र कर्मा इस अभियान को फिर शुरू करने की तैयारी में हैं।
नक्‍सलियों से भिड़ेगा नया सलवा जुडूम: छवींद्र कर्मा

छवींद्र कर्मा का दावा है कि इस बार बार ये अभियान शांतिपूर्ण रहेगा। वर्ष 2013 की 25 मई को छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में नक्सल हमले के शिकार हुए कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा की दूसरी बरसी पर छवींद्र इस अभियान को फिर शुरू करने वाले हैं। वर्ष 2004 में राज्य में भाजपा की सरकार के आते ही सलवा जूडूम अभियान महेंद्र कर्मा ने शुरू किया था। लेकिन कांग्रेस पार्टी के अजीत जोगी पूरे अभियान की खिलाफत करते रहे। इस दरम्यान सलवा जूडूम में काम करने वाले लगभग 300 लोगो की नक्सल हत्या हो गई। खुद महेंद्र कर्मा के ही परिवार के 93 लोग मारे गए। झीरम घाटी के हमले में महेंद्र कर्मा भी नक्सली हमले का शिकार बने। उनके साथ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल समेत 30 लोग मारे गए थे। यह बस्तर में नक्सलियों का सबसे बड़ा राजनीतिक कत्लेआम था। नए सिरे से इस अभियान की तैयारी के बारे में छवींद्र ने आउटलुक को और जानकारी दी। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

 

अचानक ही सलवा जूडूम की याद कैसे आ गई?

सलवा जूडूम के सूत्रधार महेंद्र कर्मा की शहादत के बाद हम काफी समय से इंतजार कर रहे थे कि केंद्र एवं राज्य में एक ही दल की सरकार रहने पर नक्सलवाद पर काबू पाया जा सकेगा। लेकिन पिछले एक साल से हम देख रहे हैं कि दोनो जगह एक ही दल की सरकार होने के बावजूद दोनों सरकारें नक्सलवाद को गंभीरता से नही ले रही हैं। इसलिए हमने तय किया है कि हम नक्सल विरोधी सलवा जूडूम को पुन: शुरू करेंगे।

 

लेकिन सलवा जूडूम की राजनीतिक दलों के अलावा सुप्रीम कोर्ट ने भी कड़ी आलोचना की थी। उसे दोबारा शुरू करने पर उसका स्वरूप क्या होगा?

देखिए हम शांति के पक्षधर हैं और शांति के साथ विकास चाहते हैं। उसके लिए हम सरकार से सभी मसलों पर बात करने को तैयार हैं। विकास होगा तो नक्सलवाद के मुद्दे पीछे जाएंगे। सलवा जूडूम का ध्येय ही शांति अभियान था और स्वरूप भी वही रहेगा। इसके लिए हमने एक विकास संघर्ष समिति का गठन किया है जिसका संरक्षक मै (छबिंद्र कर्मा), सुखदेव ताटी और चैतराम होंगे। विकास संघर्ष समिति के नेतृत्व में यह अभियान चलेगा।

 

आप लोगों को सरकार से शिकायतें क्या हैं?

पिछले दस साल से भाजपा की सरकार ने नक्सलवाद को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। यदि गंभीरता से लिया होता तो 2013 में कांग्रेस नेताओं की इतनी बड़ी शहादत नहीं होती। सरकार ने इस मसले पर कभी हमसे बात करना उचित नही समझा।

 

कांग्रेस का एक धड़ा भी इसके खिलाफ रहा हैं?

देखिए बस्तर अशांत है। बस्तर की शांति के लिए जरूरी है कि कांग्रेस पार्टी भी हमे समर्थन करे। रहा सवाल मेरी सुरक्षा का तो यदि मेरी शहादत से शांति आ सकती है तो मै इसके लिए भी तैयार हूं।

 

अगला कदम क्या होगा?

25 मई की बैठक के बाद हम मुख्यमंत्री से मिलने रायपुर जा रहे हैं, जहां हम विकास के मुद्दे पर बात करेंगे और हमारा मानना है कि विकास ही नक्सलवाद को परास्त कर सकता है। सरकार को अपने सभी संसाधन विकास के मोर्चे पर लगाने चाहिए।