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खूबसूरती देखना है तो बुडापेस्ट आइए

बुडापेस्ट में कोई भी पर्यटक जीवन भर का सौंदर्य बोध पा लेते हैं। यह ऐसा शहर है जो अपनी प्राचीन पहचान और नएपन को साथ ले कर चलता है। बुडापेस्ट की खूबसूरती सभी को बांधती है। इस खूबसूरत शहर गए फिल्मकार और भारतीय सांस्कृतिक परिषद की क्षेत्रीय सलाहकार समिति, पटना के सदस्य और मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली के संचालन समिति के सदस्य ने कैसे इस शहर को देखा उन्हीं की नजर से।
खूबसूरती देखना है तो बुडापेस्ट आइए

मैं यहां न आया होता तो शहर की सुंदरता का मेरा पैमाना शायद कुछ और होता। यहां आए बिना शहर के सौंदर्य की परिकल्पना असंभव थी। लगता है मानो आंखें अंजुरी-सी बंध गई हैं और मैं यहां की सुषमा पीता जा रहा हूं। मैं हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में हूं। इसे पेस्टबुडा भी कहूं तो गलत नहीं होगा। एक ओर पेस्ट है और दूसरी ओर बुडा। बीच में मैं जहां खड़ा हूं, उसके नीचे दानेब नदी बहती है। दानेब ग्रीक नाम है। इस नदी को दुनाव, दोनाऊ, दूनो, दुनेरिया आदि नामों से भी पुकारा जाता है। दानेब से मैं पहले भी मिल चुका हूं, विएना में। बल्कि और भी पहले जर्मनी के ब्लैक फॉरेस्ट में। यूरोप के दस देशों से गुजरने वाली इस नदी पर चार देशों की राजधानियां हैं। ऑस्ट्रिया तथा हंगरी की राजधानियों क्रमश: वियना और बुडापेस्ट के अलावा स्लोवाकिया की राजधानी ब्रातिस्लावा और सर्बिया की राजधानी बेल्ग्राद। हालांकि इसका बड़ा भाग रोमानिया से होकर गुजरता है, पर इस पर बसा सबसे बड़ा शहर बुडापेस्ट है।

 

1873 से पहले बुडा और पेस्ट अलग-अलग नगर हुआ करते थे। सन 1873 में इन दोनों के साथ ओबुडा नाम के एक अन्य नगर को मिलाकर इनका नाम बुडापेस्ट रखा गया। ओबुडा दरअसल पुराने बुडा को ही कहते थे। इससे पहले 1849 में चेन ब्रिज के निर्माण के साथ बुडा और पेस्ट के बीच आवाजाही के लिए स्थाई प्रबंध हो चुका था, जबकि पहले यह काम पंटून पुल से हुआ करता था। मैं इसी चेन ब्रिज पर खड़ा हंगरी के संसद भवन को निहार रहा हूं। यह नयनाभिराम भवन दानेब के पूर्वी तट यानी पेस्ट में स्थित है। दानेब के पश्चिमी तट यानी बुडा स्थित पहाड़ी पर निर्मित है शाही महल। पहाड़ी क्या पूरा दुर्ग है। यह कैसल हिल के नाम से जाना जाता है। जिस तरह दिल्ली आक्रांताओं का शिकार होती रही, वैसे ही बुडा और पेस्ट पर भी बाहरी हमले होते रहे। मध्यकाल में इसे हूण, तातार और तुर्की आक्रमण झेलना पड़ा तो आधुनिक काल में रूस और जर्मनी का। मूल रूप से इस क्षेत्र में मेग्येर कबीले के लोग रहते आए हैं।

 

बुडापेस्ट आकर पिताजी की याद आना स्वाभाविक है। दो बार वह यहां जा चुके थे। पहली बार वह यहां किसी श्रम सम्मेलन में भाग लेने वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल के अगुआ बनकर आए थे। दूसरी बार राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा के साथ भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में। उन्हीं के शब्दों में, 'एक नदी के दो किनारों को जोड़ता हुआ शहर बुडापेस्ट जहां जिंदगी का उफान शराब की बोतल में नहीं, बौद्धिक अनुराग में है।’ हंगरी के संसद भवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा, 'हंगरी का संसद भवन भव्यता और कलात्मकता का मिला-जुला रूप है। हम अपने संसद भवन पर नाज करते हैं, लेकिन इस भवन के हॉल, कमरें तथा जीने, सब हमें पीछे छोड़ रहे थे।’

भारत का एक सांसद, वह भी राष्ट्रपति के साथ भारतीय प्रतिनिधिमंडल का सदस्य, जब अपने संसद भवन को हंगरी के इस संसद भवन से उन्नीस पा रहा हो, तो मुझ जैसा साधारण सैलानी इसके रूप जाल में भला क्यों न फंसता? मैं इस भवन को देखकर ठिठक गया और मेरी आंखें बरबस उस पर टिकी रह गईं। मुझे लगा कि हो न हो, यह यहां का संसद भवन ही होगा, फिर भी मैंने किसी राहगीर से पूछ लिया, सामने क्या है यह? अंग्रेजी और हिंदी दोनों से अनजान इस राहगीर ने मेरा आशय समझकर मुझे संक्षिप्त उत्तर दिया, 'ओरसाघज।’ यह संसद भवन नहीं है? मैंने मन ही मन सवाल किया। यह तो मुझे बाद में मालूम चला कि ओरसाघाज यहां के संसद भवन को ही कहते हैं। ओरसाघाज का अर्थ है देश का घर। यह जानने के बाद मेरा मन फिर से वहां जाने को अधीर हो उठा। और अब मैं उसे निहारता हुआ चेन ब्रिज पर खड़ा था।

 

इससे पहले मैं कैसल हिल स्थित शाही महल देख आया था। शाही महल से थोड़ी ही दूर पर स्थित मत्यास गिरजाघर और उसके साथ में बना फिशरमेंस बैशुन यानि मछुआरों का गढ़ भी लोगों को खासा आकर्षित करता है। मत्यास गिरजाघर बुडा शहर के बनने, बिगड़ने और संवरने का खामोश गवाह रहा है। हालांकि सन 1015 में निर्मित इस गिरजाघर का आधिकारिक नाम चर्च ऑफ  ऑवर लेडी है, पर इसे आज सम्राट मत्यास के नाम से ही जाना जाता है।

 

वैसे तो 13वीं शताब्दी में हुए मंगोल आक्रमण के बाद कैसल हिल पर आए शरणार्थियों ने यहां निर्माण कार्य आरंभ कर दिया था, पर 15वीं शताब्दी में सम्राट मत्यास तथा वेट्रिक्स के विवाह के बाद कैसल हिल ने स्वर्ण युग का साक्षात्कार किया। उनकी दूसरी पत्नी नेपल्स की राजकुमारी बेट्रिक्स के साथ ही इटली के अनेक शिल्पकार भी यहां आए और उन्होंने अपनी कला की छटा कैसल हिल के चप्पे-चप्पे पर बिखेर दी। यही वह समय था जब शाही महल अपनी पूर्ण गरिमा तक पहुंचा। फिर एक समय ऐसा भी आया जब तुर्की के ओटोमन शासकों ने बुडा को नेस्तनाबूत कर दिया और यहां के बेशकीमती सामान लूट ले गए। हालांकि उन्होंने जब दोबारा यहां चढ़ाई की तो बुडा को ओटोमन साम्राज्य में ही मिला लिया। ये बुडा के बुरे दिन थे। शाही महल फौजी छावनी में तब्दील हो गया और मत्यास गिरजाघर में नमाज पढ़ी जाने लगी थी। बाद में ईसाई सशस्त्र बलों ने मिलकर बुडा की घेराबंदी की और उसे ओटोमन शासकों से छुड़ाने में सफल हुए। इसके बाद वर्षों तक शाही महल तथा मत्यास गिरजाघर के पुनर्निर्माण का काम चलता रहा। इस बीच भी कभी इसे नाजी शासकों ने रौंदा तो कभी रूसी शासकों ने।

 

अब कैसल हिल की इमारतें और दानेब किनारे का क्षेत्र यूनेस्को के विश्वदाय सूची में शुमार हैं। दानेब नदी के दो पाटों के बीच झूलते चेन ब्रिज पर खड़ा हुआ मैं कभी संसद भवन को निहारता हूं तो कभी शाही महल को। दानेब नदी में राष्ट्रपति के साथ नौका विहार के दौरान उसके दोनों किनारों का परिदर्शन करते हुए पिताजी ने अनुभव किया कि यह नदी बुडा और पेस्ट को अलग नहीं करती, बल्कि उन्हें जोड़ती है, जबकि इन दोनों उपनगरों को जोडऩेवाले चेन ब्रिज से गुजरते हुए मुझे लगता है मानो मेरी यात्रा बुडा से पेस्ट की ओर न होकर राजशाही से लोकतंत्र की ओर है। ओरसाघाज - देश का घर - कितना सार्थक नाम है यहां के संसद भवन का। हमारे यहां तो संसद भवन तक जाने के लिए राजपथ से ही गुजरना होता है, जनपथ से तो आप उसे दूर से ताकते रह जाते हैं।

 

संसद भवन का 96 मीटर ऊंचा गुंबद शहर के अनेक भागों से देखा जा सकता है। सन 1896 में हंगरी का 1000वां स्थापना दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया गया और उसी साल संसद भवन का उद्घाटन भी हुआ। वैसे इसकी आधारशिला बुडा, ओबुडा एवं पेस्ट के विलय के बारह साल बाद सन 1885 में रखी जा चुकी थी। बताते हैं कि इसके निर्माण में लगभग 4 करोड़ ईंटो के साथ 40 किलो सोना भी लगा। गुंबद के दोनों ओर एक समान विस्तार बोरोक एवं गॉथिक शैली में बनी इस इमारत को सुडौल बनाते हैं। कभी यह संसद हमारे यहां की लोकसभा और राज्यसभा की तरह दो सदनों का हुआ करता था। रूसी अधीनता के समय इसका एक सदन भंग कर दिया गया और तबसे यह एक-सदनी ही है। अब इसके एक हिस्से में राष्ट्रीय असेंबली बैठती है तो दूसरे का उपयोग संगोष्ठियों एवं सभाओं के लिए किया जाता है। यह हिस्सा सैलानियों के लिए भी खुला है, जो चार हजार फॉरिन्ट देकर इसकी भव्यता को अंदर से भी देख सकते हैं।

 

ओरसाघाज को देखने के लिए सुबह 8 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक लोगों की कतार लगी ही रहती है। एक अनुमान के अनुसार लगभग पांच लाख सैलानी हर साल इसे देखने पहुंचते हैं। भीतर घुसते ही इस भवन की भव्यता बांध लेती है।

 

सुंदर गलियारों से होता हुआ मैं पुराने ऊपरी सदन में पहुंचता हूं। यह सदन हाऊस ऑफ मैग्नेट्स कहलाता था और हमारे यहां के राज्यसभा की तरह था। अब यह सदन भंग हो चुका है तो इस हॉल का उपयोग बैठकों, सम्मेलनों तथा भवन परिभ्रण के लिए किया जाता है। गुंबद के दूसरे पार्श्व पर ठीक ऐसा ही हॉल है, जहां चुने हुए जनप्रतिनिधि यानि सांसद बैठते हैं। यहां से निकल कर मैं लॉबी में आता हूं। यहीं की दीवारों पर विभिन्न पेशों से जुड़े आमजनों का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रतिमाएं हैं। इसके आगे गुंबद के ठीक नीचे राजमुकुट रखा है। वहां दो संतरियों का पहरा हमेशा बना रहता है। इसी गुंबद की दूसरी ओर हाउस ऑफ  रिप्रेजेंटेटिव या यूं कहें, लोकसभा है। इसके पूर्व की ओर भव्य सीढिय़ां हैं, जो मुख्य द्वार से चली आ रही हैं। छत पर दो बड़े भित्तिचित्र बने हैं। विशेष ग्रेनाईट पत्थरों से निर्मित आठ विशाल स्तंभ इसे सौंदर्य के साथ-साथ गरिमा भी प्रदान करते हैं। बताते हैं कि इनमें से एक-एक स्तंभ चार टन के ग्रेनाईट पत्थर से बना है। यह भी बताया जाता है कि इस विशेष ग्रेनाईट पत्थर के ऐसे स्तंभ पूरे विश्व में सिर्फ 12 ही हैं, जिनमें आठ यहीं हैं।

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