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प्रथम दृष्टिः भाजपा का नबीन प्रयोग

नितिन नबीन के चयन के पीछे की सबसे अहम वजह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का पार्टी की अगली पीढ़ी के नेताओं को...
प्रथम दृष्टिः भाजपा का नबीन प्रयोग

नितिन नबीन के चयन के पीछे की सबसे अहम वजह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का पार्टी की अगली पीढ़ी के नेताओं को तैयार करने की रणनीति दिखती है। हालांकि कुछ इसे अगले चुनावों से जोड़ रहे हैं तो कुछ इसके जाति समीकरण टटोल रहे हैं

खेल के मैदान में तीस-पैंतीस बसंत देख चुके खिलाड़ी को युवा नहीं समझा जाता है। कुछेक अपवाद छोड़ दें, तो अधिकतर दिग्गज खिलाड़ी उस समय तक अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दुनिया को दिखा चुके होते हैं। फिल्मों में, तो चालीस पार अभिनेता वरिष्ठ या बुजुर्ग की श्रेणी में आ जाते हैं। लेकिन, राजनीति में युवा किसे समझा जाता है? दरअसल जिस उम्र में अन्य क्षेत्र के लोग शिखर पर पहुंचने के बाद ढलान पर होते हैं, उस अवस्था में सियासत में लोगों के करियर की शुरुआत होती है। व्यवसाय से लेकर नौकरी तक में ‘युवाओं को मौका दो’ जैसी धारणा का चलन लंबे समय से रहा है। सियासत में युवाओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने की कोई रिवायत नहीं रही। राजनीति में युवा जोश की तुलना में अनुभव का पलड़ा हमेशा भारी रहा। आम तौर पर माना जाता है कि राजनैतिक परिपक्वता उम्र होने पर ही आती है। इसलिए साठ साल के नेताओं को भी अक्सर युवा नेता कहा जाता है।

वैसे तो युवा तुर्क जैसे शब्द का प्रयोग पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के समय से ही होता चला आ रहा है, लेकिन जब भी युवा तुर्क को नेतृत्व सौंपने की बात होती है तो मुख्यधारा दल कन्नी काट लेते हैं। इसलिए जब भारतीय जनता पार्टी ने अचानक बिहार के युवा मंत्री नितिन नबीन के नाम की घोषणा कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में की तो न सिर्फ आम लोगों को बल्कि सियासी मामलों के जानकारों को भी आश्चर्य हुआ। नितिन को भाजपा के राष्ट्रीय स्तर का नेता नहीं समझा जाता और बिहार से बाहर उनकी कोई राजनैतिक पहचान नहीं है। बावजूद भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया है, जिसके सियासी मायने महत्वपूर्ण हैं।

नितिन अभी मात्र 45 वर्ष के हैं, उनका जन्म उसी साल हुआ जब भाजपा नए राजनैतिक दल के रूप में अस्तित्व में आया। राजनीति में अमूमन इस उम्र के लोगों को पार्टी की युवा इकाई का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी मिलती है। लेकिन नितिन को उस दल के नेतृत्व की कमान मिली है, जो पिछले 11 साल से देश की सत्ता में है और जिसकी लोकप्रियता नरेंद्र मोदी-अमित शाह दौर में लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतने के बाद शिखर पर है। तो, क्या नितिन इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाने को तैयार हैं?

हालांकि नितिन का राजनैतिक अनुभव कम नहीं है। उनका सियासी सफर अपने पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के असामयिक निधन के कारण लगभग 26 वर्ष की अवस्था में शुरू हुआ। उनके पिता बिहार भाजपा के बड़े नेताओं में थे और नवंबर 2005 के विधानसभा चुनाव में वे पटना पश्चिम क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर जीत कर आए थे। चुनाव परिणाम आने के कुछ ही सप्ताह बाद उनका निधन हो गया और नितिन उसी सीट से भाजपा के टिकट पर विजयी हुए। उसके बाद चार और विधानसभा चुनावों में उन्होंने लगातार जीत हासिल की और नीतीश कैबिनेट में मंत्री बने।

नितिन का भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में चयन के पीछे के कारणों का विश्लेषण राजनैतिक टिप्पणीकार अपने तरीकों से कर रहे हैं। कुछ इसे पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों से जोड़ रहे हैं, तो कुछ इसके पीछे जाति समीकरण टटोल रहे हैं। हालांकि नितिन के चयन के पीछे का सबसे महत्वपूर्ण कारण भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का पार्टी की अगली पीढ़ी के नेताओं को तैयार करने की रणनीति दिखाता है। नितिन भले ही सियासत के राष्ट्रीय फलक पर जाना-पहचाना नाम न हों लेकिन वे बिहार में पार्टी के सबसे कर्मठ कार्यकर्ताओं में गिने जाते रहे हैं। भाजपा ने उन्हें छतीसगढ़ चुनाव में प्रभारी बनाया था, जहां पार्टी की शानदार जीत ने उनका राजनैतिक कद बढ़ाया। भाजपा ने उनका चयन कर संदेश भी देने की कोशिश की है कि पार्टी का कोई भी कार्यकर्ता सर्वोच्च पद पर पहुंच सकता है। वैसे तो अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के दौर में भी प्रमोद महाजन और अरुण जेटली जैसे युवा नेता पार्टी में अग्रणी भूमिका निभा रहे थे। लेकिन, मोदी के दौर में अनेक युवा नेताओं को केंद्र और राज्यों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने का अवसर मिला और आडवाणी सहित कई उम्रदराज नेता राजनैतिक फलक से धीरे-धीरे ओझल हो गए। महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर युवाओं को आने वाले समय के लिए तैयार करने की नीति ही नितिन नबीन के चयन का प्रमुख कारण है।

लेकिन क्या, बाकी पार्टियां भी नेतृत्व की कमान भाजपा की तरह युवा नेताओं को देने की पहल करेंगी? मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस में राहुल गांधी से इतर किसी नेता को नेतृत्व सौंपना फिलहाल संभव नहीं लगता, क्योंकि पार्टी की यूएसपी गांधी परिवार ही है। देश की अन्य पार्टियों में अधिकतर का नेतृत्व परिवार विशेष का ही विशेषाधिकार बन कर रह गया है, इसलिए पार्टी से बाहर किसी दूसरे को नेतृत्व की कमान सौंपने का सवाल ही पैदा नहीं होता है चाहे वे युवा हो या अनुभवी।

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