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अरुणाचल : भाजपा और कांग्रेस में जोर आजमाइश

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच जोर-आजमाइश तेज हो गई है। नाबाम तुकी द्वारा मुख्यमंत्री पद का शपथ लेने के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने भाजपा के खेमे में चले गए विधायकों से संपर्क कर उन्हें वापस बुलाने का प्रयास शुरू कर दिया है। दूसरी ओर, भाजपा के समर्थन से फरवरी में मुख्यमंत्री बनाए गए कांग्रेस के बागी कलिखों पुल ने गुवाहाटी में 30 विधायकों के साथ प्रेस कांफ्रेंस कर दावा किया, `संख्या बल मेरे ही साथ है। कानूनन, मैं ही अरुणाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री हूं।'
अरुणाचल : भाजपा और कांग्रेस में जोर आजमाइश

अरुणाचल की राजनीतिक स्थिति के मद्देनजर भाजपा और कांग्रेस में केंद्रीय स्तर पर उच्च स्तरीय बैठकों का दौर जारी है। भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री अरुण जेटली और विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बैठक और बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की। प्रधानमंत्री के साथ इन नेताओं की बैठ में अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी को भी बुलाया गया था। इस बैठक के बाद ही नाबाम तुकी के दिल्ली में ही अरुणाचल भवन में मुख्यमंत्री पद का शपथ ग्रहण करने की सूचना आई।

इस मुद्दे पर फिलहाल भाजपा के अमित शाह और राम माधव ने नजर बना रखी है। असम के मंत्री हिमंत विश्वशर्मा वहां से अरुणाचल के नेताओं के संपर्क में हैं। गुवाहाटी में कलिखों पुल की प्रेस कांफ्रेस के बाद हिमंत विश्वशर्मा ने ट्विटर पर राम माधव और अमित शाह को जानकारी भेजी कि कलिखों पुल के समर्थन में 41 विधायक हैं।

दूसरी ओर, कांग्रेस के नेता नाबाम तुकी ने इटानगर पहुंचकर अपने पूर्ववर्ती मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई। उन्होंने बुधवार को ही अरुणाचल प्रदेश के कार्यवाहक राज्यपाल तथागत राय को पत्र लिखकर बताया था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार वे मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश की 60 सदस्यीय विधानसभा में 31 विधायकों का समर्थन बहुमत के लिए जरूरी है। दिसंबर में कांग्रेस में हुई बगावत के बाद 18 विधायक टूटकर कलिखों पुल की अगुवाई में भाजपा के खेमे में चले गए थे। उन विधायकों को वापस बुलाने की योजना पर कांग्रेस काम कर रही है।

कांग्रेस आलाकमान मान रही है कि मौजूदा हालात में अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में बहुमत साबित करने लायक आंकड़े पार्टी के पास नहीं हैं। ऐसे में बागियों के कांग्रेस छोड़कर जाने के कारणों पर चर्चा शुरू की गई है। कांग्रेस के एक नेता के अनुसार, अधिकांश को कांग्रेस नेतृत्व से शिकायत नहीं थी। दरअसल उन्हें तुकी के नेतृत्व से नाराजगी थी। तुकी को इस बात के लिए मना लिया गया है कि जरूरत के अनुसार, दो-तीन लोगों से इतर बागियों में से किसी को भी कमान दिए जाने पर आपत्ति नहीं करेंगे। 

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