राज और उद्धव ठाकरे स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों को अपने पक्ष में नहीं ला सके, भाजपा ने शिंदे से गठबंधन कर मराठी मानुष और शिवसेना दोनों ही बातों को अपने पक्ष में कर सत्ता हासिल की
महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने नया और साफ सियासी फैसला सुनाया है। ठाकरे भाइयों के एक मंच पर आने के बावजूद वोटरों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि मराठी मानुष की राजनीति का वोट शिंदे शिवसेना को भी मिला। इस वजह से शायद पहली बार महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसे सवाल मुखर हैं, जो लंबे समय से टलते जा रहे थे। बाल ठाकरे के दोनों राजनैतिक वारिस मिलकर भी जनादेश नहीं बदल पा रहे हैं, तो क्या उनकी विरासत बची है? बाल ठाकरे सिर्फ शिवसेना प्रमुख नहीं, बल्कि खुद ही पार्टी थे। उनका इकबाल निर्विवाद था। तकरीबन हर समर्थक से उनका रिश्ता निपट व्यक्तिगत था। उनके नेतृत्व में शिवसेना आम राजनैतिक संगठन की तरह कम, आंदोलन जैसी थी, जो उनकी मजबूत आवाज और साफ संदेश के इर्द-गिर्द केंद्रित थी। वह आवाज विवाद सुलझाती थी, सुलह करवाती थी, अनुशासन लागू करती थी और कार्यकर्ताओं को विचारधारा और पदानुक्रम से साफ-साफ वाकिफ कराती थी।
बाल ठाकरे ने जो बनाया, वह बहुत ठोस और अनोखा था। उनका नेतृत्व एकदम व्यक्तिगत था। इससे कार्यकर्ताओं में वफादारी तो कायम हुई, लेकिन ऐसा कोई ढांचा नहीं बना, जिसके सहारे पार्टी आगे बढ़ती रहे। शिवसेना के इसी अनोखेपन ने उसे मजबूत ताकत बनाया, लेकिन अब वही अनोखापन विरासत को कमजोर बना रहा है।
हालांकि, विरासत में सत्ता मिलना उसी तरह का इकबाल कायम रहना नहीं है। उद्धव ठाकरे को पार्टी का ढांचा और ठाकरे की विरासत का वजन तो मिला, लेकिन उन्हें पार्टी का वही नाम, चुनाव चिन्ह और कमान स्वाभाविक तौर पर नहीं मिली, जिसने एक समय संगठन को मजबूती से बांधे रखा था। शिवसेना को ज्यादा संवैधानिक और सत्ता-उन्मुख ताकत बनाने की उद्धव की कोशिश से शायद वह आक्रामक प्रतिबद्धता कमजोर हो गई, जो पार्टी का मूल आधार था। वह काडर जो दो-टूक आक्रामकता पर फलता-फूलता था, उसने खुद को वैचारिक रूप से अनिश्चिय में पाया। नतीजा यह हुआ कि पार्टी आज भी बाल ठाकरे का नाम लेती है, लेकिन अब उनकी शिवसेना जैसा व्यवहार नहीं करती।
ठीक इसी कथित वैचारिक बदलाव का इस्तेमाल एकनाथ शिंदे ने विध्वंसक असर के साथ किया है। शिंदे लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि उद्धव ने सत्ता में बने रहने के लिए कांग्रेस और शरद पवार की राकांपा के साथ गठबंधन कर बाल ठाकरे के आक्रामक हिंदुत्व को छोड़ दिया। यह दावा उनके 2022 के विद्रोह का नैतिक आधार बना, जिसे भाजपा की भारी मदद से अंजाम दिया गया। इस तरह उद्धव मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवा बैठे। अब 2024 के विधानसभा चुनावों के बाद देवेंद्र फड़नवीस के तहत बतौर उप-मुख्यमंत्री शिंदे सत्ता में काबिज हैं और खुद को बाल ठाकरे के मूल राजनैतिक स्वभाव के वैचारिक उत्तराधिकारी के रूप में पेश कर रहे हैं।
यह फर्क बहुत कुछ कहता है। उद्धव के साथ उपाधि और पहचान तो बनी रही, लेकिन संगठन और मूल नैरेटिव पर कंट्रोल खो बैठे। शिंदे के पास उपाधि और पारिवारिक विरासत नहीं है, लेकिन वे शिवसेना के एक बड़े हिस्से को यह समझाने में कामयाब रहे कि वे टूटने के बजाय निरंतरता का प्रतिनिधित्व करते हैं।
दरअसल उद्धव विरासत की वैधता का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो राज ठाकरे करिश्मे का प्रतिनिधित्व करते हैं। राज को अपने चाचा की भाषण देने की कला, टकराव का तरीका और राजनैतिक समझ विरासत में मिली। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के जरिए उन्होंने बाल ठाकरे के अंदाज को जिंदा रखा है: सड़कों पर आक्रामकता, प्रवासियों के खिलाफ बयानबाजी और ‘मराठी मानुष’ वोट बैंक पर मजबूत दावा। हाल के निगम चुनाव में पुराने नारे फिर से दोहराए गए, जो 1960 के दशक की याद दिलाते थे, जब शिवसेना की बाहरी लोगों के खिलाफ राजनीति ज्यादातर दक्षिण भारतीयों पर केंद्रित थी, न कि उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासियों पर।
राज की बोली काफी हद तक उसी पुराने दौर पर टिकी हुई है। भाजपा के तमिलनाडु नेता के अन्नामलै पर उनका हालिया हमला उस दौर की बरबस याद दिला देता है। उन्होंने ‘‘हटाओ लुंगी, बजाओ पुंगी’’ का नारा दिया। लेकिन यह नारा जिस राजनीति का आईना है, वह एक अलग महाराष्ट्र की है। यहां तक कि बाल ठाकरे खुद भी बहुत पहले आगे बढ़ चुके थे और बड़े हिंदुत्व फ्रेमवर्क में करीब से जुड़ गए थे, जिसमें प्रवासी विरोधी राजनीति मुख्य मुद्दा न होकर सिर्फ सप्लीमेंट के तौर पर काम कर रही थी।
ज्यादा महत्वपूर्ण कहानी अलग है। पिछले एक दशक में भाजपा ने शिवसेना की विरासत के बड़े हिस्सों को बाल ठाकरे के वारिसों की तुलना में ज्यादा असरदार तरीके से अपनाया है। भाजपा ने शिवसेना के उग्र राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान पर जोर और अनुशासित संगठन का विस्तार किया। जहां शिवसेना ने कभी सड़कों पर ताकत दिखाई थी, वहीं भाजपा ने उसे बड़े पैमाने पर बढ़ाया।
शिंदे के साथ गठबंधन करके भाजपा ने वह मुद्दा भी हासिल कर लिया, जिस पर कभी शिवसेना का एकाधिकार था, बेधड़क हिंदुत्व और मराठी मानुष की पैरोकारी। ऐसा कर, उसने उद्धव और राज को दोनों तरफ से निचोड़ दिया। भाजपा उस वैचारिक जगह पर काबिज हो गई है, जिसकी तरफ बाल ठाकरे धीरे-धीरे बढ़े थे। साथ ही भाजपा के पास चुनावी संख्या, संगठनात्मक गहराई और सत्ता तक पहुंच भी है। इसके विपरीत, ठाकरे के वारिस बिना किसी नियंत्रण के असली-नकली की बहस में उलझे हुए हैं।
इस पृष्ठभूमि में चचेरे ठाकरे भाइयों का मिलन प्रतीक रूप में तो काफी ताकतवर था, लेकिन वह चुनावी नतीजों में उनकी ताकत में नहीं बदल सका। पुराने शिवसेना वफादारों के लिए उसमें भावनात्मक जुड़ाव था। ठाकरे नाम एकता, नेतृत्व और निर्विवाद मराठी राजनैतिक पहचान का प्रतीक था। लेकिन वह भावना पहचान तक ही सीमित रही, वह नई वफादारी या वोटिंग के उत्साह में नहीं बदली।
नतीजे बड़ा सबक देते हैं: प्रतीकवाद तालियां बटोर सकता है, लेकिन वोट विश्वसनीयता और ताकत को मिलते हैं। बाल ठाकरे की विरासत का आज जो बचा है, वह न तो कोई एकजुट पार्टी है और न ही कोई निर्विवाद मराठी राजनैतिक ताकत। जो बचा है, वह प्रतीकात्मक पूंजी है, जिसे बार-बार इस्तेमाल किया जाता है और धीरे-धीरे उसका मूल्य कम होता जा रहा है।
उद्धव और राज भाजपा पर ‘‘नकली हिंदुत्व’’ का आरोप लगा सकते हैं, लेकिन उनकी अपनी कमजोरी उन्हें एक कठिन सवाल का सामना करने पर मजबूर करती है: अब उनकी शिवसेना की मुख्य विचारधारा क्या है? संख्या, संगठनात्मक प्रभुत्व, या स्पष्ट राजनैतिक रास्ते के बिना, इसका जवाब मायावी बना हुआ है।
इस बार मतदाता का संदेश नाटकीय नहीं, निर्णायक है: विरासत को याद किया जा सकता है, लेकिन उसे दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र की राजनीति को अपनी छवि के अनुसार ढाला। दूसरों ने उस छवि का इस्तेमाल उनके वारिसों की तुलना में अधिक प्रभावी ढंग से करना सीख लिया है।