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हॉकी इंडिया के घपलों पर कीर्ति आजाद का निशाना

भारतीय हॉकी संघ (आईएचएफ) का अस्तित्व सन 1925 से है जिसे मेजर ध्यानचंद जैसे हॉकी के दिग्‍गजों ने स्थापित किया था। हमारे लिए यह बड़े सदमे की बात है कि सन 2009 में स्थापित हॉकी इंडिया के पक्ष में 90 साल पुराने आईएचएफ को अलविदा कर दिया गया क्‍योंकि हॉकी इंडिया को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। ओलिंपिक और अंतरराष्ट्रीय खेलों से जुड़े कई पूर्व खिलाड़ी भारतीय हॉकी संघ की जगह अनुचित तरीके से हॉकी इंडिया को स्थापित करने का मुद्दा बार-बार उठाते रहे हैं लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ।
हॉकी इंडिया के घपलों पर कीर्ति आजाद का निशाना

एक खिलाड़ी होने के नाते हॉकी में एक अवांछित निकाय हॉकी इंडिया के बढ़ते दखल और गड़बडिय़ों से आहत हूं। इस संगठन ने गैरकानूनी साधनों के इस्तेमाल करते हुए और कई राजनीतिक दलों के नेताओं का संरक्षण पाकर हॉकी पर कब्‍जा जमा लिया है। इस संदर्भ में मैंने लोकसभा में भी सवाल (5 अगस्त 2014) उठाया था। जवाब में खेल मंत्रालय से मुझे आश्वासन मिला कि वह संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार की पिछली गलतियों या धोखाधड़ी पर निर्विवाद तथ्य के रूप में विचार कर रहा है और खेल एवं युवा मामलों का मंत्रालय हॉकी इंडिया को मान्यता देने पर फिर से विचार कर रहा है जिसमें किसी भी विचारवान व्यक्तित्व को अनुपयुक्त मान लिया जाता है।
भारतीय हॉकी संघ (आईएचएफ) का अस्तित्व सन 1925 से है जिसे मेजर ध्यानचंद जैसे हॉकी के दिग्‍गजों ने स्थापित किया था। हमारे लिए यह बड़े सदमे की बात है कि सन 2009 में स्थापित हॉकी इंडिया के पक्ष में 90 साल पुराने आईएचएफ को अलविदा कर दिया गया क्‍योंकि हॉकी इंडिया को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। ओलिंपिक और अंतरराष्ट्रीय खेलों से जुड़े कई पूर्व खिलाड़ी भारतीय हॉकी संघ की जगह अनुचित तरीके से हॉकी इंडिया को स्थापित करने का मुद्दा बार-बार उठाते रहे हैं लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। पिछले कुछ वर्षों में प्रत्येक टूर्नामेंट के साथ ही हॉकी का प्रदर्शन स्तर गिरा है क्‍योंकि पिछले छह वर्षों के दौरान हॉकी इंडिया से चार विदेशी कोच बदले जा चुके हैं। इसमें कमजोर रीढ़ वाले भारतीय खेल प्राधिकरण के साथ-साथ हॉकी इंडिया की भूमिका संदेहास्पद है जिसने भारतीय हॉकी को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। हॉकी प्रशासन पर निगाह डालें तो कुछ ऐसे छोटे-छोटे कारोबारियों ने इस खेल पर कब्‍जा जमा लिया है जिन्होंने अपने जीवन में कभी हॉकी स्टिक भी नहीं पकड़ी लेकिन हॉकी के खुदा बन बैठे। उनका पूरा नियंत्रण न सिर्फ खिलाडिय़ों के चयन पर है बल्कि अर्जुन पुरस्कार और पद्म पुरस्कारों जैसे राष्ट्रीय सक्वमान के लिए खिलाडिय़ों का फैसला भी उन्हीं के हाथों में है। वर्तमान और पूर्व के सभी विशिष्ट खिलाड़ी महसूस करने लगे हैं जिस खेल पर देश को पहले गर्व था, वह अब कुछ लोगों के व्यापारिक हित साधने के उद्देश्य से एक कम महत्व का व्यावसायिक उपक्रम बनकर रह गया है। खेल एवं युवा मामले मंत्रालय के लिए निर्णायक कार्रवाई करने और उचित कदम उठाने का वञ्चत आ गया है ताकि हॉकी को फिर से सही राह पर लाया जा सके।
सरकार (खेल) ने 28 फरवरी 2014 को हॉकी इंडिया को राष्ट्रीय खेल संघ (एनएसएफ) का दर्जा देने का आदेश हॉकी इंडिया द्वारा पेश तथ्यात्मक त्रुटियों, गलत सूचना और पेटेंट विसंगतियों के आधार पर दिया था जिसने सभी कानून ताक पर रखकर हॉकी इंडिया जैसे गैरकानूनी निकाय को संचालित करने में मदद की। भारतीय ओलिंपिक एसोसिएशन (आईओए) के सहयोग से हॉकी इंडिया के गैरकानूनी गठन को सरकार ने मंजूरी दी जबकि इसे एनएसफ का दर्जा देने की तैयारी में राज्यों के ओलिंपिक संघों ने नए राज्यों के हॉकी संघों को इसका सदस्य बना दिया और आईएचएफ तथा भारतीय महिला हॉकी संघ (आईडब्‍ल्यूएचएफ) के पुराने सदस्यों के दावे की अनदेखी कर दी गई। आईओए ने अपने अधीनस्थ प्रादेशिक ओलिंपिक संघों को निर्देश जारी कर अपने-अपने राज्यों में पुरुषों तथा महिलाओं के लिए नए सिरे से राज्य हॉकी संघ गठित करने को कहा। सही तरीका यह होना चाहिए था कि आईएचएफ तथा आईडद्ब्रल्यूएचएफ से संबद्ध पुरुषों एवं महिलाओं की मौजूदा प्रादेशिक इकाइयों को विलय करने का सुझाव दिया जाता और तब राष्टï्रीय स्तर का एकीकृत निकाय गठित करने के लिए चुनाव कराया जाता। आईओए और अंतरराष्ट्रीय हॉकी फेडरेशन (एफआईएच) ने भारतीय हॉकी कंफेडरेशन (आईएचसी) के पुनर्गठन का फैसला किया जिसमें सिर्फ दो निकाय आईएचएफ और आईडब्‍ल्यूएचएफ ही हैं। उन्होंने 7 मई 2008 को एफआईएच द्वारा भेजे गए एडवाइजरी नोट के साथ उसी दिन एक सहमति पत्र (एमओयू) पर भी दस्तखत कर दिए। जब यह मामला पहले से चल रहा था तो आईओए कैसे इस एमओयू का पूरी तरह उल्लंघन कर सकता है और हॉकी इंडिया के नाम से बिल्कुल एक नया निकाय गठित कर सकता है?
 (लेखक पूर्व क्रिकेटर और भाजपा से लोकसभा सांसद हैं)

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