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आर्थर रॉबर्ट ऐश: विंबलडन जीतने वाले एकमात्र अश्वेत खिलाड़ी

दुनिया के सबसे बड़ा टेनिस टूर्नामेंट विंबलडन 3 जुलाई से शुरू हो चुका है। ग्रास कोर्ट पर खेले जाने वाले इस टूर्नामेंट ने इस साल अपने 140 साल पूरे कर लिए हैं। साल 1877 से अब तक विंबलडन कई एतिहासिक और रोचक घटनाओं का गवाह रहा है।
आर्थर रॉबर्ट ऐश: विंबलडन जीतने वाले एकमात्र अश्वेत खिलाड़ी

आज से 42 साल पहले विंबलडन में एक ऐसा फाइनल खेला गया, जिसने इतिहास बना दिया। ये फाइनल दो खिलाड़ियों के बीच ही नहीं बल्कि श्वेत और अश्वेत के बीच खेला गया, जिसमें एक तरफ थे 22 साल के डिफेंडिंग चैंपियन जिमी कोनर्स और उनसे 9 साल बड़े आर्थर रॉबर्ट ऐश।

इस मैच से पहले दोनों के बीच तीन बार भिड़ंत हो चुकी थी और तीनों ही बार जिमी कोनर्स ने बाजी मारी थी, लेकिन उस दिन आर्थर का दिन था। मैच शुरु होने के 19 मिनट के भीतर ही आर्थर ऐश ने पहला सेट 6-1 से अपने नाम कर लिया। दूसरे सेट भी उन्होंने आसानी से जीत लिया। तीसरे सेट में कार्नर ने 5-7 से जबरदस्त वापसी करते हुए मैच में बरकरार रहने की भरपूर कोशिश की, लेकिन आज किस्मत आर्थर के साथ थी। चौथा सेट 6-4 से जीतते ही आर्थर ने वो कर दिखाया था जो आजसे पहले कोई नहीं कर पाया था। आर्थर विंबलडन की सिंगल्स खिताब जीतने वाले पहले अश्वेत खिलाड़ी बन चुके थे।

इस खिताब से पहले आर्थर ऐश साल 1968 में अमेरिकी ओपन और साल 1970 में ऑस्ट्रेलियन ओपन जीतकर टेनिस जगत में सनसनी मचा चुके थे। विंबलडन जीतने के साथ ही वह तीन ग्रैंड स्लैम जीतने वाले पहले अश्वेत खिलाड़ी बन गए। विंबडन का खिताब जीतने के 4 साल बाद उन्हें हार्ट-अटैक आया और 1980 में उन्होंने कम्पटिटीव टेनिस से सन्यास ले लिया।

इसी साल उन्हें अमेरिका की डेविस कप टीम का कप्तान बनाया गया। उनकी कप्तानी में अमेरिका ने 1980 और 1981 में लगातार दो बार डेविस कप अपने नाम किया। उन्होंने कई सालों तक टेनिस कमेंटेटर के रुप में भी काम किया।

साल 1985 में आर्थर का नाम इंटरनेशनल टेनिस हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया. साल 1988 में उन्हें एचआईवी पॉजिटिव होने का पता चला। माना जाता है कि पांच साल पहले दिल की सर्जरी के दौरान एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाने की वजह से उन्हें ये बीमारी हुई थी।

आर्थर ने अपनी बीमारी की खबर कई सालों तक अपने फैन्स छिपाकर रखी, लेकिन साल 1992 में उन्होंने बीमारी का खुलासा कर सबको चौंका दिया। ये खबर सुनते ही दुनियाभर में मौजूद उनके प्रशंसक निराश हो गए।

रोजाना ही उनके पास उनके प्रशंसकों के ढेरों पत्र आने लगे। आर्थर रॉबर्ट ऐश उन सभी पत्रों को पढ़ते और उनका जवाब भी देते। एक दिन उनके पास एक पत्र आया। पत्र में उनके प्रशंसक ने पूछा कि इस लाइलाज बीमारी के लिए भगवान ने आपको ही क्यों चुना। इस पत्र को पढ़ने के बाद आर्थर ने इसका जवाब लिखा। उनके जवाब ने पत्र लिखने वाले की अंतरआत्मा को झकझोर दिया। उन्होंने लिखा कि पूरे विश्व में करोड़ों बच्चे टेनिस खेलना चाहते हैं। उनमें से लाखों बच्चे टेनिस खेलना शुरू कर पाते हैं। कुछ लाख बच्चे पेशेवर टेनिस खिलाड़ी बनते हैं और इनमें से हजारों खिलाड़ी महत्वपूर्ण प्रतियोगिताओं में खेल पाते हैं। इनमें से कुछ खिलाड़ी ग्रैंडस्लैम में और इनमें से भी कुछ विंबलडन में खेल पाते हैं। सेमीफाइनल में चार खिलाड़ी पहुंचते हैं और फाइनल में सिर्फ दो खिलाड़ी पहुंच पाते हैं। इतने खिलाड़ियों के बीच में से विजेता सिर्फ एक ही होता है।

जब विंबलडन ट्रॉफी जीतने के बाद मैंने कभी ईश्वर से नहीं पूछा कि 'मैं ही क्यों?' तो आज इस बीमारी के समय भी मुझे नहीं पूछना चाहिए कि 'मैं ही क्यों? ऐसी सकारात्मक सोच रखने वाले महान खिलाड़ी आर्थर रॉबर्ट ऐश ने इस लाइलाज बीमारी से अंत तक जिंदगी की जंग लड़ी। साल 1993 में एड्स की वजह से उन्हें निमोनिया हो गया और 6 फरवरी को न्यूयार्क अस्पताल में उनकी मौत हो गई। आर्थर ऐश अंतरराष्ट्रीय टेनिस में सर्वोच्च स्तर पर खेलने वाले प्रथम अफ्रीकी अमेरिकन खिलाड़ी थे।

आर्थर ऐश को मरणोपरांत तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने प्रेसीडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम से सम्मानित किया। ऐश ने अपने पूरे करियर में 3 एकल ग्रैंड स्लैम के अलाव दो डबल्स ग्रैंड स्लैम खिताब भी अपने नाम किए जिसमें एक यूएस ओपन (1968) और विंबलडन (1971) शामिल है।

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