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16 मार्च 2026 · MAR 16 , 2026

डिजिटल धोखाधड़ीः सावधानी ही सुरक्षा

पिछले वर्षों से पांच गुना ज्यादा, 2024 में साइबर अपराधियों ने लोगों को 22,842 करोड़ रुपये की चपत लगाई, कानूनी उपायों के अलावा लोग कैसे बचें
भारत में बढ़ रहे डिजिटल फ्रॉड

हर छोटे-बड़े स्टोर पर क्यूआर कोड, स्मार्टफोन को वॉलेट में बदलने वाले फिनटेक एप्लिकेशन और यूपीआइ के जरिये अरबों का लेनदेन। यह भारत में डिजिटल भुगतान की कहानी है, जिसे चुनौतियों पर जीत की कहानी के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे भयावह सच्चाई छिपी है, डिजिटल और वित्तीय धोखाधड़ी में बढ़ोतरी, जो धीरे-धीरे लोगों की बचत और भरोसे को तोड़ रही है। नए मध्यम वर्ग के लिए अब सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि ‘‘मेरी लेनदेन हो पाएगी?’’ बल्कि यह है कि ‘‘इस लिंक, ओटीपी या क्यूआर कोड के दूसरी तरफ कौन है?’’

ये आंकड़े डिजिटल पेमेंट का यथार्थ दिखाते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के अनुसार, मार्च 2024 में डिजिटल चैनलों से जुड़ी भुगतान धोखाधड़ी पिछले वर्ष की तुलना में पांच गुना से भी ज्यादा बढ़कर अनुमानित 14.57 अरब रुपये तक पहुंच गई, जबकि यूपीआइ लेनदेन की मात्रा रिकॉर्ड तोड़ती रही। एक अन्य अध्ययन बताता है कि वर्ष 2024 के दौरान लोगों ने साइबर अपराधियों और ठगों के हाथों 22,842 करोड़ रुपये की भारी रकम गंवाई, जो पिछले वर्षों के मुकाबले बहुत ज्यादा है।

आधिकारिक स्रोत चेतावनी देते हैं कि मौजूदा रुझान जारी रहा, तो वार्षिक धोखाधड़ी से हुआ नुकसान 1.2 लाख करोड़ रुपये के पार जा सकता है। दिलचस्प बात यह है आंकड़ों में पाया गया कि हर पांच में से एक यूपीआइ उपयोगकर्ता किसी न किसी तरह की धोखाधड़ी का सामना कर चुका है। फिर भी पीड़ितों में से आधे से अधिक लोग अक्सर शर्मिंदगी या आगे क्या करना है, यह पता न होने की वजह से शिकायत दर्ज नहीं कराते।

माय लीगल एक्सपर्ट (एमएलई) के संस्थापक अश्विनी कुमार कहते हैं, “डिजिटल लेनदेन को संभव बनाने वाली तकनीक की तरह ही भुगतान धोखाधड़ी भी तेजी से विकसित हो रही है। पारंपरिक फिशिंग ईमेल अब फर्जी कस्टमर-केयर नंबरों, ‘केवाइसी अपडेट’ लिंक, रिमोट-एक्सेस ऐप्स, नकली निवेश समूहों, रोमांस स्कैम्स और यहां तक कि भरोसेमंद व्यक्तियों के डीपफेक ऑडियो या वीडियो नकल में बदल गए हैं। इन सभी योजनाओं में एक बात समान है, सोशल इंजीनियरिंग। ठग शायद ही कभी सिस्टम में सेंध लगाते हैं। वे लोगों को ही बरगलाते हैं। पीड़ित अक्सर ठगी के इन तरीकों से अनजान रहते हैं, क्योंकि परिचित ब्रांड, लोगो या संदेश की भाषा देखकर उन्हें लगता है कि वे किसी वैध संस्था से बात कर रहे हैं। उसी गलत भरोसे के क्षण में वे ओटीपी साझा कर देते हैं, कलेक्ट रिक्वेस्ट मंजूर कर लेते हैं, या ऐसे ऐप्स इंस्टॉल कर लेते हैं, जो उनके फोन का नियंत्रण ठगों के हाथ सौंप देते हैं।”

हालांकि कानूनी और नियामक और बचाव के उपाय गति पकड़ रहे हैं, लेकिन धोखाधड़ी के तरीकों में आए बदलावों और कम तकनीकी जानकारी रखने वाले उपयोगकर्ताओं तक सुरक्षा उपाय पहुंचने में समय लगता है। अधिकारी डिजिटल धोखाधड़ी को बड़ा जोखिम मानाते हैं और वे बैंकों और भुगतान संस्थानों को मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और धोखाधड़ी रिपोर्टिंग सिस्टम को मजबूत करने के लिए बाध्य कर रहे हैं। पुलिस ने साइबर अपराध के लिए ऑनलाइन रिपोर्टिंग और विशेष समन्वय केंद्र शुरू किए हैं ताकि फर्जी खातों और धोखाधड़ी वाली वेबसाइटों के माध्यम से धन के प्रवाह को रोका जा सके। वहीं, जन जागरूकता अभियान और कानून प्रवर्तन एजेंसियां उपभोक्ताओं से संवेदनशील जानकारी साझा न करने या अज्ञात लिंक या नंबरों पर क्लिक न करने का आग्रह कर रही हैं।

कुमार कहते हैं, “खुशी की बात है कि धोखाधड़ी के पीड़ितों के पास संबंधित बैंकों में शिकायत दर्ज कराने के अलावा भी राहत पाने के कई रास्ते हैं। नामित ऑनलाइन पोर्टलों या स्थानीय पुलिस थानों के माध्यम से साइबर अपराध रिपोर्ट के साथ बैंकिंग लोकपाल में शिकायत की जा सकती है। हालांकि ये रास्ता लंबा है, फिर भी बड़ी रकम या बार-बार होने वाली धोखाधड़ी के मामलों में सेवा में खामी के आधार पर उपभोक्ता आयोगों का रुख कर सकते हैं या फिर रकम वसूली के लिए सिविल कोर्ट जा सकते हैं। इसके अलावा, समय पर रिपोर्टिंग होने पर आंशिक वसूली या बैंक क्रेडिट मिलना सामान्य प्रक्रिया है।’’

धोखाधड़ी की रोकथाम तकनीकी दृष्टि से जितनी चुनौतीपूर्ण है, व्यवहारिक दृष्टि से भी उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। आंकड़ों से पता चलता है कि डिजिटल भुगतान में तेजी आने के साथ आम लोगों में वित्तीय और साइबर साक्षरता की कमी भी जालसाजों के लिए आदर्श माहौल बना रहा है।

पीड़ितों में बड़ी संख्या में, ऐसे बुजुर्ग माता-पिता हैं, जो यूपीआई से जुड़े हैं, कुछ नकदी रहित व्यवस्था अपनाने वाले छोटे व्यापारी हैं, तो कुछ ऐप-आधारित बैंकिंग से नितांत अपरिचित ग्रामीण परिवार हैं। ये सभी ऑनलाइन पेमेंट के जोखिम से अनजान रहते हैं। उनके लिए, उपयोग में आसान इंटरफेस जोखिम के खतरे को भांपने में परेशानी पैदा कर सकता है। इसलिए, जरूरी है कि हर डिजिटल वित्तीय लेनदेन के साथ सुरक्षित और असुरक्षित व्यवहार की बुनियादी समझ पर निरंतर और मजबूत शिक्षा भी दी जाए।

कुमार कहते हैं, “2025 और उसके बाद के लिए सबसे अच्छा तरीका तकनीक, लेनदेन में सावधानी और व्यवहार में अनुशासन तीनों का ध्यान रखा जाना चाहिए। उपभोक्ताओं को कुछ सरल, जरूरी नियमों को अपनाना होगा। जैसे, कभी भी अनजान के साथ ओटीपी या पिन साझा न करें, आधिकारिक वेबसाइटों या ऐप्स के माध्यम से फोन नंबर और लिंक की सत्यता जांचे, पैसा ट्रांसफर करने से पहले जिसे पैसे ट्रांसफर कर रहे हैं, उसका विवरण दोबारा जांचें फोन या लैपटॉप में पासवर्ड डालें और रकम कितनी भी छोटी क्यों न हो, संदिग्ध लेनदेन की तुरंत रिपोर्ट करें।’’

इस बीच, रेगुलेटरी अथॉरिटी को जवाबदेही के ढांचे को लगातार सख्त करना चाहिए और जहां भी नियम लागू हो, वहां धोखाधड़ी के मामलों में मुआवजे की को प्रोत्साहन देना चाहिए। डिजिटल भुगतान का चलन स्थायी है और डिजिटल अपराध भी। अहम सवाल यह है कि उपभोक्ता इस चलन से सशक्त महसूस करते हैं या असहाय।

(आउटलुक मनी से साभार)

 

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