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2 मार्च 2026 · MAR 02 , 2026

आवरण कथा/जेल डायरीः ‘‘जमानत थोड़ी राहत जैसी, जिंदगी तो खो गई’’

जेल बेतुकी बातों की फैक्ट्री है, जो रोज बेरोकटोक चलती है। मसलन, हर सुबह सेल खोले जाते थे, तो यह रस्म डंडों की खड़खड़ाहट के साथ शुरू होती थी
जीवन का सबकः आनंद तेलतुम्बडे अभी जमानत पर बाहर हैं

कारागार के दुखद पहलू पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन जिसकी ज्‍यादा चर्चा नहीं हुई, वह है उसका मजाकिया पहलू। जेल बेतुकी बातों की फैक्ट्री है, जो रोज बेरोकटोक चलती है। मसलन, हर सुबह सेल खोले जाते थे, तो यह रस्म डंडों की खड़खड़ाहट के साथ शुरू होती थी। गार्ड डंडों को स्टील की सलाखों पर जोर से रगड़ते थे, जिससे कानफोड़ू आवाज निकलती थी, जो अलार्म से ज्यादा रुतबे और ताकत की घोषणा जैसी लगती थी। एक सवाल मेरे मन में घुमड़ता रहता था कि हमेशा दो या तीन ही क्यों आते है? एक ही गार्ड अपने डंडे धड़ाधड़ ठकठकाते हुए चीखता जा सकता था, ‘‘अरे उठो रे।’’ मैंने एक बार एक गार्ड से पूछा फालतू काम क्यों करते हैं। वह फौरन बोला, ‘‘रोस्टर ड्यूटी।’’ मैंने कहा, मैं यह नहीं पूछ रहा कि वह क्या कर रहा है, वह तो मुझे दिख ही रहा है, बल्कि यह पूछ रहा हूं कि उसके लिए दो लोगों की जरूरत क्यों है। इससे दार्शनिक मोड़ आ गया। थोड़ी देर ठहरकर, उसने जेल की दुनिया का सबसे शक्तिशाली मंत्र उच्‍चारित किया, ‘‘साब ला विचारतो’’, (साहब से पूछता हूं।)

जेल में ‘‘साब ला विचारतो’’ वादा नहीं, एक ठिकाना है, जहां सवाल जमा हो जाते हैं और जवाब कभी नहीं मिलते। सुबह जगाने की रस्‍म की तरह ही रुतबा जोड़ों में आती है। आखिर में हफ्ते की रस्‍म में यह कॉमेडी अपने शबाब पर पहुंचती है! सेल में अकेले पलों में ऐसे मजेदार वाकयों को याद करना मेरा दिलचस्‍प शौक बन गया था।

मुझे भीमा कोरेगांव केस में फंसाए जाने का वाकया साफ-साफ याद है, खासकर उसका मजाकिया पहलू भी। पुणे पुलिस ने पहले पांच गिरफ्तार लोगों के जब्त किए गए इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से मिले दस्‍तावेजों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की, तो खुलकर ऐलान किया कि साजिश का दायरा फैल गया है। जैसे पहले से तय हो, एक पत्रकार ने नाम पूछे। मेरा नाम फौरन ऐसे सामने आ गया, जैसे कोई जादूगर खाली टोपी से खरगोश निकाल दे। कुछ देर बाद पुलिस ने एक चिट्ठी पढ़कर सुनाई, जिसे कथित तौर पर किसी ऐसे व्यक्ति ने लिखी थी, जिसे वे पहले ही माओवादी बता चुके थे। वह चिट्ठी ‘आनंद’ को लिखी गई थी, जो पक्का दावा था कि मैं ही था। उसमें लिखा था कि मैंने पेरिस की अमेरिकन यूनिवर्सिटी में जिस सेमिनार में हिस्सा लिया था, उसे उसकी पार्टी ने फंड किया था। यह जानकर अजीब लगा कि मेरी पढ़ाई-लिखाई को मेरी जानकारी के बिना इतनी उदारता से स्पॉन्सर किया गया था। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अंडरग्राउंड संगठन की चलाई जा रही किसी गोपनीय स्कॉलरशिप का फायदा उठाता रहा हूं।

आनंद तेलतुम्बड़े

पुलिस की सोच जाने-पहचाने दायरे से आगे नहीं जा पाती। उनकी दुनिया में सब की एक कीमत होती है। फिर, अकादमिक सेमिनार का कोई स्पॉन्सर होना चाहिए, स्पॉन्सर का कोई एजेंडा होना चाहिए और एजेंडा कोई साजिश होनी चाहिए। यह बकवास है कि यूनिवर्सिटियां विद्वानों को बोलने के लिए बुलाती हैं। इस दलील से अमेरिकी यूनिवर्सिटी से भारत के माओवादियों की गोपनीय सांठगाठ थी!

विसंगतियां इतनी साफ थीं कि जब अफसर बड़ी गंभीरता से चिट्ठी पढ़ रहा था, तो मुझे हंसी आ गई, जैसे सच का पता चेहरे की गंभीरता से लगता है, न कि तथ्‍यों और तार्किक संगतियों से। इस नई ज्ञान मीमांसा में मेरा पहला सबक था, तथ्य बेमानी हैं, चेहरे की गंभीरता जरूरी है। बाद में एक दुर्लभ वाकये में, हाइकोर्ट ने इस ऊंचे ओहदे के पुलिस अफसर को कोर्ट में सबूत जमा करने से पहले प्रेस वालों को बताने के लिए फटकार लगाई। अफसोस, कोर्ट इससे वाकिफ नहीं थी कि अफसर ने न सिर्फ चिट्ठी पढ़ी थी, बल्कि उसे पर्चे की तरह पत्रकारों में बांट भी दिया था। एक टीवी चैनल के पत्रकार दोस्त ने चिट्ठी मुझे मेल की, तो मैं हंसे बिना नहीं रह सका।

जब आरोप-पत्र में यह कहानी सामने आई, तो एक वकील दोस्त ने मुझे आगाह किया कि यह हंसी-मजाक की बात नहीं है। आरोप-पत्र में और भी कई मनगढ़ंत कहानियां भरी हुई थीं। अपनी नासमझी में, मैंने सोचा कि जब ये कहानियां कोर्ट में पहुंचेंगी, तो खुद-ब-खुद नाकारा बता दी जाएंगी। इसके बजाय, सुनवाई के दौरान, पुलिस ने एक सीलबंद लिफाफे में कुछ सौंप दिया और मेरी जमानत की अर्जी खारिज कर दी गई। घबराकर, मैंने देशवासियों के नाम एक अपील लिखी, मेरी उम्मीदें टूट गई हैं, मुझे आपके सहारे की जरूरत है। मैंने एक ‘‘खुद देखो’’ टेम्प्लेट भी बनाया, ताकि लोगों को अंदाजा लग सके कि उनके जेल जाने की गुंजाइश कितनी है। यह नाउम्‍मीदी में ठिठोली करने जैसा था, लेकिन यह आज की नागरिकता के लिए एक मैनुअल जैसा भी था। टेम्‍पलेट कुछ इस तरह था, एक दिन आपकी सामाजिक हैसियत जो हो या न हो आपको पता चलता है कि किसी ‘क’ राज्य की पुलिस ने आपको आतंकवादी घोषित कर दिया है। किसी अपराध की पड़ताल करते वक्‍त उसे किसी के कंप्यूटर से एक चिट्ठी मिली जो ‘ख’ को लिखी गई थी, जो पुलिस के मुतबिक आप हैं, और यह चिट्ठी ‘ग’ नाम की जगह पर मिली, जहां आप कभी गए ही नहीं। यह चिट्ठी ‘घ’ ने लिखी थी, जिसे एक प्रतिबंधित संगठन का सदस्य बताया गया, जिसमें कहा गया था कि आप ‘च’ नाम की जगह पर मौजूद थे, जिसके बारे में शायद आपने सुना भी न हो। इसकी पुष्टि एक गवाह ने की, जिसने किसी को यह कहते सुना कि उसने आपको वहां किसी और के साथ देखा था, जिसे ‘घ’ का जानने वाला बताया गया। अब, इनकी जगह अपनी मर्जी के नाम से लिख लें, और बधाई हो अब आप गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोपी हैं। आपकी नौकरी चली जाती है, आपके परिवार का सुकून छिन जाता है, आपकी बदनामी होती है, दोस्तियां खत्म हो जाती हैं और जिंदगी लंबी कानूनी टिप्पणी बनकर रह जाती है। कुल मिलाकर, यह मौत से भी बदतर लग सकता है, कम से कम मौत में तो सब कुछ खत्म हो जाने की तसल्ली होती है।

मुझे लगा था, ऐसी घटना से लोग गुस्से में आएंगे या कम से कम जिज्ञासा तो जगेगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अपनी सेल में, मैं अक्सर अपनी अपील को याद करता रहता और अपनी नासमझी पर मन ही मन हंसता था। मुझे एहसास हुआ कि देश के लोग ऐसी छोटी-मोटी परेशानियों से परेशान होना छोड़कर आगे बढ़ चुके हैं। जिस देश में बेतुकी बातें संस्थाओं के लिए अहम बन गई हों, वहां त्रासदी को ध्यान खींचने के लिए मजेदार बनना पड़ता है।

मेरी याचिकाओं का पहला दौर सुप्रीम कोर्ट के खारिज करने के साथ खत्म हुआ, और मुझे ‘उचित’ अदालत से अग्रिम जमानत लेने के लिए एक महीने का समय देकर, छोटी-सी न्यायिक दया दिखाई गई। इस तरह मेरा दूसरा दौर शुरू हुआ, सबसे निचली सीढ़ी के पुणे की अदालत में, जहां से मामला शुरू हुआ था।

तभी मुझे त्रिशूर में एक सभा में मुख्‍य अतिथि के तौर पर बुलाया गया, जहां वरिष्‍ठ सेवारत और रिटायर सरकारी अधिकारी मौजूद थे। यह थोड़ा अजीब था, हालांकि अजीब बातें तेजी से मेरी जिंदगी का हिस्सा बनती जा रही थीं। कोच्चि एयरपोर्ट जाते समय, मुझे पता चला कि मेरी अर्जी खारिज हो गई है। तब तक, खारिज होना मेरे लिए आम बात हो गई थी।

एयरपोर्ट पर, अचानक मैंने अपने पास गोवा और मुंबई के दो टिकटों में से एक को चुना और रात करीब 2 बजे मुंबई पहुंचा। जैसे ही मैं बाहर निकला, दो पुलिसवाले आए और मुझे एयरपोर्ट पुलिस थाने ले गए। मैंने कहा कि आप गैर-कानूनी काम कर रहे हैं, क्योंकि मेरे पास तब तक सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा थी। उन्होंने जवाब दिया कि वे अपने साहब का हुक्‍म मान रहे हैं, यह ऐसा हुक्‍म है, जो संवैधानिक हिदायत से भी ऊपर है। शुरू में, उन्होंने मुझे मेरा फोन नहीं दिया, बाद में दे दिया ताकि मैं घर पर मेरा इंतजार कर रही पत्नी को बता सकूं कि मुझे गिरफ्तार कर लिया गया है। जल्द ही पुणे पुलिस आ गई और उन्होंने रूटीन काम की तरह कागजात पूरे किए। एक अफसर ने मेरे बैग में लैपटॉप चेक किया। वह सबसे ऊपर ही था, लेकिन उसने उसे आइपैड बताया और आगे बढ़ गया। टेक्नोलॉजी के इस वर्गीकरण पर मैं मन ही मन हंसा। फिर, गंदे, बदबू भरे पुलिस लॉकअप में बिताए 13 घंटे मेरे लिए अनुच्‍छेद 21 (गरिमा के साथ जीने का अधिकार) पर नितांत व्‍यावहारिक सबक बन गए। कोई टेक्स्ट बुक या संवैधानिक पाठ मुझे इससे बेहतर सबक नहीं दे सकता।

लॉकअप में एक ओरिएंटेशन प्रोग्राम भी मिला। वहां मुझे दिखा कि तलोजा सेंट्रल जेल में मेरा क्या इंतजार कर रहा था, जहां मैं अपनी जिंदगी के 31 महीने बर्बाद करने वाला था। उन 13 घंटों में, संविधान एक ढाल के रूप में नहीं, बल्कि एक फसाने की तरह सामने आया, जिसे बाहर सम्मान से बोला जाता था और अंदर करीने से निलंबित कर दिया जाता था।

उन घंटों ने जेल के पाठ्यक्रम की झलक दिखाई: बस अपमान ही अपमान, ऐसा खाना जो मुश्किल से खाना कहलाए, बिना दरवाजे वाले शौचालय; बदबूदार माहौल में सहनशक्ति और लगातार तनाव में जिंदगी। एक महामारी के दौरान दुनिया से कटा हुआ, जिसे नौकरशाही की क्रूरता के साथ चलाया जा रहा था।

पीछे मुड़कर देखने पर, लॉकअप ने ठीक वैसा ही काम किया जैसा उसे करना चाहिए था। उसने मुझे सिखाया कि गरिमा, आजादी की तरह, जेल में सिर्फ एक संवैधानिक कल्पना के रूप में जीवित रहती है। जब बाद में कोर्ट ने मेरी गिरफ्तारी को अवैध घोषित किया और मेरी रिहाई का आदेश दिया, तो मैं हंसा, मेरी जिंदगी के अब तक के सबसे हास्यास्पद काम पर।

खैर! मुझे जमानत मिल गई, यह मेरी खुशकिस्मती है, यूएपीए में यह लगभग नामुमकिन है। हालांकि लोग अक्सर यह गाना गाते रहते हैं, ‘‘जमानत ही नियम है...’’

मुझे अब भी अपने बिग डेटा, अपने छात्रों, दोस्तों की याद आती है, जो मुझसे संपर्क रखने से बहुत डरते हैं। मैं महाराष्ट्र के बाहर लेक्चर के लिए न्‍यौता स्वीकार नहीं कर सकता। यूरोप की लगभग छह यूनिवर्सिटी ने मुझे अपनी फेलोशिप/लेक्चर के लिए बुलाया था, लेकिन कोर्ट ने मना कर दिया। मैंने एक दर्जन से ज्यादा न्‍यौतों में एक लिटफेस्ट के लिए इजाजत लेने की हिम्मत की, लेकिन उसे ‘अकादमिक लग्जरी’ कहकर खारिज कर दिया गया। मुझे अपनी सामान्‍य जिंदगी की याद आती है।

खैर, बेल मिलना थोड़ी राहत की बात है क्योंकि मैंने अपनी जिंदगी तो वैसे भी खो दी है! मैं अब भी खुद पर हंस लेता हूं...ऐसी बात पर जिस पर हंसा नहीं जा सकता?

 

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