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फिल्म शख्सियत/मधुबाला: जाओ रह न सकोगे चैन से

इंटरनेट से पहले के दौर में भी उनकी ख्याति दूर-दूर तक थी और उनके चाहने वाले ग्रीस तक थे
परदे की वीनस मधुबाला

मधुबाला की छवि को दर्शकों ने एक खास तरह की त्रासदी या कहें उदासी के साथ स्मृति में रखा। संभव है इसके पीछे बहुत हद तक मुगल-ए-आजम का अनारकली का वह अमर पात्र हो, जो गहन उदासी से बुना हुआ था। ऐसी छवि बनाने में उन किस्सों का भी कम योगदान नहीं रहा, जिसमें, उनके दिल टूटने की कहानियां थीं, जन्म से दिल में छेद के कारण बीमार रहना और फिर बहुत कम उम्र (36 साल) में दुनिया-ए-फानी छोड़ देना शामिल था। उनके बहुत छोटे करियर ने भी इन धारणाओं मजबूती ही दी। लेकिन मधुबाला को केवल इस उदास नजरिए से देखना एक तरह से उनके व्यापक दायरे वाले, कला-कौशल से भरपूर करियर के प्रति नाइंसाफी ही होगी। अपने समय की वे सबसे बहुमुखी कलाकारों में से एक थीं।

लगभग दो दशकों में, उन्होंने लगभग तिहत्तर फिल्मों में अभिनय किया। यह उपलब्धि केवल संख्या के लिहाज से ही नहीं, बल्कि विविधता के लिहाज से भी बहुत उल्लेखनीय है। उस समय जब फिल्म इंडस्ट्री अभिनेत्रियों को अक्सर सीमित दायरे में बांध देती थी, तब भी उन्होंने विभिन्न शैलियों में सहजता से काम किया। वह रोमांटिक फैंटेसी, हल्की कॉमेडी, डार्क ड्रामा, ऐतिहासिक भव्यता और संगीतमय मनोरंजन जैसी भूमिकाओं में सहजता से ढल जाती थीं।

मधुबाला का सितारा होना सिर्फ अपने देश का किस्सा नहीं था, बल्कि दूर देशों के दिलों पर भी उनका जादू छाया हुआ था। उन्होंने इंटरनेट के दौर से पहले भी वैश्विक लोकप्रियता का गजब उदाहरण पेश किया था। उनकी स्टार छवि अप्रत्याशित रूप से ग्रीस जैसे दूर-दराज के स्थानों तक भी पहुंची। ‘मधुबाला’ गाना उसी सांस्कृतिक मिलन का उदाहरण है, जहां फिल्मों ने सरहदें पार की और लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गया। ग्रीस के गायक स्टेलियोस कज़ान्टजिडिस का गाया यह अनोखा गीत मधुबाला को रोमांटिक काल्पनिक पात्र के रूप में प्रस्तुत करता है। ‘मधुबाला’ गीत के बोल उन्हें आकर्षण का केंद्र बनाते हैं, स्क्रीन पर देखा गया एक चेहरा, एक दूर का सितारा, कोई ऐसा जिसकी छवि तड़प पैदा करती है।

मधुबाला

यह उस समय की बात है, जब यूरोपीय पॉप संगीत में भारतीय छवियों का इस्तेमाल रोमांस और भव्यता के लिए किया जाता था। 1950 और 60 के दशक में हिंदी सिनेमा का वैश्विक प्रसार अक्सर उन सितारों पर केंद्रित था जिनकी अभिव्यक्ति यानी चेहरे के हावभाव भाषा से परे थे। ‘मधुबाला’ गाना इसी का एक उदाहरण था। उनका चेहरा वैश्वीकरण से पहले सांस्कृतिक प्रसार का सबूत था। मधुबाला की स्क्रीन उपस्थिति, उनके चेहरे के भाव, संगीत और रहस्यमय क्लोज-अप ने उन्हें विदेश में लोकप्रिय बनया। संक्षेप में कहें, तो बिना सबटाइटल के भी उनके हावभाव समझे जा सकते थे।

मधुबाला को भारतीय सिनेमा से अलग भी कुछ अवसर मिले। कहा जाता है कि इट हैपन्ड वन नाइट (1934) और इट्स अ वंडरफुल लाइफ (1946) के निर्देशक फ्रैंक कैप्रा चाहते थे कि वे लॉस एंजिल्स आकर उनके साथ वहां काम करें। लेकिन मधुबाला के पिता ने उनकी सेहत और विदेश में काम करने की अनिश्चितता के कारण इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उनके दिल में छेद है इस जानकारी ने उनके अंतरराष्ट्रीय करिअर को सीमित कर दिया।

मधुबाला का अभिनय ऐसा था कि वह बिना संवाद के भी दिल से जुड़ जाती थीं। उनकी खासियत थी कि वह दूसरे अभिनेताओं के साथ तालमेल बिठाकर काम करती थीं और एक ही दृश्य में अपनी आवाज और भाव बदल लेती थीं। वह चुप रहकर भी बहुत कुछ कह देती थीं। उनकी गायकी भी कमाल की थी, भले ही गाने रिकॉर्ड करने वाले दूसरे गायक होते थे, लेकिन मधुबाला उन पर होंठ ऐसे हिलातीं थीं जैसे वही गा रही हों। उनकी यह अदा गाने को और भी सुंदर बना देती थी। वह अनौपचारिक तरीके से गा भी लेती थीं और उनके साथ काम करने वाले लोग उनकी धुन और ताल की समझ की तारीफ करते थे।

मधुबाला गाने में इतना डूब जाती थीं कि गाना सिर्फ स्क्रीन पर चलता नहीं था, बल्कि वह गाने को जीती थीं। उनकी सांसें, चेहरे की हरकतें और आंखों की शरारत गाने की धुन के साथ इतनी मेल खाती थी कि लगता था आवाज और शरीर एक ही जगह से निकल रहे हैं। आजकल के बॉलीवुड में यह खासियत कम ही देखने को मिलती है। यही कारण रहा कि उनके गाने और भी खास बन गए।

मधुबाला की फिल्मों में अक्सर एक ही टीम के साथ काम करने से उनकी परफॉर्मेंस में एक खास स्थिरता आती थी। गुरु दत्त के साथ मिस्टर एंड मिसेज 55 (1955) में उनकी कॉमेडी कमाल की थी। गुरु दत्त की सधी हुई स्टाइल और मधुबाला की जीवंतता ने अच्छा कंट्रास्ट बनाया। दिलीप कुमार के साथ तराना (1951), संगदिल (1952) और मुगल-ए-आजम (1960) जैसी फिल्मों में उनकी जोड़ी ने दिखाया कि वह दिलीप कुमार जैसे भावनात्मक अभिनेता के साथ भी बराबरी से काम कर सकती थीं, बिना उनकी भारी शैली की नकल किए। देव आनंद के साथ काला पानी (1958) जैसी फिल्मों में उन्होंने आधुनिक और शहरी अंदाज अपनाया, जो देव आनंद के आकर्षक व्यक्तित्व के साथ अच्छी तरह जंचा और 1950 के दशक के रोमांटिक थ्रिलर्स की खास केमिस्ट्री को स्थापित करने में मदद की।

अपनी फिल्मों में हर दृश्य को बहुत सलीके से पेश करने वाले निर्देशक के. आसिफ के साथ काम करने से, मधुबाला की अभिनय शैली में एक खास स्थिरता और शिल्पकला जैसी सुंदरता आ गई। मुगल-ए-आजम (1960) के जेल वाले दृश्यों में ये सबसे ज्यादा निखर कर सामने आए। किशोर कुमार जैसे अभिनेता, जो बहुत बेहतर कॉमेडियन भी थे के साथ भी उन्होंने हल्की-फुल्की फिल्में की। किशोर कुमार से तो उन्होंने शादी भी की थी। उनके साथ काम करने वक्त भी मधुबाला ने ध्यान आकर्षित करने की कोशिश के बजाय अपनी गति को ही उनके साथ तालमेल बिठाकर काम किया।

मधुबाला की कॉमेडी की समझ उनके काम का ऐसा पहलू है, जिसे हिंदी सिनेमा में कम कर आंका गया। मिस्टर एंड मिसेज 55 जैसी फिल्मों में उन्होंने दिखाया कि कॉमेडी के लिए केवल नियंत्रण की जरूरत होती, बल्कि खुद को थोड़ा बेवकूफ दिखाने की भी हिम्मत चाहिए होती है। मधुबाला इसे बखूबी समझती थीं। मिस्टर एंड मिसेज 55 की कहानी एक ऐसी अमीर लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे उसकी दबंग और पुरुष-विरोधी चाची संपत्ति संपत्ति हासिल करने के लिए नकली शादी करने के लिए बहकाती और मजबूर करती है। यह कहानी महिलाओं की स्वतंत्रता और नारीवादी राजनीति को भ्रामक, अतिवादी और पुरुष-विरोधी के रूप में प्रस्तुत करती है। कहानी अंततः अपनी नायिका को पारंपरिक घरेलू जीवन की ओर मोड़ देती है, यह संकेत देते हुए कि रोमांटिक प्रेम और पुरुष का मार्गदर्शन आधुनिक महिला स्वतंत्रता को ‘सुधारने’ वाली शक्तियां हैं।

लेकिन जब फिल्मों की कहानियों में वैचारिक सीमाएं थीं, उनमें साफ तौर पर नारी-विरोधी झलक दिखाई देती थी, तब भी मधुबाला की मौजूदगी उन कहानियों को और जटिल बना देती थी। खासकर इसलिए क्योंकि उस समय वह हिंदी सिनेमा की सबसे ज्यादा फीस पाने वाली अभिनेत्रियों में से एक थीं। उनकी कमाई इस बात का संकेत थी कि उस दौर में किसी महिला के लिए इतनी आर्थिक ताकत पाना बहुत दुर्लभ था। दरअसल, यह भी सच है कि वह एक कामकाजी महिला थीं, जो अपने बड़े परिवार का सहारा बनीं, वह खुद अपने कॉन्ट्रैक्ट तय करती थीं और बॉक्स ऑफिस पर अपनी मजबूत पहचान रखती थीं। यह सब कहीं न कहीं नारीवाद की ही देन था। इसलिए एक तरफ उनका किरदार पुरानी सोच को बढ़ावा देता है, वहीं दूसरी तरफ एक कामकाजी महिला के तौर पर उनकी सफलता उस सोच के खिलाफ है। पुरानी कहानियों में काम करते हुए भी आधुनिक और स्वतंत्र होना ने उनकी छवि को खास बना दिया, जैसा ज्यादातर महिला कलाकारों के साथ हुआ।

(फिल्म, टीवी और संस्कृति की आलोचक। लिंग, राजनीति और सत्ता के आपसी संबंधों के नजरिए से मीडिया विश्लेषण के लिए जानी जाती हैं।)

 

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