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2 फरवरी 2026 · FEB 02 , 2026

क्रिकेटः गलत संदेश

बांग्लादेश-भारत संबंधों पर मंडरा रहे तनाव के बीच क्रिकेट को नुकसान होगा या यह एक रणनीतिक चूक साबित होगी?
मैदान से बाहरः आइपीएल में खरीद के बाद मुस्तफिजुर रहमान का विरोध

भारतीय उपमहाद्वीप क्रिकेट कूटनीति के रंगमंच के लिए एक तरह का ब्रॉडवे रहा है। इस खेल में वह शीर्ष पर है। उसने अपनी उपस्थिति को मजबूत बना लिया है। कहा जा सकता है कि खेल की दिशा और गति को अक्सर भारत निर्धारित करता है। हालांकि सबसे लोकप्रिय चेहरों वाला, दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआइ और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आइसीसी) के शीर्ष पर प्रभावशाली भारतीय चेहरा होने के बावजूद, पड़ोसी देश बांग्लादेश के साथ कूटनीतिक रिश्तों में आई खटास के कारण भारत खुद को उपमहाद्वीप में पहले से कहीं ज्यादा अकेला महसूस कर रहा है।

चुनावों की आहट के बीच बांग्लादेश हिंसा, राजनैतिक अस्थिरता और सत्ता परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। देश में कभी कट्टरपंथ को उभरता दिखता है, तो कभी लोकतांत्रिक सामान्य स्थिति में लौटने का वादा भी है। शेख हसीना के सत्ता से हटाए जाने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव बढ़ा है और बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं ने भी ध्यान खींचा है। लेकिन यह तनाव क्रिकेट के मैदान तक पहुंच जाएगा, यह अप्रत्याशित है।

बांग्लादेश के लोकप्रिय बाएं हाथ के तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को पिछले महीने हुए आइपीएल नीलामी में कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) ने 9.20 करोड़ रुपये की भारी रकम में खरीदा। इसी दौरान ढाका-दिल्ली रिश्तों में बढ़ते तनाव और दीपू चंद्र दास की हत्या को लेकर जनभावनाएं उफान पर थीं। ऐसे माहौल में फ्रेंचाइजी मालिक शाहरुख खान एक बार फिर हिंदू कट्टरपंथी गुटों और कुछ भारतीय न्यूज पोर्टलों के निशाने पर आ गए, जिन्होंने रहमान को खरीदने के फैसले पर तीखे हमले किए।

भारी विरोध के बाद बीसीसीआइ ने केकेआर को खिलाड़ी को न लेने की सलाह दी। बीसीसीआइ सचिव देवजीत सैकिया ने एएनआइ से कहा, “हालिया घटनाक्रम को देखते हुए बीसीसीआइ ने फ्रेंचाइजी केकेआर को बांग्लादेश के मुस्तफिजुर रहमान को न लेने का निर्देश दिया है। अगर वे उनकी जगह किसी और को लेने के बारे में पूछते हैं, तो बीसीसीआइ मंजूरी देगा।”

भारत में जब यह सब हो रहा था, तब जवाब में बांग्लादेश ने आइपीएल मैचों के प्रसारण पर देश में प्रतिबंध लगा दिया और फरवरी में भारत और श्रीलंका में होने वाले आइसीसी टी20 वर्ल्ड कप के लिए भारत आने से इनकार भी कर दिया।

क्रिकेट कूटनीति का सिक्का

भारत-पाकिस्तान रिश्तों में क्रिकेट कूटनीति लंबे समय से मौजूद रही है। 1987 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया-उल-हक का भारत दौरा, परमाणु तनाव के दौर में सुनील गावस्कर से हाथ मिलाना या 1996 में ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज की सुरक्षा चिंताओं के जवाब में भारत-पाकिस्तान की संयुक्त ग्यारह का श्रीलंका में खेलना, ये घटनाएं बताती हैं कि क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, बल्कि हमेशा से रिश्तों को साधने का माध्यम भी रहा है।

अनदेखीः एशिया कप में भारत-पाक टीमें

अनदेखीः एशिया कप में भारत-पाक टीमें

उस दौर में क्रिकेट, तमाम राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद, खुलेपन और प्रतिस्पर्धा के साथ खेला जाता था। भले ही यह राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं था, लेकिन कोशिश अक्सर दोस्ती फिर कायम करने की दिशा में होती थीं। लेकिन आज का परिदृश्य इससे बिल्कुल अलग है।

पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद, भारत और पाकिस्तान सितंबर में एशिया कप में आमने-सामने आए। मैच के बाद भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव की अगुआई में टीम इंडिया ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ मिलाने से इनकार कर दिया। यादव ने कहा कि यह “टीम का फैसला” था। बाद में उन्होंने कहा, “कुछ बातें खेल भावना से ऊपर होती हैं। हम यह जीत अपने सशस्त्र बलों को समर्पित करते हैं, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में हिस्सा लिया और पहलगाम हमले के पीड़ितों के परिवारों के साथ खड़े रहे।” फाइनल में टीम ने एशियन क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष मोहसिन नकवी से ट्रॉफी लेने से भी इनकार कर दिया, जो पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री भी हैं।

दोनों देशों के बीच आखिरी द्विपक्षीय सीरीज 2012–13 में हुई थी। उसके बाद क्रिकेट में सामान्य स्थिति में लौटने की कोशिश सीमित ही रही। इसमें हाथ मिलाने और ट्रॉफी लेने से इनकार, क्रिकेट कूटनीति के पतन का साफ संकेत था। इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। पूर्व खिलाड़ियों और विपक्ष ने इसे खेल भावना के खिलाफ बताया। दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान एबी डिविलियर्स ने यूट्यूब पर कहा, “टीम इंडिया ट्रॉफी कौन दे रहा है, इस बात से खुश नहीं थी। मुझे नहीं लगता कि राजनीति को खेल में लाना चाहिए। खेल को खेल ही रहने देना चाहिए। इससे खेल, खिलाड़ी, क्रिकेटर और खेल जगत के लोग बहुत मुश्किल स्थिति में आ जाते हैं, और यही बात मुझे कतई पसंद नहीं है। अंत में माहौल काफी असहज था।”

कूटनीति की रपटीली पिच

नवंबर 2000 में स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत के पूर्वी पड़ोसी देश में हुए पहले टेस्ट मैच से लेकर अब तक, भारत-बांग्लादेश संबंध हमेशा इतने स्थिर रहे हैं कि बिना किसी राजनयिक हस्तक्षेप के मैदान पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनाई रखी जा सकती थी। लेकिन रहमान पर बीसीसीआइ की रोक और शेख हसीना को भारत द्वारा शरण देने से पैदा हुई कड़वाहट ने सब खत्म कर दिया है।

खबरों के मुताबिक आइसीसी ने बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) को भारत आने या अपने अंक गंवाने की चेतावनी दी है। हालांकि बीसीबी ने ऐसे किसी भी अल्टीमेटम से इनकार करते हुए कहा, “आइसीसी ने बीसीबी के साथ मिलकर काम करने की इच्छा जताई है और आश्वासन दिया है कि बोर्ड की राय को पूरी अहमियत दी जाएगी।”

कांग्रेस नेता शशि थरूर ने एक लेख में रहमान पर लगे प्रतिबंध को “चौंकाने वाला” बताया। उन्होंने लिखा कि यह “खेल आधारित योग्यता और रणनीतिक समझदारी, दोनों से हटकर है।” यह कदम 2008 के 26/11 मुंबई हमलों के बाद पाकिस्तानी खिलाड़ियों पर लगे आइपीएल प्रतिबंध की याद दिलाता है, जो आज तक जारी है। थरूर लिखते हैं, “बांग्लादेश की जटिल आंतरिक परिस्थितियों को पाकिस्तान जैसी राज्य-प्रायोजित दुश्मनी से जोड़ना न सिर्फ भावनात्मक प्रतिक्रिया है, बल्कि एक कूटनीतिक भूल भी है, जो दूरदृष्टि की कमी दिखाती है।”

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत की आर्थिक और प्रभावशाली स्थिति भले सुरक्षित हो, लेकिन दो सीमाओं पर बिगड़ते रिश्तों के बीच, क्रिकेट अब राजनीतिक टकराव का नया मोर्चा बनता जा रहा है।

यह देखना बाकी है कि भारत खुद थोपी गई अलगाववादी नीति मजबूत बयान साबित होगी या फिर उपमहाद्वीप की राजनीति के इस अहम दौर में रणनीतिक कमजोरियों को और उजागर करेगी।

एबी डिविलियर्स 

राजनीति को खेल में नहीं लाना चाहिए। खेल को खेल ही रहने देना चाहिए। इससे खेल जगत के लोग मुश्किल स्थिति में जाते हैं।

एबी डिविलियर्स, पूर्व कप्तान, द. अफ्रीका

देवजीत सैकिया 

बीसीसीआइ ने केकेआर को बांग्लादेश के खिलाड़ी को लेने का निर्देश दिया है। वे किसी और के बारे में पूछते हैं, तो मंजूरी मिलेगी।

देवजीत सैकिया, सचिव, बीसीसीआइ

 

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